रागलेखा-कलाकेल्यौ राधादास्यौ पुरा स्थिते।
ते ज्ञेये शिखिमाहिती तत्स्वसा माधवी-क्रमात्॥
(गौ. ग. दी. 189)
‘रागलेखा और कलाकेली नाम से ये दोनों जो पहले श्रीराधा की दासियां थीं, उन दोनों को ही यथाक्रम से शिखि माहिति एवं उनकी बहन माधवी रूप से जानना।’
उत्कलवासी शिखि माहिति महाप्रभु जी के अन्तरंग भक्त थे। यह श्रीचैतन्यशाखा में गिने जाते हैं और ये श्रीपुरुषोत्तमधाम में रहते थे। यह शुद्ध हृदय, परम दयालु व महान् आत्मा थे। इनके भाई का नाम श्रीमुरारि माहिति (महन्त) तथा इनकी छोटी बहन शुद्ध बुद्धिमान माधवी देवी थी। मुरारि माहिति और माधवीदेवी दोनों ही भगवान श्रीगौर सुन्दर जी के प्रति गाढ़ प्रीति रखने वाले थे। श्रीगौरसुन्दर जी के प्रति इनकी स्वाभाविक ही निश्चला भक्ति थी। आश्चर्य यह था कि कभी भी इनके चित्त में गौरसुन्दर जी की विस्मृति नहीं घटी। गौरसुन्दर जी ने भी इनके प्रति असीम स्नेह वर्षण किया था। इतना होन पर भी ये बहुत यत्न करके भी अपने बड़े भाई शिखि माहिति को गौरभजन में न लगा सके। तब शिखि माहिति श्रीजगन्नाथ जी के श्रीमन्दिर के लिखनाधिकारी थे—
कृष्णदास नाम एइ सुवर्ण-वेत्रधारी।
शिखि माहाति-नाम एइ लिखनाधिकारी॥
मुरारि माहाति इँह-शिखि माहातिर भाइ।
तोमार चरण बिना आर गति नाइ॥
(चै.च.म. 10/42, 44)
श्रील भक्ति सिध्दान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर ने श्रीचैतन्य चरितामृत के अनुभाष्य में वर्णन किया है कि किस प्रकार से श्रीचैतन्य महाप्रभु जी की कृपा के द्वारा शिखि माहाति अभिषिक्त हुए थे।
प्रसंग का सारमर्म यह है कि एक दिन अपने छोटे भाई मुरारि माहिति और अपनी छोटी बहन माधवीदेवी का उपदेश सुनते-सुनते और विचार करते-करते शिखि माहिति को अचानक नींद आ गई। रात्रि के अन्तिम पहर में उन्होंने एक स्वप्न देखा कि गौरपादपद्म दर्शनकारी उनके छोटे भाई बहन उनको नींद से उठने के लिये कह रहे हैं। इस आश्चर्य स्वप्न को देखने के बाद उनका शरीर पुलकित और रोमान्चित हो उठा। आँखें खोलने के साथ-साथ वे यह देखकर अत्यन्त विस्मित हो उठे कि उनके दोनों भाई बहन उनके सामने ही थे। उनके दोनों नेत्रों से अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थी। दोनों को सम्मुख देखते ही आनन्दातिशय से उन्होंने उनका आलिंगन कर लिया।
बड़े भाई ने हठात् इस प्रकार आलिंगन क्यों किया, यह न समझ सकने के कारण वे अत्यन्त विस्मित से हो उठे। उनकी विस्मयान्वित अवस्था देखकर उनका संशय दूर करने के लिये इन्होंने कहा—’मैंने आज एक अद्भुत स्वप्न देखा है। श्रीशचीनन्दन गौरसुन्दर जी की अचिन्त्य महिमा पर आज मुझे विश्वास हुआ है। स्वप्न में मैंने देखा कि श्रीगौरसुन्दर जी श्रीजगन्नाथ को दर्शन करके बार-बार उनमें प्रविष्ट हो रहे हैं और उनमें से बाहर आ रहे हैं। मैं अभी भी गौरसुन्दर को वैसे ही देख रहा हूँ। मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि क्या यह मेरी दृष्टि का भ्रम है या कुछ और? असीम कृपामय गौरहरि जी ने मुझे श्रीजगन्नाथदेव जी के सामने देखकर मेरा नाम उच्चारण करते हए दीर्घ व तुलनारहित सुन्दर-सुन्दर भुजाओं में मुझे आलिंगन कर लिया।‘
शिखि माहिति इस प्रकार कहते-कहते प्रेमाविष्ट हो गये। मुरारि माहाति और माधवीदेवी ने उनको जगन्नाथ जी के दर्शन करने के लिये जाने का निवेदन किया तथा बाद में तीनों ही नीलाचलपति जगन्नाथ जी के दर्शन करने के लिये चल दिये। जगन्नाथ जी के दर्शन करके मुरारि माहाति और माधवीदेवी प्रेमानन्द से अश्रु विसर्जन करने लगे। शिखि माहिती ने स्वप्न में जो कुछ देखा था वे वहाँ भी वही देखने लगे। महावदान्य महाप्रभु जी ने ‘तुम मुरारि के अग्रज’ यह कहकर शिखि माहिति को अपनी दोनों भुजाओं में आलिंगन कर लिया। शिखि माहिति श्रीगौरसुन्दर जी का स्पर्श पाते ही आनन्द सागर में निमज्ज्ति हो उठे। तब से शिखि माहिति जी सब कुछ भूल गये और श्रीगौर पादपद्म को ही अपना एकमात्र अभीष्ट जानकर उनकी सेवा में नियोजित हो गये। शिखि माहिति श्रीमन्महाप्रभु के कितने प्रिय थे, वह श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा रचित श्रीचैतन्य चरितामृत, श्रीवृन्दावन दास ठाकुर द्वारा रचित श्रीचैतन्य भागवत और श्रीनरहरि चक्रवर्ती ठाकुर द्वारा रचित श्रीभक्ति रत्नाकर ग्रन्थ के पाठ से जाना जाता है—
दामोदरस्वरूप-मिलने परम आनन्द।
शिखिमाहिति-मिलन, राय भवानन्द॥
(चै.च.म. 1/130)
आनन्दित भक्तगण आसिया मिलिला।
प्रेम-आलिङ्गन प्रभु सबारे करिला॥
काशीमिश्र,रामानन्द,प्रद्युम्न,सार्वभौम।
वाणीनाथ, शिखि-आदि यत भक्तगण॥
(चै.च.म. 16/253-54)
अद्वैतेर ज्येष्ठपुत्र-श्रीअच्युतानन्द।
वाणीनाथ, शिखिमाहिति आदि भक्तवृन्द॥
(चै.भा.अ. 8/60)
श्रीशिखि माहिति आदि गोपीनाथे कय।
श्रीजगन्नाथेर हैल दर्शन-समय॥
(भक्तिरत्नाकर-8/237)
शिखि माहिति श्रीमन्महाप्रभु के अन्तरंग साढ़े तीन जन भक्तों में से एक थे—
प्रभु लेखा करे जाँरे-राधिकार ‘गण’।
जगतेर मध्ये ‘पात्र’-साड़े तिन जन॥
स्वरूप-गोसाञि, आर राय-रामानन्द।
शिखि-माहिति-तिन, ताँर भगिनी-अर्द्धजन॥
(चै.च.अ. 2/105-106)
अर्थात् महाप्रभु जी जिन्हें राधा जी का गण मानकर गिनते थे, वे सारे जगत में मात्र साड़े तीन व्यक्ति ही हैं जिनमें स्वरूप दामोदर जी एक, दूसरे राय रामानन्द जी तथा दूसरे होते हैं—शिखि माहिति तथा आधी गिनती होती है इनकी बहिन माधवी जी की।
स्रोत: श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज द्वारा रचित ग्रन्थ “गौर-पार्षद” में से