इन्द्रद्युम्नो1 महाराजो जगन्नाथार्चकः पुरा।
जातः प्रतापरूद्रः सन् सम इन्द्रेण सोऽधुना॥
गौ.ग. 118
पूर्वकाल में भगवान जगन्नाथ जी के पूजक जो इन्द्रद्युम्न महाराज थे उन्होंने ही महाप्रभु की लीला में इन्द्रतुल्य ऐश्वर्यशाली प्रतापरूद्र के नाम से जन्म ग्रहण किया।
महाराज प्रतापरूद्र के पूर्ववंश के सम्बन्ध में उड़ीसा की मादलापंजी में जो वर्णन है उससे मालूम होता है कि गंगा वंश के अन्तिम राजा श्रीकज्जलभानु जब अपनी विजय यात्रा पर थे तो उनकी अनुपस्थिति में उनके मंत्री श्रीकपिलेन्द्र देव ने राज सिंहासन पर अधिकार कर लिया। यही कपिलेन्द्र देव या कपिलेश्वर देव ही उड़ीसा के गजपति राजवंश के प्रतिष्ठाता बने। कपिलेन्द्र देव और श्रीपार्वती देवी को अवल्म्बन कर श्रीपुरूषोत्तम देव का जन्म हुआ। इन्हीं पुरुषोत्तम देव के पुत्र हैं महाराज प्रतापरूद्र। प्रतापरुद्र की जननी श्रीपद्मावती देवी (या श्रीरूपाम्बिका) थीं। राजा प्रतापरुद्र श्रीमन् चैतन्य महाप्रभु के पार्षद हैं तथा गदाधर शाखा के अन्तर्गत इनके नाम का उल्लेख आता है। ये महाप्रभु के समय के विशेष प्रतापशाली स्वाधीन राजा थे। कटक इनकी राजधानी थी। महाराज प्रतापरूद्र, इनकी पत्नियाँ एवं राजपुत्र – सभी महाप्रभु जी के भक्त थे। पत्नियों में से श्रीगौरी प्रधाना महिषी थीं। पाँच पुत्रों में से एक पुत्र गौरी का भी था। पाँचों में से ज्येष्ठ पुत्र का नाम श्रीपुरषोत्तम जाना था।
प्रतापरूद्र राजा, आर उड्र कृष्णानन्द।
परमानन्द महापात्र, उड्र शिवानन्द॥
चै.च.आ 10/135
महाराज श्रीप्रतापरूद्रेर कुमार।
पुरुषोत्तम जाना’ नाम, सर्वाशे सुन्दर॥
(भक्तिरत्नाकर 6/65 )
राजा प्रतापरुद्र ने श्रीकाशीमिश्र को गुरु रूप से स्वीकार किया था तथा अत्यन्त निष्ठा के साथ वे उनकी सेवा किया करते थे। वे जितने दिन भी पुरी में रहते थे उतने दिन वे काशीमिश्र भवन में जाकर दोपहर के भोजन के पश्चात् अपने श्रीलगुरुदेव श्रीकाशीमिश्र की चरण सेवा किया करते थे एवं साथ ही जगन्नाथ जी की सेवा ठीक प्रकार से हो रही है कि नहीं, गुरु से जिज्ञासा करते रहते थे।
प्रतापरूद्रेर एक आछये नियमे।
यत दिन रहे तेँह श्रीपुरूषोत्तमें॥
नित्य आसि’ करे मिश्रेर पादसम्वाहन।
जगन्नाथ सेवार कर भियान श्रवण॥
(चै.च. अ 9/ 81-82)
काशीमिश्र के भवन में ही महाप्रभु का वास स्थान बताया जाता है। श्रीमन्महाप्रभु काशीमिश्र के घर के आंगन में बने एक छोटे कमरे में रहते थे। उड़िया भाषा में छोटे गृह को ‘गम्भीरा’ कहा जाता है ।
श्रीरायरामानन्द द्वारा रचित ‘श्रजगन्नाथबल्ल्भ’ नाटक को पढ़ने से मालूम होता है कि महाराज प्रतापरूद्र असाधारण प्रभावशाली शौर्यवीर्य सम्पन्न राजा थे। इतना होते हुये भी उन्हें किसी भी प्रकार का कोई अभिमान नहीं था बल्कि वे तो उदारहृदय के परम वैष्णव थे। उनके जीवन से ये भी मालूम पड़ता है कि वे विद्वानों को उत्साह देते रहते थे। उनके लगभग सभी चरित्र ग्रन्थों में ये वर्णित है कि उन्हें गौरांग महाप्रभु जी की अपार कृपा प्राप्त थी।
कवि श्रीकर्णपूर ने स्वरचित ‘श्रीचैतन्यचन्द्रोदय’ नाटक में राजा प्रतापरुद्र की शौर्यवीर्यता का उल्लेख किया है। महाराज प्रतापरुद्र ब्राह्मण धर्म के संरक्षक एवं वैष्णव धर्म के विशेष परिपोषक थे। तत्कालीन रचित बहुत से वैष्णव ग्रन्थों में ये लिपिबद्ध है कि राजा प्रतापरूद्र जी श्रीमन्महाप्रभु, श्रीरायरामानन्द , श्रीकाशीमिश्र और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य आदि सभी के अत्यन्त प्रिय पात्र थे। ‘श्री सरस्वती विलास’, श्रीप्रताप मार्तण्ड’, ‘श्रीकौतुकचिन्तामणि’ व ‘निर्णयसंग्रह’ इत्यादि ग्रन्थों को श्रीप्रतापरुद्र द्वारा रचित बतलाया जाता है। वस्तुतः ऐसा जाना जाता है कि राजा प्रतापरूद्र के सभा पण्डित श्रीलोल्ला लक्ष्मीधर ने ‘ श्री सरस्वती विलास’ एवं श्रीरामकृष्ण ने श्रीप्रताप मार्त्तण्ड की रचना की थी।
कहावत है कि श्रीमन्महाप्रभु वृन्दावन जायेंगे, ये सुनकर विरह से कातर होकर राजा प्रतापरूद्र ने श्रीचैतन्य महाप्रभु की एक लकड़ी की मूर्ति प्रकट की थी एवं 54 पण्डों का उस मूर्ति की सेवा का भार सौंपा था और उसके लिये काफी ज़मीन भी दान की थी। पुरी के राजमहल में अन्यान्य मूर्तियों के साथ श्रीगौर-नित्यानन्द और श्रीगौर गदाधर की मूर्तियाँ भी विराजित हैं।
उस समय राजा प्रतापरूद्र का राज्य वर्तमान आन्धप्रदेश के राजमहेन्द्री नामक स्थान तक फैला हुआ था। इस विषय की ऐतिहासिक घटनाओं को बता कर विस्तृत रूप से वर्णन करने की आवश्यकता नहीं समझता हूँ। संक्षिप्त ऐतिहासिक विवरण ये है कि राजा प्रतापरुद्र के पिता श्रीपुरुषोत्तम देव ने अपने पिता के राजय के हारे हुये स्थानों को पुनः जीता एवं उड़ीसा के राज्य को अपनी क्षमता से राजमहेन्द्री तक फैलाया था। श्रीपुरुषोत्तम देव भगवान श्रीजगन्नाथ देव के अनन्य – शरण भक्त थे। ऐसा कहा जाता है कि श्रीजगन्नाथ देव ने युद्धक्षेत्र में स्वयं आकर उनकी सहायता की थी। इस सम्बन्ध में एक घटना संक्षेप में वर्णन की जा रही है – जब श्री पुरुषोत्तम के साथ कान्ची नगर की राजकुमारी पद्मावती का विवाह निश्चित हुआ तो कान्ची के राजा वर को मिलने के लिए पुरी आये। जब कांची के राजा पुरी में पहुंचे तो उस समय रथयात्रा का समय था और राजा पुरुषोत्तम देव सोने के झाडू से रथ का रास्ता साफ कर रहे थे। ऐसा देख कान्चीराज ने यह सोचकर कि एक झाडूदार चाण्डाल के साथ वह अपनी कन्या का विवाह नहीं करेंगे, उन्होंने विवाह करना अस्वीकार कर दिया। कांची राजा गणेश का भक्त था। उसकी जैसी श्रद्धा गणेश में थी, वैसी जगन्नाथ में नहीं थी। श्रीपुरुषोत्तम देव को जब अश्रद्धा की बात मालूम हुई तो वे क्षुब्ध हो उठे और एक बड़ी सेना के साथ उन्होंने कान्चीराज पर आक्रमण कर दिया किन्तु पहली बार सफलता उनके हाथ न लग पायी अत: वे हताश होकर जगन्नाथ जी के शरणापन्न हुये। जगन्नाथ जी के द्वारा ये आश्वासन देने पर कि वे युद्ध में उसकी सहायता करेंगे, उसने पुनः कान्ची राज पर आक्रमण कर दिया। पुरी से 12 मील दूर आनन्दपुर नामक गाँव में एक ग्वालिन राजा को देखकर बोली कि दो अश्वरोही सैनिकों ने उसके पास से दूध-दही और लस्सी पी है और उसके मूल्य के बदले उन्होंने एक अंगूठी दी है और ये अंगूठी आप को देकर आप से मूल्य लेने की बात बोल गये हैं, अंगूठी देखकर पुरुषोत्तम देव को समझने में देर नहीं लगी कि ये दोनों सैनिक श्रीजगन्नाथ और बलराम को छोड़ कोई दूसरा नहीं था। राजा ने ग्वालिन को पुरस्कार दिया। राजा ने युद्ध में जय प्राप्त कर कान्चीराज के मणियों से बने सिंहासन को हरण कर लिया और उसे श्रीजगन्नाथ की सेवा में समर्पण कर दिया। वे कान्ची राजकुल के पूजित ‘गणेश’ को भी पुरी में ले आये। दर्पहारी मधुसूदन ने कान्चीराज के दर्प को चूर्ण कर दिया। ऐसा कहा जाता है कि नाना प्रकार से पुरुषोत्तम देव के युद्ध में विघ्न उत्पादन करने के कारण गणेश भण्डगणेश के नाम से प्रसिद्ध हुये। कान्चीराज अपनी कन्या पद्मावती को स्वयं पुरी लाये एवं रथयात्रा के समय स्वर्ण के झाडू से स्वयं रथ का रास्ता साफ करते हुए उन्होंने अपनी कन्या पुरुषोत्तम देव के हाथों में समर्पण कर दी। इससे पुरुषोत्तम देव की प्रतिज्ञा की रक्षा हुयी। सन् 1497 तक पुरषोत्तम देव ने राज्य किया। उसके पश्चात् राजा प्रतापरूद्र ने राज्य पर अभिषिक्त होकर 1540 तक राज्य किया। राजा प्रतापरुद्र की प्रधाना महिषी गौरी के अतिरिक्त महाराज की श्रीपद्मा, श्रीपद्मालया, श्रीइला और श्रीमहिला नाम की चार और महिषियाँ थीं।
गजपति राजवंश के राजा प्रतापरुद्र श्रीराधाकृष्णमिलित तनु स्वयं भगवान श्रीगौरसुन्दर की कृपा भाजन थे एवं ये महाप्रभु के पार्षद के रूप में गिने जाते थे। राजदर्शन संन्यासी के लिए अहितकर है, इसलिये लोकशिक्षक श्रीमन् महाप्रभु ने पहले-पहले अनुकूल भाव नहीं दिखाया था किन्तु शुद्ध भक्तिवश भगवान श्रीगौरसुन्दर ने राजा पर निष्कपट रूप से अहैतुकी कृपा वर्षण की थी। श्रीचैतन्य चरितामृत में श्रील कृष्ण दास कविराज गोस्वामी ने राजा को अवलम्बन कर जगदवासियों को महाप्रभु जी ने जो शिक्षाएँ प्रदान करने की अलौकिक लीला की, उसका विस्तृत भाव से वर्णन किया है। श्रीचैतन्य चरितामृत की मध्यलीला के ग्यारहवें परिच्छेद में ये विषय वर्णित है कि राजा प्रतापरुद्र महाप्रभु के दर्शनों के लिये अत्यन्त व्याकुल हो कर बार-बार सार्वभौम भट्टाचार्य से प्रार्थना करते कि वे महाप्रभु की उन पर कृपा करवायें । भट्टाचार्य ने ये बात महाप्रभु के सन्मुख निवेदन की। इस बात को सुनने ही महाप्रभु ने अपने कानों पर हाथ रख लिये और बोले:-
विरक्त संन्यासी आमार राजदर्शन।
स्त्री – दर्शन – सम विषेर भक्षण॥
अर्थात् : मैं विरक्त संन्यासी हूँ। मेरे द्वारा राजा का दर्शन, स्त्री दर्शन के समान है जो कि विरक्त संन्यासी के लिए ज़हर खाने की तरह ही है। यद्यपि राजा श्रीजगन्नाथ के श्रेष्ठ सेवक – भक्त हैं, फिर भी ‘राजा’ शब्द कालसर्प के समान भय प्रदान करने वाला है।
राजा की रायरामानन्द के माध्यम से महाप्रभु से मिलने की प्रचेष्टा
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज द्वारा रचित ग्रन्थ ‘गौर-पार्षद’ में से