केनावान्तरभेदेन भेदं कुर्वन्ति सात्वता:।
सत्याभामाप्रकाशोऽपि जगदानन्द पण्डितः॥
(गौ.ग.दी. 51)

श्रीकृष्ण लीला में जो सत्यभामा हैं, गौर लीला में उन्होंने ही जगदानन्द पण्डित के रूप में प्रकट होकर गौर-लीला की पुष्टि की है।

पण्डित जगदानन्द प्रभुर प्राणरूप।
लोके ख्यात येंहो सत्याभामार सवरूप॥
(चै.च.आ 10/21)

[श्रीजगदानन्द पण्डित महाप्रभु को प्राणों के समान प्रिय हैं, जो कि जगत में सत्यभामा के अवतार के रूप में प्रसिद्ध हैं।]

जय जगदानन्द श्रीगर्भ जीवन।
जय पुण्डरीक विद्यानिधि प्राणधन॥
(चै.भा.म. 7/3)

श्रीजगदानन्द पण्डित जी का आविर्भाव स्थान,सन्, तिथि, पिता व माता का परिचय सब कुछ अज्ञात है। तात्त्विक परिचय की मुख्यता होने के कारण पार्थिव परिचय की अधिक आवश्यकता भक्ति-पथिकों के लिये नहीं देखी जाती। श्रीवृन्दवन दास ठाकुर जी द्वारा लिखित चैतन्य भागवत् के पठन से ज्ञात होता है कि श्रीचैतन्य महाप्रभु जी जब गया से वापस आकर श्रीनवद्विप मण्डल के अन्तर्गत श्रीधाम मायापुर में श्रीवासांगन में और श्रीचन्द्रशेखर आचार्य के भवन में संकीर्त्तन विलास में निमग्न थे, उस समय से श्रीजगदानन्द पण्डित जी श्रीमहाप्रभु जी के साथ थे।

‘सर्ववैष्णवेर हइल शुनिया उल्लास।
आरम्भिला महाप्रभु कीर्तन-विलास॥
श्रीवास मन्दिरे प्रति निशाय कीर्तन।
कोनदिन हय चन्द्रशेखर -भवन॥
नित्यानन्द, गदाधर, अद्वैत, श्रीवास।
विद्यानिधि, मुरारि, हिरण्य, हरिदास॥
गंगादास, वनमाली, बिजय नन्दन।
जगदानन्द, बुद्बिमन्त खान, नारायण॥
सबेइ प्रभुर नृत्य थाकेन संहति।
पारिषद बइ आर केह नाहि तथि॥‘
(चै.भा.म. 8/110-113,117)

[अर्थात् यह सुनकर सब वैष्णवों को बहुत प्रसन्नता हुई कि महाप्रभु ने अपनी कीर्त्तन लीला आरम्भ कर दी। प्रत्येक रात्रि को अधिकतर श्रीवास जी के घर में कीर्त्तन होता था। हाँ कभी-कभी श्रीचन्द्रशेखर के घर पर भी होता था। श्रीनित्यानन्द, श्रीगदाधर, श्रीअद्वैताचार्य, श्रीश्रीवास, श्रीपुण्डरीक विद्यानिधि, श्रीमुरारी, श्रीहिरण्य , श्रीहरिदास, श्रीगंगादास, श्रीवनमाली, श्रीविजय नन्दन, श्रीजगदानन्द, श्रीबुद्बिमन्त खान तथा श्रीनारायण-ये सभी महाप्रभु जी के नृत्य के समय उनके साथ रहते थे। ये सब उनके पार्षद ही थे, चूँकि महाप्रभु जी के पार्षदों के इलावा दूसरा और कोई वहाँ होता ही नहीं था।] श्रील वृन्दावन दास ठाकुर जी के वर्णन के अनुसार ऐसा जाना जाता है कि जगदानन्द पण्डित श्रीचैतन्य महाप्रभु जी के पार्षद थे तथा नवद्वीप मण्डल में श्रीमन्महाप्रभु जी की गृहस्थ लीला के समय के कीर्त्तन के साथी थे। अतः इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि उन्होंने गौड़मण्डल के ही किसी स्थान पर अपनी आविर्भाव लीला प्रकाशित की होगी।

श्रीचैतन्य भागवत के ही वर्णन के अनुसार जब श्रीचैतन्य महाप्रभु जी संन्यास ग्रहण करने के पश्चात् शान्तिपूर में आये और वहाँ से जब उन्होंने नीलाचल की ओर यात्रा की तो उस समय श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीगदाधर, श्रीमुकुन्द , श्रीगोविन्द, श्रीजगदानन्द तथा श्रीब्रह्मानन्द जी उनके साथ थे तथा श्रीचैतन्य चरितामृत के अनुसार उस समय श्रीनित्यानन्द प्रभु,श्रीजगदानन्द, श्रीदामोदर और श्रीमु कुन्द महाप्रभु जी के साथ थे। आटिसारा, छत्रभोग, उड़ीसा, सुवर्ण रेखा, जलेश्वर, रेमुणा, याजपुर, वैतरणी, कटक, साक्षीगोपाल, भुवनेश्वर, कमलपुर व आठारनाला इत्यादि स्थानों को पार कर जब महाप्रभुजी के साथ नीलाचल जा रहे थे तो रास्ते में श्रीचैतन्यमहाप्रभु जी ने भक्तों को निष्किचनता, निरपेक्षता, भगवन्निर्भरता, इत्यादि बहुत विषयों के सम्बन्ध में शिक्षा प्रदान की थी।

उत्कल देश में प्रवेश करते समय उन्होंने गंगाघाट नामक एक स्थान पर स्नान किया तथा स्नान करने के पश्चात् भक्तों को एक देवस्थान में ठहराया तथा स्वयं अकेले ही गृहस्थों के घरों में चले गये और आंचल फैला कर भीक्षा की। भीक्षा में प्राप्त द्रव्य को उन्होंने रसोई करने के लिये श्रीजगदानन्दद जी को दिया। श्रीजगदानन्द जी द्वारा रसोई हो जाने पर महाप्रभु जी ने भक्तों के साथ मिलकर तृप्ति के साथ भोजन किया। श्रीचैतन्य भागवत से जाना जाता है कि महाप्रभु जी की यात्रा के समय श्रीजगदानन्द जी महाप्रभु जी का दण्ड उठाकर चलते थे। एक दिन श्रीजगदानन्द जी ने दण्ड नित्यानन्द प्रभु जी को पकड़ा दिया व स्वयं भिक्षा संग्रह के लिए चले गये। उनके जाने पर बलदेवाभिन्न विग्रह श्रीनित्यानन्द प्रभु जी ने मौका पाकर दण्ड को तीन भागों में विभक्त कर दिया और वैष्णवों को त्रिदण्ड ग्रहण की शिक्षा प्रदान करते हुये उन्होंने उसे भार्गी नदी में फैकने की लीला की। श्रीचैतन्य भागवत के वर्णनानुसार जगदानन्द जी टूटा हुआ दण्ड महाप्रभु के पास लाये थे। एकमात्र सम्बल दण्ड से वन्चित होने के कारण रूष्ट होकर महाप्रभु जी ने भक्तों से जब यह कहा कि आप लोग आगे चलो और मैं पीछे-2 चलूँगा या मैं आगे चलूँगा और आप पीछे चलें तो भक्तों ने आगे न चल स्वयं पीछे चलना सवीकार किया।

नित्यानन्द-स्वरूपे थुइया एकस्थाने।
चलिला जगदानन्द भिक्षा अन्वेषणे॥
ठाकुरेर दण्ड श्रीजगदानन्द बहे।
दण्ड थुइ नित्यानन्द-स्वरूपेरे कहे॥
“ठाकुरेर दण्डे मन दिओ सावधाने।
भिक्षा करि’ आमिह आसिब एइक्षणे”॥1
(चै.भा.अ. 2/202-204)

श्रीमन्महाप्रभु जी अकेले ही आगे चलते-चलते आठारनाला होते हुये पूरी पहूँचे व श्रीजगन्नाथ जी के मन्दिर के शिखर पर मुरलीवादन करते हुये श्रीकृष्ण के दर्शन पर उन्मत्त की तरह दौड़कर जगन्नाथ मन्दिर में प्रवेश कर गये और जगन्नाथ जी के दर्शन कर मूर्च्छित हो गये। उनके मूर्च्छित हो जाने पर श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य जी उन्हें अपने घर पर ले आये। श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीजगदानन्द, श्रीदामोदर, श्रीमुकुन्द कुछ समय पश्चात् जगन्नाथ जी के मन्दिर में पहुंचे और महाप्रभु जी के बारे में सुनकर साथ-साथ श्रीसार्वभौम पण्डित के घर गये। यही सार्वभौम भट्टाचार्य जी का श्रीजगदानन्द जी से प्रथम मिलन हुआ। श्रीमनमहाप्रभु पुरुषोत्तम धाम से गौड़मण्डल में आकर वृदावन की ओर जाने के अभिप्राय से पाँच दिन विद्यानगर में अवस्थान कर मालदह जिला के रामकेलि ग्राम में पहुँचे और श्रीरूप तथा श्रीसनातन जी से मिले तो उस समय रामकेलि गाँव में महाप्रभु के साथी भक्तों2 में जगदानन्द जी भी थे। पुरुषोत्तम धाम में भी महाप्रभुजी के नित्यसंगी भक्तों में श्रीजगदानन्द पण्डितजी के नाम का उल्लेख है—

पण्डित गोसाञि कैल नीलाचले वास।
वक्रेशवर, दमोदर, शङ्कर, हरिदास॥
जगदानन्द, भवानन्द, गोविन्द, काशीशवर।
परमानन्दपुरी, आर स्वरूप-दामोदर॥
क्षेत्रवासी रामानन्द राय प्रभृति।
प्रभुसङ्गे एइ सब कैल नित्य स्थिति॥3
(चै.च.म. 1/252-254)

महाप्रभु, जगदानन्द पण्डित के मधुर रसाश्रित प्रेम के वशीभूत थे। श्रीचैतन्य चरितामृत में यह निम्नलिखित प्रकार से वर्णित हुआ है—

पुरीर वात्सल्य मुख्य, रामानन्देर शूद्धसख्य,
गोविन्देर शुद्ध दास्य रस।
गदाधर जगदानन्द, स्वरूपेर (मुख्य) रसानन्द,
एइ चारिभावे प्रभु वश ||
(चै.च.म.2/78)

[पूरी जी का मुख्य रूप से वात्सल्य प्रेम था, रामानन्दजी का शुद्ध सख्य भाव था, जबकि गदाधर, जगदानन्द तथा स्वरूप दामोदर जी का मधुर रस से सम्बन्ध था। दास्य, सख्य, वात्सल्य तथा मधुर-इन चारों भाव से ही भगवान् वश में होते हैं।]

श्रीमन्महाप्रभु जी की कृपा से श्रीवासुदेव सार्वभौम भट्टाचार्य मायावादी-विचारों का त्याग कर शुद्ध भक्ति पथ के पथिक बने तथा महाप्रभु जी के षड़भुज रूप का दर्शन कर कृतार्थ हो गये। उन्होंने एक सौ शलोक की रचना करके महाप्रभु जी की स्तुति की। श्रीमन्महाप्रभु जी की महिमा सूचक दो शलोक ताल पत्र के ऊपर लिखकर महाप्रभु जी को देने के लिए उन्होंने उस समय इन्हीं जगदानन्द जी के हाथ में दिये थे। जगदानन्द पण्डित जी जब वासुदेव सार्वभौम पण्डित द्वारा भेजा गया महाप्रसाद और वह पत्र महाप्रभु को देने आये तो मुकुन्द दत्त ने पहले ही उस पत्र को पढ़ लिया तथा उस पर लिखे दोनों श्लोकों को बाहरी दीवार पर लिख दिया। बाद में जगदानन्द जी द्वारा पत्र महाप्रभु जी को देने पर महाप्रभु जी ने उसे पढ़ा तथा फाड़ कर फैंक दिया। श्रीमुकुन्द दत्त जी द्वारा लिखा होने के कारण ही अब भक्त लोग इन्हें* पढ़कर परमानन्दित होते हैं।

श्रीमन्महाप्रभु जी ने माघ मास के शुक्ल पक्ष में संन्यास ग्रहण किया, फाल्गुन मास में नीलाचल आये तथा चैत्रमास में सार्वभोम का उद्धार कर वैशाख मास में दक्षिण की ओर यात्रा को चल दिये। महाप्रभु जी द्वारा यह कहने पर कि वे अकेले ही दक्षिण यात्रा पर जायेंगे, नित्यानन्द प्रभु जी ने निषेध किया और स्वयं साथ जाने की इच्छा प्रकाश की। उस समय महाप्रभु जी ने श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीजगदानन्द पण्डित, श्रीदामोदर ब्रह्मचारी, इत्यादि भक्तों की कृत्रिम निन्दा के बहाने उनके अत्यन्त स्नेह पूर्ण व्यवहार के बारे में कहा। श्रीजगदानन्द पण्डित जी के सम्बन्ध में महाप्रभु जी ने कहा था:-

जगदानन्द चाहे आमा विषय भुञ्जाइते।
जेइ कहे, सेइ भये चाहिए करिते॥
कभु यदि इँहार वाक्य करिये अन्यथा।
क्रोधे तिन दिन मोरे नाहि कहे कथा॥
(चै.च.म. 7/21-22)

[अर्थात जगदानन्द मुझे विषय भुगवाना चाहता है। यह जो कहता है, वह इससे डर-डर कर मुझे करना ही पड़ता है, कभी यदि इसके बात को न मानूँ तो यह तीन दिन तक मुझ से बात भी नहीं करता।]

श्रीमन्महाप्रभु जी के दक्षिण भारत की यात्रा पर चले जाने से महाप्रभु जी के तमाम भक्त विराह ने अत्यन्त कातर होकर दिन गुज़ारने लगे। जहाँ जितना प्रीति सम्बन्ध होता है वहाँ विरह में उतना अधिक दुःख होता ही है। हाँ, विरह के पश्चात् मिलने में अति अद्भुत आनन्द का अनुभव होता है, यह ही यथार्थ प्रीति का लक्षण है। श्रीमन्महाप्रभु दक्षिण भारत पर्यटन के बाद जब वापस आकर आलालनाथ में पहुँचे तो कृष्णदास के माध्यम से उन्होंने नित्यानन्द आदि भक्तों को अपने आने का संवाद किया और उन्हें (सब भक्तों को)आने के लिए आदेश दिया। महाप्रभु जी के वापस आने का व मिलने का आदेश सुनकर सभी को महाप्रभु जी के दर्शनों के लिये अति उत्कण्ठा हुई और हृदय में अतिशय आनन्द प्रकटित हुआ। उस समय जगदानन्द पण्डित जी का किस प्रकार आनन्द उदित हुआ था, कविराज गोस्वामी जी ने चेतन्यचरितामृत में उसका निम्न प्रकार से वर्णन किया है—

प्रभुर आगमन शुनि’ नित्यानन्द राय।
उठिया चलिला, प्रेमे थेह नाहि पाय॥
जगदानन्द, दामोदर-पण्डित, मुकुन्द।
नाचिया चलिला, देहे ना धरे आनन्द॥
(चै.च.म. 9/339-340)

[श्रीनित्यानन्द राय महाप्रभु का आगमन सुनकर तुरन्तदर्शनों के लिए चल पड़े, प्रेम में वे अपने आप को संभाल नहीं पा रहे थे। श्रीजगदानन्द, दामोदर पण्डित, श्रीमुकन्द भी नृत्य करते हुए चल पड़े, कोई भी अपने आनन्द को सम्भाल नहीं पा रहा था।]

महाप्रभु जी की दक्षिण भारत से निर्विघ्न वापसी का संवाद श्रीकृष्ण दास के द्वारा शचीमाता के लिये भेजने का परामर्श नित्यानन्द व जगदानन्द जी ने ही दिया था, जिसकी सम्मति भक्त-इच्छा पूर्ति हेतु महाप्रभु जी ने प्रदान कर दी थी। पुरुषोत्तम धाम में जगदानन्द पण्डित का स्वरूप दामोदर, रायरामानन्द, हरिदास ठाकुर इत्यादि मुख्य पार्षदों से एक-एक करके मिलन हुआ। भक्त और भगवान् को परिवेशन (वितरण) करके परितृप्ति के साथ भोजन करवाना एक मुख्य सेवा है, जो की जगदानन्द पण्डित जी परम -आनन्द के साथ करते थे।

चतुर्मास्य के समय गौड़ीय भक्त प्रतिवर्ष महाप्रभु से मिलने के लिये नीलाचल में आते थे। इस प्रकार तीसरे वर्ष जब महाप्रभु जी ने भक्तों को विदाई दी और वृन्दावन की ओर जाने का अपना दृढ़ निश्चय भक्तों के सन्मुख प्रकट किया तो उस वृन्दावन यात्रा के समय महाप्रभु के संगियों में श्रीजगदानन्द भी एक थे। यद्यपि इस बार महाप्रभुजी उड़ीसा को पार करके गोड़देश में पाणिहाटी, कुमारहट्ट, कुलियाग्राम, रामकेली इत्यादि स्थानों से होकर कानाई नाटशाला तक पहुँचे और वहीं से ही वापस नीलाचल लौट आये थे।

अधिक लोगों के साथ होने के कारण ही महाप्रभु जी उस समय वृन्दावन नहीं गये तथा बाद में उन्होंने अकेले ही वृन्दावन जाने का संकल्प लिया। श्रीमन्महाप्रभु वृन्दावन गये तो बलभद्र भट्टाचार्य जी उनके साथ गये थे। वे बलभद्र भट्टाचार्य के साथ नीलाचल से झाड़िखण्ड के रास्ते वृन्दावन जाकर पुनः झाड़िखण्ड के रास्ते से ही पूरी में वापस आये। उनके वापस आने पर महाप्रभु का जगदानन्दादि आदि भक्तों के विरह और मिलन में जो अतिशय प्रेम प्रकट हुआ वह वर्णनातीत है।

श्रील सनातन गोस्वामी द्वारा मथुरामण्डल से अकेले झाड़िखण्ड के रास्ते नीलाचल आने से रास्ते में पानी के दोष और उपवास के कारण उनके शरीर में कण्डु रसा (एक प्रकार का कोढ़) हो गया। जगन्नाथ के सेवकों के साथ कोढ़ वाले अपवित्र शरीर के स्पर्श होने से अपराध होगा—ऐसा विचार कर उन्होंने संकल्प लिया कि जगन्नाथ जी की रथ यात्रा के समय रथ के चक्के के नीचे पिसकर कर अपनी देह त्याग कर देंगे परन्तु अन्तर्यामी श्रीमन्महाप्रभु जी यह सब जान गये और देहत्यागादी के द्वारा श्रीकृष्ण को नहीं पाया जाता, उन्हें तो भजन के द्वारा पाया जाता है; जो देह समर्पित है उसे नष्ट करने का समपर्णकारी को अधिकार नहीं है; इत्यादि उपदेशों के द्वारा महाप्रभु जी ने सनातन को देह तयाग के संकल्प से निवृत्त किया। भगवान्, भक्त के शरीर की बाहरी पवित्रता या अपवित्रता कुछ भी नहीं देखते। वे तो भक्त के शुद्ध सेवामय अन्तःकरण को देखकर आकृष्ट हो जाते हैं। महाप्रभु जी आपने भक्त सनातन के आलिंगन में ज़रा भी आनाकानी नहीं करते थे बल्कि पुनः पुनः उन्हें आलिंगन करते थे। महाप्रभु जी द्वारा बार-बार आलिंगन करने पर सनातन गोस्वामी के शरीर में से निकलता रस महाप्रभु जी के श्रीअंग पर लगने के कारण सनातन गोस्वामी संकुचित और अत्यन्त दुःखी होते थे। इस सम्बन्ध में जब उन्होंने जगदानन्द जी से परामर्श माँगा तो जगदानन्द पण्डित जी ने उन्हें रथयात्रा के पश्चात् वृन्दावन जाने का उपदेश दिया। उक्त उपदेश को सही समझ कर उन्होंने उसे महाप्रभु जी के सामने कहा और वृन्दावन जाने का आदेश पाने के लिए महाप्रभु जी से प्रार्थना की। यह सुनकर महाप्रभुजी क्रुध हो गये और क्रुद्ध होकर जगदानन्दजी की भर्त्सना करते हुये बोले : –

कलिकार बटुया जगा एछे गर्वी हैल।
तोमा-सबारेह उपदेश करिते लागिल??॥
व्यवहारे-परमार्थे तुमि—तार गुरू तुल्य।
तोमारे उपदेश करे न जाने आपन मुल्य??॥
आमार उपदेष्टा तुमि-प्रामाणिक आर्य।
तोमारेह उपदेशे बालका करे एछे कार्य॥
(चै.च.अ. 4/158-160)

[कल का पैदा हुआ बच्चा जगदानन्द ऐसा घमण्डी हो गया है कि आप सबको उपदेश करने लगा है। व्यवहार तथा परमार्थ में तुम उसके गुरु के सम्मान हो, वह आपको उपदेश करता है। क्या वह अपनी हैसियत नहीं जानता? आप तो मेरे को भी उपदेश करने वाले हो, आप तो प्रसिद्ध प्रमाणिक पुरुष हो, और वह बालक सा आप को उपदेश करने का कार्य करने लगा है।]

भक्त व भगवान् अपने जन की ही भर्त्सना करते हैं। बहुत सौभाग्य से ही भक्त या भगवान् की भर्त्सना सुनने को मिलती है। इसलिए सनातन गोस्वामी जी ने जगदानन्द जी के महासौभाग्य एवं अपने दुर्भाग्य का वर्णन किया—

जगदानन्दे पियाओ आत्मीयता सुधारस।
मोरे पियाओ गोरव स्तुति-निम्ब-निशिन्दा-रस॥
(चै.च.अ. 4/163)

[अर्थात सनातन गोस्वामी जी ने महाप्रभु जी से कहा कि जगदानन्द को तो आप आत्मीयता का अमृत रस पिलाते हो और मेरे को गौरव स्तुति रूपी नीम तथा निशिन्दा (एक प्रकार का पौधा जो कि आस्वादन करने पर बहुत कड़वा लगता है) का कड़वा रस पिलाते हो।]

जगदानन्द पण्डित के शुद्ध प्रेम रस के वशीभूत होने पर भी महाप्रभु जी ने वैष्णव की मर्यादा स्थापना के लिये सनातन गोस्वामी की मर्यादा लंघन के कार्य से सबको सावधान किया है। महाप्रभुजी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इसमें कोई दो राय नहीं कि जगदानन्द मुझे तुमसे भी अधिक प्यारा है परन्तु मर्यादाओं का उल्लंघन करना मैं कभी भी बर्दाश्त नहीं कर सकता—

जगदानन्द प्रिय आमार नहे तोमा हैते।
मर्यादा-लङ्घन आमि ना पारों सहिते॥
(चै.च.अ-4/166)

बल्लभभट्ट के सामने भक्तों की महिमा वर्णन करते समय महाप्रभु जी ने कहा था कि ‘कृष्ण-नाम-प्रेम प्रचारक’ जगदानन्द पण्डितादि भक्तों के संग के फल से ही कृष्ण भक्ति होती है—

आचार्यरत्न, आचार्य निधि, पण्डित गदाधर।
जगदानन्द, दामोदर, शङ्कर, वक्रेश्वर॥
काशीशवर, मुकुन्द, वासुदेव, मुरारि।
आर जत भक्तगण गौडे़ अवतरि’॥
कृष्ण नाम प्रेम कैल जागते प्रचार।
इँहा सबार सङ्गे कृष्णभक्ति ये आमार॥
(चै.च.अ-7/48-50)

[अर्थात भक्तों का मान बढ़ाते हुये श्रीमान महाप्रभुजी, कहते हैं कि श्रआचार्य रत्न, श्रीआचार्य निधि, श्रीगदाधर पण्डित, श्रीजगदानन्द, श्रीदामोदर, श्रीशंकर, श्रीवक्रेश्वर,श्रीकाशीशवर, श्रीमुकुन्द, श्रीवासुदेव, श्रीमुरारी और जितने भी भक्त गोड़देश में अवतरित हुए हैं, इन्होंने कृष्ण-नाम-प्रेम जगत में प्रचारित किया है, इन सबके संग के कारण ही मेरी कृष्ण भक्ति हुई है।]

सत्यभामा केअवतार जगदानन्द पण्डित का वाम्य (जल्दी नाराज़ होने वाला या रूठने वाला) स्वभाव होने के कारण प्रायः इनकी महाप्रभु जी से फ्रेम कलह होती रहती थी—

‘जगदानन्द पण्डितेर शुद्ध गाढ़ भाव।
सत्याभामा-प्राय प्रेम ‘वाम्य-स्वभाव’॥
बार-बार प्रणय कलह करे प्रभु सने।
अन्योऽन्ये खट्मटि चले दुइजने॥4
(चै.च.आ. 7/138-139)

श्रीजगदानन्द पण्डित की निष्कपट सेवा-प्रवृत्ति और श्रीरामचन्द्र पुरी कपट सेवा का पार्थक्य श्रीचैतन्य चरितामृत की अन्तयलीला के अष्टम परिच्छेद के प्रारम्भ में ही वर्णित है। बाहरी दृष्टि से श्रीरामचन्द्रपुरी माधवेन्द्र पूरी पाद जी के चरणाश्रित शिष्य होने पर भी सेवा प्रवृत्ति से रहित होने के कारण व स्निग्ध सेवक न होने के कारण माधवेन्द्र पुरीपाद की कृपा से वन्चित रह गए थे।

हरिदास ठाकुर के निर्याण-महोत्सव के समय प्रसाद परिवेशन करने (प्रसाद बाँटने) वालों में से श्रीजगदानन्द पण्डित भी थे। प्रसाद परिवेशन करना महाप्रभु जी के मुख्य पार्षदों का एक मुख्य भक्ति अंग है। इसका आचरण करके शिक्षा दी श्रीजगदानन्द जी ने। चातुर्मास्य में गौड़देश के भक्त महाप्रभु जी से मिलने के लिए आते थे और चातुर्मास्य के पश्चात् ही वापस लौटते थे। जिस वर्ष चातुर्मास्य के पश्चात् भक्तों को विदा देते समय महाप्रभु जी ने नित्यानन्द प्रभु को पूरी में आने के लिये निषेध किया, उस वर्ष जगदानन्द पण्डित महाप्रभु जी की खबर लेकर नदिया नगर में शची माता के पास पहुँचे थे। महाप्रभु जी नीलाचल में रहते हुये भी शची माता के प्रेम के वशीभूत होकर साक्षात् रुप से शची माता के सन्मुख प्रकट हो जाते और माता का दिया हुआ भोजन करते थे—इस सम्बन्ध में यथायथ सब वृत्तान्त जब शची माता ने जगदानन्द जी से सुना तो वे आनन्द में विभोर हो गई तथा अब तक जिसे वह सुफिर्त या स्वप्न समझती थीं, सत्य प्रतीत हुआ। जगदानन्दजी जैसे प्रेमी -भक्त से जब अन्यान्य भक्तों की भेंट हुई तो सभी भक्त महानन्द सागर में निमज्जित हो गये।

श्रीजगनदानन्द पण्डित ने श्रीशिवानन्द सेन के घर से महाप्रभु जी के मस्तक पर लगाने के लिए सुगन्धित चन्दन तेल लिया और उसे एक कलसी में भरकर खूब सावधानी के साथ नीलाचल ले आये तथा उसे महाप्रभुजी के अंगों पर लगाने के लिये गोविन्द को दे दिया। गोविन्द ने महाप्रभु जी से निवेदन किया—जगदानन्द गौड़देश से सुगन्धित चन्दन तेल लाये हैं। उसे मस्तक पर लगाने से पित्त व वायु आदि व्याधियाँ शान्त हो जाती हैं। महाप्रभु जी ने लोकशिक्षा के लिये गोविन्द को कहा—‘संन्यासी के लिये तेल व्यवहार निषिद्ध है और उस पर सुगन्धित तेल तो अति निन्दनीय है। हाँ, जब इतना परिश्रम करके तेल ले ही आये हैं तो उसे जगन्नाथ जी के दीपदान सेवा में लगाने से उनका परिश्रम सार्थक हो जायेगा।‘ गोविन्द ने जब जगदानन्द पण्डित को महाप्रभु का आदेश सुनाया तो उस समय प्रणय-अभिमान वशतः वे मौन रहे। दस दिन के बाद गोविन्द ने जब दुबारा महाप्रभुजी से पुनः जगनदानन्द जी द्वारा लाया तेल अंगीकार करने की इच्छा प्रकट की तो वे लोकशिक्षा हेतु क्रोधित हो उठे और व्यंग्य करते हुए कहने लगे : –

मर्दनिया एक राख करिते मर्दन।
एइ सुख लागि’ आमि करिलुँ सन्यास।
आमार ‘सर्वनाश’—तोमा-सबार ‘परिहास’॥
पथे जाइते तैलगन्ध मोरे जेइ पाबे।
‘दारी सन्यासी’ करि आमारे कहिबे॥
(चै.च.अ. 12/112-114)

[अर्थात महाप्रभु जी गोविन्द से कहते हैं—हाँ-हाँ क्यों नहीं मालिश करने के लिए एक मर्दनिया भी रख लो, इसी सुख के लिये ही तो मैंने संन्यास लिया था। मेरा तो सर्वनाश हो जायेगा और आपका मज़ाक हो रहा है। मार्ग में चलते हुये मेरे शरीर से जब तेल की गन्ध आयेगी तो लोग मुझे ‘दारी संन्यासी’5 कहेंगे।]

महाप्रभु जी का क्रोध देख गोविन्द अवाक् हो गये। दूसरे दिन प्रातः काल जगदानन्द पण्डित जब महाप्रभु जी से मिलने आये तो महाप्रभु जी ने उन्हें कहा कि संन्यासी के लिये तेल लगाना उचित नहीं, वह तेल जगन्नाथ जी की सेवा में लगाने में श्रम सार्थक होगा। जगदानन्द पण्डित प्रणय अभिमान-जनित रोष प्रकाश करते हुये कहने लगे—“आपको किस ने कहा कि मैं गौड़देश से तेल लाया हूँ, यह झूठ बात है—” ऐसा कहकर उन्होंने तेल की कलसी महाप्रभु के सामने ही आंगन में पटककर फोड़ दी और अपने घर जाकर दरवाजा बन्द करके सो गये। भक्त-प्रेमवश, भगवान् गौरहरि भक्त का मान तोड़ने के लिये स्वयं जगदानन्द पण्डित के घर गये और घर में जाकर मधुर स्वर से पुकारा जगदानन्द! द्वार खोलो, में जगन्नाथ का दर्शन करके दोपहर में आऊँगा और तुम्हारे द्वारा पकाया हुआ अन्न प्रसाद पाउँगा। जल्दी-जल्दी रसोई करने की व्यवस्था करो। प्रभु-प्रेमिक जगदानन्द पण्डित ने साथ-साथ उठकर स्नान किया और प्रभु के लिये बहुत प्रकार के व्यंजन पकाये। मध्याह्न कृत्य कर महाप्रभु जी ने हस्थ व चरण धोये और भोजन के लिये बैठ गये। जगदानन्द जी ने केले के पत्ते पर घी के साथ शालयान्न तथा बहुत प्रकार के व्यंजन, पिठापाना इत्यादि परोस दिये। महाप्रभु ने अपनी पत्तल के साथ एक और केले के पत्ते पर प्रसाद सजाने के लिये कहा। महाप्रभु का अभिप्राय जगदानन्द को भी अपने साथ भोजन करवाने का था। जगदानन्द के भोजन पर न बैठने तक महाप्रभु जी अपने हाथ उठाकर बैठे रहे। जगदानन्द पण्डित ने अभिमान परित्याग कर महाप्रभु जी से कहा कि वे उनके प्रसाद पाने के पश्चात् अवश्य प्रसाद पायेंगे। महाप्रभु जी ने प्रसाद सेवन करते समय जगदानन्द पण्डित के प्रेम के गुस्से में पकाये अन्न व व्यंजनों की भरपूर प्रशंसा की—

एछे अमृत-अन्न कृष्णे कर समर्पण।
तोमार भाग्येर सीमा के करे वर्णन??॥
(चै.च.अ. 12/133)

[जगदानन्द जी से मज़ाक करते हुए श्रीमन् चैतन्य महाप्रभु जी मुस्कुराते हुए कहते हैं कि ऐसे ही अमृत के समान अन्न को तुम श्रीकृष्ण को अर्पण करते हो, तुम्हारे भागय की सीमा का कौन वर्णन कर सकता है।]

जगदानन्द पण्डित द्वारा बार-बार व्यंजन परिवेशन करते रहने पर भी महाप्रभु जी भय से कुछ नहीं बोले, चुपचाप सब कुछ खाते रहे। कारण, न खाने पर जगदानन्द नाराज़ होकर फिर भूखा रहेगा और ऐसा करते-करते महाप्रभु जी ने उस दिन दस गुना अधिक भोजन किया। भोजन के पश्चात् जगदानन्द जी ने मुख्यशुद्धि के लिए महाप्रभु जी को पान दिया, माला पहनाई, वह उनके शरीर पर चन्दन का लेप किया। महाप्रभु जी ने जगदानन्द को अपने सामने भोजन करने के लिये कहा। वाम्य स्वभावी जगदानन्द पण्डित ने ऐश्वर्य भाव से महाप्रभु जी को मर्यादा संरक्षण हेतु विश्राम करने के लिये प्रार्थना की और कहा कि रामाई और रघुनाथ भट्ट ने भी तो रसोई में सहायता की है। इसलिए मैं उनको भोजन करवाने के पश्चात् अवश्य ही भोजन करूँगा। महाप्रभु जी ने जगदानन्द की बात पर विश्वास न किया और गोविन्द को ये देखकर बताने के लिये वहीं छोड़ दिया कि जगदानन्द पण्डित भोजन करता है या नहीं। किन्तु जगदानन्द जी ने गोविन्द को शीघ्र ही श्रीमहाप्रभु जी की पादसेवा के लिए भेज दिया। रामाई, नन्दाई, गोविन्द तथा रघुनाथ इत्यादि सबको भोजन करवाकर जगदानन्द जी ने महाप्रभुजी का अवशेष ग्रहण किया। गोविन्द से जगदानन्द के भोजन करने का संवाद सुनकर महाप्रभु जी ने निशचन्त होकर विश्राम किया।

जगदानन्दे-प्रभु ते प्रेम चले एइमते।
सत्यभामा-कृष्णे जैछे शुनि भागवते॥
जगदानन्देर सोभाग्येर के कहिबे सीमा?
जगदानन्देर सोभाग्येर तेंह से उपमा॥
जगदानन्देर ‘प्रेमविवर्त्त’ 6 शुने जेइ जन।
प्रेमेर ‘स्वरूप’ जाने, पाय प्रेमधन॥
(चै.च.अ. 12/152-154)

[श्रीजगदानन्द और महाप्रभु का परस्पर प्रेम ऐसा ही होता था जैसे श्रीमद् भगवतम में श्रीमति सत्यभामा और कृष्ण का प्रेम सुनते हैं। श्रीजगदानन्द के सौभाग्य की सीमा को भला कौन पार पा सकता है? श्रीजगदानन्द के सौभाग्य का तो वे स्वयं ही उदाहरण हैं। श्रीजगदानन्द जी द्वारा रचित ‘प्रेम विवर्त्त’ जो सुनेगा वह प्रेम के स्वरूप को समझ जाएगा और भगवद्-प्रेमघन को प्राप्त कर लेगा।]

महाप्रभु जी कृष्ण विरह में तीव्र वैराग्य प्रकट करते तथा केले के वल्कलों से बनी शैया पर शयन करते थे। भक्तों को यह देखकर बड़ा कष्ट होता कि महाप्रभुजी वल्कल पर सोते हैं, जो आराम दायक नहीं है। महाप्रभु जी को हड्डियों की चुभन की पीड़ा का अनुभव करके भक्तों को दारूण कष्ट होता था। अतः महाप्रभु जी को सुख देने के लिये जगदानन्द पण्डित जी ने शिमुली की रूई से एक गद्दा व एक तकिया तैयार किया और महाप्रभु को शयन के समय देने के लिये गोविन्द को दे दिया। उन्होंने इस सम्बन्ध में स्वरूप दामोदर जी से भी निवेदन किया। शयन के समय रुई का तकिया देखकर महाप्रभु जी क्रोधित हो उठे परन्तु बाद में जब मालूम पड़ा की ये जगदानन्द जी द्वारा भेजा गये है तो जगदानन्द जी का नाम सुनकर महाप्रभु थोड़ा संकुचित हो गये और कृत्रिम क्रोध प्रकाशित करते हुए कहने लगे-ये रुई का तकिया ही क्यों? एक खाट लेने से और भी अच्छा होता। अरे, संन्यासी के लिये तो भूमि-शयन का ही विधान है और ये जगदानन्द मुझे विषय भुगवाना चाहता है, अत्यन्त लज्जा की बात है। स्वरूप दामोदर जी से महाप्रभु जी ने रुई का तकिया नहीं लिया, यह सुन जगदानन्द जी को बहुत दुःख हुआ। सेवा करने में चतुर स्वरूप दामोदर ने जब केले के सूखे पत्ते से शैया तैयार करके दी तो महाप्रभु जी ने उसे अंगीकार कर लिया, इससे सब भक्तों को सुख होने पर भी जगदानन्द जी को दुःख हुआ। अभिमानवशतः जगदानन्द जी ने महाप्रभुजी से वृन्दावन जाने के लिये आदेश की प्रार्थना की। यद्यपि जगदानन्द जी के भीतर का दुःख बाहर व्यक्त नहीं हुआ तब भी अन्तर्यामी महाप्रभु जी उसे समझ गये और उन्हें सान्त्वना प्रदान करते हुए मधुर वाक्यों से बोले-तुम मुझ पर क्रोध करके, मेरे को दोषी ठहराकर मथुरा में जाकर भिकारी बनोगे?

वाम्य स्वभाव जगदानन्द हृदय के भाव को छिपाते हुये बोले—नहीं प्रभो, मेरी बहुत दिन से वृन्दावन जाने की इच्छा है। आपका आदेश न मिलने के कारण जा नहीं सका।

जगदानन्द पण्डित द्वारा बार-बार अनुरोध करने पर भी जब महाप्रभु ने भक्त वात्सल्य वशतः उन्हें जाने की सम्मति प्रदान नहीं की तो जगदानन्द पण्डित जी ने स्वरूप दामोदर जी को महाप्रभु जी से वृन्दावन जाने की अनुमति दिलवाने के लिये निवेदन किया।

स्वरूप दामोदर महाप्रभु जी से बोले—जगदानन्द की वृन्दावन जाने की बहुत इच्छा है। आपने जैसे पहले उसे शचीमाता से मिलने के लिये गौड़देश भेजा था, उसी प्रकार वृन्दावन जाने के लिये आदेश देने से अच्छा होता।

स्वरूप दामोदर के अनुरोध के कारण महाप्रभु जी ने जगदानन्द जी को वृन्दावन जाने की अनुमति दे दी किन्तु अत्यन्त स्नेह परवश होकर विस्तृत रूप से रास्ते की सुविधाओं व असुविधाओं के बारे में बताते हुये कहने लगे-वाराणसी तक तो आप स्वच्छन्दता से चल सकोगे लेकिन उसके आगे सावधानी से चलना क्योंकि उससे आगे का सारा रास्ता सुरक्षित नहीं है, वहाँ बहुत से चोर-डकैतों का डर है इसलिए क्षत्रियों को साथ लेकर चलना। निरीह गौड़ीय को वे रास्ते व घाट पर मारकर लूट लेते हैं और हाँ, मथुरा जाकर पहले सनातन से मिलना और मथुरा में चौबे ब्राह्मणों की चरण वन्दना करना। दूर से ही उनकी भक्ति करना, उनके साथ रहना नहीं। उनका आचरण नहीं समझ पाओगे और अपराध कर बैठोगे। व्रजमंडल की परिक्रमा सनातन के साथ करना। एक मुहूर्त के लिये भी उसका संग नहीं छोड़ना और गोवर्धन पर चढ़कर गोपाल जी का दर्शन भी मत करना और ज्यादा समय वृन्दावन में नहीं रहना। शीघ्र वापस आ जाना।

शीघ्र आसिह, ताँहा न रहिह चिरकाल।
गोवर्द्धने ना चड़िह देखिते ‘गोपाल’॥
(चै.च.अ. 13/39)

जगदानन्द पण्डित महाप्रभु जी की वन्दना करते हुये अकेले ही चलते-चलते वाराणसी में तपन मिश्रा और चन्द्रशेखर जी से तथा मथुरा में पहुँच कर सनातन गोस्वामी जी से मिले। सनातन गोस्वामी जी के आनुगत्य में ही जगदानन्द जी ने बारह वनों का भ्रमण किया। द्वादश वन भ्रमण के पश्चात् वे गोकुल-महावन में एक साथ रहने लगे। सनातन गोस्वामी माधुकरी भिक्षा में मिली रोटी खाकर ही जीवन निर्वाह करते थे। किन्तु जगदानन्द जी को रोटी खाने का अभ्यास न होने के कारण देवालय में जाकर चावल दाल रसोई करते थे। एक दिन जगदानन्द पण्डित जी ने सनातन गोस्वामी को प्रसाद पाने के लिये निमन्त्रित किया तथा सनातन गोस्वामी जी भी उनके निमन्त्रण को सहर्ष स्वीकार करते हुये वहाँ पहुँचे, परन्तु जब सनातन गोस्वामी जी वहाँ पहुँचे, तो उनके सिर पर एक लाल कपड़ा बँधा था जो कि उन्हें मुकुन्द सरस्वती नामक एक संन्यासी ने दिया था। सनातन गोस्वामी उस बहिर्वास को मस्तक पर बाँधकर जगदानन्द के घर के द्वार पर आकर बैठ गये। सनातन गोस्वामी के मस्तक पर खून जैसा लाल रंग का वस्र देकर जगदानन्द पण्डित प्रेमाविष्ट हो गये; किन्तु सनातन गोस्वामी से पूछने पर जब यह मालूम हुआ कि वह महाप्रभुजी का नहीं वरन् मुकुन्द सरस्वती द्वारा प्रदत्त है, तब तो जगदानन्द जी क्रोध होकर चावल की हाँडी उठाकर मारने के लिये उद्यत हो गये और भत्तर्सना करते हुये सनातन से बोले : –

तुमि महाप्रभुर हओ पार्षद-प्रधान।
तोमा सम महाप्रभुर प्रिय नाहि आन॥
अन्य सन्यासीर वस्र तुमि धर शिरे।
कोन् एछे हय—इहा पारे सहिवारे?
सनातन कहे,—“साधु पण्डित महाशय।
तोमा-सम चैतन्येर प्रिय केह नय॥
एछे चैतन्य निष्ठा योग्य तोमाते।
तुमि न देखाइले इहा शिखिमु केमते?
जाहा देखिबारे वस्र मस्तके बान्धिलुँ।
सेइ अपूर्व प्रेम एइ प्रत्यक्ष देखिलुँ॥
रक्तवस्र ‘वैष्णवेर’ परिते ना युयाय॥
कोन प्रवासीरे दिमु कि काय उदाय?
(चै.च.अ 13/56-61)

[आप महाप्रभु जी के प्रधान पार्षद है। आपके सामान महाप्रभु जी का कोई भी प्रिय नहीं है। आप दूसरे दूसरे संन्यासियों के वस्रअपने सिर पर धारण करते हो, कौन ऐसा गौड़ीय वैष्णव होगा जो इसे सहन कर पायेगा—जगदानन्द जी ने कहा। अपने उत्तर में सनातन जी कहते हैं, ” हे साधु पण्डित-महाशय! श्रीचैतन्य महाप्रभु का आपके समान कोई प्रिय नहीं है। श्रीचैतन्य जी के चरणों में ऐसी योग्य निष्ठा का प्रदर्शन आप नहीं करेंगे तो उसे मैं किस प्रकार सीखूँगा। जिसे देखने के लिए मैंने सिर पर वस्र बाँधा था, वह अपूर्व प्रेम मैंने प्रत्यक्ष ही देख लिया है। वैष्णव को रक्त वस्र पहनना शोभा नहीं देता है। अच्छा, मैं इसे किसी यात्री को दे दूँगा और बोलो क्या करूँ इसका?”]

जगदानन्द द्वारा पकाया अन्ना व व्यंजनादि महाप्रभु जी को निवेदित किया गया तथा उसके बाद जगदानन्द जी व सनातन गोस्वामी, दोनों ने बैठकर प्रसाद ग्रहण किया। दो मास इस प्रकार रहने के पश्चात् जगदानन्द भी महाप्रभु जी के विरह में अस्थिर हो गये तथा पूरी में वापस जाने के लिये सनातन गोस्वामी जी से अनुमति की प्रार्थना करने लगे। सनातन गोस्वामी जी ने जगदानन्द जी को जाने की अनुमति देकर विरह व्याकुल हृदय से रासस्थली की रेत, गोवर्धन शिला, गुंजामाला, शुष्क किन्तु पके हुए पीलूफल महाप्रभु जी को देने के लिये उनके हाथों में दिये।

नीलाचल में आकर सपार्षद महाप्रभु जी से मिलकर जगदानन्द जी परमानन्दित हुये तथा जगदानन्द को देखते ही महाप्रभु जी ने उसे ज़ोर से आलिंगन किया। सनातन गोस्वामी द्वारा भेजी सभी वस्तुयें जगदानन्द जी ने महाप्रभु जी को दे दीं। सनातन द्वारा प्रदत्त द्रव्यों को प्राप्त कर महाप्रभुजी प्रसन्न हुये। पीलूफल किस प्रकार खाया जाता है, ये पता न होने पर भी, यह समझकर कि ये वृन्दावन से आया है, भक्तों ने प्रीति के साथ उसे जैसे-तैसे खाया।

शचीमाता के शुद्ध वात्सल्य भाव के वशीभूत होकर महाप्रभु प्रतिवर्ष जगदानन्द पण्डित को प्रसादी वस्र व मिष्टान्न देकर नवद्वीप भेजते थे और जगदानन्द पण्डित जी नवद्वीप में जाकर महाप्रभुजी की बातें बता कर शचीमाता का दुःख मोचन करते थे। अन्तिम बार जब जगदानन्द पण्डित जी नवद्वीप आये तो वहाँ के भक्तों से मिलकर शान्तिपुर गये। शान्तिपुर में श्रीअद्वैत आचार्य जी से जब वे विदाई की याचना कर रहे थे तो उन्होंने (अद्वैताचार्य जी ने) जगदानन्द पण्डित के माध्यम से एक तर्जा (पहेली) महाप्रभु जी के पास भेजी जो कि इस प्रकार है: –

प्रभुरे कहिह आमार कोटि नमस्कार।
एइ निवेदन ताँर चरणे आमार॥
बाउलके कहिह,-लोक हइल बाउल।
बाउलके कहिह,-हाटे ना बिकाय चाउल॥
बाउलके कहिह,-काये नाहिक बाउल।
बाउलके कहिह,-इहा कहियाछे बाउल॥
(चै.च.अ 19/19-21)

उपरोक्त पहेली का अर्थ बताते हुए श्रील भक्तिविनोद ठाकुर जी ने लिखा है कि महाप्रभु को कहना कि, लोग प्रेम में उन्मत्त हो गए हैं, प्रेम के हाट में प्रेमरूप चावल को बेचने की जगह नहीं है अर्थात अब इसका और कोई ग्राहक नहीं है। महाप्रभु जी को कहना कि आउल अर्थात प्रेमोन्मत्त बावले का और कोई भी सांसारिक कार्य नहीं है। महाप्रभु को कहना कि प्रेमोन्मत्त होकर ही अद्वैत ने यह बात कही है। तात्पर्य यह है कि प्रभु के आविर्भाव का जो तात्त्पर्य था वह सम्पूर्ण हो गया है। अब जो प्रभु की इच्छा हो, वही हो।

श्रीजगदानन्द पण्डित जी की तिरोधन लीला का स्थान, सन् एवं तिथि भी अज्ञात है।

1 [एक स्थान पर श्रीनित्यानन्द प्रभु जी को दण्ड देकर श्रीजगदानन्द भिक्षा के लिये चले गये, महाप्रभु के दण्ड को श्रीजगदानन्द ही उठाकर ले चलते थे। श्रीनित्यानन्द जी को दण्ड देकर श्रीजगदानन्द ने कहा की यह महाप्रभु का दण्ड है, इसे मन लगाकर सावधानी से रखना, मैं शीघ्र ही भिक्षा करके अता हूँ]
2 नित्यानन्द, हरिदास, श्रीवास, गदाधर। मुकुन्द, जगदानन्द, मुरारी वक्रेश्वर।

3 जगदानन्द पण्डित नीलाचल में वास करने लगे। श्रीवक्रेश्वर, श्रीदामोदर, श्रीशंकर, श्रीहरिदास, श्रीजगदानन्द, श्रीभवानन्द, श्रीगोविन्द, श्रीकाशीश्वर, श्रीपरमानन्द पुरी और श्रीस्वरूप दामोदर तथा क्षेत्र निवासी श्री रामानन्द आदि यह सब महाप्रभु जी के साथ नित्य निवास करते थे।

4 श्रीजगदानन्द पण्डित का शुद्ध तथा गाढ़ प्रेम था जैसे सत्यभामा जी का वाम्य-स्वभाव का प्रेम श्रीकृष्ण के साथ था। ये बार-बार महाप्रभु के साथ कलह करते हैं। दोनों एक दूसरे के साथ खटपट करते ही रहते हैं।

5 दारी संन्यासी-ऐसे संन्यासी को संन्यास भी लिये होते हैं और स्री को भी साथ रखते हैं। समाज में इन्हें सम्माननीय दृष्टी से नहीं देखा जाता।

6 प्रेम विवर्त्त—एक अर्थ तो यह है कि प्रेम का विवर्त्त अर्थात ऐसा प्रेम-व्यवहार जिसमें रोष का भ्रम होता है, द्वितीय अर्थ यह है कि जगदानन्द जी ने अपने ‘प्रेम विवर्त्त’ नामक ग्रन्थ में जो श्रीचैतन्य महाप्रभु जी का चरित्र वर्णन किया है वह।

स्रोत: श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज द्वारा रचित ग्रन्थ “गौर-पार्षद” में से