(सोमवार, १९ अगस्त)
“अनर्पितचरीं चिरात् करुणयावतीर्णः कलौ
समर्पयितुमुन्नतोज्ज्वलरसां स्वभक्तिश्रियम्।
हरिः पुरटसुन्दरद्युतिकदम्बसन्दीपितः
सदा हृदयकन्दरे स्फुरतु वः शचीनन्दनः॥”
श्रीकृष्णचैतन्यदेव के विचार द्वारा अनुमोदित भागवत की जो व्याख्या है, वही हमारे लिए अवलंबनीय (स्वीकार्य) है। जिन श्रीकृष्णचैतन्यदेव ने पूर्व में कभी जीवों को जो प्रदान नहीं किया था, उसी स्वभक्ति की शोभा को करुणावश होकर जीवों के लिए सुलभ कराया है, वे साक्षात् श्रीहरि श्रीकृष्णचैतन्यदेव हमारे हृदय में उन समस्त भक्ति की कथाओं को—जो भागवत में उल्लिखित हैं—विस्तारित करें।
तृतीय दिवस हमने भागवत के विषय में जो कहा था, उसमें यह कहा गया है कि भगवत्-तत्त्व कभी भी निर्विशेष शब्दवाच्य होकर स्तब्ध नहीं हो सकता, वे अधोक्षज वस्तु हैं, इस विषय में कोई संदेह नहीं है। बद्धजीव का इंद्रियजन्य ज्ञान उनका स्पर्श नहीं कर सकता। भोगी अथवा त्यागी के सम्मुख जो वस्तुएं प्रतिभासित होती हैं, वे सब भोग्य पदार्थ—सेवक-जातीय हैं। किंतु सेव्य-जातीय तथा पूज्य न होने के कारण उन वस्तुओं द्वारा उनके स्मरण की संभावना नहीं रहती। हम भोग-विचार द्वारा इंद्रियजन्य ज्ञान से जो कुछ भी ग्रहण करते हैं, वह कभी सेव्य नहीं हो सकता। इसीलिए भगवद्-वस्तु को ‘अधोक्षज’ शब्द से लक्षित किया गया है; अर्थात् जो वस्तु स्वयं को जैव-ज्ञान की—बद्धजीव के ज्ञान की—सीमा से परे सर्वदा अधिष्ठित रख सकती है, वही अधोक्षज है। वे आरोह-अधिरोह पंथियों के लिए प्राप्य वस्तु नहीं हैं। वे जब स्वेच्छापूर्वक अवतरण करते हैं, तभी हमारे दृष्टिगोचर होते हैं। इसीलिए श्रुति कहती है—
“नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥”
भगवान् के श्रीअंग के दर्शन में इन चर्म-चक्षुओं द्वारा कोई भी समर्थ नहीं हो सकता। इस प्रकार के नेत्रों से केवल सीमा-युक्त वस्तु ही देखी जा सकती है। वे वैकुंठ-तत्त्व हैं, अतः उन्हें इस प्रकार देखा नहीं जा सकता। इन कर्णों से उनकी कथा नहीं सुनी जा सकती, इस नासिका से उनके निर्माल्य (प्रसादी पुष्प आदि) की सुवास नहीं ली जा सकती, इस जिह्वा से उनके उच्छिष्ट (प्रसाद) का आस्वादन नहीं किया जा सकता और इस मन से उनका चिंतन नहीं हो सकता। यदि वे स्वयं को सर्वकाल व सर्वथा बद्धजीवों की इंद्रिय-वृत्ति के संचालन-योग्य धरातल से पृथक् न रखते, तो वे भी बाह्य भोग्य-वस्तुओं में से ही एक होते। तब ‘वे पूज्य हैं, हमें उनका आश्रय ग्रहण करना होगा’—ये सब विचार मन में उदित ही न होते। इसीलिए हमारे कल्याण हेतु ही वे अधोक्षज हैं, अर्थात् बद्धजीवों के ज्ञान की परिधि के विषय नहीं हैं।
यहाँ यह प्रश्न उठ सकता है कि ‘अपरोक्ष’ शब्द से भी तो उन्हें समझा जा सकता है। जो न तो प्रत्यक्ष है और न परोक्ष, वही अपरोक्ष है। उसमें एकत्व का समाधान तो है, किंतु बहुत्व (विविधता) नहीं है। जहाँ विचित्रता का बहुत्व हमारे चिंतन के प्रवाह को अवरुद्ध करता है—वहाँ सीमा-युक्त पदार्थ ही हमारा आलोच्य बन जाता है। दृष्टा-दृष्टि के संबंध से हम उस वस्तु का भोग करते हैं—उसे दृश्यमात्र मान लेते हैं। श्रीमूर्ति के समक्ष आकर जब हम इन अभागे नेत्रों से देखने का प्रयास करते हैं, वहाँ हमारा इंद्रियजन्य ज्ञान का प्रयास व्यर्थ हो जाता है। इसीलिए वह अधोक्षज-तत्त्व ही द्रष्टव्य है।
भगवद्-वस्तु साक्षी, केवल, चेता और निर्गुण हैं। वे यदि कृपापूर्वक हमें दर्शन दें और हम भी यदि उनके दर्शन के योग्य बन सकें, तभी उनका दर्शन संभव हो सकता है। श्रीविग्रह को यदि हम भोग्य मान लें, पुण्य-संचय के लिए, अपराध-क्षालन के लिए या भव-रोग की औषधि समझकर दर्शन करने जाएं, तो वे हमारे मलिन चित्त को देखकर दुःखित होकर दर्शन नहीं भी दे सकते हैं। इसलिए चित्त की मलिनता का परिमार्जन कैसे हो? चैतन्यदेव के भागवत से उद्धृत तत्त्व में हमें एक ऐसा श्लोक मिलता है—
“चेतोदर्पणमार्जनं भवमहादावाग्निनिर्वापणं
श्रेयःकैरवचन्द्रिकावितरणं विद्यावधूजीवनम्।
आनन्दाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनं
सर्वात्मस्नपनं परं विजयते श्रीकृष्णसंकीर्तनम्॥”
वे उपदेशक जगद्गुरु के रूप में हम मलिन-हृदय जीवों के कल्याण हेतु कहते हैं—श्रीकृष्णसंकीर्तन सर्वोपरि जययुक्त हो। ‘कीर्तन’ का अर्थ है—जिसके श्रवण से जीव को वैकुंठ-वस्तु के श्रवण का अधिकार प्राप्त होता है। यदि वैकुंठ-तत्त्व का कीर्तन हो, तभी हम श्रवण कर सकते हैं। किंतु वर्तमान समय में हम ऐसी सेवा-विमुख बुद्धि में निवास करते हैं कि यदि इंद्रिय-तृप्ति न हो, तो हम कीर्तन सुनने के लिए प्रस्तुत नहीं होते। इसीलिए संगीत-प्रेमियों के कल्याणार्थ ‘कृष्णकथा कानों के लिए रसायन (अमृत) बनेगी’—यह सोचकर गायन के माध्यम से कीर्तन की व्यवस्था की जाती है। जो लोग गीत के अतिरिक्त सामान्य साहित्य सुनने से विमुख रहते हैं, उनके लिए विविध प्रकार की सज्जा (Decoration) देकर (जैसे कड़वी औषधि पर चीनी का लेप चढ़ाया जाता है), उसी प्रकार हरिकथा का कीर्तन किया जाता है। यदि वे पहले से ही यह निश्चय कर लें कि कृष्णकथा नहीं सुनेंगे, क्योंकि उसे सुनने से हमारी भोग-बुद्धि क्षीण होगी; हरिकथा को छोड़कर अन्य सब कुछ सुनने के लिए वे उत्सुक रहते हैं, प्रभु-सज्जा से सुसज्जित होकर लोगों से भोग की मांग करने की कथा सुनने को तत्पर रहते हैं—तो उनके कल्याणार्थ ही हरिकीर्तन है। जैसे गाय यदि सूखा चारा न खाना चाहे तो उसमें खली और नमक मिलाकर दिया जाता है, उसी प्रकार हरिकथा के साथ कुछ रुचिकर प्रवृत्तियों का भाव जोड़ दिया जाता है। तब गान-श्रवण की प्रवृत्ति से ही कुछ श्रीराधा-कान्हा के गीत सुने जा सकते हैं। श्रवण को आकर्षित करने के लिए ही यह कीर्तन है।
कोई कह सकता है कि कृष्ण एक कूटनीतिक, ऐतिहासिक नायक हैं; उनकी कथा सुनकर क्या लाभ, उससे अच्छा नेपोलियन की वीरता की कथा सुनेंगे। जब व्यक्ति विभिन्न धर्मों या मतों में स्थित होता है, तब समस्त मलिनताओं को दूर करने के लिए कृष्णकीर्तन अनिवार्य हो जाता है। जिस प्रकार संगीत से हिरण और सर्प की चित्तवृत्ति स्तब्ध हो जाती है, उसी प्रकार गीत-युक्त हरिकथा के कीर्तन से काव्य-रस के रसिकों का चित्त भी हरिकीर्तन की ओर आकृष्ट हो जाता है।
सम्यक् (पूर्ण) कीर्तन का तात्पर्य है नीरस, विरस और रसरहित मार्ग के पथिकों की विचार-प्रणाली को त्यागना। यहाँ तक कि वेदों के शिरोभाग उपनिषदों में जो वैराग्य की बात कही गई है—‘वैराग्य उपस्थित होते ही प्रव्रज्या (संन्यास) आश्रम ग्रहण करे’ (यदहरेव विरज्येत तदहरेव प्रव्रजेत्), उसका भी संकीर्तन के समक्ष कोई मूल्य नहीं है, वह तुच्छ है। जड़ जगत की सीमाबद्ध वस्तुएं हमारे आदर का विषय हैं। उसके विपरीत भाव ही वैराग्य है, जो विलास-रहित है। जड़-इंद्रिय विलास की स्तब्धता ही वैराग्य है। हम आनंद की वृद्धि होगी यह जानकर विलास की ओर दौड़ते हैं, किंतु विलास का परवर्ती फल क्लेश का कारण है—जब हम यह समझ पाते हैं, तब विलास को स्तब्ध या संयमित करते हैं; वही वैराग्य है।
श्रेय के विचार से देखें तो जड़-विलास—प्रेय के प्रति हमारी जो रुचिपूर्ण प्रवृत्ति है, उससे निवृत्त होना पड़ता है। किंतु मत्स्य-स्वभाव के वशीभूत होकर भोगरूपी कांटे को निगलने से आनंद मिलेगा यह सोचकर हम उसमें बिंध जाते हैं। इंद्रियों के विलास में जब यह असुविधा पाते हैं, तब हम वैराग्य-शास्त्रों की चर्चा करते हैं—उपनिषद् और दर्शन-शास्त्रों का अनुशीलन करके मुक्ति-लाभ के विचार से युक्त होते हैं। हम सोचते हैं कि आपाततः प्रिय लगने वाले काव्य-रस के आमोद से विरत होकर एक उच्च स्थिति प्राप्त कर लेंगे। उपनिषद् का पाठ करने से जड़-विलास का त्याग कर जड़-वैराग्य के उत्कर्ष-धर्म की ओर चित्तवृत्ति धावित होती है। तब हम सोचते हैं—त्याग बहुत बड़ी वस्तु है, भोग क्लेशप्रद है, त्याग ही आवश्यक है और वही हमारे लिए अधिक उपयोगी है। किंतु अगले ही क्षण देखते हैं कि त्याग की वासना जब अतिशय हो जाती है, तो वह आत्महत्या के समान हो जाती है। इसीलिए भागवत कहता है—
“न निर्विण्णो नातिसक्तो भक्तियोगोऽस्य सिद्धिदः”
यह न तो अत्यधिक विलास है और न ही अत्यधिक विराग। अति-आसक्ति अथवा अति-वैराग्य दोनों ही अनावश्यक हैं। अब यदि वैराग्य अनावश्यक है, तो क्या हम आसक्त हो जाएं? इसका एक सुविचारित समाधान दिया गया है—श्रीकृष्ण के चरणकमलों में भक्ति करनी होगी; और उस भक्ति का प्रथम सोपान है—नाम-संकीर्तन। ‘किसका कीर्तन?’—इस विषय पर श्रीचैतन्यदेव ने कहा—श्रीकृष्ण-संकीर्तन। सब मिलकर जो कीर्तन करते हैं, वही संकीर्तन है—‘बहुभिर्मिलित्वा यत् कीर्तनं तदेव संकीर्तनम्’। यदि कोई कहे कि निर्जन में बैठकर ध्यान करेंगे, किंतु उसमें अनेक प्रकार के विरुद्ध-धर्म उपस्थित रहते हैं। गमन के भिन्न-भिन्न मार्ग हैं, कौन-सा मार्ग ग्रहण करें, यह ज्ञात नहीं होता। जब हम ध्यान करने के लिए कपाट बंद करके बैठते हैं, तब अन्य प्रवृत्तियाँ हमें खींच ले जाती हैं और पूर्व-संचित कुविचारों की प्रबलता हमारे सर्वनाश का कारण बन जाती है। जैसे यह स्थान (श्रवण-सदन की ओर संकेत करते हुए) ‘सदन’ शब्दवाच्य है; यह कोई गिरि-गुहा या भोग-स्थल नहीं है। यहाँ हम बहुत-से लोग एकत्र होकर कीर्तन कर सकते हैं। अनेक लोगों की विभिन्न चित्तवृत्तियों में जो अभाव है, वह संकीर्तन द्वारा पूर्ण हो सकता है। जब सभी एक ही तात्पर्य से युक्त होकर पूज्य वस्तु के कीर्तन में तत्पर होकर शब्द का उच्चारण करते हैं, तब—
प्रत्येक के हृदय का भाव यही होता है कि किसे पुकार रहे हैं, किसलिए पुकार रहे हैं और इसका फल क्या है? ध्यानादि में दूसरों की सहायता नहीं मिलती। यदि बधिर न हों और हरिकथा सुनने के लिए कान हों, तो हम जान सकते हैं कि सम्यक् कीर्तन की आवश्यकता है। वह वैकुंठ की कथा है, कोई सांसारिक ग्राम्य-वार्ता नहीं।
श्रीकृष्ण अखिलरसामृतमूर्ति हैं। उनका कीर्तन ही सम्यक् कीर्तन है। नृसिंहलीला का कीर्तन करने से—‘भगवान् भक्तवत्सल हैं, भक्त के विघ्नों का विनाश करने वाले हैं’—यह जानकर हम बल और दृढ़ता तो प्राप्त कर सकते हैं; किंतु उससे भक्तवत्सल भगवान् का पूर्ण कीर्तन नहीं होता—भक्तवत्सल की समग्र कृपा प्राप्त करने के यत्न में त्रुटि रह जाती है। यदि जानना चाहें कि नृसिंहदेव किसके अवतार हैं? कोई कह सकता है—‘वे निर्विशेष ब्रह्म के अवतार हैं’, किंतु ऐसा नहीं है। श्रीजयदेव गोस्वामी कहते हैं—
वेदानुद्धरते जगन्ति वहते भूगोलमुद्बिभ्रते
दैत्यं दारयते बलिं छलयते क्षत्रक्षयं कुर्वते।
पौलस्त्यं जयते हलं कलयते कारुण्यमातन्वते
म्लेच्छान् मूर्च्छयते दशाकृतिकृते कृष्णाय तुभ्यं नमः॥
यही भागवत का प्रतिपाद्य विषय है। ये सभी श्रीकृष्ण के ही अवतार हैं—वे उनके अंश और कला से प्राकट्य पाते हैं। किंतु इनके द्वारा समस्त रसों का पूर्ण समाधान नहीं होता। गीता में भगवान् ने कहा है—“ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।” शांत, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर—इन सभी भावों से भगवान् की उपासना की जा सकती है। भिन्न-भिन्न उपासकगण ऐश्वर्य और माधुर्य के भेद से अपनी-अपनी वृत्तियों के अनुसार उस तत्त्व की ही उपासना करते हैं। शांत रस के रसिक विशिष्ट अवतारों की उपासना करते हैं। दास्य रस में मारुति-बजरंगबली रामचंद्र की उपासना करते हैं। सख्य रस में अर्जुन तथा वात्सल्य रस में वसुदेव-देवकी श्रीकृष्णचंद्र की उपासना करते हैं। उपास्य तत्त्व के जितने भी स्वरूप हुए हैं, वे सभी स्वयंरूप के आकार से कुछ भिन्नता रखते हैं, किंतु उनमें पूर्णतमता का अभाव रहता है। इसी कारण भागवत में कहा गया है—“एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयं।” अर्जुन का कृष्ण-सान्निध्य गौरव-सख्य से युक्त है। उसकी तुलना में श्रीदामा-सुदामा आदि के विश्रंभ-सख्य (प्रगाढ़ सख्य) का परिचय हमें मिलता है। वे (गोपगण), कान्तागण (गोपियाँ), पितृ-मातृवर्ग तथा चित्रक-पत्रक आदि दासगण—वे सब सिंहासन, चँवर, पाँचनी-छड़ी आदि के माध्यम से जिस-जिस प्रकार की सेवा करते हैं, उन सभी ‘सेवा-धर्मों’ में जो कीर्तन निहित है, वह सब जब एकत्रित होता है, तभी सम्यक् कीर्तन बनता है। पंचरस के रसिक जब एकत्र होते हैं, तभी पूर्ण कीर्तन संपन्न होता है। खरीदे हुए टिकट के अंतिम गंतव्य तक पहुंचे बिना दूर की वास्तविक स्थिति को नहीं जाना जा सकता।
इस सांसारिक जगत में भी हम पंचरसों के रसिक होकर वास कर रहे हैं, रस की उत्पत्ति (Generate) कर रहे हैं; किंतु उसमें कृष्ण नहीं हैं। श्रीकृष्ण में जो पूर्ण रस विद्यमान है, यदि हम उसके भिक्षुक बनें—रस-ग्रहण के पात्र को अन्य सांसारिक विषयों से न भरकर पूर्णतः रिक्त रखें, तभी हम कृष्ण-रस को पूर्ण मात्रा में अनुभव कर पाएंगे। चैतन्यदेव ने कहा है—चित्तरूपी दर्पण का मार्जन होता है तथा संसार के संकटों से मुक्ति मिलती है केवल कृष्णकीर्तन के द्वारा।
अखिलरसामृतमूर्ति श्रीकृष्ण की लीला-श्रवण के द्वारा ही पूर्ण कीर्तन संभव है, अन्य अवतारों की कथा सुनकर नहीं। लक्ष्मीनारायण के कीर्तन की अपेक्षा—श्रीराम के कीर्तन की अपेक्षा कृष्णकीर्तन, और मथुरेश की अपेक्षा—व्रजेंद्रनंदन श्रीकृष्ण का कीर्तन ही सर्वतोभावेन जययुक्त है। कृष्णकीर्तन होने पर पूर्णता में कुछ भी शेष नहीं रहता, अभावों से पूर्ण मुक्ति प्राप्त हो जाती है। दशम स्कंध में कृष्णसंकीर्तन पूर्ण मात्रा में है; तो फिर केवल दशम स्कंध लिख देने से ही कार्य सिद्ध हो जाता, अन्य स्कंधों की क्या आवश्यकता थी? तारतम्य (क्रमिक श्रेष्ठता) के दिग्दर्शन हेतु मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, राम-परशुराम-बलराम आदि सभी अवतारों की कथा वर्णित हुई है। रोहिणी-नंदन बलराम की रासलीला तक का वर्णन है, किंतु श्रीकृष्ण की कथा पूर्ण रूप से वर्णित की गई है।
सिद्धान्ततस्त्वेदेऽपि श्रीशकृष्णस्वरूपयोः।
रसोत्कृष्यते कृष्णरूपमेषा रसस्थितिः॥
रस-विचार में श्रीकृष्ण का ही सर्वोच्च उत्कर्ष दिखाया गया है। काव्यशास्त्र के रूप में यह आदिकवि ब्रह्मा के हृदय में स्फुरित हुआ था। उसमें ‘उरुक्रम’—‘उपक्रम’ अथवा ‘त्रिविक्रम’ शब्द से श्रीकृष्ण को ही लक्षित किया गया है। साधन, भाव और प्रेमभक्ति के राज्य में जिनके चरणकमल पूजित हैं—
“त्रेधा निदधे पदम् समूढ़मस्य पांसुले तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः।”
वे काष्ठ के मृग की भांति अचेतन होकर नहीं बैठे रहे, अपितु उन्होंने तीन पग रखे। ‘निदधे’—लिट् लकार का पद है। लीलामय प्रभु ही उरुक्रम हैं। इस उरुक्रम को कोई निर्विशेष सिद्ध नहीं कर सकता।
आत्मारामश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे।
कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः॥
(ब्रह्मानंद के सुख में मग्न मुनिगण, ग्रंथियों (अहंकार व संशयों) से मुक्त होकर भी अमित-पराक्रमी श्रीहरि की फलाकांक्षा-रहित निष्काम सेवा करते हैं। क्योंकि श्रीहरि ऐसे अद्भुत गुणों से संपन्न हैं कि वे आत्मारामों को भी अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं।)
उस उरुक्रम के चरण-प्राप्ति का उपाय क्या है? इस प्रसंग में प्रह्लाद महाराज ने कहा है—
मतिर्न कृष्णे परतः स्वतो वा मिथोऽभिपद्येत गृहव्रतानाम्।
अदांतगोभिर्विशतां तमिस्रं पुनः पुनश्चर्वितचर्वणानाम्॥
न ते विदुः स्वार्थगतिं हि विष्णुं दुराशया ये बहिरर्थमानिनः।
अन्धा यथान्धैरुपनीयमाना-स्तेऽपीशतन्त्र्यामुरुदाम्नि बद्धाः॥
नैषां मतिस्तावदुरुक्रमाङ्घ्रिं स्पृशत्यनर्थापगमो यदर्थः।
महीयसां पादरजोऽभिषेकं निष्किञ्चनानां न वृणीत यावत्॥
हम सब अभागे जीव ‘उरुदाम्नि बद्धाः’—माया की सुदृढ़ रस्सी से बंधे हुए हैं, माया ने हमें अपने राज्य में जकड़ कर रखा है। इससे मुक्ति कैसे प्राप्त होगी? उत्तर में उन्होंने कहा है—नैषां मतिस्तावद् इत्यादि। यहाँ एक उत्तम बात कही गई है—“निष्किञ्चनानां न वृणीत यावत्”। जो लोग सोचते हैं कि इस जगत में कुछ सार है और उसी के पीछे भाग रहे हैं, यह उनकी बात नहीं है—यह निष्किंचन महापुरुषों की बात है। वे इस इहलोक की कोई वस्तु देने नहीं आते, जो वस्तु इस जगत में अप्राप्य है, वे वही प्रदान करने हेतु सदा उद्यत रहते हैं। उनके चरणों की धूलि से जो मुकुट निर्मित होगा, उसे धारण करने की जिनकी आकांक्षा है, वे ही उरुक्रम के चरणस्पर्श के अधिकारी बनेंगे। जिन उरुक्रम के चरणों की व्याख्या श्रीगौरसुंदर ने चौंसठ प्रकार से की है, जब तक उन उरुक्रम के चरणों का स्पर्श करने की योग्यता नहीं आती, तब तक अनर्थों की शांति नहीं होगी—निर्विशेषवाद (Impersonalism) समाप्त नहीं होगा। वे सविशेष चेतन चरणकमल, जिनसे वे विचरण करते हैं, उन चरणों की अंगुलियों का स्पर्श करने की योग्यता प्राप्त हुए बिना त्रितापों का समूल उन्मूलन नहीं हो सकता।
बद्धजीव होकर हम मुक्ति के लिए नाना प्रकार के प्रयास करते हैं। ‘मोक्षं विष्ण्वङ्घ्रिलाभम्’—उरुक्रम भगवान् के चरणारविंदों की प्राप्ति ही वास्तविक मोक्ष है। भाग्यहीन जीव उन चरणकमलों का परित्याग कर नरक के मार्ग पर—जड़-विलास के पथ पर अग्रसर होते हैं। चेतनमय कृष्णविलास में सम्मिलित होने की जो स्वाभाविक वृत्ति है, वही उरुक्रम के चरणों की वास्तविक प्राप्ति है। वे चरणकमल जो त्रिभुवन में व्याप्त हैं, वही चरण व्रजवासियों की एकमात्र आकांक्षा का विषय हैं।
आनोंर हृदय मन, मोर मन वृन्दावन,
मने वने एक करि जानि।
ताहे तोमार पदद्वय, कराह यदि उदय,
तबे तोमार पूर्ण कृपा मानि॥
वास्तविक वस्तु का विचार त्यागकर जब अवास्तविक (मायावी) दृश्य देखते हैं, तभी भोग-विलासिता में वृद्धि होती है—प्रभुत्व स्थापित करने का यत्न होता है और सेव्य-भाव को भुलाकर हम स्वयं को स्वामी और भगवान् को ‘हमारा सेवक, हमारा भक्त’ मानने की दुर्बुद्धि कर बैठते हैं। यदि वे हमारे सेवक बन जाएं तो भारी अनर्थ होगा; हम उनके भक्त-सेवक बनें, इसी में हमारा परम कल्याण है। वे कहते हैं—‘अपनी समस्त इंद्रियों को मेरे चरणकमलों में समर्पित कर दो। अपनी इंद्रियों द्वारा मुझे सुख का आस्वादन कराओ, तब तुम्हें भी परमानंद का आस्वादन प्राप्त होगा।’
किंतु जो लोग कपटतापूर्वक निर्विशेष (Impersonal) बनने की चेष्टा करते हैं, भगवान् का मस्तक काटते हैं, उनके हाथ-पैर खंड-खंड कर उनके स्वरूप के अस्तित्व को ही नष्ट करने का प्रयास करते हैं—आंखें फोड़ देते हैं, हाथ-पैर काट डालते हैं—वे ही वास्तव में भगवान् के परम शत्रु हैं। उनका परिणाम बताया गया है—“सिद्धा ब्रह्मसुखे मग्ना दैत्याश्च हरिणा हताः”। उनसे भी बढ़कर शत्रु वे हैं जो यह विचार करते हैं कि नाभि से मस्तक तक का भाग सेवा के लिए उपयुक्त है और नीचे का भाग किसी अन्य सेवा के लिए हो। वे ‘वर्णाश्रमाचार’ के बाह्य विचारों से राधा-गोविंद की लीला पर प्रहार करते हैं। उनकी यह अज्ञानता और मूढ़ता जब दूर होगी, तब वे भक्ति-सदाचार को समझ पाएंगे—तब वे रूप-सनातन के वचनों को समझ सकेंगे।
महाप्रभु जब दक्षिण भारत गए थे, तब अनेक मत-मतांतरों के लोगों ने उन पर शास्त्रार्थ का आक्रमण किया था। श्रीसंप्रदाय तथा वैष्णव नामधारी मध्व-संप्रदाय के लोगों ने न जाने कितने वाक्-आडंबर रचकर अपराध किए थे।
नानामतग्राहग्रस्तान् दाक्षिणात्यजनद्विपान्।
कृपारिणा विमुच्यैतान् गौरश्चक्रे स वैष्णवान्॥
(बौद्ध, जैन, मायावादी आदि नाना प्रकार के कुतर्क रूपी ग्राहों (मगरमच्छों) द्वारा ग्रसित दक्षिण भारत के गजेंद्र-तुल्य मनुष्यों को श्रीगौरचंद्र ने कृपा-रूपी सुदर्शन चक्र से उद्धार कर विशुद्ध वैष्णव बनाया।)
परम करुणामय श्रीचैतन्यदेव ने दक्षिण देश में राधा-गोविंद की भक्ति का प्रचार किया था। किंतु वर्तमान में वे पुनः “अंधेरे के अंधकार में” जा पड़े हैं। पुनः प्रचार की परम आवश्यकता है। उन तत्त्वों को पुनर्जीवित करना आवश्यक है। चैतन्यदेव ने क्या उपदेश दिया था, वे पूर्णतः विस्मृत कर चुके हैं। वे कहते हैं, ‘हम अत्यंत तर्कवादी (Rational) और बुद्धिमान हैं, बंगालियों की भांति भावुक (Emotional) नहीं हैं’। किंतु राधा-गोविंद का तत्त्व उनके पास लेशमात्र भी नहीं है। रामानंद-गौड़ीयमठ में जब राधा-गोविंद की मूर्ति प्रतिष्ठा की जा रही थी, तब अनेक लोगों ने विरोध किया था। उनका कहना था कि चतुर्भुज विष्णु के स्थान पर यह (द्विभुज युगल) मूर्ति क्यों? किंतु आज दो-तीन वर्षों से वहाँ श्रीश्रीराधागोविंद की मूर्ति पूजित हो रही है। जहाँ महाप्रभु ने राय रामानंद के साथ राधा-गोविंद के गूढ़ तत्त्वों पर विचार-विमर्श किया था, वहीं आज राधा-गोविंद विराजमान हैं।
मद्रास के लोग पार्थसारथी की आराधना में व्यस्त रहते हैं, वे राधा-गोविंद के तत्त्व को नहीं जानते। उत्तर भारत में महाप्रभु के पार्षद षड्-गोस्वामियों द्वारा प्रकटित सेवा-सौंदर्य के दर्शन की योग्यता उन्हें प्राप्त नहीं हो पा रही है; यह उनका भारी दुर्भाग्य है। सुब्बाराव नामक मध्व-संप्रदाय के एक व्यक्ति ने भागवत का अनुवाद किया है, किंतु वह अपूर्ण है। चैतन्यदेव के उपदेश जिन्होंने नहीं सुने, चैतन्यदेव का अनुग्रह जिन तक पूर्ण रूप से नहीं पहुंचा, वे भागवत के मर्म को समझ ही नहीं सकते; जो इस मार्ग के पथिक नहीं हैं, उनके द्वारा भागवत का यथार्थ अनुवाद असंभव है।
भाग्यहीन पश्चिमी प्रदेशों के लोग भी नाना प्रकार के प्रश्न करते हैं। कल ही मथुरा के एक पंडित ने प्रश्न किया था कि जब भागवत में ‘राधा’ नाम का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं है, तो गौरसुंदर को यह नाम कहाँ से मिला? किंतु हम कहते हैं—यह नाम किसके लिए रहेगा? अल्प-बुद्धि वाले संसारी लोगों के लिए? महाप्रभु तो ‘गोपी! गोपी!’ नाम का ही जप करते थे। समय आने पर सभी नामों का साक्षात्कार हो जाएगा।
भागवत में किसका नाम स्पष्ट लिखा है? ललिता, विशाखा, रूपमंजरी आदि किसी का भी नाम स्पष्ट रूप से नहीं है, तो क्या वे श्रीकृष्ण के चरणकमलों की सेवा के पूर्ण अधिकार से वंचित हैं? चंद्रावली का नाम भी तो नहीं है! यह नाम किसके लिए प्रकट रहता? क्या हम जैसे मूढ़ जीवों के लिए? वे केवल नाम मात्र लेकर क्या कर रहे हैं?
साधारण जनों के पाठ हेतु श्रीव्यासदेव, शुकदेव आदि महर्षियों ने इन नामों को गुप्त रखा है; जिनके भीतर सेवा की वास्तविक योग्यता होगी, वे यत्न करने पर स्वतः इसके दर्शन प्राप्त कर सकेंगे।
अतः हमने विवेचन किया—भागवत के ‘अधोक्षज’ और ‘उरुक्रम’ की महिमा। इसके द्वारा निर्विशेषवाद का पूर्णतः खंडन हो जाता है। वे अचेतन अथवा निराकार नहीं हैं। जड़-जगत के बद्धजीवों को चैतन्य प्रदान करने के उद्देश्य से, ‘आश्रय-जातीय’ भाव को अंगीकार कर स्वयं श्रीकृष्णचैतन्यदेव ने अवतरित होकर चेतन-कथा का प्रचार किया; इसी कारण उनका नाम ‘चैतन्य’ है। आश्रय-तत्त्व के अनुगत हुए बिना और गुरु-चरणकमलों की कृपा प्राप्त किए बिना तुच्छ जीव का कोई भी कल्याण संभव नहीं है।
श्रीगौरसुंदर द्वारा रचित “चेतोदर्पणमार्जनम्…” श्लोक में यह स्पष्ट किया गया है कि नाम-संकीर्तन ही सर्वश्रेष्ठ भक्ति है। इस नाम-कीर्तन के अंतर्गत ही भगवान् के रूप, गुण, लीला और उनके नित्य परिकरों का कीर्तन स्वतः समाहित है। कपटतापूर्वक नाम-कीर्तन का त्याग करके केवल रूपादि का कीर्तन करने का प्रयास करेंगे, तो चित्तरूपी दर्पण सर्वथा मलिन ही रहेगा। तब भागवत का अध्ययन-श्रवण यथार्थ रूप से फलित नहीं होगा। चैतन्यदेव के अनुगत होकर ही श्रवण करना होगा, तभी भागवत के गूढ़ तत्त्व की उपलब्धि संभव है। आज ऐश्वर्य और माधुर्य के विषय में अधिक विस्तार से कहने का अवसर नहीं मिल सका।