श्रीसदाशिव कविराज-बड़ महाशय।
श्रीपुरुषोत्तमदास-ताँहार तनय॥
आजन्म निमग्न नित्यानन्देर चरणे।
निरन्तर बाल्य-लीला करे कृष्ण-सने॥
ताँर पुत्र-महाशय श्रीकानु ठाकुर।
याँर देहे रहे कृष्ण-प्रेमामृतपूर॥
(चै. च. आ. 11/38-40)

श्री चैतन्य चरितामृत आदिलीला के ग्यारवें परिच्छेद में श्रीमन् नित्यानन्द प्रभु के अनन्त पार्षदों के विवरण में श्रील कविराज गोस्वामी ने जिन मुख्य पार्षदों के नामों का उल्लेख किया है, उनमें श्री पुरुषोत्तम दास भी एक हैं।

श्रील वृन्दावन दास ठाकुर ने भी श्री चैतन्य भागवत ग्रन्थ के अन्त्य खण्ड के पंचम अध्याय में श्री पुरुषोत्तम दास ठाकुर की गणना श्रीमन् नित्यानन्द प्रभु के मुख्य पार्षद के रूप में की हैं।

सदाशिव-कविराज—महा-भाग्यवान्।
याँर पुत्र—पुरुषोत्तमदास-नाम।
बाह्य नाहि पुरुषोत्तम दासेर शरीरे।
नित्यानन्दचन्द्र याँर हृदय विहरे॥
(चै.भा.अ. 5/741-742)

सदाशिवसुतो नाम्ना नागरः पुरुषोत्तमः।
वैद्यवंशोद्भवो नाम्ना दाम यो बल्लवो व्रजे॥
(गो.ग.दी. 131)

ब्रज में जो ‘श्रीदाम’ नामक गोप थे, वही अब वैद्य वंश में उत्पन्न, सदाशिव के पुत्र ‘नागर पुरुषोत्तम’ हैं। ‘श्रीदाम’, द्वादश गोपालों में से एक हैं। ब्रज लीला में श्री पुरुषोत्तम ठाकुर भगवान श्री कृष्ण की बाल क्रीड़ा के साथी हैं।

कंसारि सेन, उनके पुत्र सदाशिव, उनके पुत्र श्री पुरुषोत्तम ठाकुर और उनके पुत्र श्री कानु ठाकुर—इस प्रकार इनकी ये चार पीढ़ी सिद्ध पार्षद थी। लगातार चार पीढ़ियों का सिद्ध पार्षदत्त्व बहुत विरल होता है। गौरगणोद्देश दीपिका में कंसारि सेन का ब्रज लीला में ‘रत्नावली’ के रूप में परिचय दिया गया है।

श्री पुरुषोत्तम ठाकुर की पत्नी का नाम श्री जाह्नवा देवी था। पुत्र कानु ठाकुर का शैशव-अवस्था में मातृवियोग हो गया था। श्रीमन् नित्यानन्द प्रभु ने इनका नाम ‘शिशु कृष्णदास’ रखा था। कहा जाता है कि श्री नित्यानन्द शक्ति, श्रीजाह्नवा देवी ने शिशु कानु ठाकुर का पालन-पोषण किया था, एवं वे उनको वृन्दावन लेकर गई थीं। किसी-किसी के मत में कानु ठाकुर द्वादश गोपालों में से एक हैं। एक समय जब वृन्दावन में कानु ठाकुर नृत्य-कीर्तन के आनन्द में विह्वल थे, तब उनके दाहिने चरण का नूपुर कहीं गिर गया। तब उन्होंने संकल्प लिया कि जहाँ उनका नूपुर गिरा है, वहीं जाकर वे रहेंगे। यशोहर ज़िला के ‘बोधखाना’ नामक स्थान पर नूपुर की प्राप्ति होने पर, कानु ठाकुर बोधखाना जाकर रहने लगे। जिराट निवासी श्री माधवाचार्य भी (श्री माधव चट्टोपाध्याय भी) श्री पुरुषोत्तम ठाकुर के शिष्य थे। श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर ने श्री पुरुषोत्तम ठाकुर के श्री पीठ-स्थान के सम्बन्ध में इस प्रकार लिखा है—

नदीया ज़िले के अन्तर्गत ‘चाकदह’ और ‘शिमूरालि’ के मध्यवर्ती स्थान ‘सुख सागर’ में श्री पुरुषोत्तम ठाकुर का निवास था। श्री पुरुषोत्तम ठाकुर द्वारा सेवित विग्रह, पहले बेलेडांगा ग्राम में विराजमान थे। उसका विध्वंस होने पर, श्री विग्रह ‘सुख सागर’ में आ गए। सुख सागर के भी गंगा के जल में समा जाने पर, ठाकुर के श्री विग्रहगणों ने साहेब डांगा बेरिग्राम में श्री जाह्नवा माता की गद्दी के श्री विग्रहों के साथ शुभागमन किया। बेरिग्राम के भी ध्वंस हो जाने पर, ठाकुर के विग्रह श्री जाह्नवा माता की गद्दी के साथ गंगा के किनारे स्थित-‘चान्दूड़े’ नामक ग्राम में आकर विराजित हो गए। प्राचीन सुख सागर के नदी के गर्भ में चले जाने पर, नया सुख सागर, चान्दूड़े ग्राम से तीन-चार मील की दूरी पर प्रकट हो गया है। ये चान्दूड़े नामक ग्राम पालपाड़ा से एक मील दूरी पर स्थित है। वैष्णव वन्दना के रचयिता श्री देवकीनन्दन दास ने ‘वैष्णव वन्दना’ में पुरुषोत्तम ठाकुर के शिष्य के रूप में अपना परिचय दिया है

सदाशिव कविराज वन्दो एकमने।
निरन्तर प्रेमोन्माद बाह्य नाहि जाने।
इष्टदेव वन्दो श्रीपुरुषोत्तम नाम।
के कहिते पारे ताँर गुण अनुपम॥
सर्वगुणहीन जे, ताहारे दया करे।
आपनार सहज करुणा शक्ति बले॥
सप्तम वत्सरे जाँर श्रीकृष्ण उन्माद।
भुवन मोहन नृत्य शक्ति अगाध॥
श्रीकंसारी सेन वन्दो सेन श्रीवल्लभ।

श्री गौड़ीय वैष्णव अभिधान में इस प्रकार लिखा है कि किसी-किसी के मत में पुरुषोत्तम दास की उपाधि ‘नागर’ थी और किसी के मत में इनके निवास स्थान का नाम ‘नागर’1 होने के कारण इन्होंने ‘पुरुषोत्तम नागर’ नाम से प्रसिद्धि प्राप्त की। इन्होंने एक बार प्रेमोन्मन्त होकर साँप का विष खा लिया, परन्तु, उस पर भी इनको कोई विकार पैदा नहीं हुआ। इस अलौकिक शक्ति को देख कर सभी आश्चर्यचकित हो गये थे। श्रीमन् नित्यानन्द प्रभु के पार्षदों में इस प्रकार की अलौकिक शक्ति की बात सुनी जाती है।


1 बेलेडांगा, बेरिग्राम, सुख सागर, चान्दूड़े, मनसापोता, पालपाड़ा, इत्यादि चौदह मौजा, पाँच नगर में हैं। इसलिए उनको कोई-कोई ‘नागर देश’ भी कहते हैं।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज द्वारा रचित ग्रन्थ ‘गौर-पार्षद’ में से