यारूपमञ्जरीप्रेष्ठा पुरासीद्रतिमञ्जरी।
सोच्यते नामभेदेन लवङ्गमञ्जरी बुधैः॥
साद्य गौराभिन्नतनुः सर्वाराध्यः सनातनः।
तमेव प्राविशत् कार्यान्मुनिरत्नः सनातनः॥
(गौ. ग. दी. 181-182)

श्रीकृष्ण लीला में जो रूपमंजरी की प्रिय रतिमंजरी अथवा लवंग मंजरी थी, वे ही गौर लीला में गौरांग महाप्रभु के अभिन्न तनु श्रीसनातन गोस्वामी के रूप में अवतरित हुये थे। चतु: सन के अन्तर्गत सनातन भी इनमें प्रविष्ट हैं।

गौड़ीय वैष्णव अभिधान में लिखा है कि श्रीसनातन गोस्वामी अनुमानत: शक संवत् 1410 (विक्रमी सम्वत् 1544 और सन् 1488) में आविर्भूत हुये थे। श्रील नरहरि ठाकुर द्वारा रचित ग्रन्थ-‘श्रीभक्तिरत्नाकर’ से श्रीसनातन गोस्वामी की सात ऊर्ध्व पीड़ियों के श्रेष्ठ पुरुषों के विषय में पता चलता है। श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर ने श्रीचैतन्य चरितामृत के अनुभाष्य में श्रील सनातन गोस्वामी के वंश का परिचय दिया है।1

श्रील सनातन गोस्वामी ने छोटी आयु में ही अध्यापक शिरोमणि विद्यावाचस्पति से शास्रों का अध्ययन किया था श्रीमद् भागवत शास्र में उनका बहुत ही अधिक अनुराग था। उन्होंने श्रेष्ठ भरद्वाज गोत्रीय ब्राह्मण वंश में जन्म लेकर भी, स्वेच्छा से राजा की नौकरी की थी। इसी कारण ये वैष्णवोचित दीनतावश अपने को सदा हीन ही मानते रहे—

श्रीसनातेनर गुरु विद्यावाचस्पति।
मध्ये मध्ये रामकेलि ग्रामे तांर स्थिति॥
सर्वशास्र अध्ययन करिला यांर ठांई।
जैछे गुरुभक्ति कहि ऐछे साध्ये नाई॥
(श्रीभक्ति रत्नाकर 1/598-599)

अर्थात् श्रीसनातन के गुरु थे-श्रीविद्यावाचस्पति जी। वह कभी-कभी रामकेलि गाँव में आकर ठहरते थे। उनसे ही इन्होंने सब शास्रों का अध्ययन किया। इन्होंने ऐसी गुरु भक्ति की, जो कि किसी और से नहीं की जा सकती।

यवन देखिले पिता प्रायश्चित करय।
हेन यवनेर संग निरन्तर हय॥
करि मुखापेक्षा यवनेर गृहे यान।
ए हेतु आपना माने म्लेच्छेर समान॥
यैछे मनोवृत्ति, ताहा किछु नाहि हय।
इथे अतिदीन हीन आपना मानय॥
यबे मग्न हन दैन्य समुद्र माझारे।
म्लेच्छादिक हैते नीच माने आपनारे॥
नीच जाति संगे सदा नीच व्यवहार।
एइ हेतु नीच जात्यादिक उक्ति तार॥
विप्रराज हैया महाखेद युक्तान्तरे।
आपनाके विप्र ज्ञान कभु नाहि करे॥
(भक्ति रत्नाकर 1/609-614)

अर्थात् यवनों को देखकर जिनके पिता प्रायश्चित करते थे, इनका निरन्तर उन्हीं यवनों के साथ उठना बैठना होता है। वे उनके सहारे पर ही रहते हैं। यवन के घर जाते हैं। इसी कारण यह अपने आप को म्लेच्छ के समान मानते हैं। जैसी इनकी मनोवृति है, वास्तव में वैसा कुछ नहीं है फिर भी ये अपने-आप को दीन-हीन मानते हैं। जब ये दीनता रूपी समुद्र में रहते हैं तो अपने आप को म्लेच्छ से भी अधिक नीच मानते हैं। उनका कहना है कि नीच जाति का संग करने से व्यवहार भी सदा नीच ही होगा। इसी कारण से वे अपने आप को नीच जाति आदि कहकर पुकारते हैं। विप्रराज होते हुए भी हृदय में महादुःख मानते हैं। मैं विप्र हूँ, ऐसी भावना वे कभी नहीं करते हैं।

रामानन्द द्वारे कंदर्पेर दर्पनाशे।
दामोदर द्वारे निरपेक्ष परकाशे॥
हरिदास द्वारे सहिष्णुता जानाइल।
सनातन रूप द्वारे दैन्य प्रकाशिल॥
(भक्ति रत्नाकर 1/630-631)

अर्थात् श्रीरामानन्द द्वारा महाप्रभु ने कामदेव को अभिमान का नाश करवाया, श्रीदामोदर के द्वारा निरपेक्षता का प्रकाश किया, श्रीहरिदास के द्वारा महाप्रभु ने सहिष्णुता का पाठ सिखाया और श्रीरूप– सनातन के द्वारा दीनता का प्रकाश किया।

श्रील सनातन गोस्वामी के दादा किस प्रकार मुसलमान बादशाह के राज कार्य में नियुक्त हुये थे और श्रीसनातन गोस्वामी कैसे उनके निम्नस्थ क्रम में नियुक्त हुए, इनका निम्नलिखित वर्णन, गौड़ीय वैष्णव अभिधान में मिलता है। सुलतान बारबकशाह के समय में (सन् 1460- 1470 ई.) श्रील सनातन गोस्वामी के दादा मुकुन्द ने गौड़देश की सरकारी सेवा में प्रवेश किया था। बारबक शाह ने राज्य और अन्तःपुर की सुरक्षा के लिये, अवसीनिया से बहुत से गुलामों और हिंजड़ों को लाकर नौकरी दे रखी थी। तब इन लोगों को हब्शी कहा जाता था। बारबकशाह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र यूसुफ और यूसुफ की मृत्यु के बाद फतेशाह बादशाह हुये। फतेशाह के समय में हब्शियों ने षड़यन्त्र रचकर, फतेशाह की हत्या करके पाँच-छः साल राज्य किया था। अन्तिम हब्शी राज के वज़ीर और मन्त्री थे-हुसैन शाह। वे ही बाद में गौड़देश के बादशाह हुये। फतेशाह के समय में ही मुकुन्द की मृत्यु हो गई थी और उनके स्थान पर सनातन गोस्वामी नियुक्त हुये थे। हब्शियों के राजत्व काल में, अनेक अत्याचार सहने के बाद, हुसैनशाह के समय में श्रीसनातन गोस्वामी ने अपनी योग्यता के बल पर ऊँची राजपदवी प्राप्त की और क्रमश: प्रधानमन्त्री बन गये। श्रीरूप गोस्वामी उपमन्त्री या अर्थमन्त्री बन गये। श्रीसनातन का मुसलमानों द्वारा दिया गया नाम था-साकिर मल्लिक और रूप गोस्वामी का नाम था-दबिर खास।

राजा कहे, शुन, मोर मने येइ लय।
साक्षात ईश्वर, इँहा नाहिक संशय॥
एत कहि’ राजा गेला निज अभ्यन्तरे।
तबे दबिर खास आइला आपनार घरे॥
घरे आसि’ दुइ भाई युक्ति करिञा।
प्रभु देखिबारे चले वेश लुकाञा॥
अर्द्धरात्रे दुई भाई आइला प्रभु-स्थाने।
प्रथमे मिलिला नित्यानन्द-हरिदास सने॥
तांरा दुइ जन जानाइल प्रभुर गोचरे।
रूप, साकरमल्लिक आइला तोमा’ देखिबारे॥
(चै. च. म. 1/180-184)

अर्थात् राजा कहने लगे, सुनो, मेरे मन में यह आता है कि यह साक्षात् ईश्वर हैं, इसमें कोई संशय नहीं है। इस प्रकार कहकर राजा अन्दर चला गया। तभी दबिर खास घर आये और घर में आकर दोनों भाई युक्ति करते हैं और अपना वेष बदलकर दोनों महाप्रभु से मिलने को जाते हैं। आधी रात के समय दोनों भाई महाप्रभु के पास पहुँचते हैं। परन्तु हाँ, पहले वे श्रीनित्यानन्द और श्रीहरिदास से मिलते हैं। इन दोनों ने ही महाप्रभु को बताया कि श्रीदबिर खास और श्रीसाकर मल्लिक आपको मिलने के लिये आये हैं।

श्रीकृष्ण लीला के पार्षद ही गौर लीला की पुष्टि के लिये अवतरित हुये थे। श्रीगौरांग महाप्रभु ने उन पार्षदों के द्वारा जगतवासियों को विभिन्न विषयों की शिक्षा दी थी—

हरिदास-द्वारा नाम-महात्म्य-प्रकाश।
सनातन-द्वारा भक्ति सिद्धान्त विलास॥
श्रीरूप-द्वारा ब्रजेर रस-प्रेम-लीला।
के कहिते पारे गम्भीर चैतन्येर खेला??॥
(चै. च. अ. 5/86-87)

अर्थात् श्रीचैतन्य महाप्रभु ने श्रीहरिदास द्वारा श्रीनाम की महिमा का प्रकाश कराया तथा श्रीसनातन के द्वारा भक्ति सिद्धान्तों का प्रचार कराया और श्रीरूप गोस्वामी के द्वारा व्रज की रसमय प्रेम लीला को प्रकाशित करवाया। श्रीचैतन्य महाप्रभु की गम्भीर लीला के विषय में कोई भला क्या कह सकता है।

सनातन-कृपाय पाइनु भक्तिर सिध्दान्त।
श्रीरूप-कृपाय पाइनु भक्तिरस प्रान्त॥
(चै. च. आ. 5/203)

अर्थात् श्रीमन् महाप्रभु कहते हैं कि श्रीसनातन की कृपा से भक्ति सिद्धान्त प्राप्त कर पाया हूँ तथा श्रीरूप गोस्वामी की कृपा से भक्ति रस की प्राप्ति हुई है।

श्रील सनातन गोस्वामी श्रीभक्ति सिद्धान्त के आचार्य तथा सम्बन्ध ज्ञान के दाता हैं। विश्वव्यापी चैतन्यमठ और गौड़ीय मठ समूह के प्रतिष्ठाता, मेरे परम गुरुचरणकमल, नित्यलीला प्रविष्ट ॐ 108 श्रीमद् भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर प्रभुपाद ने अपनी कृपा के परवश होकर, ‘वैष्णव के’ नामक स्वरचित गीत में जो उपदेश अमृत दान किया है, उसमें श्रीचैतन्य चरितामृत का सनातन शिक्षा प्रसंग लिखा गया है। उसमें उन्होंने लिखा है—

ताइ दुष्ट मन, निर्जन भजन।
प्रचारिछ छले कुयोगी वैभव॥
प्रभु सनातने, परम यतने।
शिक्षा दिल याहा, चिन्त सेइ सब॥

इसलिये हे दुष्ट मन, तू दिल से निर्जन भजन रूपी कुयोगी वैभव का प्रचार कर रहा है। हे मन! श्रीमन् चैतन्य महाप्रभु ने श्रीसनातन गोस्वामी को जो शिक्षा दी तू तो बस परम यत्न के साथ उसी का ही चिन्तन कर।

श्रीमन् महाप्रभु ने सनातन गोस्वामी को अवलम्बन करके जगतवासियों को जो शिक्षा दी, उस का परम यत्न के साथ चिन्तन करने के लिये, प्रभुपाद का उपदेश है।

श्रीमन् महाप्रभु संन्यास ग्रहण करके शान्तिपुर होकर पुरी जाने के बाद दक्षिण भारत गये थे। दक्षिण भारत से पुरी में वापिस आकर वे वृन्दावन यात्रा का मन बनाकर पहले गौड़देश गये। उस दौरान जब महाप्रभु ने कानाई की नाटशाला से वापिसी की तो उस समय उनके साथ लाखों करोड़ों लोग थे। उनके मालदह के रामकेलि गाँव पहुँचने पर श्रीरूप गोस्वामी और श्रीसनातन गोस्वामी के साथ उनका पहला साक्षात्कार हुआ। महाप्रभु के साथ असंख्य हिन्दुओं को देखकर यवन बादशाह ने पहिले तो शक किया, परन्तु क्षत्रिय केशव ने उसको ऐसी सीख दी जिससे वह श्रीमन् महाप्रभु के साथ दुश्मनी न बाँध ले। श्रीरूप गोस्वामी ने भी महाप्रभु की महिमा का बखान करके बादशाह के सौभाग्य की बात कहकर उनको उत्साहित किया। साथ ही क्षत्रिय केशव ने गुप्त रूप से महाप्रभु के पास ब्राह्मण भेजकर, श्रीमन् महाप्रभु को शीघ्र ही कहीं और चले जाने की सलाह दी। श्रीरूप व सनातन दोनों ने युक्ति करके, श्रीमन् महाप्रभु के चरणकमलों में उपस्थित होकर बहुत ही दीनता के साथ कहा—

जागाई-माधाई हैते कोटि कोटि गुण।
अधम पतित पापी आमि दुइ जन॥
म्लेच्छजाति, म्लेच्छसङ्गी, करि मलेच्छकर्म।
गो-ब्राह्मण-द्रोही-सङ्गे आमार सङ्गम॥
मोर कर्म, मोर हाते-गलाय बान्धिञा।
कुविषयविष्ठा-गर्ते दियाछे फेलिया॥
आमा उद्धरिते बली नाहि त्रिभुवने।
पतितपावन तुमि-सबे तोमा बिने॥
(चै. च. म. 1/196-199)

हम दोनों तो जगाई-मधाई से भी करोड़-करोड़ गुणा अधम हैं, पतित हैं व पापी हैं। म्लेच्छ जाति, म्लेच्छ संग व म्लेच्छ कर्म करने वाले हैं हम। हमारा मेल जोल तो गो-ब्राह्मण द्रोहियों के साथ है। हमारे कर्मों ने हमें हमारी गर्दन से पकड़कर विष्टारूपी कु-विषय के गड्ढे में फेंक दिया है। आप पतित पावन हो, सारे त्रिभुवन में आपके बिना और कोई हमारा उद्धार करने वाला नहीं है।

आपने अयोग्य देखि’ मने पाउ क्षोभ।
तथापि तोमार गुणे उपजाय लोभ॥
वामन हैञा चाँद धरिते इच्छा करे।
तैछे मोर एइ वाञ्छा उठये अन्तरे॥
(चै. च. म 1/204-205)

अपने को अयोग्य देखकर तो मन में अवश्य क्षोभ होता है परन्तु आपके गुणों के कारण लोभ हो जाता है। मेरे हृदय में भी ठीक वैसी ही इच्छा उठती है जैसे कोई नाटा व्यक्ति चान्द को छूने की चेष्टा करे।

श्रीमन् महाप्रभु, रूप-सनातन के दीनता पूर्ण वचन सुनकर व कृपा से आर्द्र होकर बोले—तुम मेरे पुराने दास हो। आज से तुम्हारा नाम रूप और सनातन हुआ। गौड़देश के रामकेलि ग्राम में, मैं तुमसे ही मिलने आया हूँ। श्रीकृष्ण तुम्हारा तुरन्त उद्धार करेंगे। श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद ने, श्रीचैतन्य चरितामृत के प्रथम परिच्छेद के दो सौ आठवें पयार के अपने अनुभाष्य में लिखा है—”श्रीमान्महाप्रभु ने प्रसाद रूप से दबिर खास को ‘रूप’ और साकर मल्लिक को ‘सनातन’ नाम दिया। वैध कनिष्ठ अधिकार में नामकरण एक संस्कार है, जो नाम प्रसाद की अवज्ञा करते हैं, उनके लिये हरि भक्ति की सम्भावना नहीं। वे तो जड़ प्रतिष्ठा में ही मस्त रहते हैं”—

शंख चक्राद्यूर्ध्व पुण्ड्र धारणाद्यात्मलक्षणम्।
तन्नामकरणश्चैव वैष्णवत्त्वमिहोच्यते॥

प्राकृत सहजिया लोगों में विष्णुदास्यपरक नामकरण करने की विधि न रहने के कारण अब उन्हें गौड़ीय –वैष्णव नहीं कहा जा सकता। अवैष्णवों को यदि वैष्णव गुरु से नाम न मिले तो उनकी देहात्म बुद्धि नहीं जाती। हरि सम्बन्ध का ज्ञान नहीं फिर ऊपर से देहात्म बुद्धि, इसी कारण वे अपने पहले वाले दुनियावी नामों को ही सम्भाल कर रखते हैं। जब कोई जीव किसी वैष्णव गुरु के चरणों में शरणागत होता है तो वह वैष्णव गुरु उन्हें दीक्षा मन्त्र देने के साथ-साथ उसका दुनियाँ वाला नाम भी परिवर्तन करके कृष्ण दास या गौरहरि दास इत्यादि रख देते हैं ताकि अपना नाम उच्चारण करते ही उसे अनुभव हो या ज्ञान हो कि वह भगवान का नित्य दास है। रामकेलि2 में श्रीमन् महाप्रभु ने अपने साथियों-नित्यानद प्रभु, हरिदास ठाकुर, श्रीवास पण्डित, गदाधर पण्डित, मुकुन्द दत्त, जगदानन्द पण्डित, मुरारि गुप्त और वक्रेश्वर पण्डित आदि भक्तों के द्वारा, रूप-सनातन को आशीर्वाद दिलवाया था। विदाई के समय अति कुशाग्र बुद्धि वाले सनातन गोस्वामी ने श्रीमन् महाप्रभु के चरणों में यह कहकर निवेदन किया—

इँहा हैते चल, प्रभु, इँहा नाहि काज।
यद्यपि तोमारे भक्ति करे गौड़राज॥
तथापि यवन जाति, ना करिह प्रतीति।
तीर्थयात्राय एत संघट्ट भाल नहे रीति॥
जाँहा सङ्गे चले एइ लोक लक्षकोटि।
वृन्दावन-जाइबार ऐ नहे परिपाटि॥
(चै. च. म. 1/222-224)

सनातन गोस्वामी महाप्रभु से कहते हैं-‘हे प्रभु! अभी आपको यहाँ से चले जाना चाहिए, यद्यपि यह गौड़देश का बादशाह आप से प्रेम करता है, फिर भी यह यवन जाति का है, इस पर विश्वास नहीं करना चाहिए और फिर इतनी बड़ी भीड़ को लेकर तीर्थ-यात्रा की रीति अच्छी नहीं है। जिसके साथ लाख, करोड़ लोग चलें, इस प्रकार वृन्दावन जाने की कोई परिपाटी नहीं है।‘

श्रीमन् महाप्रभु ने कानाई की नाटशाला तक जाकर सनातन के परामर्श पर सोच-विचार करके, वृन्दावन न जाकर, शान्तिपुर होकर पुरी की वापसी यात्रा की।

गणसह सनातन रूपे कृपा करि।
रामकेलि हैते यात्रा कैला गौरहरि॥
(भ.र. 1/635)

श्रीकृष्ण लीला के दोनों पार्षदों-श्रील रूप गोस्वामी व सनातन गोस्वामी ने गौरव लीला की पुष्टि के लिये अवतीर्ण होकर, साधक लीला के अभिनय के समय, रामकेलि में श्रीमन् महाप्रभु के दर्शन करने के बाद तीव्र वैराग्य और व्याकुलता प्रकट की। श्रीचैतन्य महाप्रभु के चरण कमलों की शीघ्र प्राप्ति के लिये उन्होंने कृष्ण-मन्त्र के दो पुरश्चरण करवाये।

श्रीरूप गोस्वामी नौकरी से अवकाश ग्रहण करके, श्रीसनातन गोस्वामी के लिये गौड़देश के एक पंसारी की दुकान पर दस हज़ार मुद्रायें रखकर, अपने द्वारा जोड़ा हुआ सारा धन लेकर वाकला चन्द्रद्वीप में चले गये। वहाँ जाकर उन्होंने ब्राह्मणों, वैष्णवों और कुटुम्ब के लोगों में वह धन बाँट दिया और एक चौथाई हिस्सा विभिन्न विश्वसनीय लोगों के पास रख दिया। इसके बाद यह जानने के लिये कि श्रीमन् महाप्रभु कब वन के रास्ते वृन्दावन की यात्रा करेंगे, दो आदमियों को पुरुषोत्तम धाम में भेजा।

बादशाह हुसैन शाह सनातन गोस्वामी को छोटे भाई की तरह समझते थे और खूब प्यार करते थे। श्रीसनातन गोस्वामी ने सोचा कि राजा का प्यार व विषयी व्यक्ति का प्यार तो बन्धन का कारण होता है। किसी तरह से राजा यदि नाराज़ हो जाये तो इस विषय-बन्धन से छुटकारा पाया जा सकता है। विषयी व्यक्ति के क्रोध और अनादर से हित ही होता है। इसलिये सनातन गोस्वामी अस्वस्थ होने का बहाना करके, राजकार्य छोड़कर, पण्डितों व विद्वानों को साथ लेकर भगवत चर्चा करने लगे। सनातन गोस्वामी द्वारा अचानक राज्य कार्य बन्द कर देने पर, बादशाह चिन्तित हो गये। सनातन गोस्वामी की अस्वस्थता का समाचार पाकर उन्होंने उनके पास अपना वैद्य भेजा। वैद्य ने उनको देखकर आने के बाद बादशाह को सनातन के स्वस्थ होने और उनकी पण्डितों के साथ भगवद् चर्चा की बात बतलायी। सारी बात जानकर बादशाह स्वयं उनके पास गये और अनेक प्रीति पूर्ण वचनों से राजा ने उन्हें समझाने-बुझाने की कोशिश की परन्तु सनातन गोस्वामी राजकार्य करने के लिये तैयार न हुये और उन्होंने उड़ीसा के बादशाह के साथ युद्ध करने के लिये भी अनिच्छा प्रकट की। सनातन के जवाब सुनकर बादशाह चिन्तित हो गया और अन्त में उन्होंने श्रीसनातन को कारागार में डाल दिया व स्वयं युद्ध के लिये चला गया।

उधर यह जानकर कि श्रीमन् महाप्रभु वन के रास्ते वृन्दावन यात्रा पर निकल पड़े हैं, रूप गोस्वामी भी अपने छोटे भाई अनुपम मल्लिक को साथ लेकर, वृन्दावन की ओर चल दिये तथा साथ ही उन्होंने सनातन गोस्वामी को किसी प्रकार कारागार से मुक्त होकर वृन्दावन पहुँचने के लिये संकेत युक्त पत्र लिखकर भेजा।

पत्र का संकेत समझकर सनातन गोस्वामी बहुत खुश हुये। बुद्धिमान सनातन ने यह सोचकर कि वे कारागार से कैसे मुक्त हों, कारागार के रक्षक से (जिसे उन्होंने ही कभी नौकरी पर लगाया था) प्रशंसा पूर्ण शब्दों में उत्साहित करते हुये कहा कि अगर वह एक कैदी को मुक्त कर देगा तो ईश्वर उसका भला करेंगे, लेकिन इस पर यवन का मन न पसीजा। तब उन्होंने उससे प्रति-उपकार करने की प्रार्थना की अर्थात् उन्होंने उसे कहा कि उन्होंने ही तो उसे नौकरी दी थी, इसलिये उस भलाई के बदले वह उनको छोड़ दे। इस पर जब कारागार का रक्षक उन्हें मुक्त करने के लिये तैयार न हुआ तो सनातन गोस्वामी ने उसे अपनी रिहाई के लिये पाँच हज़ार मुद्रायें देने का लोभ दिया। मुद्राओं की बात सुनकर कारागार रक्षक का कठोर रुख नर्म हो गया, लेकिन उन्हें मुक्त करने के लिए, बादशाह द्वारा सज़ा दिये जाने की आशंका प्रकट की। सनातन ने उसको समझाया कि बादशाह युद्ध के लिये गया है। अगर वापिस आ जाये तो उसे कहना कि साकर मल्लिक जंगल-पानी गया था, गंगा को देखकर उसने गंगा में छलांग लगा दी, ढूँढने पर भी कहाँ गया, पता नहीं चल पाया। सनातन आगे बोले कि वे यहाँ रहेंगे नहीं, दरवेश होकर मक्का चले जायेंगे, इसलिये उसे चिन्ता नहीं होनी चाहिये कि वह पकड़ा जाएगा। इस प्रकार बहुत प्रकार से झूठे दिलासे देने और मृदु वाक्यों द्वारा समझाए जाने पर भी, यवन का मन प्रसन्न न होने पर, सनातन गोस्वामी ने दुकान में सुरक्षित रकम में से सात हज़ार मुद्रायें लाकर उसके (यवन कारागार रक्षक के) सामने रख दीं। मुद्रायें देखकर यवन को लोभ हो गया और उसने बेड़ी काटकर श्रीसनातन को गंगा के पार पहुँचा दिया।

किसी की चापलूसी (खुशामद) करना, किसी से अपने द्वारा किये गये उपकार के बदले कुछ प्रार्थना करना या किसी को लोभ देकर झूठ बुलवाना अथवा किसी को रिश्वत देना, ये सभी अन्याय है लेकिन सनातन गोस्वामी ने भगवान् के निकट जाने के लिये, भगवान् की सेवा करने के लिये, यह सब प्रयोग किए। मंगल के उद्देश्य से किये जाने पर सभी को ठीक कहा जाता है। उपेय की शुद्धता या अशुद्धता के ऊपर, उपाय की शुद्धता-अशुद्धता निर्भर करती है। उदाहरण के लिए श्रीराम दास कहलाने वाले हनुमान ने परब्रह्म राम की सेवा के लिये लंका पुरी को जलाया था तथा कई प्राणियों की हत्या की थी। मंगलमय श्रीहरि की प्रीति के लिये होने के कारण, उनके इन सब कार्यों से सबका ही कल्याण हुआ और आज भी हनुमान आदर पाते हैं तथा उनकी पूजा होती है। दूसरी ओर तीनों संध्याओं में स्नान करके मन्दिर में की गई पूजा का उद्देश्य दूसरों का अनिष्ट करना हो, तो तीनों सन्ध्याओं में स्नान करके मन्दिर में की गयी पूजा भी तामसिक हो जाती है। सांसारिक दृष्टि से भी हम देखते हैं कि नरहत्या करने पर हत्यारे को प्राण दण्ड मिलता है किन्तु युद्ध क्षेत्र में देश को बचाने के लिये शत्रुपक्ष के लोगों की हत्या करने पर, प्राणदण्ड नहीं अपितु पुरस्कार मिलता है। इसका कारण यह है कि वह कार्य अपने व्यक्तिगत स्वार्थ की सिद्धि के लिये नहीं होता, बल्कि वृहत्तर स्वार्थ के लिये होता है। उसी प्रकार एक क्षुद्र देश अथवा पृथ्वी के लिये नहीं, बल्कि अनन्त-करोड़ों विश्व ब्रह्माण्डों के स्वामी मंगलमय भगवान् के लिये जो कार्य किया जाता है, वही सुसंगत होता है और उसमें सबका हित ही होता है। “मन्निमित्तं कृतं पापामपि धर्माय कल्पते”3-भगवान् के निमित्त किया गया पाप भी धर्म होता है लेकिन कपट का आश्रय लेकर अगर हम अपने दुनियावी उद्देश्य की सिद्धि के लिये भगवान् का नाम लेकर पाप करते हैं तो उसके लिये अवश्य ही नरकगामी होना पड़ेगा। हनुमान को दुनियावी अभिमान नहीं था और उनका उद्देश्य भी दुनियावी नहीं था

यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥
(गीता 18/17)

जब आत्मा की अहैतुकी भक्ति प्रकट होती है और जब यथार्थ रूप से भगवान के लिये हृदय में व्याकुलता आती है, तब संसार के सारे सुख और स्वछन्दता के विचार समाप्त हो जाते हैं। प्रधानमन्त्री सनातन गोस्वामी खाली हाथ जेल से आज़ाद होकर, राजपथ को छोड़कर, गाँवों के रास्ते बहुत तेज़ गति से चलते–चलते पातड़ा-पर्वत4 पर जा पहुँचे।

पर्वत को पार करने का रास्ता न खोज सकने पर सनातन गोस्वामी ने एक ज़मींदार-जो कि डाकुओं का सरदार भी था-से सहायता के लिये प्रार्थना की। श्रीसनातन गोस्वामी के पुराने नौकर ईशान भी तब साथ में थे। ज़मींदार को अपने ज्योतिषी द्वारा पता चल गया था कि ईशान के पास आठ मोहरें हैं। इसलिये वह सनातन गोस्वामी का खूब आदर सत्कार करने लगा। परम बुद्धिमान राजमन्त्री सोचने लगे कि एक अपरिचित व्यक्ति द्वारा इतना आदर सत्कार करने का कारण क्या हो सकता है, सन्देह होने पर उन्होंने ईशान से पूछा कि कहीं उसके पास कुछ है तो नहीं?

ईशान ने एक मोहर छुपाकर, सात मोहरें पास होने की बात स्वीकार की। सनातन गोस्वामी ने यह कहकर कि वे उस काल-यम को साथ क्यों ले आये, ईशान को मीठी झिड़की देकर, उससे सात मोहरें लेकर उन्होंने ज़मींदार को दीं और उससे पर्वत पार करवा देने का अनुरोध किया। इस पर ज़मींदार ने ईशान के पास आठ मोहरें होने और रात में उनकी हत्या के संकल्प की बात बताकर, प्रसन्नचित्त से मोहरें वापिस कर देनी चाहीं, पर श्रीसनातन गोस्वामी ने वे वापिस नहीं लीं। पारदर्शी-चतुर-दूरदृष्टिवान मनुष्य हमेशा जानता है कि—

अव्यवस्थित चित्तस्य प्रसादपि भयंकरः।
धूर्तस्य वचने क्वास्था, क्वचित् सत्यं क्वचित् मृषा॥
क्वचित् रौद्रं, क्वचित् वृष्टिः, श्रावणस्य घनो यथा।

अर्थात धूर्तों के वचनों की कोई स्थिरता नहीं होती। पर्वत पार कर लेने पर सनातन गोस्वामी ने ईशान को बाकी बची एक मोहर लेकर वापस अपने देश चले जाने को कहा। मोहर-धन मेरी रक्षा करेगा—इस प्रकार की दुनियावी वस्तुओं पर निर्भरता करने वाले को संसार त्याग करने का अधिकार नहीं होता। अनाधिकारी व्यक्ति द्वारा संसार त्याग करने से त्यक्त आश्रम दूषित होता है। श्रीसनातन गोस्वामी ने अपने नौकर ईशान के माध्यम से यही शिक्षा दी। ईशान को विदा करके, चलते-चलते वे पटना के दूसरी ओर हाजीपुर में आ पहुँचे। वहाँ वे अपने बहनोई श्रीकान्त से मिले। श्रीकान्त द्वारा कुछ दिन विश्राम करने के लिये अनुरोध करने पर भी महाप्रभु से मिलने के लिये व्याकुल श्रीसनातन गोस्वामी ने उनका अनुरोध स्वीकार नहीं किया। तब श्रीकान्त ने भेंट के रूप में एक मूल्यवान कम्बल उनको दिया। बनारस पहुँचकर, महाप्रभु के श्रीचन्द्रशेखर वैद्य के घर होने की बात जानकर सनातन गोस्वामी बहुत ही प्रसन्न हुये। पहले चन्द्रशेखर के घर के अन्दर न जाकर, वे बाहरी दरवाज़े पर बैठे रहे। अन्तर्यामी श्रीमन् महाप्रभु ने भक्त के आने के विषय में जानकर, चन्द्रशेखर के माध्यम से, उनको घर के अन्दर आने के लिये कहा जिस पर सनातन गोस्वामी अन्दर चले गये। महाप्रभु ने दौड़कर उनका आलिंगन कर लिया। भक्त और भगवान् के मिलने पर, दोनों में बहुत प्रेम प्रकट हुआ। श्रीमन् महाप्रभु सनातन को अपने पास बिठाकर, स्नेह से अभिभूत होकर उनके अंगों को सहलाने लगे। सनातन द्वारा संकुचित होकर, उनको स्पर्श करने से मना करने पर, श्रीमन् महाप्रभु ने कहा –

तोमा स्पर्शि आत्म पवित्रिते।
भक्ति-बले पार तुमि ब्रह्माण्ड शोधिते॥
तोमा देखि, तोमा स्पर्शि, गाइ तोमार गुण।
सर्वेन्द्रिय-फल,—एइ शास्रेर निरूपण॥
(चै. च. म. 20/56 व 60)

अर्थात् महाप्रभु कहते हैं कि आपको स्पर्श करके मैं अपने आप को पवित्र करता हूँ। भक्ति के बल से आप ब्रह्माण्ड का शोधन कर सकते हो। मैं आपको देखता हूँ, आपका स्पर्श करता हूँ, व आपके गुणगान गाता हूँ—ये ही तमाम इन्द्रियों का फल है, ऐसा ही शास्रों का निर्णय है।

श्रीमन् महाप्रभु ने कहा कि वे इस कारण सनातन गोस्वामी को छू रहे थे ताकि वे भी पवित्र हो जायें और ब्रह्माण्डों को भी पवित्र कर सकें। ऐसा कहकर उन्होंने आगे कहा—

“सुनो सनातन! श्रीकृष्ण कृपा के समुद्र हैं, पतित पावन हैं, उन्होंने तुम्हारा महारौरव नरक से उद्धार कर दिया है” अर्थात् श्रीसनातन गोस्वामी श्रीकृष्ण के नित्यपार्षद व शुद्ध भक्त हैं। श्रीचैतन्य महाप्रभु ने जगतवासियों को सनातन के माध्यम से शिक्षा दी कि जगत में बहुत फँसना और दुनियावी वैभव की प्राप्ति, सौभाग्य की बात नहीं अपितु अत्यन्त दुर्भाग्य का परिचय है। स्थूल व सूक्ष्म इन्द्रियों के तर्पण के लिये सांसारिक वैभव की प्राप्ति नरक प्रदान कराने वाली है। माया मोह से बंधा जीव न्याय के व अन्याय के उपाय से पैसा और सांसारिक प्रतिष्ठा प्राप्ति के लिये प्रयत्न करता है। बहुत कम संख्या में, या यूँ कहें कि कभी-कभी ही इस प्रकार का आदर्श गृहस्थ भक्त पाया जाता है, जो श्रीकृष्ण को ही एक मात्र भोक्ता मानकर उनकी सेवा में ही अपने पूर्ण विषयों को नियोजित करता हो। यदि ऐसा गृहस्थ भक्त मिल जाये तो निश्चय जानना कि वह विषयों को भोग्य रूप में नहीं देखता होगा।

श्रीमन् महाप्रभु श्रीचन्द्रशेखर के घर में रहते थे और श्रीतपन मिश्र के घर पर भोजन करते थे। श्रीमान्महाप्रभु के आदेश पर श्रीसनातन गोस्वामी जी, श्रीचन्द्रशेखर और श्रीतपन मिश्र से मिले। तपन मिश्र के निमन्त्रण पर श्रीसनातन गोस्वामी भी उनके घर पर श्रीमान्महाप्रभु द्वारा छोड़ा हुआ प्रसाद पाने लगे। बहुत दिन जेल में रहने के कारण श्रीसनातन गोस्वामी के केश और दाढ़ी मूँछें बहुत बड़ी-बड़ी हो गयी थीं। श्रीमन् महाप्रभु ने उनको हजामत बनवाकर सभ्य बनकर आने के लिये कहा। वैष्णवों के लिये दाढ़ी मूँछ रखने का विधान नहीं है। हाँ, चातुर्मास्य व्रत आदि का पालन करने के लिये, नाखून और बालों की रक्षा करने पर भी और-और समय में हजामत बनवाकर भद्रभाव से रहना ही वैष्णवों का सदाचार है। इसीलिये वैष्णव संन्यासी के लिये हर पूर्णिमा को मुण्डन करवाना उचित है। परन्तु हर रोज़ हजामत द्वारा विलासिता को आश्रय देना भी ठीक नहीं है।

श्रीसनातन के मुण्डन करवाने के बाद गंगा स्नान करके वापिस आने पर श्रीचंद्रशेखर ने सनातन को नये कपड़े देने चाहे लेकिन उन्होंने नहीं लिये। बाद में श्रीतपन मिश्र भी नये कपड़े लेकर आये पर सनातन गोस्वामी ने उन्हें भी ग्रहण न करके, उनके पुराने कपड़े लिये। जो हज़ारों लोगों को नये कपड़े दे सकते थे, आज वे ही नये वस्र लेने से संकोच कर रहे हैं। भगवद्-भजन के लिये जब निष्कपट दीनता जागृत होती है तो अच्छी पोशाकें और अच्छे भोजन के लिये रुचि नहीं रहती। वैष्णवों द्वारा दिये गये द्रव्य और वैष्णवों द्वारा व्यवहार में लाये गये वस्रों को प्रसाद रूप में ग्रहण करके विषयों का विष दोष नहीं होता। सनातन गोस्वामी के प्रत्येक आचरण में मंगलेच्छु साधकों के लिये अपूर्व शिक्षणीय विषय हैं।

सनातन गोस्वामी का वैराग्य देखकर महाप्रभु बहुत ही प्रसन्न हुये—

महाप्रभु भक्त यत वैराग्य प्रधान।
याहा देखि तुष्ट हन गौर-भगवान्।

अर्थात् महाप्रभु के जितने भी भक्त होते हैं सभी का उच्च वैराग्य होता है और सही बात यह है कि वैराग्य को देखकर महाप्रभु बड़े सन्तुष्ट होते हैं।” सांसारिक भोगविलास के पागलपन और प्रतियोगिता आने से पारमार्थिक जीवन का पतन होता है।

एक महाराष्ट्रीय ब्राह्मण द्वारा जितने दिन श्रीसनातन गोस्वामी ने काशी में रहना था, उतने दिन अपने यहाँ भोजन करने का निमन्त्रण दिये जाने पर श्रीसनातन गोस्वामी ने कहा—”वे प्रतिदिन एक स्थान पर भोजन न करके, माधुकरी भिक्षा द्वारा जीवन धारण करेंगे।” शुद्ध हरि भजन करने वाले व्यक्ति को देह के आराम की आकांक्षा ही नहीं होती।

सनातन गोस्वामी के पुराने वस्रों के पहनने पर और उसके साथ कीमती भोट कम्बल पहनने पर महाप्रभु बार-बार उसे देखने लगे। महाप्रभु द्वारा बार-बार नज़र डालने पर, सनातन गोस्वामी समझ गये कि महाप्रभु को इससे सुख नहीं मिल रहा है। अत: सनातन गोस्वामीजी ने गंगा के तट पर जाकर एक गौड़ीय बाबा को वह कम्बल दे दिया और उनके द्वारा व्यवहार में लायी हुई पुरानी गुदड़ी पहन कर आ गये। महाप्रभु मंहगे कम्बल की जगह गुदड़ी पहने देखकर बहुत सन्तुष्ट हुए—

प्रभु कहे,—“इहा आमि करियाछि विचार।
विषय-रोग खण्डाइल कृष्ण ये तोमार॥
से केने राखिबे तोमार शेष विषय-भोग?
रोग खण्डि’ सदवैद्य ना राखे शेष रोग॥
तिन मुद्रार भोट गाय, माधुकरी ग्रास।
धर्महानि हय, लोके करे उपहास॥“
(चै. च. म. 20/90-92)

अर्थात् महाप्रभु कहते हैं कि मैंने यह विचार किया है कि जब श्रीकृष्ण ने आपके विषय रोग को खण्डित कर ही दिया है तो वे थोड़ा सा भी विषय भोग क्यों रखेंगे। कारण, अच्छा वैद्य रोग को खण्डित करने के पश्चात् रोग का शेष भी नहीं रहने देता है। आपके शरीर पर तीन मुद्रा का कम्बल हो और आप माधुकरी भिक्षा करें, इससे तो धर्म की हानि ही होती है और लोग भी हंसी उड़ाते हैं।

श्रीमन् महाप्रभु स्वयं भगवान् होकर भी सर्वोत्तम आचार्य की लीला कर रहे हैं। उन्होंने जिस प्रकार स्वयं आचरण करके जगत के वासियों को शिक्षा दी, उनके पार्षदों ने भी उसी प्रकार किया—

आपनि करिमु भक्तभाव अंगीकारे।
आपनि आचरि’ भक्ति शिखामु सबारे॥
आपने ना कैले धर्म शिखान ना याय।
एइ त’ सिद्धान्त गीता-भागवते गाय॥
(चै. च.आ. 3/20-21)

अर्थात् स्वयं भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं स्वयं भक्ति भाव को अंगीकार करूँगा तथा स्वयं भक्ति का आचरण करके लोगों को शिक्षा दूँगा। धर्म तब तक सिखाया नहीं जा सकता है जब तक स्वयं पालन न किया जाये। यह सिद्धांत ही गीता तथा भागवत गान करती है।

श्रेष्ठ व्यक्ति जिस प्रकार आचरण करते हैं, दूसरे लोग भी उसे प्रमाण मानकर, उसका अनुकरण करते हैं—

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्त्तते॥
(गीता. 3/21)

श्रीमन् महाप्रभु ने सनातन के प्रति खुश होकर, उनमें शक्ति का संचार किया जिससे उनमें सद् -धर्म के विषय में प्रश्न करने की योग्यता हो गई। भगवद् कृपा के बिना तत्व के विषय में परिप्रश्न और निष्कपट जिज्ञासा का उदय नहीं होता। स्वयं जो जाना है अर्थात् स्वयं का जो ज्ञान है वही ठीक है, ऐसा मानकर अथवा अपना पाण्डित्य ज़ाहिर करने के लिये जो प्रश्न हो, उसे तर्क पन्था कहते हैं, उससे किसी वस्तु की प्राप्ति नहीं होती। शरणागत होकर तत्व-वस्तु जानने के लिये निष्कपट इच्छा होने से जो प्रश्न किया जाये, उसे परिप्रश्न कहते हैं।

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥
(गीता 4/34)

जब मनुष्य का संसार क्षय-उन्मुख होता है अर्थात् मनुष्य का जब इस जन्म-मृत्यु रूपी संसार से मुक्ति प्राप्त करने का समय आता है, तब सद्गुरु के चरण कमलों में उसके मन में किस प्रकार के प्रश्न उदित होंगे, उसे नित्यसिद्ध पार्षद श्रीसनातन गोस्वामी बताते हैं। श्रीमन् महाप्रभु के श्रीचरणों में बैठकर सनातन गोस्वामी अज्ञ साधकों की आहत मानसिक स्थिति में प्रश्न करके, संसार-वासियों को उनके उत्तर से अवगत करवाते हैं—

नीच-जाति, नीच-सङ्गी, पतित अधम।
कुविषय-कूपे पड़ि’ गोंवाइनु जनम॥
आपनार हिताहित किछुइ ना जानि।
ग्राम्य-व्यवहारे पण्डित, ताइ सत्य मानि॥
कृपा करि’ यदि मोरे करियाछ उद्धार।
आपन-कृपाते कह ‘कर्त्तव्य’ आमार॥
‘के आमि’, ‘केने आमाय जारे तापत्रय’।
इहा नाहि जानि—‘केमने हित हय’॥
‘साध्य’-‘साधन’-तत्व, पुछिते न जानि।
कृपा करि’ सब तत्व कह त’ आपनि॥
(चै. च. म. 20/99-103)

अर्थात् सनातन कहते हैं कि मैं नीच जाति, नीचों का संग करने वाला, पतित हूँ व अधम हूँ। मैंने कु-विषय रूपी कुएँ में गिरकर वृथा जन्म बिता दिया है। मैं अपना हित व अहित कुछ भी नहीं जानता हूँ। साँसारिक व्यवहार में विद्वान हूँ और उसी को सत्य मानता हूँ। आपने कृपा करके जब मेरा उद्धार कर ही दिया है तो अब यह भी कृपा कर मुझे बता दीजिये कि मैं कौन हूँ? मुझे त्रिताप क्यों सता रहे हैं? मैं नहीं जानता कि मेरा हित कैसे होगा। मेरा क्या साधन है व क्या मेरा साध्य है? और तो और मैं तो यह पूछना भी नहीं जानता हूँ। आप ही कृपा करके सब तत्त्व मुझे बताइये।

सनातन गोस्वामी का पहला प्रश्न था “मैं कौन हूँ?” श्रेय की इच्छा रखने वाले साधक के मन में सबसे पहले यही प्रश्न उठेगा। स्वरूप का निर्णय करने में भूल होगी तो, प्रयोजन को निश्चित करने में भी भूल होगी। प्रयोजन निर्धारण करने में भूल होने पर सारा परिश्रम और साधन की चेष्टा बेकार हो जाएगी।

स्वरूप के निर्णय से ही कर्त्तव्य, धर्म और स्वार्थ का निर्णय हो जाता है। देह को व्यक्ति मानकर, अपनी देह के प्रयोजन और देह सम्बन्ध युक्त दूसरी देहों के प्रयोजन में ही स्वार्थ बुद्धि होगी, उससे सम्बन्धित करने योग्य काम को ही कर्त्तव्य मानना होगा और उनके अनुकूल व प्रतिकूल विचारों से ही नीति व दुर्नीति तथा धर्म का निर्णय होगा। सूक्ष्म देह को व्यक्ति मानने से उसकी समृद्धि में ही स्वार्थ बुद्धि और दूसरे व्यक्तियों की इस विषय में सहायता करने को ही कर्त्तव्य तथा धर्म समझना होगा। जो स्थूल व सूक्ष्म दोनों देहों के अतिरिक्त, आत्मा को व्यक्ति मानते हैं, वे आत्मा की समृद्धि को और आत्मा के प्रयोजन की प्राप्ति को ही अपना स्वार्थ तथा दूसरे व्यक्तियों की आत्मा की समृद्धि की दिशा में सहायता करने को ही कर्त्तव्य और धर्म कहकर विवेचना करते हैं। परमार्थ में कुशल व्यक्ति जितने दिन स्थूल और सूक्ष्म देह धारणरूपी अवान्छित अवस्था में रहते हैं उतने दिन वे आत्मा के यथार्थ स्वरूप के स्वास्थ्य के अनुकूल ही उन दो देहों की सुविधा व सुयोग को ग्रहण करते हैं, उसके प्रतिकूल नहीं।

श्रीमन् महाप्रभु ने सनातन को शिक्षा देते समय जीव के स्वरूप निर्णय के समय जीव को परमेश्वर कृष्ण का नित्यदास कहा तथा उनकी तटस्था शक्ति और जीव को भगवान से भेदाभेद प्रकाश कहा है। उन्होंने साध्य-साधन के निर्णय में तथा सम्बन्ध, अभिधेय व प्रयोजन निर्धारण में जो उपदेश दिये, उनसे श्रीकृष्ण ही सम्बन्ध, श्रीकृष्ण भक्ति ही अभिधेय या साधन और श्रीकृष्ण प्रेम ही प्रयोजन व साध्य रूप में निर्णीत हुये हैं—

वेदशास्र कहे—‘सम्बन्ध’, ‘अभिधेय’, ‘प्रयोजन’।
‘कृष्ण’—प्राप्य-सम्बन्ध, ‘भक्ति’-प्राप्येर साधन॥
अभिधेय-नाम—‘भक्ति’, ‘प्रेम’—प्रयोजन।
पुरुषार्थ-शिरोमणि प्रेम-महाधन॥
(चै. च. म. 20/124-125)

अर्थात् वेद –शास्र—सम्बन्ध, अभिधेय व प्रयोजन की ही बात कहते हैं, जिससे श्रीकृष्ण प्राप्य-सम्बन्ध हैं तथा उनकी प्राप्ति के लिये भक्ति ही अभिधेय (साधन) है तथा भगवद्-प्रेम ही जीव का प्रयोजन है। ये ‘प्रेम ‘ ही पुरुषार्थों का शिरोमणि व महाधन है।

उपरोक्त विषय की श्रील कविराज गोस्वामी ने श्रीचैतन्य चरितामृत ग्रन्थ के मध्य लीला खण्ड के बीसवें से तेईसवें परिच्छेद तक बहुत से शास्रों से प्रमाण और युक्तियों के साथ विस्तार से चर्चा की है। श्रीसनातन गोस्वामी के चरित्र-वर्णन के बड़ा हो जाने की आशंका से, यहाँ उसका विचार विश्लेषण संक्षिप्त करना होगा।

मूल बात यही है कि ईश्वर व जीव के सम्बन्ध में भेदपरक और अभेदपरक दोनों प्रकार की श्रुति हैं। आचार्यों ने भी अद्वैतवाद, द्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद, शुद्धाद्वैतवाद और द्वैताद्वैतवाद आदि मतों का प्रचार किया है। शास्रों को मानने से शास्रों की पूरी बात माननी होगी; चूंकि सभी तो शास्रों की बातें हैं, शास्र के भेद और अभेद परक -दोनों प्रकार के ही प्रमाणों को मानना होगा। हाँ, उनका सामन्जस्य करना होगा व उनके बीच न्याय-संगत क्या रहस्य है- ये जानना जरूरी है।

श्रीचैतन्य महाप्रभु ने सबका सामन्जस्य व अनुकूलता दिखाने के लिए अचित्यभेदाभेद के सिद्धान्त की स्थापना की, जो पृथ्वी के सभी जगहों पर समादृत हुआ है और यही नहीं, इस सिद्धान्त की स्थापना ने विश्व को हिलाकर रख दिया।

श्रीमन् महाप्रभु ने श्रील सनातन गोस्वामी को चार प्रकार की सेवा प्रदान की थी—

1. शुद्ध भक्ति शास्रों का प्रचार व शुद्ध भक्ति के सिद्धान्तों की स्थापना।
2. लुप्त तीर्थों का उद्धार
3. श्रीवृन्दावन में श्रीकृष्ण सेवा का प्रकाश।
4. वैष्णव आचार, वैष्णव स्मृति-ग्रन्थों के संकलन पूर्वक वैष्णवों के सदाचार का प्रवर्त्तन तथा प्रचार एवं वैष्णव समाज की स्थापना करना।

तुमि करिह भक्तिशास्रेर प्रचार।
मथुराय लुप्ततीर्थेर करिह उद्धार॥
वृन्दावने कृष्णसेवा, वैष्णव-आचार।
भक्तिस्मृतिशास्र करि’ करिह प्रचार॥
(चै. च. म. 23/ 97-98)

श्रील सनातन गोस्वामी ने शुद्ध भक्ति सिद्धान्तों की स्थापना के लिये और वैष्णव सदाचार के प्रवर्त्तन के लिए इन चार ग्रन्थ रत्नों की रचना की: –

1. हरिभक्ति विलास की टीका दिग्दर्शिनी
2. दशम स्कन्ध की टीका और वृहद् वैष्णव तोषणी
3. लीला स्तव या दशम चरित
4. वृहद् भागवतामृत (टीका सहित भागवतामृत के दो खण्ड)

उन्होंने ब्रजमण्डल में लुप्त तीर्थों का उद्धार और वृन्दावन में श्रीराधा मदन मोहन के श्रीविग्रह की सेवा का प्रकाश किया। वैष्णव स्मृति-वैष्णवों के लौकिक आचरण से सम्बन्धित व्यवहारिक शास्र-‘श्रीहरिभक्ति विलास’ ग्रन्थ की रचना की। वैसे इस ग्रन्थ के सम्बन्ध में खुद श्रीमन् महाप्रभु ने सूत्रों के रूप में सनातन गोस्वामी को समझा दिया था।

आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे।
कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः॥
(भा. 1/7/10)

श्रीमन् महाप्रभु ने श्रीमद्भागवत के इस श्लोक की, वासुदेव सार्वभौम के पास अठारह प्रकार से व्याख्या की थी। श्रीसनातन गोस्वामी द्वारा इसी श्लोक की व्याख्या सुनाने के लिए प्रार्थना किये जाने पर श्रीमन् महाप्रभु ने इसी श्लोक की इकसठ प्रकार से व्याख्या की थी।

इस के बाद श्रीमन् महाप्रभु ने मायावादी श्रीप्रकाशानन्द आदि काशी निवासी संन्यासियों को वैष्णव बनाकर, श्रील सनातन गोस्वामी को उत्तम रूप से संस्कार देकर वृन्दावन जाने का आदेश दिया तथा स्वयं निर्जन वन के रास्ते पुरी को प्रस्थान किया। श्रीसनातन गोस्वामी का राजकीय मार्ग से वृन्दावन पहुँचने पर सुबुद्धि राय के साथ साक्षात्कार हुआ। उस समय सुबुद्धि राय जी, महाप्रभु के उपदेश से हरिनाम संकीर्तन रूपी प्रायश्चित कर रहे थे व सूखी लकड़ियाँ बेच कर, बहुत ही कष्ट से अपना जीवन निर्वाह और वैष्णवों की सेवा की व्यवस्था करते थे। श्रील सनातन गोस्वामी ने सुबुद्धि राय और सनोड़िया ब्राह्मण के साथ श्रीव्रजमण्डल के बारह वनों का भ्रमण किया था। उन्हें, उन (सुबुद्धि राय आदि) से ही पता चला कि श्रीरूप गोस्वामी और अनुपम, बारह वनों की परिक्रमा के बाद, गंगा के किनारे वाले रास्ते से बंगाल को चले गये हैं।

महाप्रभु की व्रजमण्डल यात्रा के समय, आरिट ग्राम में, राधाकुण्ड और श्यामकुण्ड की खोज होने के बाद, गोवर्धन में, हरिदेव के दर्शन के पश्चात इच्छा जागृत हुई कि वे गोवर्धन धारी गोपाल देव के दर्शन करेंगे। गोपाल गोवर्धन पर्वत के ऊपर विराजमान हैं। श्रीमन् महाप्रभु गोवर्धन पर्वत के ऊपर चढ़कर दर्शन नहीं करेंगे, वे ऐसा सोच ही रहे थे कि उसी समय गोपाल ने म्लेच्छों का भय पैदा कर दिया और भक्तों के माध्यम से गांठोली ग्राम में आ गये, जिससे महाप्रभु उनके दर्शन प्राप्त कर सकें। बीच-बीच में गोपाल देव इसी प्रकार गोवर्धन से गांठोली ग्राम जाने की लीला करते रहते थे। श्रीसनातन गोस्वामी को भी, उसी प्रकार गांठोली में गोपाल के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।

श्रीरूप गोस्वामी वृन्दावन से यात्रा आरम्भ करके बंगाल में विलम्ब से पहुँचे जिस कारण वे गौड़ीय भक्तों के साथ नीलाचल न जा पाये। इसलिये वे कुछ दिन बाद नीलाचल पहुँचकर हरिदास ठाकुर से मिले और उनके साथ रहने लगे उस समय में श्रीमन् महाप्रभु के द्वारा श्रीसनातन गोस्वामी के विषय में पूछने पर, रूप गोस्वामी ने उन्हें बताया कि वे प्रयाग से गंगा के किनारे वाले रास्ते से आने के कारण, श्रीसनातन गोस्वामी से मिल नहीं पाये।

श्रीसनातन गोस्वामी जी, व्रजमण्डल की परिक्रमा के बाद, मथुरा मण्डल से अकेले ही झारीखण्ड के रास्ते नीलाचल की यात्रा पर निकले। रास्ते में पानी की खराबी के कारण उनको खुजली (कण्डूरसा की बीमारी) हो गई। उन्होंने रास्ते में दीनता और वैराग्य से युक्त होकर सोचा कि उन्होंने तो यवनों के अधीन रहकर नौकरी की है, अतः वे नीच जाति के हैं, उनका शरीर घिनौना है। जगन्नाथजी के दर्शन के लिये और महाप्रभु के जगन्नाथ मन्दिर के निकट रहने के कारण उन्हें उनके दर्शनों का सौभाग्य भी प्राप्त नहीं होगा। अत: जगन्नाथ के मन्दिर के आसपास आने जाने व रहने से जगन्नाथ के सेवकों का स्पर्श होने पर भी अपराध होगा। इसलिए, हरिदास ठाकुर के पास आकर उन्होंने उनके चरणों की वन्दना की। हरिदास ठाकुर ने उनका आलिंगन किया तथा वे वहीं हरिदास ठाकुर के साथ रहने लगे।

श्रीमन् महाप्रभु जब हरिदास ठाकुर को दर्शन देने आए तो महाप्रभु के दर्शन करके श्रीसनातन गोस्वामी कृतकृतार्थ हो गये। महाप्रभु विभोर होकर सनातन गोस्वामी का आलिंगन करने के लिए आगे बढ़े परन्तु श्रीसनातन गोस्वामी अपने को अपवित्र समझकर दूर-दूर सरकने लगे, महाप्रभु जी, सनातन के भाव को समझ गये परन्तु अपने भक्त वात्सल्य को वे संवरण न कर पाये और सनातन के संकोच करने पर भी महाप्रभु ने उनका आलिंगन कर लिया। महाप्रभु के श्रीअंगों में खुजली के घावों का मवाद लग गया जिसे देखकर श्रीसनातन का हृदय विदीर्ण हो गया। इसी समय महाप्रभु ने सनातन को रूप गोस्वामी तथा अनुपम की खबर सुनायी, साथ ही उन्होंने महाप्रभु को अनुपम की इष्टनिष्ठा और उनकी रघुनाथ धाम प्राप्ति की बात भी बताई।

श्रीमन् महाप्रभु जब भी हरिदास की कुटिया पर आते तो सनातन गोस्वामी को आलिंगन करते। पुनः उसी प्रकार सनातन के शरीर से निकलता मवाद महाप्रभु के दिव्य शरीर पर लग जाता। तब सनातन ने मन ही मन विचार किया कि महाप्रभु तो आलिंगन से रुकेंगे नहीं। मेरा तो अपराध होता है, अतः जगन्नाथ के रथ के आगे जब महाप्रभु नृत्य कीर्तन कर रहे होंगे तब मैं रथ के पहिये के नीचे आकर अपने शरीर को त्याग दूँगा। अपने संकल्प को उन्होंने किसी से नहीं कहा परन्तु एक दिन अन्तर्यामी महाप्रभु जी, सनातन गोस्वामी के हृदय की बात जानकर,अचानक उनको लक्ष्य करके कहने लगे—

सनातन, देहत्यागे कृष्ण यदि पाइये।
कोटि-देह क्षणेके तबे छाड़िते पारिये॥
देहत्यागे कृष्ण ना पाइ, पाइये भजने।
कृष्णप्राप्त्येर उपाय कोन नाहि ‘भक्ति’ बिने॥
(चै. च. अ. 4/55-56)

महाप्रभु कहते हैं—सनातन, यदि देहत्याग करने से श्रीकृष्ण प्राप्ति होती तो इसी क्षण मैं करोड़ों देह परित्याग कर सकता हूँ। अतः ये बात समझ लो कि देह त्याग से कृष्ण नहीं मिलते हैं, वे मिलते हैं—भजन से। भक्ति के बिना श्रीकृष्ण को प्राप्त करने का और कोई उपाय नहीं है।

इस प्रसंग में महाप्रभु ने श्रीसनातन गोस्वामी के माध्यम से यह शिक्षा दी कि देह त्याग रूपी तमोधर्म से भगवान् की प्राप्ति नहीं होती। एक मात्र शुद्ध-भक्ति के अनुशीलन द्वारा ही भगवान् को प्राप्त किया जा सकता है। भजन में श्रेष्ठ है नवविधा भक्ति और उसमें भी सर्वश्रेष्ठ है नाम संकीर्तन। अन्त में यह बतलाने के लिये कि श्रीसनातन गोस्वामी उनको कितने प्रिय हैं, महाप्रभु बोले—

प्रभु कहे,—“तोमार देह मोर निज-धन।
तुमि मोरे कैराछ आत्मसमर्पण॥
परेर द्रव्य तुमि केने चाह विनाशिते?
धर्माधर्म-विचार किबा ना पार करिते??
तोमार शरीर—मोर प्रधान ‘साधन’।
ए शरीरे साधिमु आमि बहु प्रयोजन॥
(चै. च. अ. 4/76-78)

अर्थात् महाप्रभु कहते हैं कि तुम्हारी देह मेरा निजी धन है। तुमने मुझे आत्मसमर्पण किया है, इसलिये दूसरे की वस्तु आप कैसे नाश कर सकते हो? क्या तुम धर्म तथा अधर्म का विचार नहीं कर पाते हो? तुम्हारा शरीर तो मेरा प्रधान साधन है, तुम्हारे इस शरीर से मैं अपने बहुत से प्रयोजन सिद्ध करूँगा।

चौमासे में गौड़देश और उड़ीसा के भक्त पुरुषोत्तम धाम में आकर श्रीसनातन गोस्वामी के साथ मिले। रथ यात्रा में रथ के आगे महाप्रभु का नृत्य देखकर श्रीसनातन गोस्वामी हैरान रह गये। चौमासे के बाद श्रीगौड़ीय वैष्णवों की गौड़देश को वापिसी के बाद, सनातन गोस्वामी पुरी में ही रहने लगे। श्रीमन् महाप्रभु ने ज्येष्ठ मास में कुछ दिन टोटा में निवास किया था। श्रीमन् महाप्रभु ने मध्याह्न के समय सनातन गोस्वामी को वहाँ आने के लिये कहा तो, श्रीसनातन गोस्वामी अत्यन्त प्रसन्नता के साथ, जगन्नाथ मन्दिर के सामने वाले सिंह द्वार के रास्ते से न जाकर, दोपहर के समय समुद्र की गर्म रेत पर चलकर महाप्रभु के सन्मुख उपस्थित हुये। देह का ज्ञान न होने के कारण, पाँवों में पड़े हुए फफोलों को भी वे महसूस न कर सके। उनके पैरों में गर्म रेत से जलने के कारण कब फफोले पड़ गये, इसका सनातन को भान ही नहीं हुआ। महाप्रभु द्वारा सिंहद्वार से न आने का कारण पूछे जाने पर, श्रीसनातन गोस्वामीजी बोले—

सिंहद्वारे याइते मोर नाहि अधिकार।
विशेष-ठाकुरेर ताँहा सेवक प्रचार॥
सेवक गतागति करे, नाहि अवसर।
ताँर स्पर्श हैले, सर्वनाश हबे मोर॥
(चै. च. अ. 4/126-127)

अर्थात् सनातन बोले कि सिंहद्वार पर जाने का मुझे अधिकार नहीं है। वहाँ ठाकुर जगन्नाथ के विशेष सेवकों का आना-जाना लगा रहता है। वहाँ कोई समय ऐसा नहीं जब वहाँ सेवक इधर-उधर न जा रहे हों। दुर्भाग्य से यदि कभी मेरा उनसे स्पर्श हो जायेगा तो मेरा तो सर्वनाश ही हो जायेगा।

श्रीमन् महाप्रभु जी, श्रीसनातन के दीनतापूर्ण और मर्यादापूर्ण वचन सुनकर बहुत ही सन्तुष्ट हुए तथा बोले—

यद्यपिओ तुमि हओ जगत् पावन।
तोमा स्पर्शे पवित्र हय देव-मुनिगण॥
तथापि भक्त-स्वभाव—मर्यादा-रक्षण।
मर्यादा पालन हय साधुर भूषण॥
मर्यादा-लङ्घने लोक करे उपहास।
इहलोक, परलोक—दुइ हय नाश॥
मर्यादा राखिले, तुष्ट हय मोर मन।
तुमि ऐछे ना करिले, करे कोन् जन??॥
(चै.च. अ. 4/129-132)

अर्थात् यद्यपि तुम जगत को पवित्र करने वाले हो, आपका स्पर्श पाकर देवता व मुनि भी पवित्र हो जाते हैं, तब भी मर्यादा की रक्षा करना भक्त का स्वभाव है। मर्यादा को पालन करना ही साधुओं का आभूषण है। मर्यादा का उल्लंघन करने पर लोग हंसी उड़ाते हैं। लोक और परलोक दोनों ही नाश हो जाते हैं। श्रीचैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि मर्यादा पालन करने से मेरा मन प्रसन्न होता है। हाँ यदि आप ऐसा नहीं करेंगे तो भला कौन ऐसा करेगा?

महाप्रभु के बार-बार आलिंगन करने से, सनातन के शरीर की खुजली के घावों का रस (मवाद) बार –बार महाप्रभु के श्रीअंगों में लग जाता था, इसलिए एक दिन श्रीसनातन ने, जगदानन्द पण्डित से बातचीत करते हुए इस असुविधा के विषय में निवेदन किया तथा इस अपराध से छुटकारे का उपाय पूछा तो जगदानन्द ने उनको वृन्दावन चले जाने का परामर्श दिया।

श्रीमन् महाप्रभु द्वारा फिर हरिदास ठाकुर के स्थान पर आकर, जोर से श्रीसनातन गोस्वामी का आलिंगन करने पर श्रीसनातन गोस्वामी ने बहुत ही अनिच्छा से महाप्रभु को अपना दुःख निवेदित किया। उन्होंने कहा कि “मैंने अपना दुःख जगदानन्द के पास व्यक्त किया था। उन्हें मैंने कहा कि मेरा पुरी में आना तो गुरुतर अपराध का कारण ही बन गया है। बार-बार मेरे गन्दे, खुजली के मवाद से युक्त शरीर का स्पर्श आपके श्रीअंगों से होता है, मेरे निवेदन करने पर, समाधान के रूप में जगदानन्द ने आपसे वृन्दावन जाने की आज्ञा लेने की सलाह दी।

यह सुनकर महाप्रभु क्रोधित हो गये और क्रुद्ध होकर बोले—

कालिकार बटुया जगा ऐछे गर्वी हैल।
तोमा सबारेह उपदेश करिते लागिल?
व्यवहारे-परमार्थे तुमि—तार गुरु-तुल्य।
तोमारे उपदेश करे, ना जाने आपन-मूल्य??॥
आमार उपदेष्टा तुमि—प्रामाणिक आर्य।
तोमारेह उपदेशे बालका—करे ऐछे कार्य॥
(चै. च. अ. 4/158-160)

अर्थात् कल का छोकरा जगदानन्द ऐसा घमण्डी हो गया है कि तुमको उपदेश करने लगा है? परमार्थ में तथा व्यवहार में तुम उसके गुरु के समान हो। वह आपको उपदेश करता है, अपना मूल्य नहीं जानता? तुम तो प्रामाणिक सज्जन हो व मेरे भी उपदेष्टा हो, ये बालक ऐसा कार्य करता है कि आपको उपदेश करने लग गया है।

जगदानन्द के प्रति महाप्रभु के ऐसे शासन पूर्ण वाक्य सुनकर श्रील सनातन गोस्वामी ने, जगदानन्द के सौभाग्य को सराहते हुये कहा—

जगदानन्दे पियाओ आत्मीयता-सुधारस।
मोरे पियाओ गौरव स्तुति-निम्ब-निशिन्दा-रस॥
(चै. च. अ. 4/163)

अर्थात् तुम जगदानन्द को आत्मीयता रूपी अमृत का पान करवाते हो जबकि मुझे सम्मान रूपी कड़वा पिलाते हो। श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती प्रभुपाद ने अनुभाष्य में इस प्रकार लिखा है-जिसकी जितनी मर्यादा है, उसका अतिक्रमण करके, अपने को बड़ा समझकर, अपने से श्रेष्ठ सम्माननीय पात्र को परामर्श देने रूपी कार्य को महाप्रभु ने उत्साह नहीं दिया। यहाँ तक की उम्र में छोटे जगदानन्द जैसे के व्यवहार का भी महाप्रभु ने अनुमोदन नहीं किया। श्रीमन् महाप्रभु ने श्रीसनातन गोस्वामी के अप्राकृत शरीर को प्राकृत बुद्धि से देखने की भी मनाही की—

तोमार देह तुमि कर वीभत्स-ज्ञान।
तोमर देह आमारे लागे अमृत-समान॥
अप्राकृत-देह तोमार ‘प्राकृत’ कभु नय।
तथापि तोमार ताते प्राकृत-बुद्धि हय॥
(चै. च. अ. 4/172-173)

अर्थात् महाप्रभु कहते हैं हे सनातन! तुम अपनी देह को घृणित समझ रहे हो परन्तु तुम्हारी देह तो मुझे अमृत के समान लगती है। आपकी देह तो अप्राकृत है, यह प्राकृत कभी भी नहीं हो सकती। तब भी आपकी इस देह के प्रति प्राकृत बुद्धि रही है।

श्रीसनातन के प्रति महाप्रभु ने जिन प्रशंसा वाक्यों को कहा उसे सनातन ने अस्वीकार कर दिया। सनातन द्वारा प्रशंसा वाक्यों को अस्वीकार करने पर, श्रीमान्महाप्रभु ने सनातन को दोबारा समझाते हुये कहा–

तोमारे ‘लाल्य’, आपनाके ‘लालक’-अभिमान।
लालकेर लाल्ये नहे दोष-परिज्ञान॥
आपनारे हय मोर अमान्य समान।
तोमा-सबारे करों मुञि –बालक-अभिमान॥
मातार जैछे बालकेर ‘अमेध्य’ लागे गाय।
घृणा नाहि जन्मे, आर महासुख पाय॥
प्रभु कहे,—“वैष्णव-देह ‘प्राकृत’ कभु नय।
‘अप्राकृत’ देह भक्तेर ‘चिदानन्दमय’॥
दीक्षाकाले भक्त करे आत्मसमर्पण।
सेईकाले कृष्ण तारे करे आत्मसम॥
सेई देह करे तार चिदानन्दमय।
अप्राकृत-देहे ताँर चरण भजय॥
सनातनेर देहे कृष्ण कण्डु उपजाञा।
आमा परीक्षिते इँहा दिला पाठाञा॥
घृणा करि’ आलिङ्गन ना करिताम यबे।
कृष्ण-ठाञि अपराधी हइताम तबे॥
पारिषद-देहे एइ, ना हय दूर्गन्ध।
प्रथम दिवसे पाइलुँ चतुः सम-गन्ध॥
(चै. च. अ. 4/184-186,191-193,195-197)

अर्थात् भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु सनातन को कहते हैं—हे सनातन ! मैं आपको लाल्य और अपने को लालक समझता हूँ। लालक कभी भी लाल्य के दोषों के प्रति ध्यान नहीं देता। क्योंकि आपके प्रति मेरा अपनापन है, इसलिए मैं आप सबको अपना बच्चा समझता हूँ। जैसे बालक के शरीर पर यदि कोई अपवित्र वस्तु भी लग जाये तो माता उससे घृणा नहीं करती है, वरन् बच्चे का आलिंगन करके उससे महासुख का अनुभव करती है। महाप्रभु कहते हैं कि वैष्णव की देह प्राकृत कभी नहीं होती है। भक्त की देह अप्राकृत तथा चिदानन्दमय होती है। दीक्षा के समय भक्त आत्म समर्पण करता है, आत्म-समर्पण के साथ ही साथ श्रीकृष्ण उसी समय उसको आत्म-सम कर लेते हैं तथा भक्त की उस देह को चिदानन्दमय कर देते हैं। अप्राकृत देह के प्राप्त हो जाने के बाद तब वह भक्त उस अप्राकृत देह से श्रीकृष्ण के चरणों का भजन करता है।

भक्त भाव में विभावित होकर तभी महाप्रभु कहने लगते हैं कि श्रीसनातन की देह पर श्रीकृष्ण ने कण्डू रस (एक प्रकार की खुजली) को उत्पन्न करके उसे मेरी परीक्षा के लिए यहाँ भेज दिया है। यदि मैं इसे घृणा करके श्रीसनातन का आलिंगन न करता तो मैं श्रीकृष्ण के सम्मुख अपराधी बन जाता। फिर सनातन की देह तो पार्षद देह है, इसमें दुर्गन्ध नहीं है। पहले दिन ही इसमें मैंने चतुःसम (चन्दन, कपूर, कस्तूरी और कुमकुम) की गन्ध पायी थी।

इस बार महाप्रभु द्वारा आलिंगन करने पर, साथ-साथ श्रीसनातन के शरीर की तमाम खुजली अदृश्य हो गई और उनका शरीर सोने की भाँति हो गया।

श्रीमन् महाप्रभु ने सनातनजी को उस वर्ष पुरी में रहने का तथा उससे अगले वर्ष वृन्दावन जाने का आदेश दिया। दोल यात्रा की समाप्ति पर श्रीसनातन गोस्वामी श्रीमन् महाप्रभु से विदा लेकर जंगलों के रास्तों से होकर वृन्दावन पहुँच गये। बाद में श्रीरूप गोस्वामी भी वृन्दावन में आ पहुँचे।

परवर्ती काल में श्रीजगजानन्द महाप्रभु की आज्ञा लेकर मथुरा में सनातन गोस्वामी से मिले। जगदानन्द से मिलकर सनातन गोस्वामीजी आनन्दित हुए। उन्होंने जगदानन्द को साथ लेकर बारह वनों का भ्रमण किया। गोकुल वास के समय श्रीसनातन गोस्वामी की चेष्टा से, जगदानन्द पण्डित भी वहाँ रहे, पर दोनों अलग-अलग से खाना खाते थे। श्रील भक्ति विनोद ठाकुर ने अमृत प्रवाह भाष्य में लिखा है कि श्रीसनातन गोस्वामी ने तो तब तक माधुकरी भिक्षा से प्राप्त रोटी का टुकड़ा खाकर जीवन निर्वाह करना सीख लिया था परन्तु जगदानन्द पण्डित कहते कि भात (चावल) खाये बिना मेरा गुज़ारा मुश्किल है। अतः वे देवालय में जाकर खाना बनाते। व्रज के देवालयों (मन्दिरों) में दाल-भात का प्रसाद नहीं होता।

एक दिन जगदानन्द पण्डित ने श्रीसनातन को प्रसाद पाने के लिए निमन्त्रित किया तथा श्रीसनातन गोस्वामी जी, जगदानन्द पण्डित की अदभुत चैतन्य निष्ठा प्रकट करवाने के लिए मुकुन्द सरस्वती द्वारा दिये हुए लाल कपड़े को मस्तक पर धारण करके जगदानन्द के पास पहुँचे। जगदानन्द पण्डित को जब पता चला कि वह वस्र महाप्रभु का दिया हुआ नहीं था तब वे भात की हाँडी लेकर सनातन को मारने के लिए तैयार हो गये और बोले—

तुमि महाप्रभुर हओ पार्षद-प्रधान।
तोमा-सम महाप्रभुर प्रिय नाहि आन॥
अन्य सन्यासीर वस्र तुमि धर शिरे।
कोन् ऐछे हय,—इहा पारे सहिवारे??॥
(चै. च. अ.13/56-57)

अर्थात् जगदानन्द क्रोधित से होकर सनातन से बोले आप महाप्रभु के प्रधान पार्षद हो। आप के समान महाप्रभु का प्रिय और कोई नहीं है। किसी दूसरे संन्यासी का वस्र आप सिर पर धारण कर रहे हो, कौन ऐसा है जो इस को सहन कर सकेगा?

श्रीसनातन गोस्वामी जगदानन्द पण्डित की गौर-प्रेम निष्ठा की प्रशंसा करते हुए बोले—

सनातन कहे,—“साधु पण्डित-महाशय।
तोमा-सम चैतन्येर प्रिय केह नय॥
ऐछे चैतन्य निष्ठा योग्य तोमाते।
तुमि ना देखाइले इहा शिखिमु केमते??॥
याहा देखिबारे वस्र मस्तके बान्धिलुँ।
सेइ अपूर्व प्रेम एइ प्रत्यक्ष देखिलुँ॥
रक्तवस्र ‘वैष्णवेर’ परिते ना युयाय।
कोन प्रवासीरे दिमु, कि काज उहाय??”॥
(चै. च. अ. 13/58-60)

श्रीसनातन कहते हैं – हे साधु पण्डित महाशय! आपके समान श्रीचैतन्य का प्रिय कोई नहीं है। ऐसी श्रीचैतन्य महाप्रभु के प्रति निष्ठा तो आपके ही योग्य है। यदि आप ऐसी निष्ठा नहीं दिखाओगे तो मैं कैसे सीखूँगा? जिस निष्ठा को देखने के लिए मैंने यह वस्र सिर पर बान्धा था, वह अपूर्व प्रेम मैंने प्रत्यक्ष देख लिया है। खून की तरह लाल रंग के वस्र को कोई वैष्णव पहने तो उसे उपयुक्त नहीं लगता। किसी प्रवासी को मैं ये दे दूँगा, मेरे भला ये क्या काम आयेगा?

इस प्रकार व्रज में दो महीने रह कर श्रीमन् महाप्रभु का विरह न सह सकने पर श्रीजगदानन्द पण्डित सनातन गोस्वामी से विदा लेकर पुरी वापिस चले आये। श्रीसनातन गोस्वामी से विदा लेते समय जगदानन्द व्याकुल हो गए। महाप्रभु को देने के लिए सनातन ने जगदानन्द को व्रज की रास स्थली की बालु, गोवर्धन की शिला, शुष्क पके हुए पीलू फल और गुंजा माला दी। श्रीजगदानन्द पण्डित ने पुरी में पहुँच कर श्रीसनातन गोस्वामी द्वारा दिए हुए पदार्थ महाप्रभु को दिए। श्रीमन् महाप्रभु और भक्तों ने वृन्दावन के पीलू फल बड़े आदर के साथ खाये।

श्रीसनातन गोस्वामी ने वृन्दावन में द्वादश आदित्य टीले पर मठ की स्थापना करने का निश्चय किया तथा वहाँ पर बाद में श्रीराधा मदनमोहन के मन्दिर की प्रतिष्ठा की। ऐसा कहा जाता है कि सुलतान के धनवान क्षत्रिय श्रीकृष्णदास कपूर ने श्रीमदन मोहन मन्दिर और रसोई घर आदि वगैरह का निर्माण और रोज़ाना सेवा की व्यवस्था कर दी थी। वे बाद में श्रील सनातन गोस्वामी के चरणाश्रित भी हो गए थे।

श्रीमन् महाप्रभु के निर्देश के अनुसार, श्रीरघुनाथ भट्ट गोस्वामी वृन्दावन में आकर श्रीरूप गोस्वामी व श्रीसनातन गोस्वामी के साथ ठहरे थे और अपने मधुर कण्ठ से उनको प्रतिदिन श्रीमद्भागवत सुनाते थे। गोकुल महावन में उनके प्रवास के समय श्रील सनातन गोस्वामी ने रमणरेति पर अन्यान्य गोप बालकों के साथ मदन गोपाल को क्रीड़ा करते हुए देखा था। श्रील नरहरि चक्रवर्ती ठाकुर ने श्रीभक्ति रत्नाकर ग्रन्थ में उस का बहुत सुन्दर रूप से वर्णन किया है—

अहे श्रीनिवास! स्थान करह दर्शन।
एइखाने छिलेन गोस्वामी सनातन॥
महावन वासी यत लोक भाग्यवान।
सनातने देखिले सबे पाय प्राण॥
सनातन मदन गोपाल दर्शने।
महासुखे पाइया रहये महावने॥
रमणक बालु एइ यमुनार तीरे।
एथा रंगे मदन गोपाल क्रीड़ा करे॥
एक दिन महावन वासी शिशु सने।
गोप शिशु रूप आइला एइ दिव्य पुलिने॥
नाना खेला खेलये ता देखि सनातन।
मने विचारये ए सामान्य शिशु नन॥
खेल, सांग करि शिशु गमन करिते।
सनातन चलिलेन ताहार पश्चाते॥
मन्दिर प्रवेशे शिशु, तथा सनातन।
शिशु न देखिया! देखे मदन मोहन॥
सनातन मदन गोपाल प्रणमिया।
आइलेन वासा घरे किछु ना कहिया॥
गोस्वामीर प्रेमाधीन मदन गोपाल।
व्यापिल जगते याँर चरित्र रसाल॥
(भक्ति रत्नाकर ५/१७२-१८६)

अर्थात् हे श्रीनिवास! इस स्थान के दर्शन करो, यहां पर श्रीसनातन गोस्वामी थे। महावन में रहने वाले जितने भी भाग्यवान लोग थे वह सभी सनातन को देखकर नव जीवन प्राप्त करते थे। श्रीसनातन महावन में रहकर मदन गोपाल के दर्शन करके महासुख प्राप्त करते थे, यहाँ पर श्रीमदन गोपाल आनन्द से क्रीड़ा करते हैं। एक दिन महावनवासी बालकों के साथ एक शिशु गोपशिशु के रूप में इस दिव्य पुलिन पर आया और यहाँ पर नाना प्रकार के खेल खेलने लगा। ये सारा कुछ सनातन देख रहे थे और मन में विचार कर रहे थे कि यह कोई साधारण बालक नहीं है। खेल खेलने के पश्चात् वह बालक चल पड़ा। श्रीसनातन भी उसके पीछे पीछे चल पड़े। बालक ने मन्दिर में प्रवेश किया, श्रीसनातन ने भी प्रवेश किया। परन्तु वहाँ बालक को न देखकर श्रीमदन गोपाल को ही देखा। श्रीसनातन ने भगवान मदनगोपाल को प्रणाम किया और बिना कुछ कहे ही अपने घर आ गये। मदन गोपाल तो श्रीसनातन गोस्वामी के प्रेम के आधीन हैं, उन्होंने ही सारे जगत में उनके रसमय चरित्र का प्रचार किया है।

श्रीसनातन गोस्वामी जब गोवर्धन में थे तो अयाचित भाव से प्रतिदिन गिरिराज की परिक्रमा करते थे। धीरे –धीरे वृद्ध होनेपर, वे गोवर्धन की परिक्रमा करते हुए थक जाते थे। उन की थकावट देखकर एक दिन गोपीनाथजी ने गोप बालक के रूप में उन के पास आकर उनको हवा करके, उनकी थकावट दूर की। उसी गोप बालक ने गोवर्धन पर चढ़ कर श्रीकृष्ण के चरणों से चिन्हित एक शिला लाकर श्रील सनातन गोस्वामी को दी और यह कह कर अन्तर्धान हो गए कि आप बूढ़े हो गए हैं, इतना परिश्रम क्यों करते हैं, मैं आपको यह गोवर्धन शिला दे रहा हूँ। इस की प्रतिदिन परिक्रमा करने से ही आप की गिरिराज की परिक्रमा हो जाया करेगी।” गोप बालक को न देख पाकर सनातन गोस्वामी रोने लगे। यह प्रसंग भक्तिरत्नाकर के पाँचवें तरंग में वर्णित है। इस स्थान का नाम चक्रतीर्थ है। मानसी गंगा के उत्तर तट पर चक्रेश्वर महादेव (चलित भाषा में चाक्लेश्वर महादेव स्थित है। उस के सामने एक प्राचीन नीम का पेड़ है, इसी नीम के वृक्ष के नीचे श्रील सनातन गोस्वामी की भजन कुटीर थी।) उसके उत्तर में एक मन्दिर में गौर नित्यानन्द की मूर्तियाँ है। श्रीसनातन गोस्वामी द्वारा सेवित गोवर्धन शिला आजकल वृन्दावन में श्रीराधा दामोदर मन्दिर में विराजमान है। इनकी महिमा इस प्रकार भी सुनी जाती है कि श्रीसनातन गोस्वामी जब वहाँ रहकर भजन करते थे तब वहाँ मच्छरों का खूब प्रकोप था। मच्छरों के उपद्रव से हरिनाम करने और ग्रन्थ लिखने में बहुत विघ्न होने पर, श्रीसनातन गोस्वामी ने कहीं और चले जाने का निश्चय कर लिया। उसी दिन रात को चक्रेश्वर महादेव ने स्वप्न में उनसे कहा कि उनको कोई चिन्ता नहीं होनी चाहिए। वे निर्विघ्न भजन करें, अब उनको यह मच्छर परेशान नहीं करेंगे। इस अद्भुत घटना के दूसरे दिन से वहाँ कोई भी मच्छर नहीं था।

श्रील सनातन गोस्वामी ने नन्द ग्राम के पावन सरोवर के तट पर स्थित कुटिया में रह कर भजन किया था। यहाँ पर ही बालक के रूप में श्रीकृष्ण ने उनको दूध दिया था और कुटिया का निर्माण करके रहने का आदेश दिया था। इसी स्थान पर श्रीरूप गोस्वामी द्वारा श्रीसनातन को खीर का भोजन करवाने की इच्छा करने पर, श्रीमति राधारानी ने एक गोप बालिका के वेश में खीर की सामग्री घी, दूध, चावल व चीनी आदि सब कुछ दिया था।

श्रीरूप गोस्वामी ने खीर का भोग लगा कर सनातन गोस्वामी को प्रसाद रूप से दी। सनातन गोस्वामी ने बड़े प्यार से खीर खायी और उसे खाकर बहुत तृप्ति पाई। श्रीसनातन गोस्वामी ने श्रील रूप गोस्वामी से पूछा कि वे खीर का सामान कहाँ से लाये थे। श्रील रूप गोस्वामी द्वारा सारा वृतान्त सुनाने पर श्रील सनातन गोस्वामी जान गए कि श्रीमति राधारानी को कष्ट दिया गया है तथा राधा रानी ही रूप गोस्वामी की इच्छा पूरी करने के लिए गोप बालिका के रूप में खीर का सामान लेकर आयी थीं। इसलिए उन्होंने दोबारा ऐसा करने से श्रीरूप गोस्वामी को मना कर दिया।

श्रीसनातन गोस्वामी से सम्बन्धित एक अन्य घटना की बात भी सुनी जाती है।

एक बहुत ही गरीब शिव भक्त ब्राह्मण थे।5 उन्होंने गरीबी के कारण शिवजी से धन के लिए प्रार्थना की—शिवजी ने उसको स्वप्न में आदेश दिया कि वृन्दावन में सनातन गोस्वामी के पास धन है। वह उनके पास जाये, उसे उनके पास जाकर धन मिलेगा। दरिद्र ब्राह्मण स्वप्न के आदेश के अनुसार वृन्दावन गए और श्रीसनातन गोस्वामी के पास पहुँचे, किन्तु सनातन गोस्वामी के मैले कपड़े व उनके कमज़ोर शरीर को देखकर उन्हें यह विश्वास न हो सका कि वे धन दे पायेंगे। फिर भी स्वप्न के आदेश की बात उन्होंने सनातन गोस्वामी से निवेदित की। यह बात सुनकर श्रील सनातन गोस्वामी को लगा मानों आकाश से गिर पड़े हों और वे बोले कि वे तो माधुकरी भिक्षा करके किसी प्रकार जीवन धारण करते हैं। उनके पास भला धन कहाँ है?

गरीब ब्राह्मण दुःखी होकर वापिस चले गए और मन ही मन सोचने लगे कि शिवजी के स्वप्न आदेश में अवश्य ही भूल हो गई होगी। इधर श्रीसनातन गोस्वामी ये सोचकर विस्मित हुए कि शिवजी महाराज ने इस ब्राह्मण को उनके पास क्यों भेजा? बहुत सोचने पर उनके मन में एक स्पर्शमणि की बात आई, जो मैली तुच्छ वस्तुओं के नीचे गाढ़ी हुई थी। मन में आने पर उन्होंने लोगों को भेज कर ब्राह्मण को बुलवा भेजा और उन्हें उन वस्तुओं के भीतर से वह स्पर्श मणि ले लेने को कहा। उसे पाकर वह ब्राह्मण बहुत ही आनन्दित हुआ। उसे लगा कि अब उस जैसा धनवान और कोई सारी पृथ्वी पर नहीं होगा लेकिन कुछ दूर जाने पर ब्राह्मण सोचने लगा कि इतनी बड़ी मूल्यवान वस्तु की बात, श्रीसनातन गोस्वामी के मन में नहीं थी, इसका अर्थ उनके पास कुछ और मूल्यवान धन भी होगा जिस से वह वन्चित रह रहा है। उन्होंने कौन से धन से धनी होकर मूल्यवान मणि को अस्वीकार कर दिया। इस प्रकार सोचकर ब्राह्मण ने दोबारा वापिस आकर श्रीसनातन गोस्वामी से अपना सन्देह व्यक्त करते हुए पूछा कि तुम्हारे पास अवश्य ही और भी कोई मूल्यवान धन है, जिसके कारण तुम ने स्पर्श मणि त्याग दी है। तब श्रीसनातन गोस्वामी ने ब्राह्मण को श्रीकृष्ण के प्रेम की सर्वोत्तमता और दुनियाँ के पार्थिव धन के दुःखप्रद होने की बात समझायी।

ब्राह्मण ने सनातन गोस्वामी से इस प्रकार प्रार्थना की “ये धने हइया धनी। मणिरे मान न मणि। तार एक कण मांगि नत शिरे।” श्रीसनातन गोस्वामी ने उस पर कृपा करके उसे श्रीकृष्ण प्रेम का धन प्रदान किया। पुराने श्रीराधा मदन मोहन मन्दिर के पिछवाड़े में ही श्रीसनातन गोस्वामी प्रभुपाद का समाधि मन्दिर है। श्रील सनातन गोस्वामी ने ब्रज मण्डल में शकाब्द 1480 (सम्वत् 1615 सन् 1558 ईसवी) में आषाढ़ी पूर्णिमा को अपनी जागतिक लीला संवरण की।

श्रीरूप-सनातन ब्रज मण्डल में किस प्रकार भजन करते थे उस का श्रीचैतन्य चरितामृत में इस प्रकार वर्णन है—

अनिकेत दुँहे, वने यत वृक्षगण,
एक एक वृक्षेरे तले एक एक रात्रि शयन।
‘विप्रगृहे’ स्थूलभिक्षा, काँहा माधुकरी।
शुष्क रूटी-चाना चिबाय, भोग परिहरि॥
करोंया-मात्र हाते, काँथा, छिड़ा-बहिर्वास।
कृष्णकथा, कृष्णनाम, नर्तन-उल्लास॥
अष्टप्रहर कृष्णभजन, चारिदण्ड शयने।
नाम-सङ्कीर्तन-प्रेमे, सेह नहे कोन दिने।
कभु भक्तिरसशास्र करये लिखन।
चैतन्यकथा शुने, करे चैतन्य-चिन्तन॥
(चै. च. म. 19/127-131)


1 – इसी ग्रन्थ के श्रील रूप गोस्वामी के पावन चरितामृत वर्णन में, उपरोक्त वंश का परिचय दिया गया है। इसके अलावा और कोई प्रामाणिक वंश परिचय अन्यत्र उपलब्ध नहीं हो पाया। प्राचीन इतिहास के सम्बन्ध में खोज करने वाले इस विषय में रोशनी डाल सकते हैं।
2 – श्रीरूप व सनातन गोस्वामी का पीठ स्थान—श्रीरामकेलि (गुप्त वृन्दावन), अंग्रेज़ बाज़ार से लगभग आठ मील दक्षिण में और वर्तमान नगर मालदह स्टेशन से 56 मील दूर स्थित था।

दर्शनीय-(1) वे तमाल और केलि कदम्ब वृक्ष-जिन वृक्षों के नीचे महाप्रभु बैठे थे और रूप सनातन के साथ मिले थे। उस स्थान की स्मृति की रक्षा के लिये अब वहाँ पर एक पाद-पीठ मन्दिर का निर्माण हुआ है। यहाँ की ऊँची वेदी पर श्रीमन् महाप्रभु के चरण चिन्ह हैं। यहाँ पर महाप्रभु ने पार्षदों के साथ भक्तों को प्रेमामृत का दान दिया था।
(2)श्रीमदन मोहन मन्दिर – यहाँ पर सनातन गोस्वामी द्वारा सेवित मदन मोहन का विग्रह है। इसके इलावा निताई गौरांग और श्रीअद्वैताचार्य की मूर्तियां भी हैं।
(3) श्यामकुण्ड, राधाकुण्ड, सुरभिकुण्ड, ललिता कुण्ड और विशाखा कुण्ड का प्रकाश।
(4) रूपसागर – श्रीरूप गोस्वामी द्वारा प्रतिष्ठित वृहद् सरोवर।
(5) सनातन सागर नामक एक जलाशय
श्रीरूप-सनातन ने फतेहाबाद और रामकेलि दोनों स्थानों में विशाल भवन बनवाये थे।

3 मन्निमितं कृतं पापमपि धर्माय कल्पते।
मामनादृत्य धर्मोपि पापं स्यान्मत् प्रभावतः॥
(पद्म पुराण)

मेरे निमित्त किया गया पाप भी धर्म होता है और मेरा अनादर करके किया गया धर्म भी, मेरे प्रभाव से पाप हो जाता है।

4 पातड़ा-पर्वत—बिहार के छोटा नागपुर अंचल की राजमहल पर्वत श्रेणी के अन्तर्गत।
(गौड़ीय वैष्णव अभिधान)

5 शिव भक्त ब्राह्मण:- गौड़ीय वैष्णव अभिधान में और भक्त माल ग्रन्थ में ब्राह्मण का परिचय दिया गया है। ये वर्धमान ज़िले के मानकर के निवासी श्रीजीवन चक्रवर्ती थे। बहुत दिन तक काशी धाम में शिवजी की आराधना करके धन प्राप्ति के लिए शिवजी के आदेश से वृन्दावन में श्रील सनातन गोस्वामी के पास गये थे।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज द्वारा रचित ग्रन्थ ‘गौर-पार्षद’ में से