श्रीश्रीगुरुगौरांगौ जयतः

श्रीगौड़ीयमठ, कलकत्ता
ई० ६।१।२२

[ माया के साथ मिश्रित होकर भगवद्-अवतार की कल्पना करना अपराधमय मायावाद है — विभिन्न प्राकृत-सहजिया मतों की विचित्रताओं का खंडन।]

स्नेहविग्रहेषु—

आपका २१ तारीख का पत्र (कार्ड) प्राप्त हुआ। श्रीयुक्त प्रभु इस समय ऋतुद्वीप और जह्नु-मोदद्रुम आदि द्वीपों में भ्रमण कर रहे हैं। जिस दिन वे धनबाद जाना चाहेंगे, उस दिन पहले ही सूचित कर देंगे।

हम सब यहाँ कुशलपूर्वक हैं। सुंदरानंद अभी भी यहीं हैं।

परलोकवासी …बाबू थियोसॉफिस्ट (ब्रह्मविद्यावादी) मतावलंबी प्रतीत होते हैं। उन्होंने यथार्थ शुद्ध-भक्ति के सिद्धांत को ग्रहण नहीं किया था; अतः उनकी लेखनी से ये सभी अपसिद्धांत ही प्रकट हुए होंगे।

१. श्रीगौरसुंदर की लीला नित्य है, अतः किसी नैमित्तिक भय निवारण (अभयदान) हेतु निराकार ब्रह्म साकार नहीं हुए हैं; यह विचार कोरा मायावाद मात्र है।
२. सविशेष ब्रह्म सदैव शुद्ध जीवों के प्रति ही प्रीति-युक्त रहते हैं; वे बद्ध जीवों के साथ कोई प्रीति स्थापित नहीं करते। बद्ध जीव उनके प्रति जो भी लौकिक माया-ममता रखता है, वह उन तक नहीं पहुँच पाती। आपने उस ग्रंथ से जो वाक्य उद्धृत किए हैं, उन्हें पढ़कर हम अपनी हँसी रोक नहीं पा रहे हैं। इस प्रकार की अज्ञानता व अपरिपक्वता का प्रतिवाद करने जाना भी लेखक को अनुचित सम्मान देना होगा। लेखक की जड़बुद्धि इतनी प्रबल थी कि उन्होंने सांसारिक माता-पिता की सेवा का धर्म महाप्रभु के ऊपर थोपकर कोई उचित कार्य नहीं किया है।
३. तीसरा प्रश्न पूर्णतः अविवेकपूर्ण और विचारहीनता का परिचायक है।
४. श्रीश्री महाप्रभु ने कभी भी अपने पूर्वाश्रम की पत्नी को ‘साड़ी’ खरीदकर नहीं भेजी थी।
५. श्रीनिमाई ही जानते हैं कि उन्होंने …बाबू की कोई सेवा स्वीकार की है या नहीं; परंतु हमारे जैसे जीवों के प्रति तो उनकी निर्दयता ही प्रकट हुई है।
६. छठे प्रश्न का उत्तर केवल अट्टहास (जोर की हँसी) ही है।

नित्याशीर्वादक
श्रीसिद्धान्तसरस्वती