शुक्लाम्बरो ब्रह्मचारी पुरासीद्यज्ञपत्निका।
प्रार्थयित्वा यदन्नं श्रीगौरांगो भुक्तवान् प्रभुः।
केचिदाहुर्ब्रह्मचारी याज्ञिक ब्राह्मणः पुरा॥
गौ. ग. 191

पहले जो यज्ञपत्नी थीं, वही अब श्रीशुक्लाम्बर ब्रह्मचारी हैं। श्रीगौरांग महाप्रभु ने इनसे अन्न मांगकर भोजन किया था। कोई-कोई कहते हैं कि यह पहले याज्ञिक ब्राह्मण थे।

इनका नाम भी श्रीचैतन्यशाखा में है। यह नवद्वीप के रहने वाले थे। भले ही ये गरीब भिक्षुक ब्राह्मण की लीला कर रहे थे, परन्तु श्रीमन्महाप्रभु में इनकी गाढ़ प्रीति थी। सांसारिक व्यक्तियों को एक दरिद्र भिक्षुक के रूप से दिखने पर भी यह भगवद्प्रेमिक भक्त होने के कारण तात्त्विक विचार से धनी थे।

प्रेमधन बिना व्यर्थ दरिद्र जीवन।
दास करि वेतन मोरे देह प्रेमधन॥
चै.च.अ. 20/37

अर्थात् प्रेमधन के बिना ये दरिद्र जीवन व्यर्थ है, मुझे अपना दास बनाकर वेतन के रूप में अपना प्रेमधन दे दीजिये।

श्रीवृन्दावन दास ठाकुर द्वारा रचित ‘श्रीचैतन्यभागवत’ ग्रन्थ में श्रीशुक्लाम्बर ब्रह्मचारी के सम्बन्ध में श्रीमन्महाप्रभु की उक्ति है-

दरिद्र सेवक मोर तुमि जन्म जन्म ।
आमारे सकल दिया तुमि भिक्षु धर्म॥
आमिह तोमार द्रव्य अनुक्षण चाई ।
तुमि ना दिलेओ आमि बल करि खाई ॥
चै .भा.म. 16/122-23

अर्थात् तुम तो जन्म-जन्म से मेरे दरिद्र भक्त हो। संसार में प्रवेश कर तुम्हारी गृहस्थी होने की वासना नहीं है। तुम तो ब्रह्मचारी रूप से द्वार-द्वार में भिक्षा करके मुझको अपनी भिक्षा के सब द्रव्य अर्पण करते हो। तुम नैष्ठिक ब्रह्मचारी हो। गृहस्थ और वानप्रस्थ का जो प्राकृत शाब्दिक अहंकार है, उससे भी तुम निर्मुक्त हो। तुमने तो पारमहंस्यधर्म में अवस्थित होकर अकिंचन तूर्याश्रम वर्ण को ग्रहण किया है। इसलिये तुम पूर्ण शरणागत त्रिदण्डि भिक्षु हो। तुम कायमनोवाक्य द्वारा अपनी सम्पूर्ण चेष्टाओं को सम्पूर्ण भाव से मुझे अर्पण करने में समर्थ हुये हो। मैं तो सब समय तुम्हारे द्वारा अर्पित द्रव्यों की मांग करता हूं। मुझे समर्पण करने के इलावा तुम्हारी दूसरी किसी भी वस्तु में भोग बुद्धि नहीं है। इसलिये मैंने अपनी ताकत को प्रदर्शित करके तुम्हारे सर्वस्व को छीन लिया है, जिस कारण तुम गरीब हो।

शुक्लाम्बर ब्रह्मचारी बड़ भाग्यवान्।
याँर अन्न मागि’ काड़ि’ खाइला भगवान्॥
चै.च.आ. 10/38

जब श्रीमन्गहाप्रभु गया से नवद्वीपधाम में लौटकर आये तब श्रीशुक्लाम्बर ब्रह्मचारी के घर में ही भक्तों के साथ आकर मिले थे।

श्रीमान पण्डित चलिलेन गंगातीरे।
शुक्लाम्बर ब्रह्मचारी ताहान मन्दिरे॥
शुनिया ए सब कथा प्रभु गदाधर।
शुक्लाम्बर – गृह – प्रति चलिला सत्वर॥
कि आख्यान कृष्णेर कहेन शुनि गिया।
थाकिलेन शुक्लाम्बर- गृहे लुकाइया॥
सदाशिव, मुरारि, श्रीमान्, शुक्लाम्बर।
मिलिला सकल यत प्रेम – अनुचर॥
हेनइ समये विश्वम्भर द्विजराज।
आसिया मिलिला हेथा वैष्णव समाज॥
चै.भा.म. 1/78-82

अर्थात् श्रीमान पण्डित, गंगा तट पर, जहां श्रीशुक्लाम्बर ब्रह्मचारी की कुटिया थी, वहां पहुंचे। यह सुनकर गदाधर प्रभु भी शीघ्रता से श्रीशुक्लाम्बर के घर की ओर चल पड़े। ‘श्रीकृष्ण का क्या चरित कहते है, जाकर सुनूं तो’ – ऐसा विचार करके वे श्रीशुक्लाम्बर के घर में जाकर छिपकर बैठ गये। फिर श्रीसदाशिव, श्रीमुरारिगुप्त, श्रीमान आदि प्रेमी भक्तजन शुक्लाम्बर से मिले। इसी समय द्विजराज विश्वम्भर भी वैष्णव समाज से आ मिले।

श्रीगदाधर पण्डित, श्रीसदाशिव, श्रीमुरारि, श्रीवास पण्डित, श्रीमान् पण्डित – भक्तगण शुक्लाम्बर ब्रह्मचारी के घर महाप्रभु के अद्भुत प्रेम विकार को देखकर विस्मित हुये थे।

श्रीशुक्लाम्बर ब्रह्मचारी प्रतिदिन भिक्षा से जो भी द्रव्य प्राप्त करते, वह श्रीकृष्ण को अर्पण करके उनके अवशेष को ग्रहण करते तथा उसके द्वारा अपने जीवन का निर्वाह करते थे। सब समय श्रीकृष्ण के नाम गुणकीर्तन में मस्त रहने के कारण उनको अपनी दरिद्रता का जरा सा भी दुःख न होता था। बर्हिमुख व्यक्ति उनको एक साधारण भिक्षुक ही समझते थे। श्रीचैतन्य महाप्रभु की कृपा के बिना उनके सेवकों को भी कोई नहीं पहचान सकता। एक दिन क्या हुआ कि महाप्रभु प्रेमावेश में बैठे हुये थे और उसी समय श्रीशुक्लाम्बर ब्रह्मचारी भिक्षा का झोला कन्धे पर लिये महाप्रभु के सामने आकर कृष्णप्रेम में नाचने लगे। श्रीशुक्लाम्बर ब्रह्मचारी का भाव देखकर महाप्रभु प्रसन्न हो उठे। वे श्रीशुक्लाम्बर ब्रह्मचारी के गुणों का बखान करते-करते उनकी झोली से मुट्ठी भर-भर के चावल लेकर चबाने लगे। यह देखकर कि महाप्रभु ये छोटे-छोटे कण मिले हुए चावल खा रहे हैं श्रीशुक्लाम्बर अपराध के डर से व्याकुल से हो उठे, परन्तु महाप्रभु ने उनको आश्वस्त करके समझाया कि वे तो रोज ही भक्तों के द्रव्यों को परम आग्रह के साथ ग्रहण करते हैं जबकि वे अभक्त के द्रव्यों पर तो निगाह ही नहीं देते। श्रीशुक्लाम्बर के प्रति महाप्रभु की कृपा देखकर भक्तगण प्रसन्न हो उठे। महाप्रभु ने श्रीशुक्लाम्बर को प्रेमभक्ति का वर प्रदान किया।

प्रभु बले – ‘शुन शुक्लाम्बर -ब्रह्मचारी।
तोमार हृदये आमि सर्वदा विहरि॥
तोमार भोजने हय आमार भोजना।
तुमि भिक्षाय चलिले, आमार पर्यटन॥
प्रेमभक्ति बिलाइते मोर अवतार।
जन्म – जन्म तुमि प्रेमसेवक आमार॥
तोमारे दिलाम आमि प्रेम भक्ति -दान।
निश्चय जानिह ‘प्रेम – भक्ति’ मोर- प्राण॥
शुक्लाम्बर वर शुनि’ वैष्णव मण्डल।
जय जय हरि ध्वनि करिल सकल॥
चै.भा.म. 16/134 – 38

अर्थात् प्रभु बोले – ‘शुक्लाम्बर ब्रह्मचारी! सुनो, तुम्हारे हृदय में मैं सदा विहार करता हूं। तुम्हारे भोजन करने में मेरा भोजन होता है और तुम्हारे भिक्षा के लिए भ्रमण में मेरा भ्रमण होता है। प्रेम- भक्ति वितरण करने के लिए मेरा अवतार है। तुम मेरे जन्म-जन्म के प्रेमी सेवक हो। तुमको मैंने प्रेम – भक्ति दी। यह निश्चय जानो कि प्रेम- भक्ति मेरा प्राण है’ शुक्लाम्बर के लिए वरदान को सुनकर सब वैष्णव-मण्डल ‘जय-जय’ ‘हरि बोल’ ‘हरि बोल’ की ध्वनि करने लगा।

संकीर्तनावेशे प्रभु वैसे ए खट्टाय।
भिक्षा करि शुक्लाम्बर आइला एथाय॥
महाप्रीते प्रभु से झुलिते हात दिया।
खायेन तण्डुल ता’रे ‘सुदामा’ बलिया॥
कत दैन्य करि ब्रह्मचारी शुक्लाम्बर।
झुलि कांधे कीर्तने नाचये मनोहर॥
श्रीशुक्लाम्बरेर प्रेम चेष्टा निरखिते।
गण सह प्रभुर आनन्द वाद चिते॥
श्रीवास आलये प्रभु एछे विलसिया।
नगर – भ्रमणे चले निजगृहे गिया॥
– भक्त्तिरत्नाकर 12/2754-58

श्रीचैतन्यभागवत ग्रन्थ में (मध्यखण्ड 16वां अध्याय) भी श्रीशुक्लाम्बर ब्रह्मचारी के प्रेम से आकृष्ट होकर उनके पकाये हुये अन्न को ग्रहण करने की श्रीमन्महाप्रभु की लीला – कथा वर्णित हुई है। श्रीमन्महाप्रभु ने जब श्रीशुक्लाम्बर ब्रह्मचारी से अन्न ग्रहण करने की इच्छा व्यक्त की तो श्रीशुक्लाम्बर डरे और संकुचित हो उठे। कारण, उनको चिन्ता हो गई कि भिक्षा से प्राप्त चावल तो अपवित्र हैं जोकि महाप्रभु के भोग में निवेदित होने के योग्य नहीं हैं। किन्तु श्रीमन्महाप्रभु के बार-बार मांगते रहने से वे मज़बूर हो गये और भक्तों से इसका विधान पूछने लगे। भक्तों ने श्रीशुक्लाम्बर के भाग्य की प्रशंसा की और बड़ी शुद्धता के साथ रसोई बनाकर देने के लिए कहा। श्रीशुक्लाम्बर ने स्नानादि का काम पूरा किया और चूल्हे पर पात्र में जल को खूब गर्म करके उसमें बड़ी शुद्धता के साथ चावल और थोड़ (केले के बीच का डंडा, जिसकी सब्जी बनायी जाती है) डालकर बड़े भाव के साथ हरिनाम करने लगे। भक्त के अन्न पर लक्ष्मी देवी की कृपादृष्टि पड़ी। श्रीमन्महाप्रभु ने भक्तों के साथ श्रीशुक्लाम्बर के घर आकर अपने हाथों से उसी अन्न को विष्णु जी को निवेदन किया और भोजन के समय उस अन्न का अपूर्व आस्वादन करने लगे। श्रीशुक्लाम्बर के प्रति महाप्रभु के इस स्नेह को देखकर भक्तों की आंखों में बरबस आँसू भर आये।

शुक्लाम्बर प्रति देखि’ कृपार वैभव।
कान्दिते लागिला अन्योऽन्ये भक्त सब॥
एइमत प्रभु पुनः पुनः आस्वादिया।
करिलेन भोजन आनन्दयुक्त हइया॥
ये प्रसाद पायन भिक्षुक शुक्लाम्बर।
देखुक अभक्त यत पापी कोटीश्वर॥
धने जने पाण्डित्ये चैतन्य नाहि पाइ।
‘भक्तिरसे वश प्रभु’ सर्वशास्त्रे गाइ॥
चै.भा.म. 26/28 – 31

अर्थात् श्रीशुक्लाम्बर के प्रति प्रभु की ऐसी विशेष कृपा को देखकर अन्य सब भक्त आनन्द के आँसू बहाने लगे। इस प्रकार प्रभु ने पुनः-पुनः आस्वादन करते हुए बड़े आनन्दित होकर भोजन किया। जो प्रसाद (कृपा) एक भिक्षुक शुक्लाम्बर को प्राप्त हुआ, उसे पापी – अभक्त करोड़पति होने पर भी प्राप्त नहीं कर सकते। जरा लोग देख तो लें कि धन, जन, पाण्डित्य से श्रीचैतन्यदेव प्राप्त नहीं होते। भक्तिरस के ही वशीभूत हैं प्रभु – यही चारों वेद गाते हैं।

श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर ज ने इस विषय को अपने गौड़ीय भाष्य में इस प्रकार लिखा है – ‘यज्ञेश्वर विष्णु जी ब्रह्मा के पवित्र यज्ञ में भोजन करते है। श्रीशुक्लाम्बर ब्रह्मचारी विभिन्न स्थानों से भिक्षा इकट्ठी करते थे। बाहर में देखने से वह चावल स्पर्शदोषादि से युक्त थे। भिक्षा से अनेक बार ऐसा होता है कि साबुत चावल इकट्ठे नहीं होते, जिस कारण गृहस्थी लोग भिक्षुक के छुये हुये द्रव्यों को ग्रहण नहीं करते हैं। यह सच है कि साबुत चावल स्पर्शदोष से युक्त चावलों की अपेक्षा पवित्र हैं, किन्तु भिक्षा में मिले चावल तो उससे भी ज्यादा पवित्र हैं, क्योंकि वह तो भगवत्कृपा से मिला हुआ दान है। बाहरी दृष्टि से उसमें स्पर्शदोषादि या मर्यादा -पथ का उल्लंघन नहीं दिखता, किन्तु श्रीगौरसुन्दर के प्रवर्तित विचार के अनुसार महाप्रसाद में हृदय की पवित्रता ही प्रधान प्रयोजनीय विषय है।

एक करोड़ मुद्राओं का मालिक होने पर ही भगवान को भोजन कराया जा सकता है, ऐसी बात नहीं है। निर्धन शुक्लाम्बर ने भिक्षा वृत्ति से इकट्ठे किये हुये चावलों के द्वारा श्रीगौरसुन्दर को तृप्त किया था। भक्तिहीन पापी सम्प्रदाय के लोग ये सब बातें नहीं समझ सकते हैं।

हरिषे चलिला शुक्लाम्बर ब्रह्मचारी याँर अन्न मागि खाइलेन गौरहरि॥
चै.भा.अ. 8/23

एक दिन प्रभु अन्न मागि शुक्लाम्बरे।
एइ पथे गणसह गेला तार घरे॥
कि बलिब – एथा महा – कौतुक बाड़िल।
भुंजिलेन प्रभु, शुक्लाम्बर पाक कैल॥
भक्तिरत्नाकर 12/3467-68