श्रील लोचनदास ठाकुर सन् 1523 ई. में वर्द्धमान जिले के कटोया महकुमा में गुस्करा रेलवे स्टेशन से पाँच क्रोस उत्तर की ओर कोग्राम में वैद्यवंश में आविर्भूत हुये थे। किसी-किसी के मतानुसार पौषमास की शुक्लप्रतिपदा तिथि को इनका आविर्भाव हुआ था। इनके पिता का नाम श्रीकमलाकर दास और माताजी का नाम था श्रीमती सदानन्दी। श्रीलोचनदास ठाकुर के श्रीपाट के पास ही अजय नदी बहती है। माता-पिता की एकमात्र सन्तान होने के कारण वे उनके अत्यन्त स्नेह के पात्र थे। वे अपनी नानी के घर में रहकर अध्ययन किया करते थे। उस समय की सामाजिक प्रथा के अनुसार छोटी आयु में ही श्रीलोचनदास ठाकुर का विवाह हो गया था। आमेदपुर के काकुट ग्राम में इनका ससुराल था। गृहस्थ आश्रम में होने पर भी आप विषयों से विरक्त थे। सदैव गौरभक्तों के साथ कृष्ण कथा श्रवण-कीर्तन में ही समय बिताना आप अच्छा समझते थे। शैशव काल से ही आपके चरित्र में गौर महाप्रभु के प्रति अद्भुत अनुरक्ति देखी गई थी।1

श्रीखण्ड के प्रसिद्ध गौरपार्षद श्रीनरहरि सरकार ठाकुर ने श्रीलोचनदास के प्रति स्नेहाविष्ट होकर उन्हें दीक्षा प्रदान कर उन्हें अपने शिष्य के रूप में ग्रहण किया था। श्रीलोचनदास ठाकुर भी श्रीखण्ड में श्रील गुरुदेव के पदपद्मों में अवस्थान करते हुए परमोत्साह के साथ उनकी सेवा करने लगे। श्रीनरहरि सरकार ठाकुर ने उन्हें कीर्त्तन के विषय में शिक्षा दी और श्री श्रीगौरांग महाप्रभु का पावन जीवन चरित्र लिखने के लिए आदेश दिया। श्रील गुरुदेव की आज्ञा को शिरोधार्य करके इन्होंने ‘श्रीचैतन्य मंगल’ नामक ग्रन्थ लिखा। श्रीचैतन्य महाप्रभु के चरित्र को श्रवण करने से सर्वोत्तम मंगल की प्राप्ति होती है, इसीलिये ग्रन्थ का नाम ‘श्रीचैतन्य मंगल’ रखा गया। श्रीवृन्दावनदास ठाकुर द्वारा रचित ग्रन्थ का नाम भी पहले ‘श्रीचैतन्य मंगल’ ही था जो कि बाद में परिवर्तित होकर ‘श्रीचैतन्य भागवत’ हुआ। श्री लोचन दास की वन्दना में इस का संकेत मिलता है।

वृन्दावनदास वन्दिवे एकचित्ते।
जगत मोहित जाँर भागवत गीते।।
(चैतन्यमंगल सूत्र खण्ड)

किसी-किसी के मतानुसार श्रीलोचनदास ठाकुर और श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने वृन्दावन दास रचित ग्रन्थ का नामकरण ‘श्रीचैतन्य भागवत’ किया था। श्रीचैतन्य मंगल ग्रन्थ के प्रारम्भ में सूत्र खण्ड में श्रीनरहरि सरकार ठाकुर से कृपा प्रार्थना इस प्रकार की गयी है –

ठाकुर श्रीनरहरि, दास प्राण अधिकारी
जाँर पदप्रति आसे आश
अधमेह साध करे, गौरागुण गाहिवारे
ताहाँ बिनु नाहि मोर तिन लोके बन्धु।
नरहरिदास वन्दों गौर-गुण-सिन्धु॥
आमार ठाकुर प्रभु नरहरिदास।
प्रणति-विनति करों पुर’ मोर आश॥
से भरसा ए लोचनदास॥

पूर्व बंगाल के पाँचाली छन्द के अनुकरण में श्रीलोचनदास ठाकुर ने ‘श्रीचैतन्यमंगल’ लिखा है। ‘नवीन बांग्ला शब्दकोश’ में श्रीलोचनदास ठाकुर का बांग्ला तथ्यभाषा के साहित्य की रचना एवं मात्रावृत्त छन्द के प्रवर्त्तक के रूप में उल्लेख किया गया है। उनकी भाषा में लालित्य है। ‘श्रीचैतन्य मंगल’ ग्रन्थ सन् 1537 ई. में लिखा गया था। ऐसा कहा जाता है कि श्रीलोचनदास ठाकुर ने अपने घर में फूल के वृक्ष के नीचे एक पत्थर के ऊपर बैठकर ‘चैतन्यमंगल’ नामक ग्रन्थ लिखा था। श्रीमुरारि गुप्त द्वारा रचित ‘श्रीचैतन्य चरित’ की सहायता से श्रीलोचनदास ठाकुर ने ‘श्रीचैतन्य मंगल’ ग्रन्थ की रचना की थी। श्रीलोचनदास ठाकुर द्वारा रचित अन्य-अन्य ग्रन्थों में से उल्लेखनीय हैं ‘प्रार्थना’, ‘दुर्लभसार’, ‘पदावली’ (धामाली), ‘जगन्नाथ-बल्लभ नाटक’ तथा ‘रासपंञ्चोध्याय का पद्यानुवाद’। ऐसा भी सुना जाता है कि गुस्करा स्टेशन के पास काँदड़ा ग्राम में श्रीप्राणकृष्ण चक्रवर्ती के घर पर श्रीलोचनदास ठाकुर का स्वहस्तलिखित ‘चैतन्यमंगल’ ग्रन्थ रखा हुआ है।

श्रीलोचनदास ठाकुर ने ‘चैतन्य मंगल’ में अपने गुरुदेव श्रीनरहरि सरकार ठाकुर का श्रीगौरांग महाप्रभु के प्रियतम के रूप में वर्णन किया है। इनके मन में ऐसा विचार आया कि इस ग्रन्थ में श्रीनित्यानन्द प्रभु की महिमा यथार्थ रूप से वर्णन नहीं हो पायी। इस आशंका से कि उनका श्रीनित्यानन्द प्रभु के चरणों में अपराध हुआ है, अपराध के निवारण के लिये उन्होंने परवर्तीकाल में श्रीनित्यानन्द प्रभु की महिमा सूचक कुछ एक गीतियाँ भी लिखीं। वह गीतियाँ भक्तों द्वारा विशेष रूप से समादृत हुई हैं।

निताइ गुणमणि आमार निताई गुणमणि।
आनिया प्रेमेर वन्या भासाल अवनी॥
प्रेमेर वन्या लइया निताइ आइला गौड़ देशे।
डुबिल भकतगण दीन-हीन भासे॥
दीनहीन पतित पामर नाहि बाछे।
ब्रह्मार दुर्लभ प्रेम सबाकारे याचे॥
आबद्ध करुणासिन्धु (निताइ) काटिया मोहान।
घरे-घरे बुले प्रेम अमियार वान॥
लोचन बले मोर निताइ जेबा ना भजिल।
जानिया शुनिया सेइ आत्मघाती हैल॥

निताई गुणमणि मेरे हैं, निताई गुणमणि मेरे हैं। इन्होंने कृष्ण – प्रेम की बाढ़ लाकर सारी पृथ्वी को उसमें डुबो दिया।

कृष्ण प्रेम की बाढ़ लेकर नित्यानन्द प्रभु गौड़ देश में आये, जिस आनन्द में सारे भक्त डूब गये तथा दीन-हीन जो थे वे भी उस प्रेम की बाढ़ में बह चले।

जो ‘कृष्ण-प्रेम’ ब्रह्मा के लिए भी दुर्लभ है वह ‘प्रेम’ सभी को बांट दिया। इन्होंने दीन हीन या पतित को भी उससे वंचित नहीं रखा।

करुणा सागर नित्यानन्द प्रभु ने उस प्रेम के बाँध को तोड़ दिया जिससे वह कृष्ण प्रेमामृत घर -घर में घुस गया।

लोचन दास कहते हैं कि इस प्रकार के दयालु कृपालु जो मेरे नित्यानन्द प्रभु हैं उनका जिसने भजन नहीं किया तो समझना होगा कि जानबूझ कर वह आत्म हत्यारा बना।

अक्रोध परमानन्द नित्यानन्दराय।
अभिमान शून्य निताई नगरे बेड़ाय॥
अधम पतित जीवेर द्वारे-द्वारे गिया।
हरिनाम महामन्त्र देन बिलाइया॥
जारे देखे तारे कहे दन्ते तृण करि’।
आमारे किनिया लह भज गौरहरि॥
एत बलि नित्यानन्द भूमे गड़ि जाय।
सोनार पर्वत जेन धूलाते लोटाय॥
हेन अवतारे जार रति ना जन्मिल।
लोचन बले सेइ पापी एल आर गेल॥

क्रोध रहित एवं परमानन्द पूर्ण नित्यानन्द प्रभु अभिमान शून्य होकर नगर में भ्रमण कर रहे हैं।

वे पतित जीवों के द्वार – द्वार पर जाकर हरिनाम महामंत्र बाँटते फिर रहे हैं।

वे जिसको भी देखते हैं उससे दाँतों में तिनका लेकर अर्थात् अत्यन्त दीनता से कहते हैं कि आप गौरहरि का भजन करो और मुझे खरीद लो।

इतना कहकर नित्यानन्द प्रभु प्रेमानन्द में विभोर होकर ज़मीन पर लोट-पोट होने लगते हैं। तब ऐसा लगता है कि मानो सोने का पर्वत ज़मीन पर लोट-पोट हो रहा हो ।

इस प्रकार के अवतार में जिसकी प्रीति उदित नहीं हुई, लोचन दास ठाकुर कहते हैं कि उसकी ज़िन्दगी बेकार है। यह पापी तो समझो आया और गया।

श्रीगौर नित्यानन्द की महिमा सूचक गीतिः
परम करुण, पँहु दुइजन, निताई गौरचन्द्र।
सब अवतार, सार-शिरोमणि, केवल आनन्द-कन्द॥
भज भज भाइ, चैतन्य निताइ, सुदृढ़ विश्वास करि।
विषय छाड़िया से रसे मजिया, मुखे बल हरि-हरि॥
देख ओरे भाइ, त्रिभुवने नाइ, एमन दयाल दाता।
पशु पाखी झुरे, पाषाण विदरे, शुनि’ जार गुणगाथा॥
संसारे मजिया, रहिलि पड़िया, से पदे नहिल आश।
आपन करम, भुञ्जाये शमन, कहये लोचनदास॥

श्रीनित्यानन्द प्रभु व श्री गौरचन्द्र दोनों ही परम करुणामय हैं। वे सभी अवतारों के मूल शिरोमणि व केवल आनन्दकन्द हैं।

हे भाई! तुम अवश्य ही सुदृढ़ विश्वास के साथ श्रीचैतन्य महाप्रभु व श्रीनित्यानन्द प्रभु का भजन करो। विषय भोगों को छोड़कर उस अप्राकृत रस में निमग्न होकर मुख से ‘हरि- हरि’ उच्चारण करो।

देखो भाई! इस सारे त्रिभुवन में इस प्रकार का दयालु व इस प्रकार का दाता नहीं है। इनका गुणगान सुनकर तो पशु- पक्षी भी प्रेम विह्वल हो उठते हैं तथा पत्थर भी पिघल जाते हैं।

तुम तो संसार में प्रमत्त हुये पड़े हो। तुम्हें तो ज़रा सी भी उन पादपद्मों की अभिलाषा नहीं है। लोचन दास कहते हैं कि तुम्हारे सभी कर्मो को काल तुमसे भुगवायेगा।

श्रीलोचनदास ठाकुर ने श्रीनरहरि सरकार ठाकुर के तिरोभाव उत्सव में भक्तों को माला एवं चन्दन प्रदान किया था।

श्रीनरहरि चक्रवर्ती रचित ‘भक्ति रत्नाकर’2 ग्रन्थ में भी श्रीलोचनदास ठाकुर नाम का उल्लेख हुआ है।

श्रीयदुनन्दन, श्री लोचन दुइजन।
लइलेन पुष्प माल्य सुगन्धि चन्दन॥

एक श्रेणी के अपसम्प्रदाय इनके विषय में इस प्रकार भी कहते हैं कि श्रीलोचनदास ठाकुर के ‘श्री चैतन्यमंगल’ में ‘गौर-नागरी वाद’ की बातें हैं किन्तु ये ठीक नहीं है। श्रीचैतन्य भागवत रचयिता श्रीवृन्दावन दास ठाकुर ने गौर-नागरी वाद की निंदा की है। गौरांग नागर हेन स्तव नाहि बले।
–श्रीचैतन्य भागवत

श्रीगौरसुन्दर—राधाभावद्युतिसुवलित कृष्ण हैं। इसलिये उन्होंने श्रीकृष्ण सेवा के लिये आश्रयजातीय श्रीमति राधिकादि गोपियों के हृदय के भाव को परित्याग कर कभी भी स्वयं श्रीकृष्ण की भांति विषयजातीय चेष्टाएँ करके अर्थात् स्वयं भोक्ता अभिमान कर परस्त्री के दर्शनादि द्वारा ‘लम्पटनागर’ की वृत्ति का परिचय नहीं दिया।
–श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी

सन् 1589 ई. को श्रीलोचनदास ठाकुर का तिरोधान हुआ। श्रीलोचनदास ठाकुर की भजन स्थली में ईटों से बनी समाधि है।


1श्रीलोचनदास ठाकुर के सम्बन्ध में एक अलौकिक घटना सुनी जाती है। बाल्यकाल में विवाह हो जाने के कारण श्रीलोचनदास की पत्नी अपने माता-पिता के पास रहती थी। कन्या बड़ी हो जाने के कारण एवं श्रीलोचनदास के वैराग्य की बात सुनकर कन्या के भविष्य के विषय में सोच कन्या के माता-पिता उद्विग्न हो उठे। कन्या के माता-पिता ने लोचनदास के गुरुजी के पास आकर सब निवेदन किया। श्रीनरहरि सरकार ठाकुर के आदेशानुसार श्रीलोचनदास ससुराल जाने को बाध्य हो गये। लम्बे समय से ससुराल न जाने के कारण घर न पहचान पाने पर उन्होंने गाँव की एक युवती महिला को ‘माँ’ सम्बोधन कर घर के विषय में पूछा। बाद में ससुराल पहुँच कर ज्ञात हुआ कि जिनको उन्होंने ‘माँ’ सम्बोधन किया था, वही उनकी पत्नी है। तभी से श्रीलोचनदास ठाकुर अपनी पत्नी को ‘पत्नी’ रूप से न देखकर ‘जननी’ रूप से दर्शन करते हुए वैराग्य के साथ जीवन के अन्तिम समय पर्यन्त श्रीगुरु गौरांग की सेवा में नियोजित रहे।
2’भक्तिरत्नाकर’ ग्रन्थ के रचयिता श्रीनरहरि चक्रवर्ती हैं। इनका आविर्भाव स्थान मुर्शिदाबाद ज़िले के रेंगाग्राम में है। ये घनश्याम दास नाम से प्रसिद्ध थे। खण्ड के निवासी श्रीनरहरि सरकार ठाकुर अलग व्यक्ति है।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज द्वारा रचित ग्रन्थ ‘गौर-पार्षद’ में से