श्रीश्रीगुरुगौरांगौ जयतः
मथुरा — २४ कार्तिक, १३३३ [ श्रीमधुसूदन गोस्वामी के साथ वार्ता — त्रिदण्डिसंन्यास विचार — इन्द्रप्रस्थ — कुरुक्षेत्र — थानेश्वरी जगन्नाथ — श्रीनगर — जम्मू — ‘कश्मीर आम्नाय’ — रावलपिंडी — कश्मीरी ब्राह्मणों का आचार-विपर्यय — तक्षशिला — लाहौर — अमृतसर — सिख गुरु-परम्परा — नानक — नानक का मतवाद — दयालसिंह व ब्राह्मधर्म — खालसा कॉलेज — स्वर्ण मंदिर — मुरादाबाद — कल्कि का भावी आविर्भाव-स्थान शम्भल — मिश्रिख — ऋषिकेश — कनखल — नैमिषारण्य। ]
स्नेहविग्रहेषु—
यहाँ आने के बाद से आपका कोई पत्र नहीं मिला है और न ही मुझे आपको कोई पत्र लिखने का अवकाश मिला। यहाँ आने के उपरांत ‘गौड़ीय’ पत्रिका भी नहीं मिली। कल श्रीवृन्दावन में तीर्थ महाराज के पास ‘गौड़ीय’ के १०वें और ११वें अंक का पाठ किया और डाक द्वारा ११वाँ व १२वाँ अंक प्राप्त हुआ। * * * ‘मणिमञ्जरी’ का ढाका से प्रकाशित होना समीचीन है।
कल श्रीयुक्त मधुसूदन गोस्वामी के साथ काफी वार्तालाप हुआ। उनमें से * * * नामक * * ‘त्रिदण्ड’ के संदर्भ में कुछ उपहास कर रहे थे। श्रीमद् मधुसूदन गोस्वामी ने उन्हें शांत कराया और हमने भी कुछ शास्त्रीय विचार रखे। वह तुरंत वहाँ से खिसक गया, अन्यथा उसे और भी शास्त्र-विचार सुनाए जाते।
विशेष उत्साह के साथ कार्य करते रहें। हमारे भ्रमण के संदर्भ में कुछ निबंध लिखने की मेरी इच्छा होते हुए भी समय निकाल नहीं सका हूँ। अतः यदि संभव हुआ तो निबंध लिख रहा हूँ; पूरा होने पर आपके पास भेज दूँगा।
तीर्थ महाराज आज वृन्दावन में हैं। दिल्ली में ‘जंतर-मंतर’ के दर्शन किए; यह प्राचीन भारतीय ज्योतिषियों के नभोमण्डल दर्शन एवं उनके स्थान-संबंधी माप तथा काल-यंत्र का मान-यंत्र है। काशी में एक छोटा मान-मंदिर अवश्य है, किंतु यह विशाल है। इन्द्रप्रस्थ में योगमाया (कुन्तीदेवी) का मंदिर तथा अनंगपाल व पृथ्वीराज की कीर्ति के ध्वंसावशेष देखे हैं। कुतुबमीनार की सर्वोच्च सीढ़ी २५४ फीट है। हिन्दू-साम्राज्य का हस्तिनापुर या पाण्डव-निवास और इन्द्रप्रस्थ आज भी प्राचीन दिल्ली के गौरव का परिचय दे रहे हैं, यद्यपि विजातीय लोगों के रहने के कारण वे सभी कीर्तियाँ प्रायः विलुप्त हो चुकी हैं।
कुरुक्षेत्र में स्यमंतपंचक, द्वैपायनह्रद, ब्रह्मसर, लक्ष्मी-कुण्ड तथा थानेश्वरी जगन्नाथ के मंदिर में महाप्रभु की गद्दी के दर्शन प्राप्त हुए। इस स्थान पर एक मठ होना आवश्यक है; यह श्रीभक्तिविनोद ठाकुर की चिरकालीन इच्छा थी। स्थानीय एक व्यक्ति ने कहा कि यह महाप्रभु की गद्दी वल्लभ-सम्प्रदाय की है; किंतु (हिन्दी) ‘भक्तमाल’ के लेखक ने श्रीचैतन्य महाप्रभु के पार्षद के रूप में थानेश्वरी जगन्नाथ को निश्चित किया है। अतः विप्रलम्भमय भगवान् श्रीगौरसुन्दर का यह स्थान कुरुक्षेत्र है; यह श्रीवल्लभीय सम्प्रदाय का नहीं है। श्रीमद्भागवत के ‘आहुश्च ते’ श्लोक का कथित वाक्य लक्ष्मीकुण्ड के तट पर स्थित है। इसी स्थान पर श्रीमन्महाप्रभु आए थे, इसीलिए श्रीरूप गोस्वामी ने ‘प्रियः सोऽयं कृष्णः सहचरि’ श्लोक लिखा था—
आहुश्च ते नलिननाभ पदारविन्दंयोगेश्वरैर्हृदि विचिन्त्यमगाधबोधैः।
संसारकूपपतितोत्तरणावलम्बंगेहं जुषामपि मनस्युदियात् सदा नः॥
(भा० १०।८२।४८)
प्रियः सोऽयं कृष्णः सहचरि कुरुक्षेत्रमिलित-स्तथाहं सा राधा तदिदमुभयोः सङ्गमसुखम्।तथाप्यन्तःखेलन्मधुरमुरलीपञ्चमजुषेमनो मे कालिन्दी-पुलिन-विपिनाय स्पृहयति॥
इसके पूर्व हम अल्प समय के लिए जम्मू राजधानी में थे। श्रीनगर से जम्मू आने में हमें मोटर से तीन दिन लगे। मार्ग में अवंतीपुर तथा बिजबिहारा अर्थात् कश्मीर-विश्वविद्यालय के ध्वंसावशेष देखे। बिजबिहारा की अनेक कृष्ण-मूर्तियाँ और विष्णु-मूर्तियाँ श्रीनगर के संग्रहालय (Museum) में सुरक्षित देखी गईं। श्रीनगर में हम श्रीमद् मधुसूदन कौल (M.A. Shastry, Research Scholar) के घर गए थे। वे हमें बिना दूध पिलाए जाने ही नहीं दिए। वे ‘कश्मीर-आम्नाय’ का कोई अनुसंधान नहीं बता सके। ये मेरे सहपाठी जे० सी० चटर्जी (J. C. Chatterjee) के स्थान पर रिसर्च सुपरिटेंडेंट ऑफिसर नियुक्त हुए हैं। कश्मीर क्षेत्र में क्रमशः हमारा एक मठ स्थापित हो सकता है। कश्मीर प्रदेश में ब्राह्मणों के अतिरिक्त अन्य कोई हिन्दू जाति नहीं है; कौल संस्कृत अच्छी बोल लेते हैं।
रावलपिंडी से हम दो दिन मोटर यात्रा करके श्रीनगर पहुँचे थे, किंतु जम्मू के रास्ते लौटते समय तीन दिन लगे। श्रीनगर में मठ स्थापित होने से पूर्व श्री * * * का इस स्थान पर आना आवश्यक नहीं है, क्योंकि यह स्थान प्रायः हिन्दू-विहीन और आचार-प्रचार से शून्य है। कश्मीरी पंडितगण संस्कृत शास्त्र में निपुण अवश्य हैं; परंतु कश्मीर की अत्यधिक शीत के कारण उनका आचार-व्यवहार अन्य प्रदेशों के हिन्दुओं से कुछ भिन्न हो गया है। विधर्मियों का अत्याचार ही इसका मूल कारण है। कलकत्ता के वयोवृद्ध ऋषिबर मुखोपाध्याय वर्तमान में कश्मीर नरेश के प्राइवेट सेक्रेटरी (Private Secretary) हैं; वे कश्मीरी पंडितों के दरबार में एकमात्र सहायक हैं।
तक्षशिला में उत्खनन-कार्य जनरल कनिंघम के समय से चल रहा है। कुछ प्राचीन स्थल प्रकाश में आए हैं और अभी भी उत्खनन जारी है। यूनानी-बौद्ध मूर्तिकला (Graeco-Buddhistic Sculpture) के प्रदर्शन हेतु तक्षशिला में एक छोटा संग्रहालय (Museum) है। हमने एक मार्गदर्शिका (Guide book) क्रय की है, जो आप लोगों के पठन हेतु शीघ्र ही भेजी जाएगी। ये सभी स्थल महाभारत में वर्णित प्राचीन धरोहर हैं। रावलपिंडी (Rawalpindi) एक नवीन नगर है।
उससे पूर्व हम लाहौर में थे। लाहौर में रणजीत सिंह की समाधि, उनका हजूरी बाग, मुग़ल राजाओं का हस्तांतरित दुर्ग तथा आलमगीर की मस्जिद दर्शनीय हैं। इसके अतिरिक्त शाहदरा स्थित जहाँगीर की समाधि एक विशाल स्थापत्य है और उसी के निकट नूरजहाँ की समाधि है। लाहौर से पहले हम अमृतसर में थे। वहाँ सिखों की ऐतिहासिक कीर्ति ‘स्वर्ण मंदिर’ (Golden Temple) स्थित है। सिखों के चौथे गुरु रामदास जी ने इस मंदिर और अमृत-सरोवर का निर्माण कराया था। वे तीसरे गुरु अमरदास के दामाद थे। पाँचवें गुरु अर्जुन, रामदास के पुत्र थे। छठे गुरु हरगोविन्द, पाँचवें गुरु के पुत्र थे। सिखों के सातवें गुरु हरिराय, हरगोविन्द के पौत्र थे। आठवें गुरु हरिकिशन, सातवें गुरु के पुत्र थे। नवें गुरु तेगबहादुर, छठे गुरु हरगोविन्द के कनिष्ठ पुत्र थे। दसवें गुरु गोविन्द, नवें गुरु के पुत्र थे। सिख धर्म के प्रवर्तक ‘नानक’ एक पटवारी कायस्थ के पुत्र थे; वे स्वयं विशेष शिक्षित नहीं थे। आदि गुरु नानक के दो पुत्र थे—श्रीचंद और लक्ष्मीचंद। श्रीचंद उदासीन भक्त थे और लक्ष्मीचंद गृहस्थ-धर्म में लीन थे।
नानक में कुछ वैराग्य होने पर भी वे भगवदुपासना के स्थान पर मनःकल्पित निर्विशेषवाद के उपासक थे। वैराग्यवान होने पर भी वे गृहस्थ थे। उन्होंने क्षत्रिय-वंश के “लैहणा” (लहना) नामक एक शिष्य को अपना धर्मगुरु-पद (pontifical seat) प्रदान किया। लैहणा ही आगे चलकर ‘गुरु अंगद’ नाम से सिखों के दूसरे गुरु हुए। उनके शिष्य अमरदास तीसरे गुरु बने। गुरु अंगद ने यद्यपि किसी विशेष ग्रंथ की रचना नहीं की, तथापि उन्होंने नानक की वाणियों का संग्रह किया और ‘गुरुमुखी’ नाम से लिपि/भाषा को प्रचलित किया।
अमरदास के दौहित्र-वंशज ही सिखों के परवर्ती गुरु हुए। आदि तीन गुरु पारमार्थिक साधना में लगे रहे, किंतु चौथे गुरु से लेकर दसवें गुरु तक विधर्मियों के अत्याचारों से पीड़ित होकर क्षात्र-नीति का आश्रय लेकर राष्ट्रीय अस्मिता की रक्षा में अधिक प्रवृत्त रहे। नानक की भक्ति निराकार के प्रति समर्पित थी। दयाल सिंह नामक एक सिख ने कलकत्ता के ब्रह्म-समाज के साथ गहरा संपर्क रखकर नानक की प्रचार-प्रणाली का ब्राह्मों के साथ समन्वय किया। अमृतसर में पूर्व युद्धक्षेत्र की स्मृति-रक्षा हेतु एक विशाल खालसा कॉलेज (Khalsa College) स्थित है, जो बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) से भी कई गुना विशाल है। हाल ही में हिन्दू समाज भी स्वर्ण मंदिर की भाँति एक अन्य भव्य हिन्दू मंदिर का निर्माण कर रहा है। इस क्षेत्र में गुलाब के बगीचे अत्यधिक मात्रा में हैं। मुरादाबाद से शम्भल तक रेल-मार्ग है। शम्भल ग्राम कल्कि भगवान् की भावी प्राकट्य-भूमि है— * शम्भलग्राममुख्यस्य ब्राह्मणस्य महात्मनः।भवने विष्णुयशसः कल्किः प्रादुर्भविष्यति॥ (भा० १२।२।१८) पृथ्वीराज की कीर्तियाँ विधर्मियों के उपद्रव के बाद भी शम्भल में पूर्णतः नष्ट नहीं हुई हैं, यद्यपि अधिकांश मंदिरों को मस्जिदों में परिवर्तित कर दिया गया है। शाहजहाँ के पुत्र मुराद के नाम पर ही ‘मुरादाबाद’ नाम पड़ा। यही शम्भल का ज़िला मुख्यालय (District Headquarters) है; यहाँ मुरादाबादी धातु अर्थात् चाँदी जैसी धातु के लोटे, कटोरी, थाली आदि बर्तनों का निर्माण होता है।
मुरादाबाद से पूर्व हम नैमिषारण्य (Nimsar) में थे—
नैमिषेऽनिमिषक्षेत्रे ऋषयः शौनकादयः।
सत्रं स्वर्गाय लोकाय सहस्रसममासत॥
(भा० १।१।४)
मिश्रिख सीताजी के पाताल-प्रवेश का स्थान है। मिश्रिख का पोहा (चिउड़ा) अत्यंत उत्तम, एक रुपया सेर, स्वच्छ और बारीक मिलता है। शम्भल से लौटकर मुरादाबाद होते हुए हम हरिद्वार गए। वहाँ गंगा किनारे शंकराचार्य का एक मठ स्थित है। वहाँ से ऋषिकेश जाने का मार्ग है। हम मोटर द्वारा ऋषिकेश तक जाकर पैदल ऊँचे पर्वत पर चढ़कर लक्ष्मणझूला पहुँचे। वहाँ से ‘मणिकूट’ पर्वत पर साधुओं के भजन-साधन हेतु निर्मित अनेक छोटी-छोटी कुटियाएँ देखीं।
सूरजमल्ल झुनझुनवाला और उनके सुपुत्र शिवप्रसाद ने इन तपस्वियों के लिए १५०-२०० कुटियाएँ थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बनवा दी हैं। वहाँ काली-कमलीवाले के ‘आत्मप्रकाश’ नामक एक शिष्य नित्य साधुओं को भोजन कराते हैं। ऋषिकेश में भरतजी का मंदिर ही सबसे प्राचीन है। कनखल सती-देह का त्याग-स्थल है; यह हरिद्वार के निकटवर्ती प्राचीन तीर्थ है।
यह पत्र वासुदेव प्रभु को और मठ के अन्य जिन भक्तों को जिज्ञासा हो, उन्हें दिखाइएगा। भक्तिसर्वस्व गिरि ने अंग्रेज़ी में प्रमाण-पत्र प्राप्त किया है, यह पढ़कर परम आनंद हुआ। इस प्रकार भिन्न-भिन्न स्थानों पर संन्यासी और ब्रह्मचारी जब अपनी योग्यता का परिचय देते हैं, तो हमारे हर्ष की सीमा नहीं रहती।
श्रीमध्वगौड़ीय मठ का उत्सव सुचारु रूप से संपन्न हो रहा है, यह जानकर प्रसन्नता हुई। ढाका का उत्सव समाप्त होने पर भारती महाराज संभवतः कलकत्ता आएँगे; और पर्वत, पुरी तथा अरण्य—तीनों महाराज पूर्वी बंगाल के विभिन्न क्षेत्रों में कुछ दिन और प्रचार कर सकते हैं। अलग-अलग स्थानों में विभक्त होकर कार्य करने पर ही सामूहिक रूप से विशाल कार्य का संपादन संभव हो सकेगा।
इस क्षेत्र के अंतर्गत वाराणसी में मठ की स्थापना हो चुकी है, नैमिषारण्य में मठ का निर्माण चल रहा है, और कुरुक्षेत्र में मठ स्थापित होगा। मथुरा मंडल में भी एक स्थान प्राप्त होने की संभावना है। तत्पश्चात बम्बई प्रदेश और मद्रास के किसी स्थान पर दो मठों की स्थापना आवश्यक है। भारत के कोने-कोने में शुद्ध-भक्ति और कृष्ण-प्रेम के प्रचार-केंद्र (Church of Devotion and Love) का विस्तार होना अनिवार्य है। आप सभी को संभवतः महाप्रभु की वाणी का स्मरण होगा ही—
“पृथिवीते आछे यत नगरादि ग्राम।
सर्वत्र प्रचार हइबे मोर नाम॥”
महाप्रभु के सिद्धांतों में हमें क्षात्र-नीति, वैश्य-नीति, शूद्र-नीति या यवन-नीति का कोई स्थान नहीं दिखता। उनकी प्रचारित वाणियों से स्पष्ट है कि उन्होंने ऋषि-नीति के सर्वोच्च शिखर का आश्रय लिया था। हम भी उन्हीं के पदचिह्नों पर चलते हुए ब्रह्म-नीति रूप भागवत-धर्म का ही आश्रय ग्रहण करेंगे।
नित्याशीर्वादक
श्रीसिद्धान्तसरस्वती