नित्यलीला प्रविष्ट ॐ परिव्राजकाचार्य त्रिदण्डिस्वामी १०८ श्री श्रीमद्भक्तिभूदेव श्रौति गोस्वामी महाराज

प्रणाम
नमो ॐ विष्णुपादाय श्रौतपथ प्रदर्शिने।
श्रीमद्भक्ति भूदेवाय श्रौति गोस्वामीति नमः ।।
जय जय श्रीश्रीश्रौति गोस्वामी।
भक्तिभूदेव जय, परम करुणामय,
तोमार अभयपद नमि
परमहंस यतिवर, श्रीआचार्य भास्कर,
विश्व भरि करिले प्रचार।
श्रीभक्तिसिद्धान्तवाणी, येन अमृतेर खनि,
लभि जीवे हइल अमर।।
जीव दुःखे दुःखी हये, नाम प्रेम प्रदायिने,
जगतेर करिते कल्याण।
दीन हरिदास कय, श्रौति स्वामी दयामय,
कृपा करि दाओ श्रीचरण।।
श्रीगुरुपदरज प्रार्थी पण्डित हरिदास राय (भक्तिशास्त्री)
श्रीश्रील भक्ति भूदेव श्रौति महाराज दशकम्
यो विप्रवंशे कृपयावीरासीत् श्रीरामगोपालतया प्रसिद्धः।
श्रीभक्तिभूदेव उपाधि युक्तस्तं श्रौतिराजं प्रणमामि नित्यम् ।।१।।
जो बंगदेश के विप्र वंश में आविर्भूत होकर श्रीरामगोपाल नाम से प्रसिद्ध हुये, बाद में संन्यास धर्म स्वीकार कर श्रीमद्भक्तिभूदेव उपाधि प्राप्त की, ऐसे श्रील श्रौति महाराज को मैं प्रणाम करता हूँ।
अधीतविद्यो कृतगार्हधर्म्यः सारञ्च विज्ञाय सदारकन्याम्।
विहाय गुर्वात्मगतिं तं श्रौतिराजं प्रणमामि नित्यम् ।।२।।
जो बाल्यकाल में विद्याध्ययन, यौवन में गार्हस्थ धर्म पालन, बाद में साधुसंग के द्वारा श्रीकृष्णभजन की विशेष प्रयोजनीयता समझकर संसार त्याग कर श्रीगुरुपादपद्म श्रीलप्रभुपाद के श्रीचरणों में आश्रय ग्रहण कर आत्म समर्पण किया, ऐसे श्रील श्रौति महाराज को मैं प्रणाम करता हूँ।
सारस्वताग्रयो बहुभाषायाढ्य चैतन्यवार्त्तावहसज्जनाग्रयसुशीलवान् ।
यो हरिनाम गाने तं श्रौतिराजं प्रणमामि नित्यम् ।। ३ ।।
जो श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर के अन्यतम शिष्य थे। जो संस्कृत, हिन्दी, उड़िया आदि अनेक भाषाविद् पण्डित थे, गौरवाणी प्रचार वैष्णवाग्रगण्य, हरिनाम-गान, तृणादपि सुनीच एवं सुशीलवान थे, उन श्रील श्रौतिमहाराज को मैं प्रणाम करता हूँ।
श्रुतिस्मृतिषूत्तम बुद्धिमान् यः प्रशान्तचित्तो धृतिधर्मवित्तः ।
प्रचार कार्येषु च मुक्तकण्ठस्तं श्रौतिराजं प्रणमामि नित्यम् ।।४।।
जो श्रुति, स्मृति, पुराण, पञ्चरात्र विभिन्न शास्त्रों में सुतीक्ष्ण बुद्धिमान्, प्रशान्तचित्त, धृतिधर्मादि, सम्पत्तिशाली आदि जीव कल्याणकारी प्रचार कार्य में मुक्तकण्ठ एवं मुक्तहस्त थे, ऐसे श्रील श्रौति महाराज को मैं प्रणाम करता हूँ।
गीतार्थसारोपनिषद् सुसारवेदान्तसारादिप्रणेतृवर्यः ।
सम्पादको विष्णुसहस्त्रनाम्नां तं श्रौतिराजं प्रणमामि नित्यम् ।। ५ ।।
जो गीतासार, उपनिषद्सार, वेदान्तसार, सन्दर्भसार के प्रणेता हैं, विष्णुसहस्रनाम के सम्पादक हैं, ऐसे श्रील श्रौति महाराज को मैं प्रणाम करता हूँ।
यो गौरसारस्वतमन्दिरादीन् श्रीगौरगोविन्दसराधिकेशान् ।
संस्थापयामास परार्थपार्थस्तं श्रौतिराजं प्रणमामि नित्यम् ।।६ ।।
जो रूपानुगधारा में गुर्वानुगत्य में समस्त जगद्वासियों के कल्याण के लिए श्रीगौरसारस्वत मठ के संस्थापक एवं श्रीगौरराधागोविन्द, राधावल्लभ विग्रह की नित्यसेवा प्रकाशक हैं, ऐसे श्रील श्रौति महाराज को मैं प्रणाम करता हूँ।
औदार्यकारुण्यदयार्द्रचित्तः सारल्यधैर्यादिगुणैर्महान् यः।
स्वधर्मनिष्ठो भजने प्रतिष्ठस्तं श्रौतिराजं प्रणमामि नित्यम् ।। ७ ।।
जिनका चित्त उदारता, कारुण्य एवं दया से द्रवीभूत है, जो सरलता, धैर्य गुणों में महान् हैं, स्वधर्मनिष्ठ एवं गौरगोविन्द के भजन में सदा प्रतिष्ठित हैं, ऐसे श्रील श्रौति महाराज को मैं प्रणाम करता हूँ।
अध्यक्ष आसीच्च मठे विभिन्ने गुर्वानुगत्येह परार्थवेत्ता।
गौड़ीयपत्रस्य सहायको यस्तं श्रौतिराजं प्रणमामि नित्यम् ।।८ ।।
जो परमार्थवेत्ता श्रीगुरुदेव के आदेश से प्रयागादि विभिन्न मठों के एवं गौड़ीय पत्रिका के सहायक थे, ऐसे श्रील श्रौति महाराज को मैं प्रणाम करता हूँ।
अज्ञातकृन्नारदवन्नराणां निर्माणमोहव्यजकुण्ठधर्मः ।
तदीयसर्वस्वशुभांघ्रियुग्मस्तं श्रौतिराजं प्रणमामि नित्यम् ।। ९ ।।
जो नारद के समान मनुष्य के अज्ञात कर्मा हैं, जो अभिमान, मोह, कपटता एवं कुण्ठाधर्म से मुक्त हैं, जिनके श्रीचरणयुगल अपने शिष्यभक्तों के सर्वस्व स्वरूप हैं, ऐसे श्रील श्रौति महाराज को मैं प्रणाम करता हूँ।
गोविन्दवाणे जानितश्च वंगे नारायणे गौरादिवाकराह्नि ।
श्रीनित्यलीलागतिमाप्तवान् यस्तं श्रौतिराजं प्रणमामि नित्यम् ।।१०।।
जो माघी पञ्चमी तिथि में आविर्भूत हुये एवं पौष शुक्ला द्वादशी तिथि में नित्यलीला में प्रविष्ट हुये, ऐसे श्रील श्रौति महाराज को मैं प्रणाम करता हूँ।
माघकृष्णवाणचन्द्रवासरे च जातकं सिन्धुनेत्रचन्द्रदण्डिवेषधारकम् । पौषशुक्लसूर्यवासरे तिरोहितञ्च तं भक्तिभूदेवनौतिदण्डिशेखरं भजे ।।११।।
जो १३०० बंगाब्द, माधी पञ्चमी तिथि सोमवार को आविर्भूत होकर १३३७ बंगाब्द में संन्यास वेष ग्रहण किये एवं १३८९ बंगाब्द पौष शुक्ला द्वादशी तिथि में अन्तर्धान लीला किये, ऐसे श्रील भक्तिभूदेव श्रील श्रौति महाराज को मैं प्रणाम करता हूँ।
नमो ॐ विष्णुपादाय औतपथ प्रदर्शिने।
मात श्रीमद्भक्तिभूदेवाय औति गोस्वामिने नमः ।।
श्रील भक्तिभूदेव श्रौति गोस्वामी महाराज ने १३०० बंगाब्द २१ माघ सोमवार श्रीगोविन्द पञ्चमी तिथि पर छातना दुवराजपुर (बाँकुड़ा) ग्राम में श्रीरामसुन्दर चट्टोपाध्याय एवं श्रीमती सरस्वती देवी के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में जन्म ग्रहण किया। माता-पिता ने इनका नाम रखा रामगोपाल।
१३३५, ७ वैशाख वे श्रीधाम मायापुर में श्रीलप्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर का श्रीचरणाश्रय कर श्रीकृष्ण भजन में मग्न हुये। इनका कठोर वैराग्य दर्शन करके श्रील प्रभुपाद ने अतिशय सन्तुष्ट होकर इनको १३३७ बंगाब्द ७ आश्विन को त्रिदण्ड संन्यास मन्त्र और वेष प्रदान कर श्रीमद्भक्तिभूदेव श्रौति महाराज नाम से विभूषित किया। वे श्रीलप्रभुपाद के षष्ठतम संन्यासी थे।
श्रीलप्रभुपाद के निर्देशानुसार उन्होंने भारतवर्ष के विभिन्न स्थानों पर प्रचार कार्य किया एवं भजनानन्दी के समस्त शुद्ध गुणों के अधिकारी, नदिया प्रकाश पत्रिका के सहकारी सम्पादक का कार्य, हिन्दी भाषा में भागवत पत्रिका कटक से उड़िया भाषा में पत्रिका प्रकाशन का कार्य किया एवं बंगला, संस्कृत, हिन्दी, इंग्लिश, उड़िया भाषा में महापाण्डित्य तथा विशेष प्रतिभा का प्रदर्शन किया।
१९३२ साल में श्रील प्रभुपाद ने इनको काशी, इलाहाबाद, गया आदि स्थानों के मठ में सेवा का गुरुतर दायित्व प्रदान किया।
श्रीलप्रभुपाद ने जिस शुभ तिथि-नक्षत्र लग्न एवं राशि को आश्रय कर इस संसार में प्रकटलीला की थी, श्रीलमहाराज भी उसी तिथि में आविर्भूत हुये।
उन्होंने श्रुति, सात्वत स्मृति, सात्वत पुराण, पञ्चरात्र आदि समस्त शास्त्रों में अत्यद्भुत ज्ञान-विज्ञान, श्रीरूपानुग विचार वैशिष्ट की चमत्कारिता की अपार महिमा को विशेष रूप से जीवन में प्रकाशित किया।
इनकी वैष्णवोचित दीनता का शिक्षादान अतुलनीय है। इनके धैर्य, स्थैर्य, महान्, उदार हृदय, अकपट, सरल, अनाडम्बर आदि आचरण के दर्शन कर सभी मुग्ध हो जाते थे।
वे अचानक कब, किस समय, कहाँ, किस रूप से, किस अवस्था में, कितने समय तक विराजित रहते थे, यह पता करना सभी को बहुत मुश्किल होता था। इसलिए नित्य सात्रिध्यकारी ज्ञानवृद्ध सतीर्थ गण उनको श्रीनारद के अवतार रूप से अत्यन्त प्रीतिपूर्वक सम्भाषण करते थे।
इनके प्रकाशित बहुत से ग्रन्थ विशेष उल्लेख योग्य हैं। श्रील प्रभुपाद के प्रकटकाल में बहुत से ग्रन्थ प्रकाशित हुये हैं जैसे सज्जन तोषणी, दैनिक नदिया प्रकाश, काशी से हिन्दी भागवत पत्रिका, कटक से उड़िया पत्रिका के विशेष प्रबन्ध इत्यादि प्रकाशित हुये।
श्रीलप्रभुपाद की अप्रकटलीला के बाद वेदान्त सिद्धान्तसार, गीतासार, उपनिषद्सार, सन्दर्भसार, श्रीविष्णुसहस्त्रनाम स्तोत्रम्, वैष्णव विचार पद्धति, श्रीसिद्धान्त रत्नम्, श्रीगोविन्द भाष्यम्, श्रीगौरांगलीला स्मरण मंगलस्तोत्रम् आदि ग्रन्थ सम्पादन कर आपने मानव समाज को परमार्थ ज्ञान प्रदान किया है।
उन्होंने झाड़ग्राम श्रीगौरसारस्वत मठ, टाटानगर, बोकारो, बोलपुर, बीरभूम आदि बहुत से स्थानों में मठ स्थापन एवं श्रीश्रीगुरुगौरांग राधावल्लभ, राधागोविन्द श्रीविग्रह प्रकाशित कर जगत जीवों का मंगल साधन किया है।
आप सन् १९३८, २५ पौष द्वादशी तिथि पर श्रीश्रीराधागोविन्द जू की मध्याह्न लीला में प्रविष्ट हुये।