तुंगविद्या व्रजे यासीत् सर्वशास्त्रविशारदा।
सा प्रबोधानन्दयतिगौरोद्गानसरस्वती॥
-गौ.ग.दी .163

व्रजलीला में जो सर्वशास्त्र विशारद ‘तुङगविद्या’ थीं वे ही गौरोद्गान यति प्रबोधानन्द सरस्वती जी हैं।

श्रीवैष्णव एक, – व्यैंकटभट्ट नाम।
प्रभुरे निमन्त्रण कैल करिया सम्मान॥
चै.च. म. 9/82

श्रीचैतन्य चरितामृत के इस पयार के अमृत प्रवाह भाष्य में श्रील भक्ति विनोद ठाकुर ने लिखा है कि वैंकट भट्ट इनके भाई त्रिमल्ल भट्ट और प्रबोधानन्द सरस्वती ये पहले ‘श्री’ सम्प्रदाय के आचार्य स्वरूप थे। वैंकट भट्ट के पुत्र का नाम ही गोपाल भट्ट गोस्वामी है। श्रीवैंकट भट्ट दक्षिण भारत के रहने वाले थे। ये विशिष्ट शास्त्रज्ञ ब्राह्मण थे।

श्रीवैंकटभट्टेर निवास दक्षिणेते।
विशिष्ट ब्राह्मण विज्ञ सकल शास्त्रेते॥
– भक्ति रत्नाकर 1/82

श्रीचैतन्य चरितामृत (मध्य 9 /82) पयार के अनुभाष्य में श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती प्रभुपाद ने लिखा है कि श्री वैंकट भट्ट श्रीरंगक्षेत्र निवासी एवं श्री सम्प्रदाय के एक ब्राह्मण थे। तब ‘श्रीरंग’ तमिल देश के अन्तर्गत ही था। इसलिये वर्तमान में वहाँ के अधिवासियों के ‘वैंकट’ ‘तिरुमलय’ इत्यादि नाम नहीं होते। सम्भावना है कि ये वंश कुछ दिन पहले से ही श्रीरंग में वास कर रहा था।

वैंकट भट्ट ‘बड़गलइ’ शाखा के रामानुजीय वैष्णव थे। इनके दूसरे भ्राता थे – त्रिदण्डि रामनुजीयाचार्य स्वामी श्रीपाद प्रबोधानन्द सरस्वती । श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी इन्हीं वैंकट भट्ट के पुत्र थे। ये पहले लक्ष्मी नारायण के उपासक थे किन्तु श्रीमन् महाप्रभु की कृपा से एवं उनके संग के प्रभाव से वैंकट भट्ट श्रीराधा कृष्ण के उपासक बन गये। ये प्रसंग श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी ने सुन्दर रूप से वर्णन किया है। छः गोस्वामियों में से एक श्रील श्रीगोपाल भट्ट गोस्वामी श्रील प्रबोधानन्द सरस्वती के शिष्य थे। हरिभक्ति विलास में लिखा है-

भक्ते र्विलासांश्चिनुते प्रबोधानन्दस्य शिष्यो भगवत्प्रियस्य।
गोपाल भट्टो रघुनाथ दासं सन्तोषयन् रूपसनातनौ च॥
-श्रीहरिभक्तिविलास 1/2

श्रीरघुनाथदास और श्रीरूपसनातन की प्रसन्नता के लिये श्रील प्रबोधानन्द सरस्वती पाद का शिष्य मैं श्रीगोपाल भट्ट भक्ति विलासों का चयन कर रहा हूँ।

श्रीलप्रबोधानन्द सरस्वती के द्वारा लिखित ग्रन्थों में से 1.श्रीवृन्दावनशतकम् 2. श्रीनवद्वीपशतकम् 3. श्रीराधारससुधानिधि 4. श्री चैतन्य चन्द्रामृतम् आदि ग्रन्थ रसिक भक्तों द्वारा विशेष समादृत हैं। इनके अतिरिक्त श्रीगौड़ीय वैष्णव अभिधान में भी उनके द्वारा रचित ग्रन्थों का उल्लेख है – संगीतमाधव, आचार्यरास प्रबन्ध, श्रुतिस्तुति व्याख्या, कामबीज – काम- गायत्रीव्याख्यान एवं श्रीगीत गोविन्द का व्याख्यान है।

श्रीचैतन्य भागवत के मध्यखण्ड के तृतीय अध्याय के 37वें पयार के श्रीगौड़ीय भाष्य में श्रीलप्रभुपाद ने लिखा है कि ‘प्रकाशानन्द नामक एक केवलाद्वैतवादी अध्यापक संन्यासी वेदों की व्याख्या करते समय मेरे अप्राकृत नित्य अंगों को विखण्डित करता है। अज्ञानतावश कोई-कोई ऐसा समझता है कि ये प्रकाशनन्द ही कावेरी प्रवासी वैंकट भट्ट के छोटे भाई प्रबोधानन्द हैं। भक्त माल नामक सहजिया ग्रन्थ में ये भ्रम दोष होने के कारण वर्तमान लेखकों में भी थोड़ा बहुत ये दोष प्रवेश कर गया है।

श्रीलभक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद ने उपरोक्त भ्रम के विषय में जो निर्देश किया है, वह सत्य है। प्रमाणस्वरूप कहा जा सकता है कि श्री आशुतोष देव द्वारा लिखित नवीन बंगला अभिधान में प्रबोधानन्द के सम्बन्ध में लिखा है कि ‘वे एक वैष्णव दार्शनिक थे और उनका वास्तविक नाम प्रकाशनन्द सरस्वती था। प्रबोध नाम उन्हें श्रीचैतन्य महाप्रभु ने दिया था।’

पुनः श्रीहरिदास दास ने स्वरचित श्रीगौड़ीय वैष्णव अभिधान में ‘प्रबोधानन्द सरस्वती’ के चरित्र में इस प्रकार मन्तव्य दिया है – ‘मतान्तर में प्रकाशानन्द का ही वैष्णवनाम प्रबोधानन्द हुआ… एवं सुधानिधि के अन्तिम श्लोक में ‘मायावादार्कतापसन्तप्त’ द्वारा ये समझा जाता है कि ये पहले मायावादी सन्यासी थे।’

परन्तु आपको यह बता देना चाहता हूँ कि ‘मायावादार्कतापसन्तप्त’ कहने से ही वे पहले मायावादी थे ऐसी युक्ति लेना या ऐसा समझना ठीक नहीं है। श्रीमन् महाप्रभु और श्रीमन् महाप्रभु के अनुगत सभी श्रीगौड़ीय वैष्णवाचार्यो ने अत्यन्त भक्ति प्रतिकूल मायावाद विचारों का खण्डन किया है। जगाई-मधाई उद्धार की अपेक्षा मायावादी वासुदेव सार्वभौम और श्री प्रकाशानन्द के उद्धार से श्रीमन् महाप्रभु के पतितपावनत्व और औदार्य का अस्मोर्द्धत्व निरूपित हुआ है।शायद इसीलिये उन्होनें वह लिखा होगा।

विश्वव्यापी श्रीचैतन्य मठ और श्रीगौड़ीय मठों के प्रतिष्ठाता अतिमर्त्य चरित्र – श्रीगौरांग के निजजन श्रीवार्षभानवीदयित दास, नित्यलीला प्रविष्ट ॐ 108 श्री श्रीमद् भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी प्रभुपाद ने श्री प्रबोधानन्द सरस्वती पाद द्वारा रचित ‘श्री श्रीचैतन्य चन्द्रामृतम्’ ग्रन्थ में ‘ग्रन्थकार का परिचय’ नामक प्रबन्ध में जो लिखा है, वह सम्पूर्ण ही नीचे दिया जा रहा है।

1433 शकाब्द के प्रारम्भ में श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु जो ने दक्षिण भारत के तीर्थ भ्रमण करने के बहाने वहां के भक्तों पर कृपा की। उत्कल प्रदेश के नीलाद्रि से आरम्भ करके पहले गोदावरी संगम में, बाद में वर्तमान मद्रास (चेन्नई) प्रदेश के अनेक तीर्थ स्थानों का भ्रमण किया। आषाढ़ शुक्ला एकादशी तिथि को महाप्रभु श्रीरंग क्षेत्र में पहुंचे। चातुर्मास्य व्रत को आया देख दशनामी सन्यासियों की विधि के अनुसार भगवान श्री चैतन्य चन्द्र ने चार मास श्रीरंग क्षेत्र में ही रहने का संकल्प लिया। वहाँ पर ‘श्री’ सम्प्रदायी वैष्णवों का वास है। दक्षिण देशीय साम्प्रदायिक वैष्णवों की सदाचार को पालन करने में बड़ी निष्ठा है। दक्षिण भारत के जिन गांवों में पारमार्थिक वैष्णव रहते हैं वहां पर स्मार्त्त-विप्र किसी भी तरह वास करना अच्छा नहीं समझते। उस समय ‘श्रीरंग’ केवल श्रीवैष्णव- सेवित तीर्थ था। इसीलिये ही श्रीमन् महाप्रभु ने विष्णु भक्ति आश्रित सदाचार सम्पन्न वैष्णवों के पास चार मास व्यतीत किये। उन्होंने वहाँ श्रीरंगनाथ जी के दर्शन किये और कृष्णकथा का प्रचार कर महाप्रभु ने जीवों को उपदेश दिया। उसी समय ‘तिरुमलय’, ‘वैंकट’ और ‘गोपाल गुरु’ नामक तीनों भाई भी महीसूर प्रदेश से आकर श्रीरंग में रहते थे। वास्तव में ये आंध्र प्रदेश के या उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे। श्रीमन् महाप्रभु ने इस विप्र वंश के प्रति अत्यन्त प्रसन्न होकर उनके घर पर ही चार मास व्यतीत किये। इन तीनों में से बीच वाले भाई वैंकट भट्ट का बालक गोपाल भट्ट गोस्वामी सुप्रसिद्ध षड्गोस्वामियों में से एक है। श्री- सम्प्रदायी वैष्णवों को श्रीलक्ष्मी नारायण की उपासना प्रिय है। श्रीमन् महाप्रभु की आन्तरिक दया के गुण से ये श्रीभट्ट परिवार श्रीकृष्ण रस प्राप्ति के लिए लालायित हो उठा और कृष्ण – भक्त बन गया। श्री तिरुमलय के विषय में हमें अधिक मालूम न होने पर भी ये समझा जा सकता है कि चैतन्य महाप्रभु उनके प्राण स्वरूप थे। श्री वैंकट भट्ट के साथ श्रीकृष्णचैतन्यदेव के कथनोपकथन का श्रीचैतन्य चरितामृत ग्रन्थ की मध्यलीला के नवम परिच्छेद में उल्लेख है। श्री प्रबोधानन्द की श्रीचैतन्य देव के प्रति निष्ठा अतुलनीय थी। श्रीप्रबोधानन्द की सद् शिक्षा के प्रभाव से श्रीवैंकट के पुत्र श्रीगोपाल भट्ट ने श्रीगौड़ीय वैष्णवों का आचार्यत्व प्राप्त किया। श्रीचैतन्य दासों में श्री प्रबोधानन्द का स्थान अत्यन्त उच्च है। श्री कविकर्णूपर ने स्वकृत ‘गौरगणोद्देश दीपिका’में श्रीप्रबोधानन्द सरस्वती को श्रीकृष्ण लीला में ‘तुंगविद्या’ कहा है। श्रीहरिभक्ति विलास के प्रारम्भ में लिखा है कि श्रीभगवतप्रिय श्रील प्रबोधानन्द के शिष्य श्रीगोपाल भट्ट ने श्रीरूप, श्री सनातन एवं श्रीरघुनाथ दास की प्रसन्नता के लिए श्रीहरि भक्ति विलास ग्रन्थ की रचना की है। भक्ति रत्नाकर ग्रन्थ में लिखा है –

केह कहे प्रबोधानन्देर गुण अति।
सर्वत्र हइल याँर ख्याति सरस्वती॥
पूर्णब्रह्म श्रीकृष्णचैतन्य भगवान।
ताँर प्रिय, ताँहा बिना स्वपने नाहि आन॥
परम-वैराग्य -स्नेहमूर्ति मनोरम।
महाकवि, गीत- वाद्य- नृत्ये अनुपम॥
याँहार वाक्य शुनि’ सुख बाड़ये सबार।
प्रबोधानन्देर महामहिमा अपार॥

अर्थात् : प्रबोधानन्द अति गुणवान थे इसलिये वे सरस्वती के नाम से चारों ओर विख्यात थे। पूर्णब्रह्म श्रीकृष्णचैतन्य भगवान के अतिरिक्त स्वपन में भी उनका कोई और प्रिय नहीं था। वे परम वैराग्य, मनोरम स्नेह की मूर्ति, महाकवि, गीतवाद्य एवं नृत्य में अनुपम थे। उनके वचन सुन सभी का आनन्दवर्द्धन होता था। प्रबोधानन्द की अपार महामहिमा थी।

श्रीमन् महाप्रभु के नीलाचल लौटने के बाद कुछ एक सालों में ही श्रीप्रबोधानन्द सरस्वती श्रीकृष्ण चैतन्य देव के हृदयगत उपासना में प्रगाढ़ रूप से प्रवेश कर गये और अधिक समय व्यर्थ न गंवाकर श्रीगौरांग महाप्रभु के चरणों का आश्रय लेकर तथा अभीष्ट भजन का संकल्प लेकर वे श्रीरंग का परित्याग करके मथुरामण्डल के काम्यवन नामक स्थान पर रहने लगे। श्रीगोपाल भट्ट के मन में भी व्रजधाम में वास करने की लालसा धीरे-धीरे बढ़ उठी। अतः बाद में उन्होंने भी अपने चाचा के पदों का अनुसरण किया।

अधिकतर व्यक्तियों के सामने ये प्रश्न खड़ा हो सकता की श्रीप्रबोधानन्द सरस्वती श्रीगौरांग के इतने अधिक प्रिय थे फिर भी श्रील कविराज गोस्वामी ने श्री गौरांग भक्तों की प्रीति के लिये उनकी महिमा लिपिबद्ध क्यों नहीं की? तो इसके उत्तर में श्रीभक्ति रत्नाकर ग्रन्थ की लेखनी ही बहुत है। ग्रन्थकार श्री घनश्याम श्रीनरहरि चक्रवर्ती कहते हैं-

श्रीगोपाल भट्टेर ए सब विवरण।
केह किछु वर्णे, केह न करे वर्णन॥
ना बुझिया मर्म इथे कुतर्क ये करे।
अपराध-बीज तार हृदये संचारे॥
परम-रसिक पूर्व पूर्व कविगण।
वर्णिते समर्थ हइया न करे वर्णन॥
राखिलेन मध्ये मध्ये वर्णन करिते।
वर्णिवे ये कविगण ताहार निमित्ते॥
श्रीगोपाल भट्ट हृष्ट हइया आज्ञा दिल।
ग्रन्थे निज – प्रसंग वर्णिते निषेधिला।
केने निषेधिला, – इहा के बुझिते पारे॥
निरन्तर अति दीन मानेन आपनारे।
कविराज ताँर आज्ञा नारे लघिंवारे॥

कई ऐसा कहते हैं कि श्रीप्रबोधानन्द की लेखनी से स्वकीयवाद की पुष्टि देखी जाती है। इसलिये श्रीरूपानुग गौरभक्तगण पारकीय भजन के उत्कर्ष को देखकर श्रील सरस्वती गोस्वामी प्रभु की अधिक आलोचना नहीं करते हैं। जो भी हो श्रीनरहरि की तरह निरपेक्ष श्री चैतन्य चरणाश्रित भक्त मात्र ही भाग्यवान है। उनकी तरह सभी कुतर्क छोड़कर श्रील प्रबोधानन्द के विमल गौर-आनुगत्य में श्रीवृन्दावनेश्वरी के पारकीय दास्यमाधुरी का सब आस्वादन करें। प्रबोधानन्द के भाव परम परिस्फुट हैं। उनकी रचनाओं में भाषा की गम्भीरता और माधुर्य की एक साथ स्थिति देखी जाती है। श्रीचैतन्य चरणाश्रित सब वैष्णव ही प्रबोधानन्द के ‘श्रीवृन्दावनशतक’ को नित्य पाठ कर अनुपम आनन्द प्राप्त कर रहे हैं। उनके द्वारा रचित ‘श्रीनवद्वीप शतक’ ग्रन्थ भी श्रीवृन्दावन शतक’ की तरह ही है। प्रबोधानन्द जी का ‘श्रीराधासुधा निधि’ काव्यग्रन्थ वास्तविकता में जगत में अतुलनीय है। हो सकता है ये ग्रन्थ साधारण काव्यप्रिय पाठकों को वैसे सुख की अनुभूति करवाने वाला न हो परन्तु श्रीहरिरस स्निग्ध, निष्कपट भक्तों का परम प्रिय है। रुचि के तारतम्य के अनुसार ही श्रेष्ठपने में तारतम्य होता है, इसलिये पाठकों की सुकृति के तारतम्य से भी आनन्द घटता व बढ़ता है। इसीलिए, पाठकों की सुकृति के अनुसार ही ये लोकातीत व्रजरसमूलक भाव रसास्वादन प्रदान करेंगे। ‘विवेकशतक’ नामक उनका एक ग्रन्थ है। अफ्रेत नामक एक अध्यापक के ग्रन्थ में उसका उल्लेख देखने को मिलता है। बरहमपुर के वासी परलोकगत रामदास सेन महाशय ने ये ग्रन्थ देखा है। श्री चैतन्य चन्द्रामृत ग्रन्थ बंगाल में बहुत प्रचारित हुआ है। श्री गौर विरोधी भी इसे पढ़ कर अपने – अपने चित्त की निर्मलता को प्राप्त करेंगे और ये कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि श्रीरूपानुग सज्जन इसे पढ़कर परमानन्द में अनिर्वचनीय सुख सागर में निमग्न हो जायेंगे। श्री गोलोक पति ने चार मास तक जिनके सेव्य बनकर उन्हें कृष्णप्रेम प्रदान किया है, अवश्य ही क्षुद्र जीव मण्डली उनके अक्षय अमूल्य द्रव्यों के भण्डार के थोड़े से अंश की प्राप्ति के लिये आशा करेंगे।

किसी-किसी को यही स्थापन करने का प्रयास करते देखा जाता है कि काशी के मायावादी प्रकाशानन्द और वैष्णव अग्रगण्य प्रबोधानन्द एक ही हैं, किन्तु हम किसी भी तरह उनकी बातों पर विश्वास नहीं कर पाये। क्योंकि श्री चैतन्य भागवत के मध्यखण्ड के तृतीय अध्याय में काशी के प्रकाशानन्द नाम के मायावादी सन्यासी के सम्बन्ध में इस प्रकार लिखा है –

एइ रूपे नवद्वीपे प्रभु विश्वम्भर ।
भक्ति मुखे भासे लइ’ सर्व अनुचर॥
एक दिन वराह – भावेर श्लोक शुनि ।
गर्जिया मुरारि – घरे चलिला आपनि॥
गुप्त वाक्ये तुष्ट हइ’ वराह-ईश्वर ।
वेद प्रति क्रोध करि बलये उत्तर॥
हस्त, पाद, मुख, मोर नाहिक लोचन ।
वेदे मोरे एइमत करे विड़म्बन॥
काशी ते पढ़ाय बेटा ‘प्रकाशानन्द’ ।
सेई बेटा करे मोर अंग खंड खंड॥
वाखानये – वेद मोर विग्रह न माने ।
सर्वागे हइल कुष्ठ तबु नाहिं जाने॥
सर्वयज्ञमय मोर ये अंग पवित्र ।
अज भव आदि गाय याँहार चरित्र॥
पुण्य पवित्रता पाय ये – अंग- परशे ।
ताहा ‘मिथ्या’ बले बेटा केमन साहसे॥

अर्थात् : इस प्रकार श्री विश्वम्भर प्रभु नवद्वीप में अपने सब अनुचरजनों के सहित भक्ति-सुख की सरिता में आनन्द से बहे जा रहे थे। एक दिन वराह अवतार का एक श्लोक सुनते ही प्रभु गरजते हुए मुरारि गुप्त के घर को चल दिए। वराह भगवान मुरारि गुप्त के वचनों से प्रसन्न हुए। फिर वेदों के प्रति क्रोध करते हुए बोले ‘मेरे हाथ, पाँव, मुख, आँख नहीं है, कह कर वेद मेरी विडम्बना करते हैं। काशी में प्रकाशानन्द वेद पढ़ाता है, पढ़ाता क्या है वह मेरे शरीर के टुकड़े-टुकड़े करता है। वह वेद की व्याख्या करते हुए मेरे शरीर को नहीं मानता है, इसी से उसके सर्वाग में कोढ़ हो गया है, फिर भी उसकी आंखें नहीं खुलतीं, मेरा जो पवित्र अंग सर्व यज्ञमय है, जिसके चरित्र को ब्रह्मा, शिव आदि गाते हैं, जिस मेरे अंग के स्पर्श से पुण्य और पवित्रता की प्राप्ति होती है अथवा अपवित्र भी पवित्र बन जाते हैं, उसे वह बेटा ‘मिथ्या’ कहने का साहस कैसे करता है। 1425 से 1430 शकाब्द के बीच में ये घटना घटी थी। 1433 शकाब्द में श्रीरंग पहुँच कर श्रीमन् महाप्रभु तीनों भाईयों में से श्रीप्रबोधानन्द पाद को देख पाये थे। उस समय वे ‘श्री’ सम्प्रदाय के श्री रामानुजीय वैष्णव थे इसलिये वे विशिष्टाद्वैतवादी नित्य श्रीनारायण विग्रह के सेवक थे और प्रकाशानन्द तो उस समय शंकराचार्य द्वारा चलाये गये मायावाद के सेवकों के अग्रगणीय थे। इन दोनों व्यक्तियों को एक करने का प्रयास मात्र बड़बोलापन ही है। श्रीचैतन्य भागवत के मध्यखण्ड के 20वें अध्याय में भी प्रकाशानन्द के सम्बन्ध में इस प्रकार का उल्लेख है।

बलिते प्रभुर हइल ईश्वर आवेश ।
दन्त कड़मड़ि करि बलये विशेष॥
सन्यासी प्रकाशानन्द बसयेकाशीते ।
मोरे खण्ड खण्ड बेटा करे भालमते॥
पढ़ाय वेदान्त, मोर ‘विग्रह’ न माने ।
कुष्ठ कराइलुँ अंगे, तबु नाहि जाने॥
अनन्त ब्रह्माण्ड मोर ये अंगेते वैसे ।
ताहा ‘मिथ्या’ बले वेटा केमन साहसे?
सत्य कहोँ, मुरारी, आमार तुमि दास ।
ये न माने मोर अंग, सेइ याय नाश॥
सत्य मोर लीला कर्म, सत्य गोर स्थान ।
इहा मिथ्या बलि मोरे करे खान खान॥
ये यशः श्रवणे आजि अविद्या-विनाश ।
पापी अध्यापक बले, ‘मिथ्या’ से विलास ।
हेनपुण्य कीर्ति प्रति अनादर यार ।
से कभु ना जाने गुप्त मोर अवतार॥

ऐसा कहते कहते प्रभु को ईश्वर का आवेश हो आया और दांत पीसते हुए कहने लगे – ‘काशी में प्रकाशानन्द संन्यासी रहता है। वह बेटा अच्छी तरह से मेरे टुकड़े- टुकड़े करता है। वह वेदान्त पढ़ाता है और मेरे विग्रह को नहीं मानता। मैंने उसके शरीर में कोढ़ पैदा कर दिया है तो भी वह नहीं समझता है। मेरे जिस देह में अनन्त ब्रह्माण्डों का वास है, उसे वह बेटा किस साहस से मिथ्या कहता है? मुरारि! तुम मेरे दास हो! मैं तुमसे सत्य कहता हूँ कि जो मेरी देह को सच्चिदानंद नहीं मानता, वह नष्ट हो जाता है। ब्रह्मा, शिव आदि जिस विग्रह की सेवा बड़े आनन्द से करते हैं, सब देवता अपना प्राण समझ करके जिस विग्रह की पूजा करते हैं, जिस अंग के स्पर्श से पुण्य और पवित्रता प्राप्त होती है, उसे किस साहस से वह बेटा मिथ्या कहता है? मैं तुम्हें यह सत्य कह रहा हूँ कि मैं सत्य हूँ, मेरे दास सत्य हैं, और मेरे दासों के दास सत्य हैं। मेरी लीला मेरे कर्म सत्य हैं, मेरा धाम सत्य हैं। जो इनको मिथ्या कहता है वह मेरे टुकड़े-टुकड़े करता है (मायावाद मत में भगवद् विग्रह, लीला- धाम एवं जगत को मिथ्या का भ्रममात्र मानते हैं )। मेरे जिस यश के श्रवण से भूल अविद्या का विनाश होता है, उस विलास को वह पापी अध्यापक मिथ्या कहता है। ऐसे पुण्य यश के प्रति जिसका अनादर भाव है , हे गुप्त! वह मेरे अवतार को कभी समझ नहीं सकता।’

1. श्री प्रकाशानन्द एक- दण्डी शंकर सम्प्रदाय के सन्यासियों के उस समय के नेता थे जबकि प्रबोधानन्द सरस्वती महीशूर देश के अन्तर्गत रंग क्षेत्र के रहने वाले रामानुजीय त्रिदण्डि स्वामी थे। 2. प्रकाशानन्द काशीवासी मायावादी थे जबकि प्रबोधानन्द काम्यवन में रहने वाले वैष्णव थे 3. एक आर्यवर्तवासी था जबकि दूसरा दक्षिण देशवासी वैष्णव था। 4. एक निर्विशेषवादी था और दूसरा विशिष्टाद्वैत सविशेषवादी और बाद में अचिन्त्यद्वैताद्वैत मत का आश्रय लेने वाला। 5. एक पहले तो विष्णु वैष्णव का विरोधी और उद्धार प्राप्ति के पश्चात् भक्त बना और जबकि दूसरे नित्यसिद्ध गौरपार्षद एवं वैष्णवाचार्य गोपाल भट्ट स्वामी के गुरुदेव थे। श्रीगोपाल भट्ट गोस्वामी के परमाराध्य चाचा और गुरुदेव को नित्यसिद्ध भक्त चूड़ामणि न कहकर विष्णु वैष्णव विद्वेषी मायावादी और बद्ध जीव कह कर लांछन लगाने और निन्दा करने से ऐसा वैष्णव अपराध होता है जिसके फलस्वरूप भीषण नरकों की प्राप्ति होती है। श्रीचैतन्य चरितामृत ग्रन्थ के मध्य लीला के 25वें परिच्छेद और इसी ग्रन्थ के आदि लीला के सप्तम परिच्छेद में मायावादी प्रकाशानन्द का उल्लेख है।

1425 शकाब्द से 1430 शकाब्द तक जो व्यक्ति मायावादी है वह 1433 शकाब्द में दक्षिण भारत में जाकर कैसे श्री रामानुजीय वैष्णव हो सकता है? और फिर 1435 शकाब्द में फिर कैसे मायावादी हो गया; समझ में नहीं आता। इसलिये प्रकाशानन्द और प्रबोधानन्द दोनों को एक ही सिद्ध करने का प्रयास नितान्त अज्ञता का परिचायक है। परिणामस्वरूप परम्परा को इस प्रकार मूल से उखाड़ने की प्रवृत्ति – थोड़े दुःख का विषय नहीं है। श्रीपाद प्रबोधानन्द सरस्वती ने दीनता और विनय वशतः श्रीगोपाल भट्ट द्वारा श्रीचैतन्य चरितामृत में अपनी व्यक्तिगत बातों का उल्लेख करने को निषेध करवाया था। श्रील कृष्ण दास कविराज गोस्वामी ने उनके आदेश का उल्लंघन नहीं किया। इसीलिये वर्तमान समय में ये विपत्ति देखने को मिल रही है। यदि प्रबोधानन्द सरस्वती जानते कि उन्हें बाद में इस प्रकार विष्णु वैष्णव अपराधी श्रेणी में शामिल करने के लिए ऐसी विषम भ्रममयी चेष्टाएं होंगी तो वे श्री भट्ट गोस्वामी द्वारा श्री कविराज गोस्वामी को अपने बारे में उल्लेख करने से न रोकते। पाठक ये समझ सकेंगे कि श्रील प्रबोधानन्द सरस्वती के सम्बन्ध में भक्ति रत्नाकर ग्रन्थ में इस प्रकार लिखा है –

तिरुमलय, वैंकट, आर प्रबोधानन्द ।
तीन भ्रातार प्राणधन गौरचन्द्र॥
लक्ष्मीनारायण-उपासक ए तिन पूर्वेते॥
राधाकृष्ण- रसे मत्त प्रभुर कृपाते॥
तिरुमलय, वैंकट, प्रबोधानन्द तिने ।
विचारये – प्रभु बिने रहिव केमने?
मो- सबार संगे परिहास के करिवे?
कावेरी स्नानेते संगे केवा लइया यावे?
चारिमास परे प्रभु हइला विदाय ।
तिन भाई क्रन्दन करये उभराय?
प्रभु तीन भ्राताय करि आलिंगन ।
कहिला अनेक रूप प्रबोध- वचन ॥
केह कहे प्रबोधानन्देर गुण अति ।
सर्वत्र हइल ख्याति यति ‘सरस्वती’॥
पूर्णब्रह्म श्रीकृष्णचैतन्य भगवान ।
ताँर प्रिय ताँ- बिना स्वपने नहि आन॥

अध्यापक प्रवर अफ्रेत की तालिका में ‘श्रीसंगीत – माधव’ नामक एक ग्रन्थ श्रील प्रबोधानन्द सरस्वती द्वारा रचित गिना जाता है। ‘श्रीसज्जन तोषणी’ पत्रिका के 18वें वर्ष की पाँचवीं संख्या से 22वीं संख्या तक यह ग्रन्थ पूर्ण रूप से प्रकाशित हुआ है।

‘श्री’ सम्प्रदाय के गृहस्थ वैष्णव कभी भी घर छोड़कर एक दण्ड सन्यास नहीं लेते। वे सभी त्रिदण्ड सन्यास ग्रहण करते हैं और रामानुजीय कहलाते हैं। कोई – कोई श्रीप्रबोधानन्द के श्रीचैतन्य चन्द्रामृत ग्रन्थ को पढ़ने के पश्चात श्रील प्रबोधानन्द सरस्वती को ‘ब्राह्म’ सन्यासी समझते हैं, किन्तु, विशेष प्रभावशाली प्रमाणों के अभाव में उसे स्वीकार करने से अनेक प्रकार की असुविधा होती है।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज द्वारा रचित ग्रन्थ ‘गौर-पार्षद’ में से