घनिष्ठा भक्ष्यसामग्रीं कृष्णायादाद्व्रजेऽमिताम्।
सेव साम्प्रतं गौरांगप्रियो राघव पण्डितः
गुणमाला व्रजे यासीद्दमयन्ती तु तत्स्वसा॥
गौ. ग. 166 – 67

जो व्रज लीला में धनिष्ठा थीं, जिसने श्रीकृष्ण जी को बहुत सी खाद्यसामग्री प्रदान की थी, वे ही अभी गौरांग लीला में गौरांग प्रिय श्री राघव पण्डित हुये हैं और व्रजलीला में जो गुणमाला थी वह राघव जी की बहन दमयन्ती हुयी हैं।

इन्टर्न रेललाईन पर सियालदाह स्टेशन के उत्तर की तरफ सोदपुर स्टेशन है। इस स्टेशन के एक मील पश्चिम में गंगा के किनारे पाणिहाटी नामक जगह है जो कि श्री राघव पण्डित जी का आविर्भाव स्थान है। राघव भवन में श्रीमन्महाप्रभु का नित्य अवस्थान है। श्रीकृष्ण लीला में धनिष्ठा देवी ने श्रीमति यशोदा माता जी के निर्देशानुसार श्रीकृष्ण का प्रसाद राधारानी को दिया था, राधा जी ने वह प्रसाद प्रेम के साथ ग्रहण किया था।

यशोमति आज्ञा पेये धनिष्ठा आनीत।
श्रीकृष्ण प्रसाद राधा भुन्जे हये प्रीत।
– श्री भक्ति विनोद ठाकुर

स्वयं भगवान नन्दनन्दन श्रीकृष्ण के अभिन्न स्वरूप श्री गौरांग महाप्रभु ने भी उसी प्रकार राधा के भाव मे भावित होकर धनिष्ठा के अभिन्न स्वरूप राघव पण्डित जी द्वारा दिये गये द्रव्यों का भोजन करने की लीला की थी। राघव पण्डित के घर में श्रीमन्महाप्रभु के हमेशा रहने की बात श्रीलकृष्णदास कविराज गोस्वामी ने श्रीचैतन्य चरितामृत की अन्त्यलीला के द्वितीय परिच्छेद में इस प्रकार से वर्णन की है –

शचीर – मन्दिरे, आर नित्यानन्द नर्तने।
श्रीवास कीर्तने, आर राघव भवने॥
एई चारि ठाञि प्रभुर सदा ‘आविर्भाव’ ।
प्रेमाकृष्ट हय, – प्रभुर सहज स्वभाव॥

अर्थात् : माता शची के मन्दिर में, श्रीमन् नित्यानन्द प्रभु के नृत्य में, एवं श्रीवास के कीर्तन में तथा श्रीराघव के भवन में – इन चार स्थानों पर श्रीमहाप्रभु का नित्य आविर्भाव रहता है। कारण यह है कि श्री महाप्रभु प्रेम से आकृष्ट हो जाते हैं।

राघव पण्डित श्रीमन्महाप्रभु के कितने प्रिय थे वह वृन्दावन दास के वर्णन से जाना जा सकता है। श्रीमन्महाप्रभु श्रीवास पण्डित के घर कुमार हट्ट से पाणिहाटी में राघव के घर पर आये थे। प्राणनाथ गौरचन्द्र के दर्शन कर राघव पण्डित प्रेम से गदगद हो गये और महाप्रेम में भर कर महाप्रभु के पादपद्यों में गिर पड़े।

राघवेर भक्ति देखि’ श्रीवैकुण्ठ नाथ।
राघवेरे करिलेन शुभ दृष्टिपात॥
प्रभु बले – राघवेर आलये आसिया।
पासरिलुँ सब दुःख राघव देखिया॥
गंगाय मज्जन कैसे ये सन्तोष हय।
सेइ सुख पाइलाङ राघव – आलय॥
चै. भा. अ. 5/81-23

अर्थात् : श्रीवैकुण्ठनाथ ने राघव की भक्ति देख उनके ऊपर दृष्टिपात किया । श्रीप्रभु ने कहा – “राघव के घर आकर, उन्हें देखकर मैं सब दुःख भूल गया। गंगा में स्नान करने से जो सन्तोष होता है वही सुख मुझे राघव के घर में आकर मिला।”

श्री राघव पण्डित द्वारा प्रगाढ़ भक्ति से पकाये हुये द्रव्य भोजन करने के लिये श्रीमन्महाप्रभु स्वयं उनको बनाने के लिए आदेश देते थे और राघव पण्डित भी परम उत्साह के साथ बहुत प्रकार के द्रव्य बनाकर महाप्रभु को खिलाते थे। बलदेवाभिन्न स्वरूप नित्यानन्द प्रभु भी अपने जनों के साथ राघव पण्डित के घर आते और उनके द्वारा बनाये गये द्रव्यों का भोजन करते और उनकी रसोई की खूब प्रशंसा करते । श्रीमन्महाप्रभु की इच्छा से श्रीगदाधरदास, श्री पुरन्दर पण्डित, श्री परमेश्वरी दास, श्री रघुनाथ वैद्य इत्यादि परम वैष्णव भी पाणिहाटी में श्रीराघव के घर आये थे।

उस समय श्रीगौरसुन्दर ने श्रीराघव पण्डित को अलग से एकान्त में उपदेश दिया था कि वह उन्हें और नित्यानन्द प्रभु को अभिन्न समझे। श्रीमन्महाप्रभु ने मकरध्वज कर को श्री राघव पण्डित की सेवा करने का निर्देश करते हुए कहा था कि राघव पण्डित की सेवा ही मेरी सेवा है। मकरध्वज कर राघव पण्डित के कृपापात्र शिष्य थे। इनका जन्म कायस्थ कुल में हुआ था और वे भी पाणिहाटी में ही रहते थे। वे गुरदेव की आज्ञा का पालन करते हुए उनके द्वारा दिये गये द्रव्यों की झाली लेकर प्रत्येक वर्ष पुरी जाते थे। श्री मकरध्वज कर हर समय उस झाली की रक्षा करते थे। यह लीला श्रीचैतन्य चरितामृत में अन्त्यलीला के दशम परिच्छेद में वर्णित हुई है। राघव की बहन दमयन्ती महाप्रभु की सेवा के लिये एक पात्र में दो महीने तक के लिए खाद्य द्रव्य सजा कर देती थी। यही ‘राघव की झाली’ के नाम से प्रसिद्ध थी। अभिराम ठाकुर द्वारा लिखे ‘पाटपर्यटन’ एवं श्रील कविराज गोस्वामी द्वारा लिखित ‘श्रीचैतन्य चरितामृत’ में यह विषय सुन्दर रूप से वर्णित हुआ है –

पाणिहाटी ग्रामे राघव-दमयन्ती धाम।
राघवेर झालि बलि आछये आख्यान॥
-(पाटपर्यटन)

राघव पण्डित प्रभुर आद्य अनुचर।
ताँर शाखा मुख्य एक मकरध्वज कर॥
ताँहार भगिनी दमयन्ती प्रभुर प्रियदासी ।
प्रभुर भोग सामग्री ये करे बारमासि॥
से सब सामग्री यत झालिते भरिया ।
राघव लइया यान गुपतकरिया॥
बारमास ताहा प्रभु करेन अंगीकार ।
राघवेर झालि’ बलि प्रसिद्धि याहार॥
चै.च.आ. 10/24-27

चलिलेन श्रीराघव पण्डित उदार
गुपते याँर घरे हैल चैतन्य-विहार॥
चै.भा.अ. 8/32

श्रीलकृष्णदास कविराज गोस्वामी ने श्रीचैतन्य चरितामृत की अन्त्यलीला के दसवें परिच्छेद में राघव की झाली का विवरण विस्तृत रूप से वर्णन किया है। व्रजवासी के शुद्धसत्त्वमय विशुद्ध प्रेम में ऐश्वर्य देखने को नहीं मिलता। स्वयं भगवान श्रीगौरांग महाप्रभु का पेट खराब हो सकता है, इस भय से दमयन्ती शुक्ता नामक व्यन्जन बना कर महाप्रभु को परोसती थी। इस प्रकार स्नेह से दिये द्रव्य से महाप्रभु जी को उल्लास होता था।

राघव पण्डित चले झालि साजाइया ।
दमयन्ती यत द्रव्य दियाछे करिया॥
नाना अपूर्व भक्ष्य द्रव्य प्रभुर योग्य भोग।
वत्सरेक प्रभु याहा करे उपयोग॥
चै.च.अ. 10/13 – 14

भाव ग्राही महाप्रभु स्नेहमात्र लय ।
शुक्तापाता – काशन्दिते महासुख हय॥
मनुष्य बुद्धि दमयन्ती करे प्रभुर पाय।
गुरु, भोजने उदरे कभु ‘आम’ हइया याय॥
शुक्ता खाइले सेइ आम हइवेक नाश।
सेइ स्नेह मने भावि’ प्रभुर उल्लास॥
– चै.च.अ. 10/18-20

श्री राघव पण्डित भी श्रीमन्महाप्रभु के लिए उन सब द्रव्यों को एक पेटिका में सजाकर साथ ले चले, जो दमयन्ती ने उन्हें दिये थे। उस झाली में क्या – क्या पदार्थ श्रीराघव पडित ले जाते थे, उनका वर्णन करते हैं – अनेक प्रकार के खाद्यपदार्थ श्री महाप्रभु के खाने योग्य उस झाली में होते थे, जिनको प्रभु वर्ष पर्यन्त उपभोग करते रहते थे। श्रीमन्महाप्रभु भावग्राही हैं, वे केवल प्रेम को ही ग्रहण करते हैं। सुकुता के पत्तों एवं कासुन्दी में ही वे महासुख अनुभव करते हैं, दमयन्ती (शुद्ध प्रेमभक्ति के कारण) श्री महाप्रभु में मनुष्य – बुद्धि रखती थी और सोचती थी कि भारी भोजन करने से प्रभु के उदर में यदि आंव पैदा होगी, तो सुकुताचूर्ण खाने से उदर की आंव नष्ट हो जाएगी। दमयन्ती के बस इसी शुद्ध प्रेम के कारण श्री महाप्रभु बहुत आनन्दित होते थे । श्री राघव पण्डित के शुद्ध प्रेम के वशीभूत होकर श्रीमन्महाप्रभु ने राघव की प्रेमनिष्ठा के बारे में पुरुषोत्तम धाम में अपने भक्तों के सामने परमोल्लास के साथ वर्णन करके सुनाया था जो कि श्री चैतन्य चरितामृत की मध्यलीला के 15वें अध्याय में वर्णित हैं। अपने घर में सैकड़ों नारियल के वृक्ष होते हुए भी पण्डित दूर-दूर से अधिक मूल्य में नारियल खरीद कर नारियल का जल और उसके भीतर का शस्य महाप्रभु को निवेदन करते थे। यही नहीं, महाप्रभु को निवेदन करके स्वयं महाप्रेमाविष्ट हो जाते थे। महाप्रभु भी उनके द्वारा दिए सब द्रव्य ग्रहण करते थे। वे किसी भी अशुद्ध द्रव्य का भोग नहीं लगाते थे। एक बार एक सेवक ने पहले ज़मीन पर हाथ लगाने के बाद फल को पकड़ा तो इन्होंने सोचा कि इस फल पर बाहर के लोगों की पैरों की धूलि का स्पर्श हो गया है, जिससे यह फल अपवित्र हो गया है। अतः राघव ने उस फल को अपवित्र समझ कर घर की चारदीवारी से बाहर फेंक दिया। राघव पण्डित महाप्रभु के भोग के लिए अच्छे-अच्छे मीठे केले, आम व कटहल इत्यादि फल दूर – दूर के गांव से बहुत मूल्य चुका कर लाते थे। राघव पण्डित के फल फेंकने के सम्बन्ध में किसी के मन में सन्देह हो सकता है, ये सोचकर श्रीभक्ति सिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने अपने अनुभाष्य में इस विषय के प्रति सावधान किया है – श्री राघव पण्डित कोई ‘जड़ीय शुचिवायु रोग ग्रस्त’ कर्मजड़ व्यक्ति या प्राकृत कनिष्ठ भक्त की तरह द्वैतबुद्धि विशिष्ट बनकर ‘भौमे इज्यधी’ अर्थात जड़ वस्तु पर चिद् आरोपण करने वाले मनोधर्मी नहीं थे। वे तो नित्य सिद्ध कृष्ण सेवक थे। जड़ीय कामगन्ध विहीन अप्राकृत सेवाभाव में मग्न रहते हुये अनुक्षण अपने आराध्य की सेवा करते थे ।
– चै.च.म. 14/81 – 83

जब श्रीमन्महाप्रभु के आदेश के अनुसार शुद्ध भक्ति के प्रचार के लिये अपने पार्षदों के साथ श्रीमन् नित्यानन्द प्रभु नीलाचल से गौड़देश में आये तो गौड़fदेश में भ्रमण करते समय पाणिहाटी में श्री राघव पण्डित के विशुद्ध प्रेम से आकृष्ट होकर उन्होंने इनके घर पर ही शुभपदार्पण किया था । तब श्रीनित्यानन्द के पार्षद श्रीमाधव, श्रीगोविन्द और श्रीवासुदेव घोष, ये तीनों ही श्रेष्ठ कीर्तनिया भाई भी वहां उपस्थित हो गये। उनके कीर्तन से भावाविष्ट होकर नित्यानन्द प्रभु नृत्य कीर्तन करने लगे और नृत्य के अन्त में भावाविष्ट होकर विष्णु भगवान के सिंहासन पर बैठ गये। नित्यानन्द को सिंहासन पर बैठे देख राघव पण्डित ने पार्षदों सहित श्री नित्यानन्द प्रभु का महाभिषेक किया। महाभिषेक के पश्चात दिव्यमाला और वस्त्रादि के द्वारा शोभित होकर नित्यानन्द प्रभु पुनः सिंहासन पर विराज गये और राघव पण्डित उनके बगल में छत्र धारण कर खड़े हो गये। उस समय एक अलौकिक घटना इस प्रकार घटी कि प्रेमाविष्ट होकर नित्यानन्द प्रभु ने राघव पण्डित को कदम्ब के फूलों की माला लाने का आदेश दिया। तो राघव पण्डित ने उन्हें बताया कि अभी तो कदम्ब वृक्ष के फूल फूटने का समय ही नहीं है। तब नित्यानन्द प्रभु ने राघव पण्डित को कहा कि अपने घर में जाकर खोजो, फूल मिल जायेंगे । राघव पण्डित घर में गये तो जम्बीर के वृक्ष पर कदम्ब के फूल देखकर अत्यन्त विस्मित हो गये। जल्दी-जल्दी उन्होंने कदम्ब के फूलों को पेड़ से उतारा और उनकी माला तैयार करके नित्यानन्द को पहनायी। कुछ समय के बाद दमनक पुष्प की सुगन्ध से सारी दिशायें महक उठीं तो नित्यानन्द प्रभु ने कहा कि श्रीगौरसुन्दर दमनक फूलों की माला पहन कर कीर्तन श्रवण करने के लिये नीलाचल से यहाँ आये हैं। नरहरि चक्रवर्ती ठाकुर ने भक्ति रत्नाकर ग्रन्थ में इस अद्भुत नृत्यकीर्तन लीला का उल्लेख किया है

प्रथमेइ नित्यानन्द प्रियगण संगे।
पाणिहाटी ग्रामेते आइला महारंगे॥
राघव पण्डित, श्रीमकरध्वज कर।
सबार हइल महाउल्लास-अन्तर॥
राघव पण्डित गृहे ये नृत्यकीर्तन ।
ताहा वर्णिवार शक्ति धरें कोन् जन ॥
भ.र. 12/3645 – 47

रामदास, गदाधर दासादि सहित ।
पाणिहाटी ग्रामे प्रभु हैला उपनीत।
प्रथमे राघव पण्डितेर आलयेते ।
संकीर्तनारम्भ सुख व्यापिल जगते।
महाभक्त राघवेर जनम तथाई ।
भक्त- जन्म स्थानेर महिमा अन्त नाई ॥
भ.र. 8/156-58

श्रीमन् नित्यानन्द प्रभु के आदेश से रघुनाथ दास गोस्वामी ने जिस समय पाणिहाटी में गंगा के किनारे दही और चिड़वे का महोत्सव किया था, उस समय राघव पण्डित (निःसक्ड़ि) दही ,खीर ,पनीर ,पूरी व पकौड़े आदि प्रसाद के साथ वहाँ उपस्थित हुए थे और वहाँ नित्यानन्द प्रभु की पुलिन भोजन-लीला देखकर विस्मित हो उठे थे। दही – चिड़ावे के महोत्सव के बाद नित्यानन्द ने कुछ समय वहां विश्राम किया तथा विश्राम करने के पश्चात सायँ काल के समय वे श्रीराघव पण्डित के प्रेम से आकर्षित होकर उनके घर चले गये और वहां जाकर उन्होंने नृत्य आरम्भ कर दिया। नित्यानन्द प्रभु के दर्शनों के लिये वहां श्रीगौरांग महाप्रभु का आविर्भाव हुआ। राघव पण्डित के सौभाग्य को प्रदर्शन करते हुए राघव पण्डित के घर में श्रीमन् महाप्रभु और नित्यानन्द प्रभु आसन पर बैठ गये तथा दोनों ने आसनों पर बैठ कर राघव पण्डित द्वारा प्रदत्त अमृत के समान पिठापायस, शैला – चावल और विविध व्यन्जनादि समस्त द्रव्य परम तृप्ति के साथ सेवन किए। राघव पण्डित ने स्नेह परवश होकर महाप्रभु का अवशेष प्रसाद रघुनाथ दास गोस्वामी को प्रदान किया।

श्रीपुरुषोत्तम धाम में गुन्डिचा मन्दिर मार्जन लीला में, श्रीजगन्नाथ देव की रथयात्रा में एवं जलकेलि लीला में राघव पंडित महाप्रभु के साथ ही थे। रथ के आगे सात संकीर्तन के टोलों में से प्रथम टोले में स्वरूप दामोदर मूल गायक थे जबकि श्रीमद् अद्वैताचार्य नृत्य करने वाले थे एवं पांच दोहार देने वालों में से राघव पण्डित भी एक थे। श्रील भक्ति सिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने श्रीचैतन्य चरितामृत के अनुभाष्य में श्रीराघव पण्डित की समाधि के विषय में उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है कि “राघव पण्डित जी की समाधि के ऊपर लताकुंजों से घिरी एक ऊँची वेदी बांधी गयी है। जिस स्थान पर समाधि है उसके उत्तर की तरफ टूटे – फूटे मकान में बड़ी लापरवाही के साथ सेवित श्रीमदनमोहन का विग्रह विराजमान है। पाणिहाटी के वर्तमान ज़िमींदार श्रीशिवचन्द्र राय चौधरी की देख-रेख में सेवा की व्यवस्था चल रही है ।”
-चै.च.आ 10/24

श्रील प्रभुपाद ने 1932 में ये अनुभाष्य लिखा था। तब जो अवस्था थी अब वह अवस्था नहीं है। अब तो नया मंदिर बन गया है तथा कई नये कमरे आदि भी बन गये हैं।