श्रीश्रीगुरुगौरांगौ जयतः
श्रीगौड़ीय मठ, कलकत्ता
ई० २२।१।२४
[ तरुसम (वृक्ष के समान) सहिष्णुता — असहिष्णुता की सीमाओं के भीतर भी सहिष्णुता की शिक्षा आवश्यक है। ]
प्रभो,
आपका पत्र प्राप्त हुआ। वैष्णव की शिक्षा के संदर्भ में महाप्रभु ने जो ‘तृणादपि’ श्लोक कहा है, उसमें से ‘सहिष्णुता’ वृक्ष के समान रखनी होगी। कृष्ण की इच्छा से जब सहन करने का अवसर उपस्थित हो, तब कुछ हद तक सहन करें। उसमें असह्य होने पर भी कुछ सीमा तक सहन करने की शिक्षा प्राप्त होगी। कुछ दिनों के पश्चात कलकत्ता की ओर आएँ। किंतु इस बीच इसे क्लेश-सहन-धर्म की शिक्षा का ही अवसर समझें। अन्य बातें बाद में बताऊँगा।
नित्यस्नेहाक्षी
श्रीसिद्धान्तसरस्वती