नित्यलीला प्रविष्ट ॐ विष्णुपाद परिव्राजकाचार्य त्रिदण्डिस्वामी १०८ श्री श्रीमद्भक्तिसुधीर याचक गोस्वामी महाराज
प्रणाम
नमो ॐ विष्णुपादाय गौर प्रेष्ठाय भूतले।
श्रीमते भक्तिसुधीर याचक गोस्वामीति नामिने।।

श्रीलमहाराज पूर्वबंग ढाका विक्रमपुर परगनान्तर्गत कोई एक गाँव में आविर्भूत हुये। इनकी पूर्वस्थली के सारे परिचय अज्ञात हैं। श्रीलप्रभुपाद द्वारा पूर्वबंग में विभिन्न स्थानों पर श्रीचैतन्यवाणी प्रचार के समय उनको श्रील प्रभुपाद के दर्शन हुये और बहुत से स्थानों पर उनसे वीर्यवती हरिकथा सुनकर उन्होंने कॉलेज का अध्ययन त्याग कर श्रीलप्रभुपाद के श्रीचरणों में नित्यकाल के लिए आश्रय ग्रहण कर एवं हरिनाम दीक्षा प्राप्त कर श्रीपाद सुधीरकृष्ण दास ब्रह्मचारी नाम प्राप्त किया। कुछ दिन बाद श्रील प्रभुपाद ने श्रीमन्महाप्रभु की वाणी प्रचार के लिए इनको पांचरात्रिक विधानानुसार त्रिदण्ड संन्यास मन्त्र दीक्षा प्रदान की एवं त्रिदण्डि स्वामी श्रीमद्भक्तिसुधीर याचक महाराज नाम से आदरणीय हुये।

सन् १९३७ में श्रीलप्रभुपाद के अन्तर्धान लीला प्रकाश करने से श्रीलमहाराज ने बहुत वर्षों तक श्रीधाम मायापुर में श्रीचैतन्य मठ के आचार्य श्रीमद्भक्तिविलास तीर्थ गोस्वामी महाराज के आनुगत्य में श्रीलप्रभुपाद के प्रतिष्ठित भारतवर्ष के समस्त मठ मन्दिरों में बहुत सेवा की। श्रीलमहाराज ने बंगला, अंग्रेजी, उड़िया, हिन्दी, पञ्जाबी बहुत प्रकार की भाषा से बंग, बिहार, उड़ीसा, दिल्ली, जयपुर, पञ्जाब, कश्मीर, गुजरात, महाराष्ट्र, पश्चिमांचल, उत्तरांचल एवं ब्रह्मदेश आदि स्थानों पर जीवन के अन्तिम समय तक परम उत्साह के साथ श्रीलप्रभुपाद, श्रीलभक्तिविनोद ठाकुर, श्रीलरूप-रघुनाथ का भजन वैराग्य आदर्श एवं श्रीमन्महाप्रभु की वाणी का प्रचार किया। इनके मुखारविन्द से हरिकथा सुनकर बहुत ज्ञानी-गुणी, शिक्षित एवं पण्डित उच्च समाज के लोगों ने सन्तोष प्राप्त कर बहुत सम्मान और आदर पूर्वक इन्हें प्रशंसा पत्र भेजा था।

श्रील महाराज ने एक-दो शिष्य किये हैं। श्रीधाम वृन्दावन में श्रीमन् विहारी जू के पीछे यमुना किनारे एक मठ निर्माण कर अपने प्राण प्रियतम श्रीश्रीराधाविनोद जू के श्रीविग्रह प्रतिष्ठा कर सेवा प्रकाशित की, किन्तु योग्य सेवक के अभाव में अपने मठ गुरुभ्राता श्रीमद्भक्तिश्रीरूप सिद्धान्ती महाराज को समस्त सेवा का दायित्व समर्पण कर ५ जून, सन् १९८६ को वैशाख महीना में अप्रकट लीला प्रकाश कर श्रीश्रीलराधाविनोद जू की नित्यलीला में प्रविष्ट हुये।