अष्टमोऽध्यायः
गर्भस्थ परीक्षित्की रक्षा, माता कुन्तीके द्वारा भगवान्की स्तुति तथा महाराज युधिष्ठिरका शोक
श्रीसूत उवाच –
अथ ते सम्परेतानां स्वानामुदकमिच्छताम् ।
दातुं सकृष्णा गङ्गायां पुरस्कृत्य ययुः स्त्रियः ॥ १॥
श्रीसूत गोस्वामीने कहा- इसके बाद पाण्डव परलोकगत आत्मीय-बन्धुओंके उद्देश्यसे तर्पण करनेके लिए शास्त्र-विधिके अनुसार द्रौपदी सहित स्त्रियोंको आगे करके गङ्गाके तटपर आये ॥ १ ॥
ते निनीयोदकं सर्वे विलप्य च भृशं पुनः ।
आप्लुता हरिपादाब्ज-रजःपूतसरिज्जले ॥ २ ॥
उन सबने स्नानके बाद मृत-बन्धुओंको जलाञ्जलि प्रदान की अर्थात् तर्पण किया तथा उनके गुणोंका स्मरण करते हुए विलाप करने लगे। तदुपरान्त सभीने श्रीहरिके चरणकमलोंकी धूलिसे पवित्र गङ्गाके जलमें पुनः स्नान किया ॥ २ ॥
तत्रासीनं कुरुपतिं धृतराष्ट्रं सहानुजम् ।
गान्धारीं पुत्रशोकार्त्ता पृथां कृष्णाञ्च माधवः ॥ ३॥
सान्त्वयामास मुनिभिर्हतबन्धून् शुचार्पितान् ।
भूतेषु कालस्य गतिं दर्शयन्नप्रतिक्रियाम् ॥ ४ ॥
उस गङ्गाके तटपर भीमादि भाइयोंके साथ महाराज युधिष्ठिर, दुर्योधनादिके पिता धृतराष्ट्र, पुत्रोंके शोकसे कातर दुर्योधनादिकी माता गान्धारी, पाण्डवोंकी माता कुन्ती, पाण्डव-पत्नी द्रौपदी आदि बैठे हुए थे। वे सभी बन्धु-बान्धवोंके निधनसे शोकमें अभिभूत हो रहे थे। यह देखकर भगवान् श्रीकृष्णने मुनियोंके साथ उन सबको सान्त्वना देते हुए कहा-कालकी गतिको रोका नहीं जा सकता है तथा कोई भी प्राणी इससे बच नहीं सकता ॥ ३-४ ॥
साधयित्वाजातशत्रोः स्वराज्यं कितवैर्हतम् ।
घातयित्वाऽसतो राज्ञः कचस्पर्शक्षतायुषः ॥ ५ ॥
याजयित्वाश्वमेधैस्तं त्रिभिरुत्तमकल्पकैः ।
तद्यशः पावनं दिक्षु शतमन्योरिवातनोत् ॥ ६ ॥
इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णने अजातशत्रु राजा युधिष्ठिरके जिस पैतृक राज्यको दुर्योधनादि धूर्त्त राजाओंने छलसे छीन लिया था, उसे वापस दिलवाया तथा द्रौपदीके केशोंको खींचनेके दोषसे जिन दुष्ट राजाओंकी आयु क्षीण हो गयी थी, उनका विनाश करवाया। तत्पश्चात् उन्होंने महाराज युधिष्ठिरके द्वारा सर्वश्रेष्ठ सामग्रियों एवं पुरोहितोंसे तीन अश्वमेध यज्ञ करवाकर सौ यज्ञ करनेवाले इन्द्रके समान उनकी पवित्र कीर्त्तिका चारों दिशाओंमें विस्तार किया ॥ ५-६ ॥
आमन्त्र्य पाण्डुपुत्रांश्च शैनेयोद्धवसंयुतः ।
द्वैपायनादिभिर्विप्रैः पूजितैः प्रतिपूजितः ॥७॥
गन्तुं कृतमतिर्ब्रह्मन् द्वारकां रथमास्थितः ।
उपलेभेऽभिधावन्तीमुत्तरां भयविह्वलाम् ॥ ८ ॥
हे ब्रह्मन् ! अब भगवान् श्रीकृष्ण द्वारका जाना चाहते थे। अतः उन्होंने पाण्डवोंसे यथायोग्य संभाषण करते हुए विदायी ली और श्रीवेदव्यास आदि मुनियोंका बड़ा सत्कार किया। पुनः उन ऋषियोंने भी श्रीकृष्णकी पूजा की। तदनन्तर जैसे ही श्रीकृष्ण शिनिपौत्र सात्यकि और उद्धवके साथ द्वारका जानेके लिए रथपर सवार हुए, उसी समय उन्होंने देखा कि अभिमन्युकी पत्नी उत्तरा भयसे व्याकुल होकर तीव्रगतिसे उनकी ओर दौड़ी चली आ रही है॥ ७-८ ॥
श्रीउत्तरोवाच –
पाहि पाहि महायोगिन् देवदेव जगत्पते।
नान्यं त्वदभयं पश्ये यत्र मृत्युः परस्परम् ॥ ९ ॥
श्रीउत्तरादेवीने कहा- हे देवादिदेव ! हे विश्वस्वामिन् ! हे महायोगी ! मेरी रक्षा करो, मेरी रक्षा करो। इस मर्त्यलोकमें एक वस्तु दूसरी वस्तुके विनाशका कारण है। आपके अतिरिक्त इस संसारमें अभय प्रदान करनेवाला कोई दूसरा दिखलायी नहीं देता, अतएव आपको छोड़कर मैं किससे प्रार्थना करूँ ? ॥९॥
अभिद्रवति मामीश शरस्तप्तायसो विभो।
कामं दहतु मां नाथ मा मे गर्भो निपात्यताम् ॥ १० ॥
हे परमेश्वर ! हे सर्वव्यापिन् ! हे सर्वशक्तिमान ! देखिये ! यह दहकता हुआ लोहेके बाणसे युक्त ब्रह्मास्त्र मुझे पीड़ा देनेके उद्देश्यसे मेरी ओर वेगपूर्वक चला आ रहा है। हे नाथ! यह चाहे मुझे दग्ध कर डाले, मुझे कोई चिन्ता नहीं, किन्तु मेरी गर्भस्थ सन्तानको नष्ट न करे ॥ १०॥
श्रीसूत उवाच –
उपधार्य वचस्तस्या भगवान् भक्तवत्सलः ।
अपाण्डवमिदं कर्तुं द्रौणेरस्त्रमबुध्यत ॥ ११ ॥
श्रीसूत गोस्वामीने कहा- भगवान् श्रीकृष्ण शरणागतोंके पालक हैं। उन्होंने उत्तराके इन दुःखपूर्ण वचनोंको सुना और भलीभाँति विचारकर समझ गये कि अपनी पराजयके कारण अत्यन्त क्रोधित द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने इस संसारको पाण्डवोंसे रहित करनेके लिए ब्रह्मास्त्र छोड़ा है ॥ ११॥
तर्ह्येवाथ मुनिश्रेष्ठ पाण्डवाः पञ्च सायकान् ।
आत्मनोऽभिमुखान् दीप्तानालक्ष्यास्त्राण्युपाददुः ॥ १२ ॥
हे मुनिश्रेष्ठ शौनक ! ठीक उसी समय पाण्डवोंने देखा कि जलते हुए पाँच बाण उनकी ओर बढ़े चले आ रहे हैं। यह देखकर उन्होंने अपने-अपने अस्त्र धारण कर लिये ॥ १२ ॥
व्यसनं वीक्ष्य तत् तेषामनन्यविषयात्मनाम् ।
सुदर्शनेन स्वास्त्रेण स्वानां रक्षां व्यधाद्विभुः ॥ १३ ॥
सर्वशक्तिमान भगवान् श्रीकृष्णने जब देखा कि उनके ऐकान्तिक प्रेमी और शरणागत भक्त पाण्डवोंपर बहुत बड़ी विपत्ति आ पड़ी है तथा दूसरे-दूसरे अस्त्रोंसे इस घोर विपत्तिजनक ब्रह्मास्त्रको रोका नहीं जा सकता, तब उन्होंने तत्काल ही अपने सुदर्शनचक्रसे अपने निजजन उन पाण्डवोंकी रक्षा की ॥ १३॥
अन्तःस्थः सर्वभूतानामात्मा योगेश्वरो हरिः।
स्वमाययावृणोद्गर्भं वैराट्याः कुरुतन्तवे ॥ १४॥
भगवान् श्रीहरि षडैश्वर्यपूर्ण और सभी प्राणियोंके हृदयमें विराजमान परमात्मा हैं। उन्होंने कुरुवंशमें उत्पन्न पाण्डवोंके वंशकी रक्षाके लिए विराटनन्दिनी उत्तराके गर्भमें श्रीकृष्णरूपमें ही प्रवेश किया और अपने योगमायारूपी कवचसे उसके गर्भको ढक दिया ॥ १४॥
यद्यप्यस्त्रं ब्रह्मशिरस्त्वमोघञ्चाप्रतिक्रियम् ।
वैष्णवं तेज आसाद्य समशाम्यद् भृगूद्वह ॥ १५ ॥
हे भार्गव शौनकजी ! यद्यपि ब्रह्मास्त्र अमोघ है अर्थात् कभी व्यर्थ नहीं जाता और उसके निवारणका भी कोई उपाय नहीं है, तथापि श्रीविष्णु (श्रीकृष्ण) से सम्बन्धित तेजके समक्ष आकर वह ब्रह्मास्त्र पूर्णतया शान्त हो गया ॥ १५ ॥
मा मंस्था ह्येतदाश्चर्यं सर्वाश्चर्यमयेऽच्युते ।
य इदं मायया देव्या सृजत्यवति हन्त्यजः ॥ १६॥
हे ब्रह्मन् ! परमपुरुष श्रीविष्णु जन्मादिसे रहित हैं। वे अपनी बहिरङ्गा माया-शक्तिसे इस विश्वकी सृष्टि, स्थिति और विनाश करते हैं। अचिन्त्यशक्तिमान होनेके कारण वे अनेक परम चमत्कारपूर्ण लीलाएँ करते हैं। उन अच्युत श्रीकृष्णके लिए इस ब्रह्मास्त्रको शान्त करना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है ॥ १६ ॥
ब्रह्मतेजोविनिर्मुक्तैरात्मजैः सह कृष्णया।
प्रयाणाभिमुखं कृष्णमिदमाह पृथा सती ॥ १७ ॥
तत्पश्चात् श्रीकृष्ण द्वारकाकी ओर प्रस्थान करनेके लिए तत्पर हुए। यह देखकर साध्वी कुन्ती ब्रह्मास्त्रकी ज्वालासे मुक्त अपने पुत्रों और द्रौपदीके साथ उनकी इस प्रकारसे स्तुति करने लगीं – ॥ १७ ॥
श्रीकुन्त्युवाच –
नमस्ये पुरुषं त्वाद्यमीश्वरं प्रकृतेः परम्।
अलक्ष्यं सर्वभूतानामन्तर्बहिरवस्थितम् ॥ १८ ॥
माता कुन्तीने कहा- हे कृष्ण ! आप मेरे भतीजे होते हुए भी आदिपुरुष हैं। आप मायासे अतीत तत्त्व हैं तथा मायाके नियन्ता हैं। यद्यपि आप समस्त प्राणियोंके भीतर एवं बाहरमें पूर्ण रूपसे अवस्थित हैं, तथापि आपको इन्द्रियों और उनकी वृत्तियोंके द्वारा नहीं जाना जा सकता। मैं आपको नमस्कार करती हूँ ॥ १८॥
मायाजवनिकाच्छन्नमज्ञाधोक्षजमव्ययम् ।
न लक्ष्यसे मूढदृशा नटो नाट्यधरो यथा ॥ १९॥
हे वासुदेव ! आप अपने मायारूपी आवरणसे ढके रहते हैं। आप इन्द्रियज्ञानसे अतीत, अपरिच्छिन्न और अच्युत हैं। मैं भक्तियोगसे अनजान हूँ, इसलिए आपको केवल नमस्कार करती हूँ। जिस प्रकार गान-नृत्य-तालादिसे युक्त अभिनय करता हुआ कोई नट भिन्न-भिन्न वेश धारणकर भिन्न-भिन्न भाव प्रस्तुत करता है और उसके अभिनयसे मुग्ध द्रष्टा उसे पहचान नहीं पाते, उसी प्रकार आप देहाभिमानियोंके सामने प्रत्यक्ष रहकर भी उनके दृष्टिगोचर नहीं होते ॥ १९ ॥
तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम् ।
भक्तियोगविधानार्थं कथं पश्येम हि स्त्रियः ॥ २०॥
मननशील, आसक्ति रहित, आत्म-अनात्म विवेकी जीवन्मुक्त परमहंस पुरुष भी आपकी महिमाके प्रभावके कारण आपका दर्शन नहीं कर पाते। अतएव ऐसे पुरुषोंमें भी अपने प्रति भक्ति उत्पन्न करानेके उद्देश्यसे अवतीर्ण आपका मेरे जैसी मुग्ध स्त्रियाँ कैसे दर्शन कर सकती है अर्थात् किस प्रकार आपको जाननेमें समर्थ हो सकती हैं? ॥२०॥
कृष्णाय वासुदेवाय देवकीनन्दनाय च।
नन्दगोपकुमाराय गोविन्दाय नमो नमः ॥ २१॥
हे श्रीकृष्ण ! समस्त अवतारोंकी तुलनामें आपका यह श्रीकृष्ण अवतार ही अति श्रेष्ठ है। पुनः इस अवतारमें आपने जिन्हें अपने सम्बन्धसे प्रीतियुक्त और कृतार्थ किया है, उनमें मेरे भाई वसुदेव ही अति धन्य हैं, क्योंकि आपने उन्हें अपने पिताके रूपमें वरण किया है, इसलिए आपका नाम वासुदेव है। पिता वसुदेवकी अपेक्षा भी अधिक स्नेहवत्सला एवं सौभाग्यशालिनी माता देवकी हैं, जिनके गर्भसे प्रकट होकर आपने उन्हें अधिक धन्या और समृद्धिमती बनाया है, इसीलिए आप ‘देवकीनन्दन’ कहलाते हैं। इसकी भी अपेक्षा अधिक धन्य वात्सल्य-स्नेहसे परिपूर्ण गोपराज नन्द हैं। उन्होंने आपकी कौमार-लीलाके माधुर्यका आस्वादन किया है, इसलिए आप ‘नन्दगोपकुमार’ अर्थात् ‘नन्दनन्दन’ कहलाते हैं। उनकी भी अपेक्षा प्रीतिमती देवी यशोदा धन्या हैं, इसलिए आप ‘यशोदानन्दन’ कहलाते हैं। आपकी कौमार-लीलाकी अपेक्षा व्रजकी कैशोर-लीलाका माधुर्य श्रेष्ठ है, क्योंकि आप अपनी कैशोर-लीला द्वारा सभीकी समस्त इन्द्रियोंको आकर्षणकर आनन्दका उपभोग करते हैं, इसलिए आप ‘गोविन्द’ हैं। आपको बार-बार प्रणाम है ॥ २१॥
नमः पङ्कजनाभाय नमः पङ्कजमालिने ।
नमः पङ्कजनेत्राय नमस्ते पङ्कजाङ्घ्रये ॥ २२ ॥
आपकी नाभिसे ब्रह्माजीका जन्म-स्थान ‘कमल’ प्रकट हुआ है, आपके गलेमें सुन्दर कमलोंकी माला सुशोभित है, आपके दोनों नेत्र कमलके समान प्रफुल्लित एवं विशाल हैं, आपके दोनों चरणोंमें कमलका चिह्न अङ्कित है। आपको देखकर मेरे नेत्र सुशीतल हो जाते हैं, अतएव मैं आपको पुनः पुनः प्रणाम करती हूँ ॥ २२॥
यथा हृषीकेश खलेन देवकी
कंसेन रुद्धातिचिरं शुचार्पिता।
विमोचिताहञ्च सहात्मजा विभो
त्वयैव नाथेन मुहुर्विपद्गणात् ॥ २३ ॥
हे सर्वशक्तिमान इन्द्रियाधिपति ! आपकी माता देवकीको क्रूर कंसने बहुत समय तक कारागारमें बन्द कर दिया था, जिससे वे शोकसे व्याकुल रहती थीं। जिस प्रकार आपने उन्हें कारागारसे मुक्त किया है, उसी प्रकार हे सर्वव्यापिन् प्रभो ! आपने मेरे और मेरे पुत्र-पाण्डवोंके रक्षक एवं पालकके रूपमें हमें अनेक विपत्तियोंसे अति शीघ्र ही बार-बार मुक्त किया है ॥ २३॥
विषान्महाग्नेः पुरुषाद-दर्शना-
दसत्सभाया वनवासकृच्छ्रतः ।
मृधे मृधेऽनेकमहारथास्त्रतो
द्रौण्यस्त्रतश्चास्म हरेऽभिरक्षिताः ॥ २४ ॥
हे श्रीहरि ! आप सर्वशक्तिमान हैं। आपने विष-मिश्रित मोदक (लड्डु) से होनेवाली मृत्युसे, लाक्षा-गृह-दाहसे, मानव-भक्षक हिडिम्बादि दुष्ट राक्षसोंकी दृष्टिसे, दुष्टोंकी द्यूत-सभासे, वनवासरूप कष्टोंसे और प्रत्येक युद्धमें भीष्म, द्रोण, कर्ण आदि अनेकों महारथियोंके प्राणघाती अस्त्रोंसे तथा अभी-अभी अश्वत्थामाके इस ब्रह्मास्त्रसे सभी प्रकारसे हमारी रक्षा की है ॥ २४॥
विपदः सन्तु ताः शश्वत् तत्र तत्र जगद्गुरो ।
भवतो दर्शनं यत् स्यादपुनर्भवदर्शनम् ॥ २५ ॥
हे विश्वपति श्रीकृष्ण ! इन सब विपत्तियोंके बार-बार उपस्थित होनेके कारण ही हमें आपके दुर्लभ दर्शनका सौभाग्य प्राप्त होता है। आपका दर्शन होनेपर पुनः इस संसार-चक्रमें आना नहीं पड़ता। इसलिए हे सम्पद रूप अहङ्कारकी आँधीको ध्वंस करनेवाले ! हमारी वे सभी विपत्तियाँ इस प्रकारकी विचित्र अवस्थाओंमें चिरस्थायी बनी रहें, बार-बार आती रहें ॥ २५ ॥
जन्मैश्वर्यश्रुतश्रीभिरेधमानमदः पुमान् ।
नैवार्हत्यभिधातुं वै त्वामकिञ्चनगोचरम् ॥ २६ ॥
हे श्रीकृष्ण ! उच्चकुलमें जन्म, ऐश्वर्य, विद्या और रूपादिको प्राप्तकर जिनका अभिमान बढ़ता जाता है, वे कभी भी आपके श्रीकृष्ण, गोविन्द इत्यादि पावन नामोंका कीर्त्तन करनेमें समर्थ नहीं हो सकते। यह सौभाग्य तो एकमात्र सांसारिक अभिमानसे रहित निष्किञ्चन भक्तोंको ही प्राप्त होता है ॥ २६ ॥
नमोऽकिञ्चनवित्ताय निवृत्तगुणवृत्तये ।
आत्मारामाय शान्ताय कैवल्यपतये नमः ॥ २७॥
आप अकिञ्चन भक्तोंके परम धन हैं और ये अकिञ्चन भक्त भी आपके सर्वस्व हैं। आप धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी वाञ्छारूप विषयोंकी कामनासे रहित हैं, अपितु ये सब तो आपको स्पर्श भी नहीं कर सकते, क्योंकि आप अपनी आत्मामें ही विहार करनेवाले हैं। आप पूर्णानन्दस्वरूप, शान्तस्वरूप तथा मोक्ष प्रदाता हैं। अतः मैं आपको बार-बार प्रणाम करती हूँ ॥ २७॥
मन्ये त्वां कालमीशानमनादिनिधनं विभुम् ।
समं चरन्तं सर्वत्र भूतानां यन्मिथः कलिः ॥ २८ ॥
हे श्रीकृष्ण ! आप केवल देवकीके पुत्र ही नहीं, अपितु सभीके कालस्वरूप हैं। आप सभीके नियन्ता हैं, अतः आपका न आदि है और न ही अन्त। आप सर्व-समर्थ प्रभु हैं तथा सर्वत्र समान भावसे रहते हैं। यद्यपि आप पार्थसारथी हैं, तथापि आपको निमित्त बनाकर प्राणी परस्पर कलह करते रहते हैं कि आप ईश्वर हैं, दुःख और सुख प्रदाता हैं, सम और विषम हैं, करुणापूर्ण और करुणाहीन हैं। किन्तु वस्तुतः आपमें किसी प्रकारकी विषमता नहीं है ॥ २८ ॥
न वेद कश्चिद्भगवंश्चिकीर्षितं
तवेहमानस्य नृणां विडम्बनम्।
न यस्य कश्चिद्दयितोऽस्ति कर्हिचिद्
द्वेष्यश्च यस्मिन् विषमा मतिर्नृणाम् ॥ २९ ॥
हे ईश्वर ! आपका कभी भी कोई भी प्रिय मित्र अथवा अप्रिय शत्रु नहीं है। जब आप नरवत् लौकिक-लीलाका अनुकरण करनेके लिए तत्पर होते हैं, तब यह कोई नहीं जान सकता कि आप किस अभीष्ट कार्यको सम्पन्न करना चाहते हैं। आपके सम्बन्धमें मनुष्य कृपा और दण्डरूप भ्रम-बुद्धिका आरोप उसी प्रकार कर लेता है, जिस प्रकार सूर्य सूर्यकान्त शिलामें अपने ही समान दाहिका शक्तिका गुण प्रदान करता है, जिससे अन्ध, उदासीन और चक्रवाक पक्षियोंका तो उपकार होता है, किन्तु उल्लूपक्षी, तस्कर और अन्धकारादिका अपकार होता है। वस्तुतः सूर्यमें किसी प्रकारकी विषमता नहीं होती ॥ २९ ॥
जन्म कर्म च विश्वात्मन्नजस्याकर्तुरात्मनः ।
तिर्यङ्नृषिषु यादःसु तदत्यन्तविडम्बनम् ॥ ३० ॥
हे विश्वकी आत्मा ! आप परमात्मा अन्तर्यामी विश्वरूप हैं। आप न तो जन्म लेते हैं और न ही कर्म करते हैं, तथापि पशु-लीला करते हुए वराहादि रूपमें, नर-लीला करते हुए रामादि रूपमें, ऋषि-लीला करते हुए नर-नारायणादि रूपमें, जल-जन्तुकी लीला करते हुए मत्स्यादि रूपमें अवतीर्ण होकर आप जिन-जिन क्रियाओंको करते हैं-वह समस्त केवल अभिनय हैं अर्थात् लोक प्रवञ्चना मात्र हैं ॥ ३०॥
गोप्याददे त्वयि कृतागसि दाम तावद्
या ते दशाश्रुकलिलाञ्जनसम्भ्रमाक्षम् ।
वक्त्रं निनीय भयभावनया स्थितस्य
सा मां विमोहयति भीरपि यद्विभेति ॥ ३१ ॥
बाल्यकालमें आपने दधि-भाण्डको फोड़ दिया था। आपके इस ‘अपराध’ के लिए गोपराज पत्नी श्रीयशोदादेवीने आपको बाँधनेके लिए जिस समय हाथोंमें रस्सी धारण की थी, उस समय आपके अञ्जन लगे हुए नेत्र व्याकुल होने लगे और उनसे आँसू निकलने लगे। आपने अपना मुख नीचे कर लिया और ‘माता मुझे मारेगी’ – इस भयसे भीत होकर चिन्तामग्न हो गये। आप तो साक्षात् भयस्वरूप हैं, महाकाल भी आपसे भयभीत होता है। अतः उस समय आपकी जो अवस्था हुई थी, उस लीला छविको स्मरण करके मैं मोहित हो रही हूँ ॥ ३१ ॥
केचिदाहुरजं जातं पुण्यश्लोकस्य कीर्तये ।
यदोः प्रियस्यान्ववाये मलयस्येव चन्दनम् ॥ ३२ ॥
आपने अजन्मा होकर भी जन्म-ग्रहण किया है। आपके इस प्रादुर्भावके कारणके विषयमें कई मतभेद हैं। कोई-कोई कहते हैं कि जिस प्रकार मलय-पर्वतके यशकी वृद्धिके लिए उसपर चन्दन-वृक्षोंका जन्म होता है, उसी प्रकार पुण्यश्लोक प्रिय युधिष्ठिर और पवित्रकीर्त्ति यदुओंके यशके विस्तारके लिए ही आप यदुवंशमें अवतीर्ण हुए हैं ॥ ३२ ॥
अपरे वसुदेवस्य देवक्यां याचितोऽभ्यगात् ।
अजस्त्वमस्य क्षेमाय वधाय च सुरद्विषाम् ॥ ३३ ॥
अन्य कुछ लोग कहते हैं कि सुतपा-पृश्निरूप क्षत्रिय दम्पत्तिने आपको पुत्ररूपमें प्राप्त करनेके लिए आपसे वरदान माँगा था, इसलिए आपने इस जगत्के कल्याण और असुरोंके नाशके लिए अजन्मा होकर भी वसुदेव-देवकी (पूर्व जन्ममें सुतपा-पृश्नि) के पुत्र होनेके भावको सम्पूर्ण रूपसे अङ्गीकार किया है ॥ ३३॥
भारावतरणायान्ये भुवो नाव इवोदधौ ।
सीदन्त्या भूरि भारेण जातो ह्यात्मभुवार्थितः ॥ ३४ ॥
दैत्योंके असहनीय पाप-भारके कारण पृथ्वी अति पीड़ित होकर इस प्रकार डगमगा रही थी, जिस प्रकार समुद्रके बीचमें अत्यधिक भारके कारण नौका डूबने लगती है। ब्रह्माजीने (समस्त देवताओंके साथ) पृथ्वीके भार-हरणके लिए आपसे प्रार्थना की थी। उनकी प्रार्थनाके फलस्वरूप ही आप अवतीर्ण हुए हैं- ऐसा भी कोई-कोई कहते हैं ॥ ३४॥
भवेऽस्मिन् क्लिश्यमानानामविद्याकामकर्मभिः ।
श्रवणस्मरणार्हाणि करिष्यन्निति केचन ॥ ३५ ॥
इस संसारमें आपके परमानन्द स्वरूपकी जो अज्ञानरूपिणी अविद्या है, उसके कारण ही जीवकी शरीरके प्रति आत्मबुद्धि होती है, जिससे उसमें अनेकों कामनाओंकी उत्पत्ति होती है। कोई-कोई ऐसा भी कहते हैं कि आपने जन्म-ग्रहण करके अनेकों प्रकारकी लीलाएँ की हैं, जिससे इन कामनाओंकी अग्निमें दग्ध हो रहे जीव अपने दुःखोंकी निवृत्तिके लिए ही इन लीलाओंका श्रवण-स्मरण-ध्यान कर सकें ॥ ३५ ॥
शृण्वन्ति गायन्ति गृणन्त्यभीक्ष्णशः
स्मरन्ति नन्दन्ति तवेहितं जनाः।
त एव पश्यन्त्यचिरेण तावकं
भवप्रवाहोपरमं पदाम्बुजम् ॥ ३६ ॥
जो लोग आपकी पवित्र कथाका बार-बार श्रवण, कीर्त्तन, उच्चारण और स्मरण करके आनन्दित होते हैं अथवा दूसरेके द्वारा आपकी कथाका कीर्त्तन होनेपर उसका बड़ा आदर करते हैं, वे लोग अतिशीघ्र ही आपके चरणकमलोंका दर्शन प्राप्त कर लेते हैं, जिसके प्रभावसे उनका जन्म-मृत्युका प्रवाह सदाके लिए रुक जाता है ॥ ३६ ॥
अप्यद्य नस्त्वं स्वकृतेहित प्रभो
जिहाससि स्वित् सुहृदोऽनुजीविनः ।
येषां न चान्यद्भवतः पदाम्बुजात्
परायणं राजसु योजितांहसाम् ॥ ३७ ॥
हे भगवन् ! आप सदा अपने भक्तोंके कार्योंको सम्पन्न करनेके इच्छुक रहते हैं। युद्धमें मेरे पुत्रों द्वारा राजाओंके बन्धु-बान्धवादिके वधके कारण वे राजा मेरे पुत्रोंके विद्वेषी और शत्रु हो गये हैं। हमलोग पूर्णतया आपके आश्रित हैं, अतएव आपके चरणकमलोंके अतिरिक्त हमारा कोई दूसरा सहारा नहीं है। क्या अब आप अपने आश्रित स्वजनोंको छोड़कर जाना चाहते हैं? ॥ ३७ ॥
के वयं नामरूपाभ्यां यदुभिः सह पाण्डवाः।
भवतो दर्शनं यर्हि हृषीकाणामिवेशितुः ॥ ३८ ॥
जिस प्रकार इन्द्रियोंके चालक जीवके अदृश्य होते ही इन्द्रियाँ अपने नाम और रूपसे रहित तथा शक्तिहीन हो जाती हैं, उसी प्रकार यदि हमपर आपकी कृपादृष्टि न रहे, तो यशस्वी और समृद्धिशाली यदुओंके साथ युक्त होनेपर भी, पाँचों पाण्डवोंका और मेरा मूल्य ही क्या रह जायेगा? हमारा अस्तित्व तो अति तुच्छ है। हम सैकड़ों बलोंसे भी बलवान क्यों न हों- आपके अभावमें सब कुछ निष्फल ही है, क्योंकि आप ही हमारा एकमात्र बल और सहारा हैं ॥ ३८ ॥
नेयं शोभिष्यते तत्र यथेदानीं गदाधर।
त्वत्पदैरङ्किता भाति स्वलक्षणविलक्षितैः ॥ ३९ ॥
हे गदाधर कृष्ण ! अब जिस प्रकार हमारी पाल्य-कुरुजाङ्गल देशकी भूमि असाधारण ध्वज, वज्र, अंकुश आदि चिह्नोंसे युक्त आपके चरण-युगलोंसे चिह्नित होकर शोभा पा रही है, आपके चले जानेपर उसकी वैसी शोभा नहीं हो सकती ॥ ३९ ॥
इमे जनपदाः स्वृद्धाः सुपक्वौषधिवीरुधः ।
वनाद्रिनद्युदन्वन्तो ह्येधन्ते तव वीक्षिताः ॥ ४० ॥
विशेष रूपसे आपके दर्शनके प्रभावसे यह देश समस्त प्रकारके उत्तम फलों, औषधियों और लता-वृक्षोंसे समृद्ध हो रहा है। आपकी कृपादृष्टिसे समृद्ध होकर ही ये वन, पर्वत, नदियाँ और सागर वर्द्धित हो रहे हैं ॥४०॥
अथ विश्वेश विश्वात्मन् विश्वमूर्ते स्वकेषु मे।
स्नेहपाशमिमं छिन्धि दृढं पाण्डुषु वृष्णिषु ॥ ४१ ॥
हे जगदीश ! हे सबके अन्तर्यामिन् ! हे विश्वरूप ! अब आप यहाँसे प्रस्थान करें या यहाँ रहें, जो भी करें, परन्तु इन पाण्डवों एवं यादवोंके प्रति मेरा जो स्नेहबन्धन बड़ा गाढ़ हो गया है- आप कृपया इसका छेदन कर दीजिये ॥ ४१ ॥
त्वयि मेऽनन्यविषया मतिर्मधुपतेऽसकृत्।
रतिमुद्वहतादद्धा गङ्गेवौघमुदन्वति ॥ ४२ ॥
हे माधव ! गङ्गा जिस प्रकार किसी भी विघ्नको विघ्न नहीं मानतीं तथा समस्त नद-नदियोंके आश्रय सागरकी ओर उन्मुख होकर अपने स्रोतको प्रवाहित करती रहती हैं, उसी प्रकार मेरी एकान्तिक साध्वी मति विघ्नोंसे मुक्त होकर समस्त भक्तोंके आश्रय-स्वरूप आपके प्रति निरन्तर प्रेममयी बनी रहे ॥ ४२ ॥
श्रीकृष्ण कृष्णसख वृष्ण्यृषभावनीध्रुग्-
राजन्यवंशदहनानपवर्गवीर्य ।
गोविन्द गोद्विज-सुरार्तिहरावतार
योगेश्वराखिलगुरो भगवन् नमस्ते ॥ ४३ ॥
हे कृष्ण ! हे अर्जुनसखा ! हे यादवश्रेष्ठ ! आप पृथ्वीद्रोही राजवेशधारी दैत्योंके कुलका विनाश करनेवाले हैं। हे गोविन्द ! आप अपने अक्षय प्रभावसे वैकुण्ठ और गोलोकाधिपति हैं। गौ, ब्राह्मण और देवताओंके दुःखोंको दूर करनेके लिए आपका अवतार हुआ है। हे योगेश्वर ! हे विश्वगुरु ! हे ईश्वर ! मैं आपको प्रणाम करती हूँ ॥ ४३ ॥
श्रीसूत उवाच –
पृथयेत्थं कलपदैः परिणूताखिलोदयः ।
मन्दं जहास वैकुण्ठो मोहयन्निव मायया ॥ ४४ ॥
श्रीसूत गोस्वामीने कहा- श्रीकुन्तीदेवीने इस प्रकार मधुर पदोंसे युक्त वचनोंके द्वारा भगवान्की सम्पूर्ण महिमाके विषयमें विशेष भावसे स्तुति की, जिसे सुनकर अप्राकृत वैकुण्ठके ईश्वर श्रीकृष्ण उन्हें अपनी मायासे मानो मोहित करते हुए मन्द मन्द मुसकराने लगे ॥ ४४ ॥
तां बाढमित्युपामन्त्र्य प्रविश्य गजसाह्वयम् ।
स्त्रियश्च स्वपुरं यास्यन् प्रेम्णा राज्ञा निवारितः ॥ ४५ ॥
‘आपमें मेरी एकान्तिक मति निरन्तर प्रेममयी रहे’- माता कुन्तीकी इस प्रार्थनाको स्वीकार करते हुए श्रीकृष्णने ‘तथास्तु’ कहा और कुन्तीके अनुरोधको भी स्वीकार करके रथसे उतरकर हस्तिनापुरमें प्रवेश किया। इसके बाद पुनः जब वे कुन्ती और सुभद्रा आदि अन्यान्य स्त्रियोंसे विदायी लेकर अपने राज्य द्वारकापुरीको जाने लगे, तब राजा श्रीयुधिष्ठिरने उनसे ‘यहाँ कुछ दिन और रह जाइये’- इस प्रकारकी अत्यन्त प्रेमभरी प्रार्थना करके उन्हें रोक लिया ॥ ४५ ॥
व्यासाद्यैरीश्वरेहाज्ञैः कृष्णेनाद्भुतकर्मणा।
प्रबोधितोऽपीतिहासैर्नाबुध्यत शुचार्पितः ॥ ४६ ॥
राजा युधिष्ठिरको अपने भाई-बन्धुओंके मारे जानेका बड़ा शोक हो रहा था, (१) भगवान्की लीलाका मर्म जाननेवाले व्यास आदि महर्षियोंने और स्वयं अलौकिक लीलाएँ करनेवाले श्रीकृष्णने पूर्व इतिहास बतलाकर अबोध युधिष्ठिरको समझानेका बहुत प्रयास किया, परन्तु उन्हें सान्त्वना नहीं मिली, न ही उनका विवेक जगा अर्थात् उन्हें शान्ति प्राप्त नहीं हुई ॥ ४६ ॥
(१) मूल श्लोकमें ‘ईश्वरेहाज्ञैः’ पदका अर्थ ‘ईश्वरेहाया अज्ञैः’ भी किया गया है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरने स्वरचित टीकामें इस पद की व्याख्या इस प्रकार की है- भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा अपने भक्त भीष्मको उनके निर्याणके समयमें दर्शन देनेके लिए राजा युधिष्ठिरके साथ कुरुक्षेत्र जाना और उन्हीं भीष्मदेवके मुखसे युधिष्ठिरको सान्त्वना दिलाना – व्यासदेव इत्यादि ऋषि भी श्रीकृष्णके इन दोनों कार्योंको सम्पन्न करनेके अभिप्रायसे अवगत नहीं थे। जिन भगवान् द्वारा कौरव और पाण्डवोंकी सन्धिके लिए यथेष्ट चेष्टा करनेपर भी जिस प्रकार उन भगवान्ने युद्धको ही पहलेसे निश्चित कर रखा था, उसी प्रकार यहाँपर भी भक्तराज भीष्मदेवके माहात्म्यको दिखलानेके लिए उन श्रीकृष्णने स्वयं अन्तर्यामी रूपमें राजा युधिष्ठिरके अन्तरमें प्रवेशकर उनमें अविवेक उत्पन्न किया और बाहरसे स्वयं और व्यासादि ऋषियों द्वारा युधिष्ठिरको समझानेपर भी उनका अविवेक ही दृढ़ किया।
आह राजा धर्मसुतश्चिन्तयन् सुहृदां वधम् ।
प्राकृतेनात्मना विप्राः स्नेहमोहवशं गतः ॥ ४७ ॥
हे शौनकादि ब्राह्मणो ! धर्मपुत्र महाराज युधिष्ठिरका हृदय अविवेकसे ग्रस्त हो रहा था। सुहृद और स्वजनोंके विनाशकी चिन्तासे वे स्नेह और मोहके वशीभूत होकर कहने लगे – ॥ ४७ ॥
अहो मे पश्यताज्ञानं हृदिरूढं दुरात्मनः ।
पारक्यस्यैव देहस्य बह्व्यो मेऽक्षौहिणीर्हताः ॥ ४८ ॥
हाय! मैं बड़ा ही पापी हूँ। मेरे हृदयके मूलमें बद्ध हुए इस गाढ़ मोहरूप अज्ञानको तो देखो ! मैंने सियार और कुत्तोंके आहार इस अनात्म शरीरके लिए कितनी ही अक्षौहिणी (१) सेनाओंको मार डाला ॥ ४८ ॥
(१) २१८७० रथ, २१८७० हाथी, १०९३५० पैदल, ६५६०० घुड़सवार- इतनी सेनाको अक्षौहिणी कहते हैं।
बालद्विज-सुहृन्मित्र-पितृभ्रातृगुरुद्रुहः ।
न मे स्यान्निरयान्मोक्षो ह्यपि वर्षायुतायुतैः ॥ ४९ ॥
हाय ! मैंने बालक, ब्राह्मण, सम्बन्धी, सखा, चाचा-ताऊ, भाई और गुरुजनोंका वध किया है, अतः मैं करोड़ों वर्षों तक भी नरकसे छुटकारा प्राप्त नहीं कर पाऊँगा ॥ ४९ ॥
नैनो राज्ञः प्रजाभर्तुर्धर्मो युद्धे वधो द्विषाम् ।
इति मे न तु बोधाय कल्पते शासनं वचः ॥५०॥
‘युद्धके समय प्रजाके पालनके उद्देश्यसे राजा शत्रुओंका विनाश कर सकता है तथा यह उसका स्वधर्म है, इसमें पाप नहीं होता-यही धर्मशास्त्रका विधान है’, परन्तु मुझे इन लिखित वचनोंसे सान्त्वना नहीं मिल रही है। भावार्थ – शत्रु द्वारा अपनी प्रजामें अशान्ति उत्पन्न होनेपर राजा द्वारा शत्रुओंका वध शास्त्र-विहित है। किन्तु दुर्योधन तो अपनी प्रजाका सुखपूर्वक पालन कर रहा था। मैंने तो केवल राज्यके लोभसे उसका वध किया है, अतः मेरे द्वारा पाप ही हुआ है ॥५०॥
स्त्रीणां मद्धतबन्धूनां द्रोहो योऽसाविहोत्थितः ।
कर्मभिर्गृहमेधीयैर्नाहं कल्पो व्यपोहितुम् ॥ ५१ ॥
इस युद्धमें मैंने जिनके पति, बन्धु-बान्धवोंका वध किया है, उन स्त्रियोंके मनमें मेरे प्रति भयानक हिंसाका भाव उत्पन्न हो गया है। उनके प्रति हुए मेरे इस अपराधको मैं गृहस्थाश्रममें विहित समस्त धर्म-कर्मादि द्वारा भी धोनेमें समर्थ नहीं हो सकता ॥ ५१ ॥
यथा पङ्केन पङ्काम्भः सुरया वा सुराकृतम् ।
भूतहत्यां तथैवैकां न यज्ञैर्मार्ष्टुमर्हति ॥ ५२ ॥
जिस प्रकार कीचड़ द्वारा कीचड़ मिश्रित जल स्वच्छ नहीं होता अथवा जिस प्रकार एक बिन्दु मदिराके स्पर्शकी अपवित्रताको मदिरापान द्वारा शुद्ध नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार मनुष्य द्वारा प्रमादवशतः हो जानेवाली प्राणियोंकी हत्यासे उत्पन्न पापको हिंसामूलक बहुत-से यज्ञोंके द्वारा शोधित नहीं किया जा सकता, अर्थात् हिंसा द्वारा उसका प्रायश्चित्त नहीं किया जा सकता ॥ ५२॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे ब्रह्मसूत्र-भाष्ये पारमहंस्यां संहितायां वैयासिक्यां प्रथमस्कन्धे श्रीकुन्तीस्तवः श्रीयुधिष्ठिरानुतापो नामाष्टमोऽध्यायः ॥