श्रीश्रीगुरुगौरांगौ जयतः

श्रीयुक्त अतुलचन्द्र बनर्जी का आश्रम
डी० टी० एम०-ऑफिस, धनबाद
ई० ३०।९।२१

[ ढाका में नियम-सेवाव्रत — साधुसंग ही सेवा का मूल है। ]

आपका १० आश्विन का पत्र पाकर समाचार ज्ञात हुआ। मेरा स्वास्थ्य पहले की अपेक्षा काफी अच्छा है। कलकत्ता श्रीआसन के जन्मोत्सव में आप नहीं आ सके। अस्तु, हाल ही में ढाका शहर में एक मास तक नियम-सेवा व्रत का पालन किया जाएगा। मानव जीवन में संग ही हरि-भजन की प्रधान वृत्ति है। अवैष्णव-संग के प्रभाव से जीव की संसार में आसक्ति बढ़ती है, और साधु-संग के प्रभाव से आत्मा उत्तरोत्तर हरि-सेवा में प्रवृत्त होती है। मानव जीवन में यही एक सर्वप्रधान अवलंबन है; इससे विमुख न हों। पूजा के समय यदि कलकत्ता स्थित आसन में आते हैं, तो वहाँ से ढाका श्रीनियम-सेवा करने जा सकते हैं; तब एक मास से अधिक समय तक साधुसंग का सुफल प्राप्त होगा। संग से वंचित होकर हम व्यर्थ ही जीवन बिता रहे हैं। अन्य कार्य हरि-सेवा का स्थान ले रहे हैं, इसलिए मेरी इच्छा है कि आप ढाका में ‘श्रीमध्वगौड़ीयमठ’ की स्थापना के समय एक मास हरि-सेवा में योगदान दें। प्रत्युत्तर में यह अवश्य बताएँ कि आप किस तारीख को ढाका जाने हेतु आसन में आ रहे हैं। “श्रेयांसि बहुविघ्नानि” (शुभ कार्यों में अनेक विघ्न आते हैं) का विचार करके *”लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते तूर्ण यतेत न पतेदनुमृत्यु यावन् निःश्रेयसाय विषयः खलु सर्वतः स्यात्”* श्लोक पर विशेष रूप से विचार कीजिएगा।

नित्याशीर्वादक
श्रीसिद्धान्तसरस्वती