सप्तम दिवस
(२४ अगस्त १९३५, शनिवार)

“जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट्
तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यत् सूरयः।
तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा
धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि॥”

हम उस परमेश्वर-तत्व का ध्यान करते हैं, जो वास्तविक सत्य हैं; जो अपने धाम की किरणों द्वारा सर्वदा बद्धजीवों की वासना-कपटता का निवारण करते हैं। “उस परम सत्य परमेश्वर का हम सब मिलकर ध्यान करें”—यह बात जो कह रहे हैं, वे संप्रदाय-प्रवर्तक श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासदेव हैं। वे समस्त अनुगत-मंडली के साथ ध्यान करने हेतु प्रवृत्त हुए हैं, अकेले नहीं।

‘ध्येय’ वस्तु में उद्दिष्ट पदार्थ का बहुत्व (अनेकता) नहीं है, एक ही वस्तु उद्दिष्ट है; किंतु ध्यान करने वाले अनेक हैं। जब सभी प्रकार के आवरण दूर हो जाते हैं, तब सर्वदा ध्यान संभव होता है। ‘ध्यान’ शब्द का तात्पर्य किसी एक क्षणभंगुर, सीमित वस्तु का ध्यान नहीं है, बल्कि परमेश्वर का ध्यान है। परमेश्वर के ध्यान और उनके अधीन वश्य-वस्तु के ध्यान में अंतर है। वैकुंठ-वस्तु का ध्यान सीमाबद्ध वस्तु के ध्यान के समान नहीं है; ये (सांसारिक वस्तुएं) भोग्य हैं, और वे (परमेश्वर) सेव्य-तत्व हैं। सर्वेंद्रियों द्वारा पूर्ण भाव से सेवा करने का विचार ही ध्यान में निहित है।

ध्यान की निष्ठा जब आनुषंगिक विषयों में बहिर्जगत के अधिष्ठान के साथ मिलती है, तब वह विपर्यस्त (भ्रष्ट) हो जाती है। ध्यान का पूर्ण-वस्तु होना आवश्यक है; जहाँ ध्येय-वस्तु में अपूर्णता है, वहाँ ध्यान में भी अपूर्णता रहती है। उसकी पूर्ति के लिए ही यज्ञ और अर्चन-विधि है। किंतु कीर्तन के सम्मुख ध्यान की परिपूर्णता होती है।

वह ध्येय-वस्तु केवल वैचित्र्यपूर्ण जगत मात्र नहीं है। यह जगत नश्वर है और वैकुंठ नित्य—कपटता-रहित (निरस्तकुहक) सत्य-तत्व है। जब तक धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष के अधिकारी धाम का प्रकाश नहीं होता, तब तक ध्यान की पूर्णता नहीं होती; केवल आंशिक स्मृति मात्र उदित होती है।

ध्येय-वस्तु परमेश्वर हैं। ‘परमेश्वर’ कहने पर केवल शक्ति-परिणत त्रिगुणात्मक भोग्य जगत या जगत के प्रभु मात्र—इतने ज्ञान में ही आबद्ध रहना उचित नहीं है। तब जगन्नाथ-तत्व परमेश्वर से पृथक हो जाते हैं। जीव की मलिन धारणा में जो ज्ञान है, वह अपूर्ण धर्मयुक्त है। इसलिए संबंध-ज्ञान के विचार में जन्म-स्थिति-प्रलय की घटना जिनसे अन्वय और व्यतिरेक क्रम से ग्रहण की जाती है, केवल उतनी शक्ति का परिचय मात्र ही नहीं है; यह तो गौण शक्ति है। जहाँ चेतन-जगत का प्राकट्य, नित्यता, अखंड आनंद है—वह आनंदरस-धाम, वैचित्र्ययुक्त लीलामय का धाम—इस जगत की विचार-धारा से बोधगम्य नहीं है।
मानव-ज्ञान के विचार में उच्चाकांक्षा विद्यमान रहती है। इसमें केवल ‘अल्प से वृहत्’ की ओर दौड़ने का ही विचार है; किंतु जो अपनी शक्ति से वृहत् को आपेक्षिक लघुता में परिणत कर सकते हैं, उनकी बात जगत के लोग नहीं जानते। विशाल को संकुचित करके मध्यम रूप में अवस्थित रखने की शक्ति उनमें है। जागतिक दृष्टि से श्रेष्ठता का अभाव होगा—ऐसा सोचकर जो लोग भगवान की ऐसी शक्ति को अस्वीकार करते हैं, वे भगवान की अवज्ञा करते हैं।

“अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥”

काव्य-शास्त्रों में जो समस्त जड़-रस वर्णित हैं, यदि वे (परमेश्वर) केवल उसके गम्य-पदार्थ होते, तो हमारी ग्राह्य-वस्तु बन जाते; किंतु वे ‘भूमा’ (अनंत) हैं। अधोक्षज होने पर भी उस धर्म के सुवृहत् रूप को संकुचित करने की शक्ति उनमें है। वह माधुर्य-विग्रह स्वयंरूप वस्तु की तुलना में ब्रह्मत्व या परमात्मा की व्यापकता कोई बड़ी चीज़ नहीं है। ऐश्वर्य की व्यापकता उनमें मलिनता प्राप्त करती है, वे ऐसे माधुर्यमय तत्व हैं।

‘ईश्वर’ शब्द से ब्रह्मा, परमात्मा आदि का बोध हो, किंतु ‘परमेश्वर’ शब्द केवल श्रीकृष्ण को ही सूचित करता है। भगवान अखिलरसामृतमूर्ति हैं। उन्हीं का रचा हुआ यह विश्व है; इसके अतिरिक्त अन्य कोई जगत नहीं है—मानव की ऐसी धारणा में आंशिक धर्म या अपूर्णता विद्यमान है। विचार की मूढ़तावश जहाँ ‘परमभाव’ को जानने का अभाव देखा जाता है, वहाँ जड़ता का आश्रय लेकर मिश्र-चेतन धर्म में स्थिति होती है।

गौण शक्ति—अर्थात् माया-शक्ति द्वारा परिणत जगत की प्रधानता को अस्वीकार करते हुए, वैकुंठ के वैचित्र्य की प्रधानता बताने वाले संबंध-ज्ञान का परिचय हम आदि-श्लोक में लक्षित करते हैं।

‘विश्व’ नाम की जो वस्तु है, मनुष्य जिसका स्वयं को भोक्ता मानता है, वह केवल उनसे ही उद्भूत है, उन्हीं में स्थित है और कुछ समय पश्चात नश्वरता के अधीन होकर परिवर्तित या नष्ट हो जाती है।

यह कर्मभूमि है; केवल इहलौकिक व्यक्ति ही कर्म की प्रधानता का विचार करते हैं। कर्म की तुलना में नैष्कर्म्यवाद उच्च है, किंतु वह भी आर्थिक (भौतिक) संप्रदायों के महत्व-ज्ञान की उच्च सीमा पर नहीं है; पारमार्थिक जनों का विचार ही सर्वश्रेष्ठ है। वे कर्म की नश्वरता से भली-भांति परिचित हैं।

“कर्मणां परिणामित्वादाविरिञ्च्यादमङ्गलम्।
विपश्चिन्नश्वरं पश्येददृष्टमपि दृष्टवत्॥”

लौकिक इंद्रियाँ—नेत्र, कर्ण, नासिका, जिह्वा और त्वचा द्वारा जो निर्णय करती हैं, उनके द्वारा हम स्वयं को कर्म का कर्ता मानकर सुख-दुःख का अनुभव करते हैं। उसमें दुःख का त्याग और सुख का आह्वान करने की आवश्यकता होती है। सुखानुभूति कैसे प्राप्त हो? उसके लिए ज्ञान प्राप्त करने की वासना में ‘वृहत्-धर्म’ संलग्न रहता है। ऐश्वर्य-सूचक वृहत् के विचार की तुलना में माधुर्य ही श्रेष्ठ है। ह्लादिनी शक्ति के पूर्ण विकास को प्राप्त करने की आवश्यकता को ही माधुर्य कहते हैं।

ह्लादिनी शक्ति हमारे भीतर अति सूक्ष्म रूप में विद्यमान है। “मैं भोक्ता हूँ”—इस विचार से जो आनंद-संग्रह की पिपासा हममें आती है, वह ह्लादिनी शक्ति के न्यूनाधिक रूप से संकटग्रस्त होने पर होती है; किंतु जिनकी यह ह्लादिनी शक्ति है, उनके संसर्ग में सेवा-वैचित्र्य में ही ह्लादिनी का पूर्ण विकास दृष्टिगोचर होता है।

सीमाबद्ध (मापा हुआ) धर्म जड़-जगत से जुड़ा है, उससे उद्धार पाना चाहिए। “हम भोक्ता हैं, जगत भोग्य है”—इस विचार में प्रवंचना (धोखा) निहित है। “दूसरों का भोग मेरी ओर आ जाए”—यही तो प्रवंचना है। पूर्ण भोग ग्रहण करने का सामर्थ्य केवल परम वास्तविक वस्तु (भगवान) में ही है। “सब कुछ उन्हीं तक पहुंचे”—यह विचार होने पर “मैं भोक्ता हूँ” का यह अभिमान दूर हो जाता है।

हमारी परीक्षा हेतु—हमारे मंगल के लिए ही यह विश्व-दर्शन है। “मैं भोक्ता नहीं हूँ”—यह विचार पशु नहीं कर सकते, केवल शुद्ध भक्ति होने पर मानव ही कर सकता है। अन्य लाखों-करोड़ों जीव परमेश्वर के ध्यान के अभाव में न्यूनाधिक पशु-धर्म से युक्त हैं। वे परमेश्वर के ऐश्वर्य को समझने में असमर्थ होकर, अपनी इस असमर्थता के कारण ही उसे (निराकार को) श्रेष्ठ मान बैठते हैं।

किंतु परम कृपामय विग्रह की ह्लादिनी की कृपा होने पर माधुर्य-मूर्ति की परम पराकाष्ठा की अनुभूति होती है। इसीलिए ‘अनर्पितचरीं चिरात्’ श्लोक में श्रीरूप गोस्वामी प्रभु ने जिस परमेश्वर की वंदना की है, उससे हम जानते हैं कि उन्होंने परम करुणावश अपनी भक्ति की शोभा का वितरण किया है। वे श्रीचैतन्यदेव हमारे हृदय पर अधिकार कर हमारा मंगल विधान करें। वह मंगल केवल कर्म-पथ या कर्म-बंधन मात्र नहीं है। कर्म का परिणाम होता है। कर्म से प्राप्त वस्तु परिणामी स्वभाव वाली होती है; हम उसकी रक्षा नहीं कर सकते, वह नष्ट हो जाती है। किंतु हम स्थूल या सूक्ष्म शरीर में उसके फल को भोगने के लिए बाध्य होते हैं। प्रवंचना द्वारा स्थूल या सूक्ष्म शरीर में भोग, ब्रह्म में विलीन होना या परमात्मा में कैवल्य प्राप्त करना—इन सभी संकीर्ण चेष्टाओं से श्रीचैतन्यदेव ने मानव जाति को परिष्कृत, निर्मल और उन्नत किया है—भागवत की व्याख्या करके।

विशुद्ध ह्लादिनी शक्ति में जिस लीला का वर्णन है, वह इस संसार के नपे-तुले धर्मयुक्त लोगों की धारणा में विकृत (कदर्य) रूप ले चुकी है। अपनी भोग-जनित मलिनता के कारण वे परम-पवित्र, पूर्णतम कृष्ण-लीला में भी मलिनता की आशंका करते हैं। यहाँ तक कि वे भागवत में श्रीराधिका का नाम तक नहीं देख पाते।

वासना के दास, कामी और पतित जीव न तो कृष्ण के समीप जा सकते हैं और न ही उनमें कृष्ण-सेवा की योग्यता होती है। वे सोचते हैं कि कृष्ण को वंचित करके हम भोग करेंगे, किंतु वे भोग नहीं कर सकते। छाया में वस्तु का भ्रम करके जो कर्म या नैष्कर्म्य-ज्ञान की चेष्टा की जाती है, उससे कोई मंगल नहीं होता। बुद्धिमान मनुष्य ऐसे संकट में नहीं पड़ते।

जो ज्ञेय पदार्थ को विश्व, विश्व को ज्ञाता या विश्व को ही ज्ञान मानकर इस संकीर्ण धारणा में बंधे हैं, उनके लिए कहा गया है कि यह वैकुंठ-धाम की छाया मात्र है। वैकुंठ के छाया-प्रतिफलित इस जगत में भगवत्-सेवा से विमुख होने के कारण जीव अनित्य भोग-धर्म में स्थित है। उसमें कोई कल्याण नहीं है।
वैकुंठ के साथ इस जगत का सादृश्य होने पर भी, वहाँ नित्य धर्म है और यहाँ अनित्यता—तात्कालिक उपस्थिति मात्र है। असंख्य दर्शनशास्त्रों के कपट अथवा अविवेक के कारण मोहित होकर लोग भगवान के परम भाव को समझ नहीं पाते। वे विमूढ़ हैं, यह जानना होगा। इस मूढ़ता को दूर करके संबंध-ज्ञान प्रदान करने के लिए ही

श्रीमद्भागवत के प्रथम श्लोक का अवतरण हुआ है।

व्यतिरेक-भाव क्या है? अपूर्णता, नश्वरता, त्याज्य कर्म की ग्राह्यता, परिच्छेद-जनित अमंगल आदि। ये सब यहाँ उपस्थित हैं; इन्हें वहाँ (वैकुंठ) नहीं ले जाया जा सकता। मूढ़ मायावादी यह नहीं जानते कि ‘भगवद्वस्तु ही महेश्वर हैं’। इसलिए वे ‘जन्माद्यस्य यतः’ सूत्र की ऐसी व्याख्या करते हैं कि जगत के वैचित्र्य के जन्मदाता, रक्षक और संहारक वे ही हैं, और इस धारणा से वे विशुद्ध तत्व को निम्न स्तर पर स्थापित कर देते हैं।

किंतु उस मतवाद का खंडन करने के लिए—निर्वेशेषवाद का निवारण करने के लिए—भागवत में ‘जन्माद्यस्य यतः’ श्लोक प्रस्तुत किया गया है। वैकुंठ से अन्वय-क्रम के अनुसार सादृश्य इस (संसार) में आया है। और उस वैकुंठ के विपरीत धर्म ‘इतरतः’ के रूप में यहाँ उपस्थित हैं। यहाँ दुःख, चेतना का अभाव, मूढ़ता आदि विद्यमान हैं। यहाँ की भोगमयी चेष्टा में विषयों को इंद्रिय-ज्ञान के माध्यम से जाना जाता है। “मूर्ख न रहकर पंडित बनें—सभी विषयों में अनुभवी हो जाएं”—भगवत्-सेवा से विमुख हृदय के भीतर से ऐसी ही प्रेरणा उठती है।

भगवान की सृष्टि के रूप में यहाँ जो वैचित्र्य दिखाई देता है, उसका मूल—नित्य जन्मस्थान वैकुंठ है; वहाँ यह वैचित्र्य पूर्ण रूप से वर्तमान है। उनमें अज (अजन्मा) और अनज-धर्म युगपत (एक साथ) विद्यमान हैं। निर्विशेष विचार द्वारा उनके उरुक्रमत्व और अधोक्षजत्व को नष्ट करके नास्तिकता के विभिन्न रूपों को धर्म कहकर प्रचारित करने की चेष्टा, और संकीर्ण धर्म की हीनता को उन पर थोपने का दुस्साहस भक्ति-विरोधी मनुष्यों में आया है।

वहाँ से यहाँ क्या भिन्नता है? वहाँ सच्चिदानंद-धर्म विद्यमान है; संधिनी, संवित् और ह्लादिनी का नित्य प्राकट्य है। यहाँ परिणाम—विकारयुक्त धर्म तीनों गुणों के अधीन है, अतः यह ‘इतरतः’ से उत्पन्न है। वहाँ विनाश-धर्म, हीनता आदि दोषों का कोई आरोप नहीं है। वहाँ का सब कुछ निर्दोष है, जबकि यहाँ का वैचित्र्य दोषयुक्त है।

‘अर्थेष्वभिज्ञः’—‘अर्थ’ शब्द का अर्थ विषय है। अभीष्ट विषय को ‘अर्थ’ कहते हैं। ‘अर्थेषु’ बहुवचन का पद है। हम रूप, रस, गंध, शब्द और स्पर्श के भिखारी होने के कारण समग्र अर्थ के अनुभवी नहीं हैं; किंतु वे सभी प्रयोजनों में अभिज्ञ—सर्वतोभावेन ज्ञाता हैं। मैं काम-क्रोध का दास और अनभिज्ञ हूँ। और वे काल के वशीभूत विकारी अपूर्ण जगत के ज्ञान मात्र से मेरे जैसे पंडित नहीं हैं। वहाँ केवल उपादेयता (स्वीकार्यता) है, कोई निकृष्ट या घृणित वस्तु नहीं है। वैकुंठ के वैचित्र्य में वे अभिज्ञ हैं, वे ही मूल ज्ञाता, साक्षी, केवल, निर्गुण और चेता हैं।

हम अनभिज्ञ, भ्रांत और विवर्तवादी होकर अहंग्रहोपासक बन जाते हैं। उस विचार से सर्वनाश उपस्थित होता है। मैं वह वस्तु नहीं हूँ, उस जातीय वस्तु हूँ; हम अणु-सच्चिदानंद हैं, अणुता के कारण ही हमारी आध्यात्मिकता है; हममें बद्ध और विमुक्त होने की योग्यता है। वे जीवों का मंगल करते हैं। जिसका मंगल करते हैं, उसे इस जगत की आत्म-श्लाघा (बहादुरी) में आबद्ध नहीं रखते।

“यस्याहमनुगृह्णामि हरिष्ये तद्धनं शनैः।
ततोऽधनं त्यजन्त्यस्य स्वजना दुःखदुःखितम्॥”

यह जगत स्वप्न के समान है। धन-संग्रह, स्थूल और सूक्ष्म दोनों शरीरों को यहीं छोड़कर जाना होगा; सूक्ष्म शरीर के साथ केवल संस्कार ही जाते हैं, स्थूल रूप से कोई विषय साथ नहीं जाता। पुनः संस्कारों के वशीभूत होकर स्थूल जगत से जुड़ना पड़ता है, जिससे अनेक प्रकार की कठिनाइयाँ होती हैं।

परमेश्वर-तत्व को क्षुद्र जीव के ‘समान’ समझना उचित नहीं है। भागवत के मर्मज्ञ जानते हैं कि जीव सेवक-तत्व है, सेव्य नहीं; और मुक्त-सेव्य भगवान केवल सेव्य हैं, सेवक नहीं। मुक्त सेवक और मुक्त सेव्य के मध्य परस्पर अखंड प्रेम विद्यमान रहता है। पशु-पक्षियों का प्रेम, संसार का वात्सल्य प्रेम और दाम्पत्य प्रेम को ‘प्रेम’ मान लेना एक भ्रांति है। छाया को वास्तविक वस्तु के निकट ले जाना घोर अज्ञानता है। यह ‘nescience’—अविद्या-जनित भ्रांत चेष्टा है। मनुष्य जागतिक ज्ञान के ज्ञाता-भाव में स्थित होकर अज्ञेयता, संदेह और नास्तिकता में पड़ा हुआ है।

वास्तविक वस्तु-ज्ञान का महा-अकाल पड़ा है; उनके विषय में कोई चर्चा नहीं करता, इसलिए शरीर के साथ भोग्य-जगत के संबंध ही चर्चा का विषय बने रहते हैं—यह सब कर्म है, जो भक्ति के विपरीत है।

‘कर्मणां परिणामित्वादाविरिञ्च्यादमङ्गलम्’। ब्रह्मा आधिकारक देवता हैं—जिनके ऊपर जगत की सृष्टि का भार है; जो बद्ध-भाव वाले जीवों के मनुष्य, पशु-पक्षी, कीट-पतंग आदि के रूप समयानुकूल निर्मित करते हैं। उस ब्रह्मा का अपना लोक भी अमंगलपूर्ण है। वह भी अपूर्ण है। शिवलोक—विनाशकारी का अधिष्ठान भी उसी प्रकार का है। यदि उनमें वास्तव में विनाश—‘impersonal face’ करने की योग्यता होती, तो ब्रह्मांड नाम की कोई वस्तु शेष न बचती।
जगत-मिथ्यावादी कहते हैं कि जगत की सृष्टि नहीं हुई, कोई ‘objective existence’ (वस्तुपरक अस्तित्व) नहीं है। यह अज्ञान द्वारा स्वप्न देखने के समान विषय है। किंतु भागवत का कथन है—‘विपश्चिन्नश्वरं पश्येददृष्टमपि दृष्टवत्’। दृष्ट के समान—इंद्रिय-ज्ञान के सदृश अदृष्ट (जिसे कुछ नहीं कहा जाता) भी दृष्ट के समान ही परिवर्तनशील है। कर्मवाद का परित्याग करके, नैष्कर्म्य की सिद्धि होने पर नित्य-पूर्णज्ञान—ह्लादिनी, संधिनी और संवित् की क्रिया पूर्ण रूप से दृष्टिगोचर होती है।

वे “स्वेनैव राजते” अर्थात् Self-effulgent—स्वराट् पुरुष हैं। वे दूसरों के द्वारा प्रकाशित नहीं होते। हमारी आँखें होते हुए भी—देखने की योग्यता होने पर भी—यदि प्रकाश न हो तो हम देख नहीं पाते; किंतु वह परम तत्व स्वतः-प्रकाशमान है। उपनिषद् में कहा गया है—

न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥

वे नित्य प्रकट लीलामय हैं। सूर्य कुछ समय के लिए उदित होता है और फिर दृष्टि से ओझल हो जाता है। वहाँ कोई भौतिक सूर्य नहीं है। वहाँ ऐसे चंद्र-तारे, विद्युत या अग्नि आदि नहीं हैं। उनके प्रकाश से ही सबका प्रकाश है। वहाँ से प्रकाश आया है, तभी सूर्य को मिला है। इस जगत में उन्हीं का प्रकाश सूर्य द्वारा प्रतिबिंबित होता है; और उसी से हमारी दृष्टि-शक्ति कार्यशील होती है।

वे ‘स्वराट्’ हैं—दूसरों की सहायता की अपेक्षा नहीं रखते। उन्हें प्राप्त करने के लिए जिस भक्ति की आवश्यकता है, वह भक्ति-देवी भी दूसरों की सहायता—अन्य अभिलाषा, कर्म, ज्ञान, योग आदि की अपेक्षा नहीं करतीं। सत्कर्म द्वारा भक्ति प्राप्त नहीं हो सकती। जागतिक ज्ञान अथवा ब्रह्मज्ञान से भक्ति की प्राप्ति नहीं होती। ये सब तो भक्त के पीछे-पीछे चलते हैं।

भक्तित्वयि स्थिरतरा भगवन् यदि स्याद्
दैवेन नः फलति दिव्यकिशोरमूर्तिः।
मुक्तिः स्वयं मुकुलिताञ्जलिः सेवतेऽस्मान्
धर्मार्थकामगतयः समयप्रतीक्षाः॥

—यही विचार होना चाहिए। भक्त के निकट सभी वस्तुएं स्वतः चली आती हैं।

“जनयत्याशु वैराग्यं ज्ञानञ्च यदहेतुकम्।”

“तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये”—आदिकवि ब्रह्मा के कवित्व के अनुसार यह जगत रचा गया है। उनके हृदय में जिन्होंने वेद का विस्तार किया है। ‘वेद’ अर्थात् ज्ञान अभिज्ञान—माधुर्य-विग्रह श्रीकृष्ण, ऐश्वर्य-विग्रह नारायण, वासुदेवादि चतुर्व्यूह, संकर्षण से प्रकटित नारायणत्व—कारणाब्धिशायी आदि तीनों पुरुषावतारों का अभिज्ञान जिन्होंने ब्रह्मा के हृदय में स्थापित किया, अर्थात् भागवत की कथा समझाई। जब ब्रह्मांड की रचना भी नहीं हुई थी, तब उन्होंने यह ज्ञान दिया था।

यावानहं यथाभावो यद्रूपगुणकर्मकः।
तथैव तत्त्वविज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात्॥

—इत्यादि श्लोकों द्वारा वास्तविक विज्ञान प्रकट किया। ब्रह्मा आधिकारक देवता हैं, जगत के सृष्टिकर्ता; विष्णु—रक्षाकर्ता; और रुद्र—विनाशकर्ता हैं। यह त्रिविध विचार उन्हीं में स्थित है।

“मुह्यन्ति यत् सूरयः”—सूरिगण अर्थात् महापंडित जन यत् यस्मिन्—जिसमें (oblative ७मी) विमूढ़ता को प्राप्त होते हैं। आधार के विचार में वे भूः, भुवः, स्वः—इन तीन व्याहृतियों तक जाकर अटक जाते हैं। शक्ति के परिचय के विचार में वे अपूर्णता को प्राप्त होते हैं।

‘लोकस्याजानतो विद्वांश्चक्रे सात्वत-संहिताम्’ अर्थात् अज्ञानी मनुष्यों को ज्ञान प्रदान करने के लिए विद्वान वेदव्यास ने श्रीमद्भागवत की रचना की। यह उन्हीं की उक्ति है। वे कह रहे हैं, “आओ, हम सब मिलकर उनका ध्यान करें। जो मुख्य-गुण-विशिष्ट विग्रह हैं, जिनके गौण गुणों से जगत रचा गया है—उनका हम ध्यान करें।” उन्होंने मूढ़ जनों को आकर्षित करने के लिए राजसिक एवं तामसिक पुराणों की रचना की है। भागवत के अतिरिक्त अन्य पुराणों में विमोहन की बात कही गई है, यह उन्होंने स्वयं लिख दिया है।

भक्तियोगेन मनसि सम्यक् प्रणिहितेऽमले।
अपश्यत् पुरुषं पूर्णं मायां च तदपाश्रयाम्॥
यया संमोहितो जीव आत्मानं त्रिगुणात्मकम्।
परोऽपि मनुतेऽनर्थं तत्कृतं चाभिपद्यते॥
अनर्थोपशमं साक्षाद् भक्तियोगमधोक्षजे।
लोकस्याजानतो विद्वांश्चक्रे सात्वतसंहिताम्॥
यस्यां वै श्रूयमाणायां कृष्णे परमपूरुषे।
भक्तिरुत्पद्यते पुंसः शोकमोहभयापहा॥

अशोक, अभय और निर्मोह की इच्छा हो तो भक्ति का आश्रय लें—अधोक्षज की भक्ति करें। कुत्ते, घोड़े, अन्य निम्न प्राणियों, मनुष्यों या देवताओं की सेवा न करके केवल कृष्ण के चरणकमलों की सेवा करें। ‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्’। वे सर्वदा प्रस्तुत हैं; शांत, दास्य, सख्य, वात्सल्य या मधुर—जिस किसी भी भाव से उनके सामीप्य की आकांक्षा हो, वे तदनुरूप ही कृपा करते हैं। सेव्य के साथ सेवक-संबंधी समस्त बातों सहित भक्त उन्हें प्राप्त करते हैं।
जो लोग इस विषय में उदासीन हैं, वे एकादशी-व्रतादि के नाम पर केवल पित्त बढ़ाते हैं; उनका ‘हरिवासर’ नहीं होता। हरि को प्राप्त करना हो तो हरिकथा की चर्चा करना आवश्यक है। बद्धजीव जड़-जगत में आकर संकोच-धर्म में स्थित हो गया है। उसकी जो विचार-प्रणाली है, उसमें वह काम, क्रोध आदि घड़ियाल-मगरमच्छों द्वारा ग्रसित हो चुका है। उससे उद्धार पाना हो तो भगवान का आश्रय लेना होगा। उन भगवान के साथ हमारा क्या संबंध है, उसी संबंध-ज्ञान को प्रथम श्लोक में प्रतिपादित किया गया है।

हम सर्वदा कृष्ण को भूले हुए हैं। जो कृपा करके कृष्ण के चरणकमलों की ओर आकर्षित करने आते हैं, उनकी उपेक्षा करके हम कपटता, प्रतारणा (धोखा) और त्याज्य कर्मों को ग्रहण करने में व्यस्त रहते हैं। सब कुछ जानने का दंभ भरने वालों का विश्वास होता है—‘मैं ज्ञाता हूँ, मैंने ज्ञेय-पदार्थ का ठीक-ठीक निर्धारण कर लिया है, मेरे ज्ञान में कोई त्रुटि नहीं है।’ जो मूढ़ और विमुख हैं, जिन्हें भगवत्-ज्ञान नहीं हुआ है, उनमें सेवा-प्रवृत्ति नहीं आती। वे स्वयं को ‘सेव्य’ मानकर धन-संग्रह, कामिनी-सेवा और प्रतिष्ठा-प्राप्ति के लिए चौदह भुवनों को मथ रहे हैं। अपना निजी भोग-संग्रह ही उनका एकमात्र लक्ष्य है। भागवत ने ऐसे लोगों को ‘नरपशु’ कहा है।

कृष्ण की इंद्रिय-तृप्ति को रोककर—हृषीकेश की सेवा बंद करके—‘हृषीकेश के द्वारा मैं भोग करूँगा’, जिसकी ऐसी बुद्धि है, वह अपना कल्याण नहीं चाह रहा है। हमारे दुर्भाग्यपूर्ण पशु-स्वभाव के कारण हममें भागवत सुनने की प्रवृत्ति ही नहीं है। उसका विरोध करके अपनी मूढ़ता को बढ़ाना—यही हमारा भागवत-पाठ बन गया है। भोग में नरक-प्राप्ति या त्रिविध तापों के वशीभूत रहना ही एकमात्र फल मिलता है। हमें सेवा-परायण होना चाहिए। सेवा-प्रयास को नष्ट करके त्रिगुण-जनित जगत के विचार-वैकल्य के लिए यत्न करना उचित नहीं है।

वास्तविक वस्तु के दर्शन के अभाव में ही भोग की कुप्रवृत्ति जन्म लेती है। अभिधेय के विचार के समय—‘धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र’ श्लोक की व्याख्या करते हुए इन सभी विषयों पर भली-भांति चर्चा की जाएगी।

धर्म के विचार में भी विवर्त (भ्रम) हुआ है। कोई स्वाध्याय को धर्म कहता है, तो कोई तीर्थयात्रा आदि को; किंतु समस्त सिद्धियाँ तो गोविंद के चरणों में हैं। कृष्ण के चरणकमलों का भजन करने पर ही सर्वसिद्धि करतलगत होती है। यहाँ विवर्त-ज्ञान—माया-रचित निकृष्ट ज्ञान और शुद्ध ज्ञान—दोनों प्रकार की योग्यताएं विद्यमान हैं।

अनेक लोग ‘कमठ’ (कछुए) के न्याय से यहाँ ग्राह्य सामग्री का संग्रह करते हैं। ‘Analogy’ (सादृश्य) को ही बड़ा मानकर विचार करने पर केवल जगत ही सत्य प्रतीत होता है। किंतु जगत के प्रभु परमेश्वर का ज्ञान नहीं होता। जगन्नाथ या ब्रजेंद्रनंदन को अन्य देवता मान लेने पर भ्रांति के कारण अमंगल ही होता है।

अनेक लोगों को यह भ्रांति होती है कि गौड़ीय मठ के लोग गोस्वामी-शास्त्रों या भागवत के वचनों को छिपाकर अन्य बातें करते हैं, और केवल प्राकृत-सहजिया ही उन सब गूढ़ विषयों की चर्चा में प्रवृत्त रहते हैं। किंतु हमारा कहना है कि गले में माला धारण करके अपनी साज-सज्जा के साथ कंचन और कामिनी की प्रतिष्ठा के लिए घूमना भागवत-पाठ का फल नहीं है। उनका ऐसा भागवत-पाठ बंद होना चाहिए।

१९०४ ईस्वी में नीलाचल (पुरी) में चैतन्य-चरितामृत की व्याख्या आरंभ की थी। बहुत से लोग सुनने आते थे, किंतु उनमें से अधिकांश मेरी बात को समझ नहीं पाए। जो केवल खान-पान और रहने की व्यवस्था में ही व्यस्त हैं, वे वैष्णवता से सैकड़ों-हजारों योजन दूर हैं। उनके साथ हमारी कोई प्रतियोगिता नहीं है। हम कृष्ण-विमुख लोगों के संग से सहस्रों योजन दूर स्थित हैं। जो भागवत श्रवण की सच्ची आकांक्षा रखते हैं, उन्हीं के साथ हमारा संबंध है। समर्पित-चित्त व्यक्ति के समक्ष ही भागवत का कीर्तन करना चाहिए।

तथापि, जो दुःख में पड़े हैं, उनका उद्धार करना हमारा मुख्य कर्तव्य है। किंतु आजकल उसमें भी संकट है। दो पक्षों में कलह चल रहा हो, और तीसरा पक्ष यदि उनका झगड़ा सुलझाने जाए, तो लाठी उसी के सिर पर पड़ती है। डूबते हुए व्यक्ति को जो बचाने जाता है, जल में डूबा हुआ व्यक्ति उसी को जकड़कर डुबो देना चाहता है।

“ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च।
प्रेममैत्रीकृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः॥”

विद्वेषी को ‘incorrigible’ (असुधार्य) जानकर उससे दूरी बनाए रखनी चाहिए। अश्रद्धालु को हरिनाम नहीं देना चाहिए। किंतु ऐसे लोग गुरु के निकट हरिनाम ग्रहण करने का केवल अभिनय करके कुमार्ग पर चले जाते हैं। गुरु भी कहते हैं—‘जो इच्छा हो करो, बस वार्षिक भेंट देते रहना’। किंतु अपराधयुक्त होने पर हरिनाम फलित नहीं होता। “मन्नाथः श्रीजगन्नाथः, मद्गुरुः श्रीजगद्गुरुः”—इस विचार को समझे बिना, जिसका जो गुरु है वह उसी तक सीमित रहे; किंतु शैतान का गुरु या चोरी सिखाने वाला गुरु होने से काम नहीं चलेगा।

मंदिर (ठाकुर जी के घर) में कोई पूजा करने जाता है, तो कोई चोरी करने के लिए भी प्रवेश करता है—ऐसे दुर्भाग्य की बातें भी बहुत सुनने को मिलती हैं। ठाकुर महाशय ने गाया है—‘असत्य को सत्य मानकर और अनर्थकारी धन के लिए यत्न करके मैंने वास्तविक धन को त्याग दिया’—ये बातें केवल कहानी कहने या राग-ताल मिलाने के लिए नहीं हैं, बल्कि हरि-सेवा की योग्यता प्राप्त करने के लिए हैं। अपनी बड़ाई दिखाकर संसार के जीवों को ठगना अथवा आत्म-प्रवंचना करना उचित नहीं है। त्रिगुण-जनित पदार्थों को अत्यधिक महत्व देने से मनोरथ विफल ही होते हैं। शुद्ध नाम का आश्रय लेने पर विश्व-दर्शन निरर्थक (मिथ्या) सिद्ध हो जाता है। नामाभास और नामापराध का त्याग करके, असत्-संग छोड़कर शुद्ध नाम का आश्रय लेना ही परम कर्तव्य है।

सजातीयाशये स्निग्धे साधौ संग: स्वतो वरे।
श्रीमद्भागवतार्थानामास्वाद्यो रसिकैः सह॥

(समान आध्यात्मिक भाव वाले, स्निग्ध और अपने से श्रेष्ठ साधु का संग करना चाहिए; और रसिक साधुओं के साथ श्रीमद्भागवत के गूढ़ अर्थ का आस्वादन करना चाहिए।)

समस्त रूप से इस दृश्य-जगत को ही एकमात्र सत्य मान लेने पर मनुष्य ‘जिस अंधकार में था, उसी अंधकार में’ पड़ा रहेगा। लीलामय की लीला परम सत्य और पूर्ण ज्ञानमय है। नीरसता वहाँ से लाखों-करोड़ों योजन दूर स्थित है। वहाँ नित्य नवीन रहने वाला अखंड आनंद विराजमान है। वहाँ पहुँचना ही आवश्यक है।

वे परमेश्वर-तत्व साक्षात् हमारे सम्मुख उपस्थित हैं। (श्रीविग्रह की ओर संकेत करते हुए) इन्हें बद्धजीवों के उपभोग की काठ, मिट्टी या पत्थर की वस्तु न समझें। हृदय जब निर्मल होगा, तब देख सकेंगे कि यह विग्रह केवल कोई जड़ पिंड नहीं हैं—वे परम वास्तविक सत्य हैं। उसी समय वास्तविक भूत-शुद्धि संपन्न होगी।