नित्यलीला प्रविष्ट ॐ विष्णुपाद परिव्राजकाचार्य त्रिदण्डि स्वामी १०८श्री श्रीमद्भक्ति विलास तीर्थ गोस्वामी महाराज

प्रणाम नमो ॐ विष्णुपादाय गौरप्रेष्ठाय भूतले।
श्रीमते भक्तिविलास तीर्थगोस्वामीति नामिने।।
मेरे गुरुपादपद्म श्रीलप्रभुपाद प्रेष्ठ श्रीमद्भक्तिविलास तीर्थ गोस्वामी महाराज पूर्वबंग, यशोहर जिला, नड़ाइल महकमा, कालिया थाना अन्तर्गत चाँचुड़ी पुरुलिया गाँव के एक सम्भ्रान्त वैष्णव परिवार में ४/२/१८९४ ई. १३०२ बंगाब्द १९ चैत्र शुक्ला सप्तमी, सोमवार श्रीरामचरण दास के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में आविर्भूत हुये। पिता माता ने इनका श्रीउमापति नाम रखा। इनके कनिष्ठ भ्राता श्रीगणपति (श्रीसम्विदानन्द दास) थे। वे सुवर्णकान्ति, सौम्यदर्शन, मधुरभाषी, विनम्र व्यवहारी, मेधावी एवं ईश्वरानुरागी थे। शिशु अवस्था में श्रीभागवत को अतिशय आदर करते एवं सभीका आनन्द वर्धन करते थे।
वे अत्यन्त कृतित्व एवं प्रशंसा के साथ सन् १९११ में प्रवेशिका परीक्षा में उत्तीर्ण हुये। पिता का देहान्त होने के कारण विद्याध्ययन बन्द हो गया। संसार में प्रवेश कर दो पुत्र नन्द और ध्रुवानन्द को जन्म दिया। धन उपार्जन के लिए कलकत्ता आकर किराये के घर में रहकर जनरल पोस्ट आफिस (जी. पी. ओ.) में नौकरी की। कर्म जीवन में एक फकीर वेशी महापुरुष के साथ उनका साक्षात्कार हुआ। वे सद्गुरु की प्राप्ति के लिए बहुत धार्मिक प्रतिष्ठानों में जाते थे। अन्त में श्रीधाम नवद्वीप राणीरचड़ा स्थान पर आपको भजनानन्दी महात्मा महाभागवत श्रीलगौरकिशोर दास बाबाजी महाराज के दर्शन प्राप्त हुये। उनके मुखारविन्द से हरिकथा सुनकर अत्यन्त मुग्ध हुये। श्रीलबाबाजी महाराज के निर्देश से उन्होंने सपरिवार जगद्गुरु श्रीलप्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर के चरण में आत्म समर्पण कर हरिनाम दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा के बाद वे श्रीपाद कुञ्जबिहारी दासाधिकारी नाम से परिचित हुये। दीक्षा के उपरान्त वे निज उपार्जित समस्त धन निष्कपट भाव से श्रीलगुरुदेव प्रभुपाद के चरणों में समर्पण कर देते। श्रीलप्रभुपाद इनका सारा संसार सम्भालते थे। वे वास्तविक रूप से गुरुपादपद्म सर्वस्वं गुरवे दद्यात इस शास्त्र उक्ति के मूर्त विग्रह थे। उन्होंने गौड़ीय सिद्धान्त का सही रूप से अध्ययन कर विभिन्न दर्शन शास्त्र की परीक्षा में विशेष कृतित्व अर्जन किया। श्रील प्रभुपाद ने इनको आचार्यत्रिक, महामहोपदेशक, विद्याभूषण, भागवतरत्न उपाधियाँ प्रदान कीं। श्रीलप्रभुपाद ने इन्हें आचार्यत्रिक महामहोपदेशक श्रीकुञ्जबिहारीविद्याभूषण भागवतरत्न नाम दिया।
श्रीलप्रभुपाद ने प्रथम भजनानन्दी श्रीपाद को गौराणी प्रचार के लिए विशेष निवेदन कर कलकत्ता महानगरी भेज कर उल्टाडिंगि १ नं, जंक्शन रोड पर एक किराये के घर को श्रीभक्तिविनोद आसन नाम देकर प्रथम प्रचार शुरू किया। उन्होंने निष्कपट रूप से गुरु वैष्णव सेवा में सर्वस्व देकर कभी ऋणग्रस्त हो जाते थे। वह ऋण चुकाने के लिए नौकरी किये बिना दूसरे काम द्वारा अर्थ संग्रह करते थे। क्योंकि श्रीलप्रभुपाद के साथ प्रचार कार्य में जीने का व्रत ले लिया था। थोड़े दिन के अन्दर इनकी गुरु-वैष्णव सेवा, भजनादर्श एवं अभिभावुकता से मुग्ध होकर बहुत प्राज्ञ-विज्ञ सुकृतिमान व्यक्तियों ने श्रीलप्रभुपाद का चरणाश्रय कर मठ की सेवा एवं श्रीलगुरुदेव की सेवा कर अपना-अपना जीवन धन्य करने लगे। इनकी कृपा और विशेष चेष्टा से एक महा कंजूस श्रीजगदीश बाबू ने श्रील प्रभुपाद के एकान्त शिष्य होकर बागबाजार गौड़ीय मठ के साधारण सम्पादक के पद को स्वीकार कर बहुत सेवा की। मठ के सभी भक्त इनको आदर पूर्वक कुंजदा कहकर बहुत सम्मान एवं प्यार करते थे। इनकी विशेष चेष्टा से श्रीधाम मायापुर श्रीचैतन्य मठ में चैतन्यमठ प्रदर्शिनी एवं गौड़ीयमठ प्रदर्शिनी आयोजित हुई।
श्रीलगुरुदेव प्रभुपाद के अन्तर्धान होने पर (१२) साल बाद १२ चैत्र, बृहस्पति वार को श्रीलप्रभुपाद की समाधि मन्दिर के प्रांगण में अपने गुरुभ्राता संन्यासी एवं ब्रह्मचारियों की उपस्थिति में श्रीकुंजदा ने श्रीलप्रभुपाद के संन्यासी शिष्य श्रील भक्तिविज्ञान आश्रम महाराज के निकट त्रिदण्ड संन्यास ग्रहण कर श्रीमद्भक्तिविलास तीर्थ गोस्वामी महाराज नाम से परिचित हुये। श्रीलमहाराज ने समस्त सतीर्थ गुरुभ्राताओं की सम्मति से श्रीधाम मायापुर आकर मठराज श्रीचैतन्यमठ का आचार्य पद ग्रहण किया। उन्होंने आचार्य के रूप में श्रील प्रभुपाद का मनोभीष्ट पूर्ण किया। उन्होंने आन्ध्रप्रदेश के गुन्टुर, पुरीधाम में स्वर्गद्वार, २४ परगना, डायमण्ड हारवार, श्रीधाम वृन्दावन श्रीमदनमोहन घेरा में श्रीगौड़ीयमठ एवं कलकत्ता रासविहारी एवेन्यू में श्रीचैतन्य रिसर्च इन्स्टिट्यूट स्थापित करके श्रीश्रीराधागोविन्द जू की सेवा प्रकाश की।
श्रीलमहाराज द्वारा वसरा में काम करते समय श्रीलप्रभुपाद ने इनको एक आशीर्वाद पत्र लिखा-
प्राणाधिक कुंजबाबू ! आज कुछ दिन व्यतीत हो गये आपका पत्र नहीं मिला। मेरे जीवन की आशा भरोसा कम है, यह मैं सोचता हूँ। अगर समय रहे तो और एक पत्र लिखूँ, नहीं तो समझ लीजिये ये ही मेरा अन्तिम पत्र है। पत्र के माध्यम से मेरा विशेष आशीर्वाद स्वीकार कीजिये। श्रीलसनातन गोस्वामी के चार सेवा कार्य थे- लुप्ततीर्थ उद्धार, भक्तिसिद्धान्त प्रचार, वैष्णव स्मृति, समाज स्थापन एवं श्रीमदनमोहन विग्रह का लोक समाज में प्रकटन। तदनुकरण में मैं एवं मेरे प्राणाधिक तुम सब यह चार विषय साध्यानुसार पूर्ण करना। पृथ्वीपर रहते हुये यह चार कार्यों को करने से श्रीगौरसुन्दर की कृपा अवश्य ही मिलेगी। और एक विषय है- श्रीचैतन्यमठ के ट्रस्टियों में तुमको एक चुना है। मेरी इच्छानुसार तुम वही कार्य स्वीकार कर हरिसेवा अवश्य ही करना। तुमको मैं विशेष रूप से प्यार करता हूँ, इसलिए कुछ दिन बाद इस शरीर में नहीं रहूँ तो जिस किसी अवस्था में मैं रहूँगा, आपके साथ अवश्य ही साक्षात् करूंगा। श्रीवार्षभानवी तुम्हारा कल्याण करें। तुम्हारी सरलता, जड़ विषय त्याग एवं मैं अति क्षुद्र हूँ, फिर भी मेरे प्रति जो तुम्हारा प्यार है यह नित्यकाल मेरे स्मरण में रहेगा। तुम्हारे समान त्यागी होने पर कृष्ण निश्चय ही मुझे दया करेंगे। जो कार्य मैंने शुरु किये थे वे सब कार्य तुम सब परमोत्साह के साथ करते रहना। उसी में श्रीराधागोविन्द की प्रीति होगी। ये दिन तोमार भावे आमार ए प्राण यावे सेइ दिन दिओ पदाश्रय। (जिसदिन तुम्हारे भाव में मेरा अन्त होगा उसी दिन आपके चरणों में स्थान देना।) श्रील प्रभुपाद ने उस पत्र में अपने और महाराज जी के सिद्धस्वरूप का परिचय दिया है। श्रीवृषभानुनन्दिनी कोई एक अनिपुणा गोप ललना को नयन मंजरी नाम से पुकारती थी एवं हमेशा के लिए अपने पास रखना चाहती थी। किन्तु वह मूढ़ा पति वंचना कार्य में असमर्था थी, इसलिए नाना प्रकार के दूसरे कामों में अपना समय बिताती थी। किन्तु परम सुशोभना बिमल मंजरी विनोदिनी के संग-विमुखा होकर नयनमणि के संग को दूर से वर्जन करने का प्रयास करती थी। अतः नयनमणि वार्षभानवी की खोज में जैसे एकान्त रूप में यत्न कर पाएँ, यह भी बिमल मंजरी का कार्य है। यहाँ श्रील प्रभुपाद नयन मंजरी एवं श्री कुंजबाबू विमल मंजरी यह बताया है। श्रीलप्रभुपाद के द्वारा बागबाजार गौड़ीयमठ के प्रवेश द्वार के दोनों और लिखा है कि श्रीगौड़ीय मठरक्षक आचार्यात्रिक श्रीपाद कुंजविहारी विद्याभूषण; गौड़ीयमठ महामन्दिर के मूलस्तम्भः गौड़ीयमठ सेवा प्रतिष्ठान के प्राण एवं सेवा समृद्धि का मूल कारण; गौड़ीयमठ रचना के आदि शिल्पी; श्रीलजगबन्धु की सेवा प्रवृत्ति उद्बोधन व सम्बोधन के मूल मन्त्री; गौड़ीयमठ भागवतरत्न माला की मध्यमणिः गुरुसेवा के मूर्त्तविग्रह; गुरुदेव के प्रेष्ठ मूर्ति; श्रीगुरु मनोभीष्ट परिपूर्ण के प्रधानतम सहायक; गुरुसेवा शिक्षक के अग्रणी सेवा सहिष्णु शिरोमणि; गुरुसेवक सेवाव्रत हरिगुरु सेवा में विश्व नियन्त्रणकारी; गौड़ीय जन बन्धुवर हैं। श्रीलप्रभुपाद का आशीर्वाद – श्रीमान् कुंजविहारी विद्याभूषण बहुत जययुक्त हों। उनके सहयोगी एवं व्यक्तिगण उनका अनुस्मरण कर पायें तो उन सबका भी बहुत मंगल होगा।
I told the other day and again I say kunja babu should be respected by as long as he lives. Kunja babu’s sympathy for me brought me in connection with so many persons. His sympathy for me knows no bound. His intelligence excelled all.
श्रीलगुरुदेव के प्रति श्रीलप्रभुपाद की अन्तरंगता—एकदिन श्रीलप्रभुपाद के पेट में बहुत दर्द हो रहा था। सभी सेवक मिलकर एक बोतल में गरम पानी भरकर ताप देने लगे, किन्तु उससे कुछ नहीं हुआ, दर्द कम नहीं हुआ। तब श्रीलभक्तिहृदय वनदेव महाराज ने कुंजबाबू को बुलाया। कुंजबाबू संवाद पाते ही दौड़-दौड़ कर आये। तब श्रील प्रभुपाद ने कुंजबाबू को आते हुये देखकर शयन से उठे एवं उनको छाती से लगाया, तुरन्त श्रीलप्रभुपाद का दर्द बिलकुल ठीक हो गया। यह देखकर उपस्थित सभी लोग आश्चर्य चकित हो गये। श्रीलमहाराज (कुंजदा) हमेशा हा प्रभुपाद! हा प्रभुपाद! पुकारते थे। उन्होंने कभी अपनी पूजा स्वीकार नहीं की। बोलते थे कि श्रील प्रभुपाद की पूजा करने से सबकी पूजा होती है। वे सबको श्रीलप्रभुपाद एवं श्रीधाम मायापुर की सेवा करने के लिए उपदेश करते थे।
जयति जयति देवस्तीर्थ गोस्वामी पादो जयति जयति सेव्यस्तस्यमाधुर्यलीलाः।
जयति जयति कीर्त्तिस्तस्य पुण्यप्रदात्री जयति जयति वाणी या च भक्तिप्रसूतिः।।
श्रील प्रभुपाद के समान उन्होंने भारतवर्ष के सभी स्थानों पर मठ मन्दिर, श्रीविग्रह स्थापन, चारों धाम की भक्तगणों के साथ परिक्रमा, सत् शिक्षा प्रदर्शिनी की व्यवस्था, मुद्रण यन्त्र के माध्यम से इंग्लिश, बंगला, हिन्दी, संस्कृत, उड़िया, असमिया बहुत सी भाषाओं में पत्र-पत्रिका एवं भक्तिग्रन्थ प्रकाश किये हैं। गुरु-वैष्णव-भगवान् के स्मरण महोत्सव महाप्रसाद दान असंख्य सेवाकार्य में साक्षात् रूप में काय-मनो-वाक्य से सेवा करके श्रीमद् कुंजबिहारी विद्याभूषण प्रभु (श्रीमद्भक्ति विलास तीर्थ गोस्वामी महाराज) को श्रीलप्रभुपाद का बहुत स्नेहभाजन एवं कृपाशीर्वाद प्राप्त हुआ। परमार्थानुशीलनकारी निष्कपट रूप से गुरु वैष्णव भगवान् के सेवाराज्य में एक अस्वाभाविक प्राणवन्त दृष्टान्त स्वरूप सेवक के रूप में अपना कृतित्व अर्जन किया।
श्रीलभक्तिविलास तीर्थाष्टकम्
यस्तत् प्रेष्ठतया प्रसन्नगुरुणा प्राज्ञेन विज्ञापितः, सर्वस्वं गुरुपादपद्म परिचर्यायैव येनार्पितम्।
सौहार्दं भुवि भाग्यवद्भिरधिकं प्रस्तावितं यस्य तं श्रीमद्भक्तिविलास तीर्थ चरणं मत् प्राणपूज्यं भजे।।
जो प्रज्ञाप्रपन्न गुरु कर्तृक प्रेष्ठरूप से विराजित हैं, जो गुरुपादपद्म की परिचर्या में सर्वस्व समर्पण किया है, जिनके भूत सौहार्द्र भाग्यवान कर्तृक अधिक रूप से प्रशंसित हैं, ऐसे मेरे प्राणपूज्य गुरुपादपद्म श्रीमद्भक्तिविलास तीर्थगोस्वामी महाराज जी का मैं भजन करता हूँ।
वैराग्यं विषयेषु यस्य सहजत् निष्ठा हरौ चोर्जिता, वात्सल्यं शरणागतेषु विमलं वैभष्यविद्यान्वयम्।
सद्गुण्यं स्वजनार्थपालमसतां स्वस्तिप्रदं यस्य तं, श्रीमद्भक्तिविलास तीर्थचरणं मत् प्राणपूज्यं भजे।।
जिनका विषय वैराग्य सहज एवं हरि में निष्ठा क्रमवर्द्धमाना है, शरणागतजन के प्रति विशुद्ध वात्सल्य, जो विनय विद्यासम्पन्न, जिनके सद्गुण सज्जनगण के परमार्थ पालक एवं असद् लोगों के लिए भी मंगलप्रद हैं, ऐसे मेरे प्राणपूज्य गुरुपादपद्म श्रीमद्भक्तिविलास तीर्थ गोस्वामी महाराज जी का मैं भजन करता हूँ।
सख्यं सार्वजनीन भक्तिसुखदं स्थैर्यं प्रशान्तींगीतं, नेतृत्वं मठरक्षणे जनगतौ चातिप्रियम्भावितम्।
चातुर्यं परिवेशन हरिस्सानामद्भुतं यस्य तं, श्रीमद्भक्तिविलास तीर्थचरणं मत् प्राणपूज्यं भजे।।
जिनका सख्य सार्वजनीन भक्तिसुखदायक, स्थैर्य प्रशान्ति सम्बलित, मठरक्षण एवं जनगति विधान नेतृत्व अतिशय प्रिय भावयुक्त, जिनका हरिरस परिवेशन में अद्भुत रूप से चातुर्य है, ऐसे मेरे प्राणपूज्य गुरुपादपद्म श्रीमद्भक्तिविलास तीर्थ गोस्वामी पाद का मैं भजन करता हूँ।
भक्तिप्राणजनैर्यतीन्द्रचरणे सम्मानितं मानदं, सद् गोस्वामीगुणालयं गतिविदंगाम्भीर्यगुप्ताशयम्।
कारुण्यं हरिभक्तिधर्मजनितं स्वाभाविकं यस्य तं, श्रीमद्भक्तिविलास तीर्थचरणं मत् प्राणपूज्यं भजे।।
जो भक्तिप्राण संन्यासियों द्वारा सम्मानित, दूसरों को यथायोग्य मानदाता, सद् गोस्वामी गुणों के आलय स्वरूप, परमार्थगति वेत्ता, जो भक्तिभावित चित्त गुरुगाम्भीर्यभाव से सदा आच्छादित, हरिभक्ति धर्मजात दैन्य स्वभाव सुलभ है, ऐसे मत् प्राणपूज्य गुरुपादपद्म श्रीमद्भक्तिविलास तीर्थगोस्वामी पाद का भजन करता हूँ।
धर्मज्ञं धरणीविधर्मधमणं सद्धामकामाध्रयं, प्रेमाध्र्यं वरिवर्षणं दिशि दिशि श्रद्धालुषूच्चैर्मुदा।
धीरं वीरमतिं समीरचरितं सारस्वतानां प्रियं, श्रीमद्भक्तिविलासतीर्थचरणं मत् प्राणपूज्यं भजे।।
जो जैवधर्मज्ञाता, पृथ्वी पर वेदविरुद्ध धर्म के नास्तिक, साधुधाम एवं काम के आश्रय स्वरूप, चारों ओर श्रद्धालु जनता को पुनः-पुनः आनन्दपूर्ण प्रेमार्थ वर्षणकारी, स्वभाव में धीर, वीर के समान सत्य मतिमान, वायु के समान निर्लिप्त चरित्र युक्त एवं श्रीलभक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर के चरणाश्रित समस्त शिष्य के प्रियपात्र हैं, ऐसे मत् प्राणपूज्य गुरुपादपद्म श्रीमद्भक्तिविलास तीर्थगोस्वामी पाद का मैं भजन करता हूँ।
वाणी वैतरणी गतिप्रहरणी वैकुण्ठसम्वादिनी, कीर्तिः कर्णरसायनी कलितरी नैष्कर्म्यनिष्षादणी।
भक्तिर्भागवतीरति प्रणयनीशक्तिप्रदा यस्य तं, श्रीमद्भक्तिविलासतीर्थचरणं मत् प्राणपूज्यं भजे।।
जिनकी वैकुण्ठ संवाद सम्बलित वाणी यमगति को हरण करती है, कीर्ति कर्णरसायन स्वरूपा, कलि समुद्रतरणी के नौका स्वरूप, नैष्कर्म सम्पादिका, भक्ति भागवती रति प्रणयन में शक्तिप्रदायिका है, ऐसे मत् प्राणपूज्य गुरुपादपद्म श्रीमद्भक्तिविलास तीर्थगोस्वामी का मैं भजन करता हूँ।
मूर्तिमंगलदायिनी गुणवती गौरस्मृतिश्रावणी, पारुष्यं पुरुषोत्तमैकशरणागत्यानुकूल्योर्जितम्।
सौजन्यंजनताघसंघशमनं सौभाग्यदं यस्य तं, श्रीमद्भक्तिविलासतीर्थचरणं मत् प्राणपूज्यं भजे।।
जिनकी मूर्ति मंगलदायिका, दिव्य गुणवती, एवं गौरसुन्दर की स्मृति विधायिका, पुरुषात्व पुरुषोत्तम के शरणागति आनुकूल्य द्वारा वर्धित, सुजनता के पाप समूह नाशक एवं सौभाग्यप्रदायक हैं, ऐसे मत् प्राणपूज्य गुरुपादपद्म श्रीमद्भक्तिविलास तीर्थ गोस्वामी पाद का मैं भजन करता हूँ।
सौम्यं स्वर्णतनुं प्रसन्नवदनं कारुण्यं पूर्णेक्षणं, वालार्काभसुवाससंतिलकितं नामामृतास्वादकम्।
श्रीरूपानुगशुद्धभक्तिरसिकं श्रीगौरधामाश्रयं, श्रीमद्भक्तिविलासतीर्थचरणं मत् प्राणपूज्यं भजे।।
मधुर मूर्ति सुवर्णकान्ति, प्रसन्नवदन, करुणापूर्ण चितवन युक्त हैं, बालसूर्य के समान सुन्दर वसन में भूषित, तिलकयुक्त, हरिनाममृत आस्वादनरत, रूपानुग शुद्धभक्ति रसनिष्ठ गौरधामाश्रय हैं, ऐसे मत् प्राणपूज्य गुरुपादपद्म श्रीमद्भक्तिविलास तीर्थगोस्वामीपाद का मैं भजन करता हूं।