योगमाया भगवती गृहिणी तस्य (अद्वैतस्य) साम्प्रतं।
सीतारूपेणावतीर्णा श्रीनाम्ना तत्प्रकाशतः॥
तस्य पुत्रोऽच्युतानन्दः कृष्णचैतन्यबल्लभः।
श्रीमत् पण्डितगोस्वामिशिष्यः प्रिय इति श्रुतं ॥
य: कार्तिकेयः प्रागासीदिति जल्पन्ति केचन।
केचिदाहु रसविदोऽच्युतानाम्नी तु गोपिका ॥
उभयन्तु समीचीनं द्वयोरेकत्र संगतात्।
कार्तिकेयः कृष्ण मिश्रस्तत्साम्यादिति केचन ॥
– गौ.ग.दी. 86/88

अर्थात् भगवती देवी योगमाया ही अपने धर्म को अवलम्बन कर श्री अद्वैताचार्य की गृहणी-सीता देवी के रूप में अवतीर्ण हुयी थीं। इनका प्रचलित नाम ‘श्री’ था। अच्युतानन्द इनके पुत्र थे जो श्रीचैतन्य महाप्रभु के प्रिय थे। ये श्री गदाधर पण्डित गोस्वामी के शिष्य एवं उनके प्रिय रूप में विख्यात थे। कोई-कोई रसवेत्ता कहते हैं कि कृष्ण लीला में कार्तिकेय एवं अच्युता नाम की जो गोपी थीं, वे दोनों ही एक साथ मिलित होकर अच्युतानन्द रूप से अवतरित हुए हैं। इसके अतिरिक्त कोई-कोई कहता है कि कृष्ण मिश्र भी कार्तिकेय के अवतार हैं।

श्री अच्युतानन्द 1428 शकाब्द अर्थात् सन् 1507 में श्रीअद्वैताचार्य और श्रीसीतादेवी को अवलम्बन कर शान्तिपुर में आविर्भूत हुये थे।* किसी-किसी के मत में इनका आविर्भाव सन् 1426 शकाब्द अर्थात् सन् 1505 में हुआ था। श्री अच्युतानन्द श्रीअद्वैताचार्य के ज्येष्ठ पुत्र थे तथा ये श्रीचैतन्य शाखा में गिने जाते हैं।

श्रीचैतन्यामरतरोर्द्वितीयस्कन्धरुपिणः
श्रीमदद्वैतचन्द्रस्य शाखारूपान् गणान्नुमः ॥
चै.च. आदि 12/3

अर्थात् चैतन्य नामक अमर वृक्ष के द्वितीय स्कन्ध रुपी अद्वैत प्रभु की शाखा के सभी गणों को मैं नमस्कार करता हूँ।

अच्युतानन्द- बड़ शाखा, आचार्य नन्दन।
आजन्मसेविला तेँहो चैतन्य चरण ॥
चै.च. आदि 12-13

श्रीअद्वैताचार्य जी के छः पुत्र थे, जिनमें से तीन पुत्र श्री अच्युतानन्द, श्रीकृष्ण मिश्र, श्रीगोपालदास तो सारग्राही थे जबकि बलराम, स्वरूप और जगदीश असारग्राही थे। श्रीअद्वैत चरितग्रन्थ में इस प्रकार वर्णित हैं:-

अच्युतः कृष्णमिश्रष्य गोपालदास एव च ।
रत्नत्रयमिदं प्रोक्तं सीतागर्भादि सम्भवम् ॥
आचार्यतनयेष्वेते त्रयो गौरगणाः स्मृताः।
चतुर्थबलरामश्च स्वरूपः पन्चमः स्मृतः ॥
षष्ठस्तु जगदीशाख्य आचार्यतनया हि षट् ॥

श्रीचैतन्य चरितामृत के अपने अमृतप्रवाह भाष्य में इस सम्बन्ध में श्रील सच्चिदानन्द ठाकुर इस प्रकार लिखते हैं कि पहले तो अद्वैत प्रभु के परिवार के सभी सदस्यों का एक ही मत था। किन्तु बाद में दैववशतः कुछ लोगों का मत अलग हो गया। इनमें से जो लोग तो आचार्य के मत के अनुसार चले वे तो सारग्राही शुद्ध वैष्णव बन गये और जिन्होंने दैव के वशीभूत होकर आचार्य के द्वारा उपदेशित मत से अलग अपने- अपने मत चलाए, वे सब असारग्राही कहे जाते हैं।

असारग्राही व्यक्तियों के नामों से हमारा कोई मतलब नहीं है। फिर भी सारग्राही वैष्णवों को असारग्राहिंयों से पृथक रखने के अभिप्राय से ही पहले दोनों के नाम एक साथ दे रहा हूँ तथा बाद में जैसे भूसी से धान अलग किया जाता है ,उसी प्रकार अद्वैत आचार्य के पुत्रों में जो सारग्राही शुद्ध वैष्णव है ,उनके नामों का उल्लेख करूँगा।

आचार्येर मत येइ, सेइ मत सार।
ताँर आज्ञा लंघि’ चले, सेइ त’ असार ॥
चै.च.आ 12/10

ये ये लैल श्रीअच्युतानन्देर मत।
सेइ आचार्येर गण ‘महाभागवत’।
सेइ सेइ, आचार्येर कृपार भाजन।
अनायासे पाइल सेइ चैतन्यचरण ॥
चै.च.आ 12/73-74

अर्थात् जिस-जिस ने श्रीअच्युतानन्द के मत को स्वीकार किया है,वही आचार्य के गण एवं महाभागवत् हैं। वही अद्वैताचार्य के कृपापात्र हैं । ये समझो कि जिन्होंने श्रीअच्युतानन्द के मत को स्वीकार किया उन्होंने अनायास ही श्रीचैतन्य चरण प्राप्त किये हैं।

कटोया में संन्यास ग्रहण कने के पश्चात जब श्रीमन्महाप्रभु शान्तिपुर में अद्वैत भवन में आये थे, उस समय अच्युतानन्द जी की आयु मात्र तीन वर्ष की थी। किसी – किसी के मत के अनुसार पाँच वर्ष की थी।

दिगम्बर शिशुरूप अद्वैततनय।
नाम श्रीअच्युतानन्द महोज्योतिर्मय॥
परम सर्वज्ञ तिँहो अचिन्त्य – प्रभाव।
योग्य अद्वैतेर पुत्र सेइ महाभाग॥
धूलामय सर्व अंग, हासिते हासिते।
जानिया आइला प्रभु-चरण देखिते॥
आसिया पड़िया गौरचन्द्र-पदतले।
धूलार सहित प्रभु लइलेन कोले॥
चै.भा.आ. 1/213 -216

अर्थात् श्री अद्वैताचार्य जी के महाज्योतिर्मय श्री अच्युतानन्द नामक दिगम्बर शिशु परम सर्वज्ञ था तथा उनका प्रभाव तर्क रहित था।।वास्तव में वह महाभाग ही श्री अद्वैताचार्य जी का योग्य पुत्र था। उसके अंग धूल से लिपटे हुए थे, तथापि वह हँस रहा था। प्रभु के आगमन का समाचार पाकर वह चरण-दर्शन करने आया और आकर श्री गौरचन्द्र के चरणों में गिर पड़ा। तब गौरचन्द्र ने धूलि में लिपटे हुए श्रीअच्युतानन्द को गोद में ले लिया। श्रीमन्महाप्रभु ने अच्युतानन्द को गोद मे लेकर स्नेह से गदगद् हो कर कहा- क्योंकि श्रीअद्वैताचार्य इसके पिता हैं, इसलिये सम्बन्ध से ये मेरा भाई है। महाप्रभु जी के मुखारविन्द से ऐसा सुनकर श्रीमन्महाप्रभु के तत्त्व को प्रकाशित करते हुये अच्युतानन्द ने कहा – ये तो जीव मात्र के ही सखा हैं, श्रुति शास्त्रों ने इन्हें ही सबके पिता के रूप में निर्दिष्ट किया है। भक्तगण अच्युतानन्द के इस सिद्धान्त को सुनकर विस्मित हो गये। श्रील वृन्दावनदास ठाकुर जी ने स्वरचित श्रीचैतन्य भागवत ( अन्त्य खण्ड 4 अध्याय ) में बालक अच्युतानन्द की अद्भुत श्रीचैतन्य – निष्ठा का इस प्रकार वर्णन किया है –

एक बार एक सन्यासी अद्वैत भवन में आये और उन्होंने आचार्य जी से जिज्ञासावश पूछा कि केशव भारती महाप्रभु के क्या लगते हैं? इसके उत्तर में अद्वैताचार्य जी ने व्यवहारिक विचार से ही कहा कि वे केशव भारती तो महाप्रभु के गुरु हैं। बस इतना सुनना था कि पाँच वर्ष के दिगम्बर शिशु ने क्रोधित होकर कहा – जब सारे जगत् के गुरुओं के गुरु स्वयं भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु हैं तो फिर उनका गुरु और कौन हो सकता है? अपने पाँच वर्ष के पुत्र के मुख से सिद्धान्त वाणी सुनकर श्रीअद्वैताचार्य बोले कि अच्युतानन्द ही मेरा पिता है और मैं उसका पुत्र हूँ। अपने द्वारा किये अपराध के लिये जब अद्वैताचार्य ने पुत्र से क्षमा मांगी तो अच्युतानन्द का मुख शर्म से झुक गया। श्रीचैतन्य चरितामृत में श्री कविराज ने भी बहुत सुन्दर रूप से वर्णन किया है –

चैतन्य – गोसाञिर गुरु – केशव भारती।
एइ पितार वाक्य शुनि’ दुःख पाइल अति॥
जगद्गुरुते तुमि कर ऐछे उपदेश।
तोमार एइ उपदेशे नष्ट हइल देश॥
चौद्दभुवनेर गुरु चैतन्य-गोसाञि।
ताँर गुरु अन्य, एइ कोन शास्त्रे नाइ॥
पन्चम वर्षेर बालक कहे सिद्धान्तेर सार।
सुनिया पाइला आचार्य सन्तोष अपार॥
चै.च. 12/14-17

अर्थात् श्री अच्युतानन्द को पिता अद्वैताचार्य के ये वाक्य सुनकर कि श्रीचैतन्य गोस्वामी के गुरु केशव भारती हैं बड़ा दुःख हुआ। श्रीअच्युतानन्द ने पिता से कहा कि श्रीचैतन्य महाप्रभु तो जगत-गुरु हैं। उनके सम्बन्ध में यदि आप ऐसी बात कहेंगे तो इससे जगत का नाश हो जायेगा अर्थात् आप जैसे प्रामाणिक व्यक्ति के मुख से ऐसा सुनकर जगत के लोग श्रीचैतन्य देव को साधारण जीव मान बैठेंगे, जिससे उनका अनिष्ट होगा। स्वयं भगवान होने के कारण, श्रीचैतन्य गोसाई जी तो चौद्दह भुवनों के गुरु हैं। उनका भी कोई और गुरु हो सकता है – ये बात कोई भी नहीं कहता अर्थात उनका कोई गुरु नहीं है। वही सबके गुरु हैं। श्री अच्युतानन्द जी उस समय पाँच वर्ष के बालक थे। उनके मुख से इस प्रकार सिद्धान्त का सार सुनकर श्रीअद्धैताचार्य परम आनन्दित हुये। जिस समय श्रीअद्वैताचार्य और अन्य-अन्य भक्त अच्युतानन्द के इस अलौकिक आचरण से मुग्ध थे उसी समय महाप्रभु जी ने अद्वैत भवन में आकर अच्युतानन्द को कृपा आर्शीवाद दिया था। नवद्वीप में महाप्रभु की महाप्रकाश लीला से पहले जब श्रीमन्महाप्रभु ने अद्वैताचार्य को अपने पास बुलाने के लिए श्रीराम पण्डित को शान्तिपुर भेजा था एवं जिस समय अद्वैताचार्य ने भक्ति के विरोध में ज्ञानपरक व्याख्या करने की लीला की थी व परिणामस्वरूप श्रीमन्महाप्रभु ने उन पर प्रहार लीला की थी – इन सब लीलाओं में श्रीअच्युतानन्द भी उपस्थित थे। श्रीभक्तिसिद्वान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर ने श्रीचैतन्य चरितामृत के अपने अनुभाष्य में लिखा है कि श्रीअच्युतानन्द बाल्यावस्था से ही महाप्रभु के भक्त थे। ऐसा कहीं नहीं सुना जाता कि अच्युतानन्द ने विवाह कर संसार धर्म अपनाया था। श्रीअद्वैताशाखा के वर्णन में उनके शिष्यों के बारे में जो जानकारी मिलती है उनमें सबसे पहला नाम इनका ही हैं। श्रीयदुनन्दनदास कृत श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामी के ‘शाखानिर्णयामृत’ ग्रन्थ से मालूम होता है कि अच्युतानन्द ठाकुर गदाधर पण्डित के शिष्य थे एवं उनकी ही शाखा में थे।

महारसामृतानन्दमच्युतानन्दनामकम्।
गदाधरं प्रियतमं श्रीमद्वैतनन्दनम् ॥

क्योंकि श्रीअच्युतानन्द के गुरुदेव श्रीलगदाधर पण्डित गोस्वामी अपने शेष जीवन में महाप्रभु के साथ नीलाचल धाम में ही रहे थे इसलिए अच्युतानन्दादि अद्वैताचार्य के सारग्राही सेवकों ने भी श्रीमन्महाप्रभु के सान्निधय में ही वास किया था।

अच्युतानन्द- अद्वैताचार्य तनय।
नीलाचले रहे प्रभुर चरण आश्रय ॥
– चै.च.आदि 10/150

अच्युतानन्द प्रत्येक वर्ष ही रथयात्रा के समय उपस्थित रहते हुए सात सम्प्रदायों ( संकीर्त्तन मण्डलियों) में से छटी सम्प्रदाय में प्रधान रूप से नृत्य किया करते थे।

शान्तिपुरेर आचार्येर एक सम्प्रदाय ।
अच्युतानन्द नाचे तथा,और सब गाय ॥
चै.च.अ . 13/45

श्रीमन्महापभु ने जब श्रीजगन्नाथ के रथ के सामने सातों सम्प्रदायों को साथ लेकर घूम-घूम कर संकीर्त्तन किया था तो उस समय अच्युतानन्द भी वहाँ नर्तक रूप से विद्यमान थे।

बेड़ा संकीर्त्तन ताँहा आरम्भ करिला।
सात-सम्प्रदाय तबे गाइते लागिला॥
सातसम्प्रदाये नृत्य करे सातजन।
अद्वैत- आचार्य आर प्रभु-नित्यानन्द॥
वक्रेश्वर, अच्युतानन्द, पण्डित श्रीवास।
सत्यराज खाँन आर नरहरिदास॥
सात सम्प्रदाये प्रभु’ करेन भ्रमण।
‘मोर सम्प्रदाये प्रभु’ एछे सबार मन॥
चै.च.अ . 10/58-61

अर्थात् वहां उन्होंने *बेड़ा कीर्तन (इसमें भक्तजन मृदंग और करताल लेकर गोलाकार स्थिति में नाचते-नाचते संकीर्तन करते हैं। इसका शुभारम्भ श्री महाप्रभु ने ही किया था। ) आरम्भ किया। जब सातों मंडलियों ने अपनी-अपनी मंडली में कीर्तन करना प्रारम्भ किया, तब प्रत्येक मंडली में एक-एक मुख्य नृत्य करने वाला था, जिनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं- श्रीअद्वैताचार्य, श्रीनित्यानंद प्रभु, श्रीवक्रेश्वर, श्रीअच्युतानंद, श्रीवास पण्डित, श्रीसत्यराज खान एवं श्रीनरहरिदास – ये सातों जन पृथक- पृथक मण्डली में नृत्य कर रहे थे। सातों मण्डलियों में श्रीमहाप्रभु अपने सात स्वरूप विस्तार करके एक साथ सातों मंडलियों में नृत्य कर रहे थे और सभी मण्डलियों वाले यही समझ रहे थे कि प्रभु हमारी मण्डली में ही उपस्थित हैं।

श्रीमन्महाप्रभु की गुण्डिचा मन्दिर की मार्जनलीला में भी अच्युतानन्द ने योगदान दिया था। जगन्नाथ देव के गुण्डिचा मन्दिर में अवस्थान के समय श्रीमन्महाप्रभु प्रातःकाल स्नान के पश्चात व जगन्नाथ जी के दर्शन करने के पश्चात भक्तों को साथ लेकर गुण्डिचा मन्दिर के प्रागंण में त्रिसन्ध्या कीर्त्तन किया करते थे। उस समय कभी अद्वैताचार्य, कभी नित्यानन्द, कभी हरिदास ठाकुर, कभी अच्युतानन्द व कभी वक्रेश्वर पण्डित और कभी अन्यान्य भक्तों ने महाप्रभु की इच्छा से नृत्य किया था।

प्रात: काले स्नानकरि’ देखि जगन्नाथ।
संकीर्त्तने नृत्य करे भक्तगणसाथ।
कभु अद्वैते नाचाय, कभु नित्यानन्दे।
कभु हरिदासे नाचाय कभु अच्युतानन्दे॥
कभु वक्रेश्वरे, कभु आर भक्तगणे।
त्रिसन्धया कीर्त्तन करे गुण्डिचा – प्रांगणे॥
चै.च. म 14/70-72

श्रीनरहरि दास द्वारा लिखित श्रीनरोत्तमविलास ग्रन्थ में श्रीअच्युतानन्द द्वारा खेतरी उत्सव में योगदान की बात जानी जाती है। महाप्रभु के प्रकटकाल तक अच्युतानन्द पुरी में ही रहे थे। श्रीनरहरि के मत के अनुसार महाप्रभु के अप्रकट होने के पश्चात् अच्युतानन्द का बाकी समय शान्तिपुर वाले गृह में ही बीता।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज द्वारा रचित ग्रन्थ ‘गौर-पार्षद’ में से