श्रीकाशीश्वर पण्डित (ब्रह्मचारी, गोस्वामी) पूर्व लीला के अर्थात् वृन्दावन लीला के श्रीकृष्ण सेवक भृंगार अथवा शशी रेखा हैं।
पुरा वृन्दावने चेटौ स्थितौ भृङ्गार भंगुरौ ।
श्रीकाशीश्वर-गोविन्दौ तौ जातौ प्रभु सेवकौ॥
(गौ. ग. दी. 137)
श्रीकाशीश्वर पण्डित का पीठ स्थान हुगली ज़िले में श्रीरामपुर स्टेशन से एक मील दूर चातरा ग्राम में था। काशीश्वर पण्डित के पिता कांजी लाल जी कानु वंश में पैदा हुए, उनका वात्स्य गोत्र था तथा उनकी उपाधि चौधरी थी। इसलिये चातरा ग्राम में जहाँ काशीश्वर पण्डित का देवालय था, वह अभी भी चौधरी पाड़ा (मुहल्ला) नाम से विख्यात है। वहाँ के मन्दिर में काशीश्वर पण्डित द्वारा प्रतिष्ठित श्रीगौरांग विग्रह और श्रीराधा-गोविन्द जी विराजमान हैं। होली के समय इस स्थान पर उत्सव-आदि के अनुष्ठान किए जाते हैं। काशीश्वर पण्डित बहुत बलवान थे। बल्लभपुर के श्रीरुद्र पण्डित उनके भान्जे थे। काशीश्वर पण्डित श्रीईश्वर पुरीपाद जी के कृपासिक्त शिष्य थे। इसलिए इनकी गणना श्रीचैतन्य शाखा में होती है—
ईश्वर पुरीर शिष्य-ब्रह्मचारी काशीश्वर।
श्रीगोविन्द नाम ताँर, प्रिय अनुचर॥
(चै.च.आ. 10/138)
श्रीचैतन्य महाप्रभु जी के सेवक श्रीगोविन्द भी ईश्वर पुरीपाद जी के शिष्य थे। श्रीईश्वर पुरीपाद जी के जीवनकाल में श्रीकाशीश्वर पण्डित और श्रीगोविन्द दोनों ही निष्ठा सहित गुरु सेवा करते थे। श्रीईश्वर पुरीपाद जी ने अपने अप्रकट होने से कुछ पूर्व ही दोनों को महाप्रभु जी की सेवा करने की आज्ञा की थी। ईश्वर पुरीपाद जी के अन्तर्धान होने पर वे दोनों ही महाप्रभु जी की सेवा में नियोजित हो गये। पहले श्रीगोविन्द जी श्रीचैतन्य महाप्रभु जी के निकट आये तथा तीर्थ भ्रमण के बाद श्रीकाशीश्वर पण्डित महाप्रभु जी के पादपद्यों में उपस्थित हुए।
ईश्वर-पुरीर-भृत्य,—‘गोविन्द’ मोर नाम।
पुरी-गोसाञिर आज्ञाय आइनु तोमार स्थान॥
सिद्धिप्राप्तिकाले गोसाञि आज्ञा कैले मोरे।
कृष्णचैतन्य-निकटे जाई’ सेविह ताँहारे॥
काशीश्वर आसिबेन सब तीर्थ देखिया।
प्रभु आज्ञाय मुञि आइलु तोमा-पदे धाञा॥
(चै.च.म. 10/132-134)
“काशीश्वर गोसाञि आइला आर दिने।
सम्मान करिया प्रभु राखिला निज स्थाने॥
(चै.च.म. 10/185)
“गुरुर किङ्कर हय मान्य आपनार।” अर्थात् गुरुजी का सेवक तो पूज्य होता है—इस विचार के अनुसार गुरु-सेवक से सेवा ग्रहण करना अनुचित है और गुरु की आज्ञा का पालन न करने से भी अपराध होता है। इस प्रकार की स्थिति में क्या करना चाहिये? महाप्रभु जी द्वारा जिज्ञासा करने पर, सार्वभौम भट्टाचार्य ने कहा कि गुरु की आज्ञा का अवश्य पालन करना चाहिए।1
इसी कारण महाप्रभु जी श्रीकाशीश्वर पण्डित और गोविन्द जी की सेवा ग्रहण करने के लिये सहमत हो गये।
श्रीमन्महाप्रभु जी जब श्रीजगन्नाथ के दर्शनों को जाते तो बलवान काशीश्वर पण्डित लोगों की भीड़ को ठेल कर महाप्रभु जी के चलने का रास्ता बनाते हुए चलते थे ताकि महाप्रभु जी के श्रीअंग में किसी का भी स्पर्श न हो—
ईश्वरपुरीर शिष्य-ब्रह्मचारी काशीश्वर।
श्रीगोविन्द नाम ताँर, प्रिय अनुचर॥
ताँर सिद्धिकाले दोंहे ताँर आज्ञा पाञा।
नीलाचले प्रभुस्थाने मिलिला आसिया॥
गुरुर सम्बन्धे मान्य कैल दुँहाकारे।
ताँर आज्ञा मानि’ सेवा दिलेने दोंहारे॥
अंगसेवा गोविन्देरे दिलेन ईश्वर।
जगन्नाथ देखिते आगे चले काशीश्वर॥
अपरश याय, गोसाञि मनुष्य-गहने।
मनुष्य ठेलि पथ करे काशी बलवाने॥
(चै.च.आ. 10/138-142)
महाप्रभु सुखे लञा सब भक्तगण।
जगन्नाथ-दर्शने करिला गमन॥
आगे काशीश्वर जाय लोक निवारिया।
पाछे गोविन्द जाय जल-करंग लञा॥
(चै.च.म.12/206-207)
पुरुषोत्तम धाम में श्रीरथयात्रा के समय श्रीमन्महाप्रभु जब नृत्य करते थे, तब भीड़ को नियन्त्रित करने के लिए, महाप्रभु को चारों ओर से घेर कर तीन मण्डलों की रचना होती थी। प्रथम मण्डल में नित्यानन्द प्रभु अपने भक्तगणों के साथ, दूसरे मण्डल में ये काशीश्वर जी, मुकुन्दादि भक्तगणों के साथ होते थे और तीसरे मण्डल में होते थे—महाराज प्रतापरुद्र अपने पात्रों के साथ।
काशीश्वर-मुकुन्दादि जत भक्तगण।
हाताहाति करि’ हैल द्वितीय आवरण॥
(चै.च.म. 13/89)
स्वरूप गोसाईं जगदानन्द दामोदर।
काशीश्वर गोपीनाथ वाणीनाथ शंकर।
परिवेषन करे ताँहा एइ सातजन॥
स्वरूप गोसाईं, जगदानन्द, दामोदर, काशीश्वर, गोपीनाथ, वाणीनाथ और शंकर-ये सात ही वहाँ भोजन परोसते थे।
नवद्वीप धाम में श्रीमन्महाप्रभु की गृहस्थ लीला के समय में, श्रीवास जी के आंगन में, संकीर्तन विलास और गंगा स्नान के समय में भी काशीश्वर पण्डित महाप्रभु जी की लीला के साथी होते थे। जिस समय महाप्रभु जी ने भक्तों के साथ संकीर्तन करते-करते श्रीधर के घर में उपस्थित होकर उनके लोहे के बर्तन में पानी पिया था, तब महाप्रभु जी की उस भक्तवात्सल्य लीला को दर्शन करके काशीश्वर पण्डित आदि भक्त रो पड़े थे।
गोविन्द, गोविन्दानन्द, श्रीगर्भ, श्रीमान।
कान्दे काशीश्वर, श्रीजगदानन्द, राम॥
(चै.भा.म. 23/451)
जय श्रीजगदानन्द-प्रिय-अतिशय।
जय वक्रेश्वर-काशीश्वरेर हृदय॥
(चै.भा.म. 1/6)
जय जय श्रीजगदानन्दे जीवन।
जय हरिदास-काशीश्वर-प्राणधन॥
(चै.भा.म. 24/3)
नीलाचल में जब सगोष्ठी श्रीमद् अद्वैताचार्य जी का शुभागमन हुआ तो महाप्रभु जी उनके शुभागमन का समाचार पाकर स्वागत के लिए गए तो उस समय भी काशीश्वर पण्डित महाप्रभु जी के साथ थे।
काशीश्वर पण्डीत ने कार्तिक मास की शुक्ला चतुर्दशी को तिरोधान लीला की। (एक मत के अनुसार आश्विन मास में श्रीराधा-कृष्ण की रास पूर्णिमा के दिन उनका तिरोभाव हुआ)।
1 – स शुश्रवान्मातरि भार्गवेण फितुनियोगात् प्रहृतं द्विषद्वत्।
प्रत्यगृहीदग्रजशासनं तदाज्ञा गुरुणां ह्यविचारणीय॥
(रघुवंश 14 सर्ग 46 श्लोक।)
स्रोत: श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज द्वारा रचित ग्रन्थ “गौर-पार्षद” में से