षष्ठोऽध्यायः
देवर्षि नारदका वनमें गमन, श्रीकृष्णका दर्शन तथा चिन्मय स्वरूपकी प्राप्ति
श्रीसूत उवाच –
एवं निशम्य भगवान् देवर्षेर्जन्म कर्म च।
भूयः पप्रच्छ तं ब्रह्मन् व्यासः सत्यवतीसुतः ॥ १ ॥
श्रीसूत गोस्वामीने कहा- हे ब्रह्मन् ! इस प्रकार सत्यवती-नन्दन भगवान् वेदव्यासने देवर्षि नारदजीसे उनके जन्म और साधनका वृत्तान्त बड़े आदरके साथ सुना एवं पुनः उनसे यह प्रश्न किया- ॥ १ ॥
श्रीव्यास उवाच –
भिक्षुभिर्विप्रवसिते विज्ञानादेष्टृभिस्तव ।
वर्तमानो वयस्याद्ये ततः किमकरोद्भवान् ॥ २ ॥
श्रीव्यासदेवने कहा- हे देवर्षे ! जब आपको रहस्यपूर्ण भगवत्-ज्ञानका उपदेश करनेवाले परिव्राजक महात्मागण चले गये, तब अपने जीवनकी उस प्राथमिक अर्थात् बाल्यावस्थामें आपने क्या किया ? ॥ २ ॥
स्वायम्भुव कया वृत्त्या वर्तितं ते परं वयः।
कथं चेदमुदस्राक्षीः काले प्राप्ते कलेवरम् ॥ ३ ॥
हे ब्रह्मनन्दन (श्रीनारद) ! आपने बाल्यावस्थाके बादकी अपनी आयुको किस प्रकारसे व्यतीत किया? कालवशतः आपको वार्द्धक्य (बुढ़ापा) भी आया होगा। अतः मृत्यु उपस्थित होनेपर आपने उस दासीके गर्भसे उत्पन्न देहका किस प्रकार त्याग किया? ॥ ३॥
प्राक्कल्पविषयामेतां स्मृतिं ते मुनिसत्तम ।
न ह्येष व्यवधात् काल एष सर्वनिराकृतिः ॥ ४॥
हे मुनिश्रेष्ठ ! कालके प्रभावसे तो समस्त वस्तुएँ ही लुप्त हो जाती हैं, अतः यह काल आपके पूर्वकल्पोंके जन्मोंकी स्मृति-शक्तिका नाश क्यों नहीं कर सका? ॥४॥
श्रीनारद उवाच –
भिक्षुभिर्विप्रवसिते विज्ञानादेष्टृभिर्मम ।
वर्तमानो वयस्याद्ये तत एतदकारषम् ॥५॥
श्रीनारद ऋषिने कहा- मुझे भगवत्-ज्ञानका उपदेश करनेवाले महात्मागण जब किसी दूसरे स्थानपर चले गये, तब अपने जीवनकी प्राथमिक (बाल्यावस्था) मैंने इस प्रकार व्यतीत की-॥५॥
एकात्मजा मे जननी योषिन्मूढा च किङ्करी।
मय्यात्मजेऽनन्यगतौ चक्रे स्नेहानुबन्धनम् ॥ ६ ॥
मेरी माँ एक अबला स्त्री थी। वह स्वभावसे ही बुद्धिहीन और पराधीन दासी थी। मैं ही उसका एकमात्र पुत्र था। अतः मेरी अन्य कोई गति न देखकर वह मुझसे अत्यधिक स्नेह करती थी ॥ ६॥
सास्वतन्त्रा न कल्पासीद् योगक्षेमं ममेच्छती।
ईशस्य हि वशे लोको योषा दारुमयी यथा ॥ ७॥
वह मेरी रक्षा तथा पालन-पोषणकी बहुत चिन्ता करती थी, परन्तु पराधीन होनेके कारण कुछ कर नहीं पाती थी। जिस प्रकार कठपुतली अपने नचानेवालेकी इच्छाके अनुसार ही नाचती है, वैसे ही प्राणीमात्र ईश्वरकी इच्छाके अधीन होता है॥७॥
अहञ्च तद्ब्रह्मकुले ऊषिवांस्तदपेक्षया।
दिग्देशकालाव्युत्पन्नो बालकः पञ्चहायनः ॥ ८ ॥
मैं उस समय पाँच वर्षका बालक था तथा मुझे दिशा, देश एवं कालका कोई भी ज्ञान न था। सदैव माताके स्नेहपाशमें बँधे रहनेके कारण मैं उसका त्याग भी नहीं कर सकता था। अतः उसके स्नेह-पाशसे कब मुक्त हो पाऊँगा-इसी प्रतीक्षाके साथ मैं उसी ब्राह्मण-कुलमें वास करने लगा ॥ ८॥
एकदा निर्गतां गेहाद्दुहन्तीं निशि गां पथि।
सर्पोऽदशत् पदास्पृष्टः कृपणां कालचोदितः ॥ ९ ॥
एक बार रात्रिके समय मेरी माता गो-दोहनके लिए घरसे बाहर निकली। कालकी प्रेरणासे उसका पाँव एक साँपको छू गया और साँपने पथमें ही उस बेचारीको डस लिया ॥ ९॥
तदा तदहमीशस्य भक्तानां शमभीप्सतः ।
अनुग्रहं मन्यमानः प्रातिष्ठं दिशमुत्तराम् ॥ १०॥
भगवान् सदैव अपने भक्तोंके मङ्गलकी अभिलाषा करते हैं। उस समय मैंने अपनी माताकी मृत्युको भगवान्की कृपा माना और उत्तर दिशाकी ओर चल पड़ा ॥ १०॥
स्फीतान् जनपदांस्तत्र पुरग्रामव्रजाकरान् ।
खेटखर्वटवाटीश्च वनान्युपवनानि च ॥ ११ ॥
चित्रधातुविचित्राद्रीनिभभग्नभुजद्द्रुमान् ।
जलाशयाञ्छिवजलान् नलिनीः सुरसेविताः ॥ १२ ॥
चित्रस्वनैः पत्ररथैर्विभ्रमद्भ्रमरश्रियः ।
नलवेणुशरस्तम्बकुशकीचकगह्वरम् ॥१३॥
एक एवातियातोऽहमद्राक्षं विपिनं महत्।
घोरं प्रतिभयाकारं व्यालोलूकशिवाजिरम् ॥ १४ ॥
मैं अकेला ही उत्तर दिशामें तीव्र गतिसे चलता जा रहा था। मार्गमें मैंने बहुत-से धन-धान्यसे सम्पन्न देश और नगर, ब्राह्मण, शूद्रों और अहीरोंकी बस्तियाँ, रत्नोंकी खानें, कृषकोंकी खेड़े, पहाड़की तलहटीपर स्थित ग्राम, पुष्प-कुञ्ज (वाटिकाएँ), वन-उपवन तथा स्वर्ण-रत्नादि विविध धातुओंसे रञ्जित विचित्र पर्वत देखे। कहीं-कहीं मुझे विशाल वृक्ष दिखायी पड़े, जिनकी शाखाएँ हाथियोंकी सूँड़ोंसे टूटी हुई थीं। कहींपर स्वास्थ्यवर्धक पुण्य जलसे भरे हुए जलाशय थे, जिनमें देवताओंके प्रयोगमें आनेवाले कमल खिले हुए थे। फिर कहीं विविध प्रकारकी बोली बोलनेवाले पक्षियोंके कलरवकी ध्वनिसे आकृष्ट इधर-उधर विचरणशील भ्रमरोंके दलोंसे परिशोभित देवताओंके रमणीय आवास स्थल थे। इतना दीर्घ मार्ग पार करके मैं एक घन-घोर जङ्गलमें पहुँचा। वह जङ्गल नरकट, वेणु, सरपत (सेंठा), स्तम्भ आदि विविध प्रकारकी झाड़ियोंसे परिपूर्ण था तथा विपुल अन्तरालसे युक्त छिद्ररहित बाँस, कुश एवं कीचकके कारण वहाँका मार्ग अतीव दुर्गम, दुःसह और भयङ्कर था। उस जङ्गलकी लम्बाई-चौड़ाई भी बहुत अधिक थी और वह सर्प, उल्लू और सियारोंका क्रीड़ा-स्थल बना हुआ था ॥ ११-१४॥
परिश्रान्तेन्द्रियात्माहं तृट्परीतो बुभुक्षितः ।
स्नात्वा पीत्वा हृदे नद्या उपस्पृष्टो गतश्रमः ॥ १५ ॥
चलते-चलते मेरा शरीर क्लान्त हो गया और इन्द्रियाँ शिथिल पड़ गयीं। मैं भूख-प्याससे व्याकुल हो रहा था। तब मैंने नदीके जलमें स्नान, उस जलका पान और आचमन किया, जिससे मेरी थकावट दूर हो गयी ॥ १५ ॥
तस्मिन्निर्मनुजेऽरण्ये पिप्पलोपस्थ आश्रितः ।
आत्मनात्मस्थमात्मानं यथाश्रुतमचिन्तयम् ॥ १६ ॥
तदनन्तर उसी निर्जन वनमें मैं एक पीपलके पेड़के नीचे आसन लगाकर बैठ गया। तब मैं आत्म-बुद्धि द्वारा हृदयस्थित अन्तर्यामी परमात्माके उस मन्त्रोपदिष्ट स्वरूपका ध्यान करने लगा जिसके विषयमें उन महात्माओंने मुझे बतलाया था ॥ १६॥
ध्यायतश्चरणाम्भोजं भावनिर्जितचेतसा ।
औत्कण्ठ्याश्रुकलाक्षस्य हृद्यासीन्मे शनैर्हरिः ॥ १७ ॥
भक्ति-भावसे शुद्ध हुए हृदयमें श्रीहरिके चरणकमलोंका ध्यान करते-करते भगवान्को प्राप्त करनेकी तीव्र लालसासे मेरे दोनों नेत्रोंसे अश्रुधारा निकलने लगी। तब मेरे शुद्ध हृदयमें श्रीहरि धीरे-धीरे प्रकट हो गये। (उस समय हृदयकी तीनों वृत्तियाँ-नासिका, कान और नेत्र क्रमशः उनके अङ्ग-सौरभ, नूपुरकी सुमधुर ध्वनि और श्रीमुखके सौन्दर्यका रसास्वादन करने लगीं) ॥ १७ ॥
प्रेमातिभरनिर्भिन्नपुलकाङ्गोऽतिनिर्वृतः ।
आनन्दसंप्लवे लीनो नापश्यमुभयं मुने ॥ १८ ॥
हे महर्षि वेदव्यास ! गम्भीर प्रेमकी प्रचुरतासे भरा मेरा शरीर पुलकित और रोमाञ्चित हो उठा। मेरा हृदय अत्यधिक सुखका अनुभव करता हुआ परमानन्दके सागरमें डूब गया। उस समय मुझे न तो अपना भान रहा और न ही मैं ध्येय वस्तु-श्रीहरिको प्रत्यक्ष देख सका ॥ १८॥
रूपं भगवतो यत्तन्मनःकान्तं शुचापहम् ।
अपश्यन् सहसोत्तस्थे वैक्लव्याद् दुर्मना इव ॥ १९॥
भगवान् श्रीहरिके उस मनमोहक, अनिर्वचनीय तथा समस्त शोकोंका नाश करनेवाले रूपको सहसा न देख पानेके कारण मैं इस प्रकार दुःखी और व्याकुल हो गया, जिस प्रकार प्राप्त धन-सम्पत्तिके हरण हो जानेसे लोग दुःखी और व्याकुल हो जाते हैं। मेरा हृदय उस विरह दुःखसे अनमना-सा होकर व्याकुल हो गया और तब मेरा ध्यान भङ्ग हो गया ॥ १९॥
दिदृक्षुस्तदहं भूयः प्रणिधाय मनो हृदि ।
वीक्षमाणोऽपि नापश्यमवितृप्त इवातुरः ॥ २० ॥
पुनः भगवान्के उस रूपके दर्शनकी इच्छासे मैंने अपने हृदय और मनको समाहित किया और उन्हें देखनेका बहुत प्रयास किया, परन्तु देख नहीं पाया। अतृप्त रह जानेसे मैं व्याकुल और अधीर हो उठा ॥ २०॥
एवं यतन्तं विजने मामाहागोचरो गिराम्।
गम्भीरश्लक्ष्णया वाचा शुचः प्रशमयन्निव ॥ २१ ॥
अपनी इस व्याकुल अवस्थामें मैं निर्जन वनमें भगवान्के दर्शनके लिए बारम्बार चेष्टा करने लगा। यह देखकर वाणीके अगोचर रहनेवाले भगवान् श्रीहरि गम्भीर, स्नेहपूर्ण और मधुर वचनोंसे अपने अदर्शनसे उत्पन्न मेरे विरह-दुःख और शोकको दूर करते हुए कहने लगे – ॥ २१ ॥
हन्तास्मिन् जन्मनि भवान् मा मां द्रष्टुमिहार्हति ।
अविपक्वकषायाणां दुर्दर्शोऽहं कुयोगिनाम् ॥ २२ ॥
हे वत्स ! खेद है कि इस जन्ममें तुम पुनः मेरा दर्शन नहीं कर सकोगे। जिनकी सांसारिक कामना-वासनारूपी मलिनता दग्ध नहीं हुई है, ऐसे अपरिपक्व योगियोंके लिए मेरा दर्शन अत्यन्त दुर्लभ है ॥ २२ ॥
सकृद्यद्दर्शितं रूपमेतत् कामाय तेऽनघ।
मत्कामः शनकैः साधुः सर्वान् मुञ्चति हृच्छयान् ॥ २३॥
हे निष्पाप बालक ! तथापि मैंने एकबार जो तुम्हें अपने रूपकी झलक दिखलायी है, वह मेरे प्रति तुम्हारे अनुरागकी वृद्धिके लिए ही है। मुझमें अनुराग हो जानेपर ही साधु-पुरुष क्रमशः अपने हृदयकी सम्पूर्ण कामना-वासनाओंका भलीभाँति त्याग करनेमें समर्थ होते हैं ॥ २३॥
सत्सेवयादीर्घयापि जाता मयि दृढा मतिः।
हित्वावद्यमिमं लोकं गन्ता मज्जनतामसि ॥ २४ ॥
तुमने जो अति अल्पकाल मात्रके लिए साधु-सेवा की है, उसके द्वारा ही तुम्हारा चित्त मुझमें स्थिर हो गया है। अतएव अब तुम दासीके गर्भसे उत्पन्न अपनी इस मलिन-देहका परित्याग करके मेरे पार्षदत्वको प्राप्त करोगे ॥ २४ ॥
मतिर्मयि निबद्धेयं न विपद्येत कर्हिचित्।
प्रजासर्गनिरोधेऽपि स्मृतिश्च मदनुग्रहात् ॥ २५ ॥
मुझे प्राप्त करनेके लिए दृढ़तापूर्वक मुझमें अनुरक्त तुम्हारी यह बुद्धि कभी भी किसी प्रकारसे विलुप्त नहीं होगी। मेरी कृपाके प्रभावसे सृष्टि तथा प्रलयके समय भी तुम्हें अपने पूर्व जन्मकी स्मृति बनी रहेगी ॥ २५ ॥
एतावदुक्त्वोपरराम तन्महद्-भूतं नभोलिङ्गमलिङ्गमीश्वरम् ।
अहञ्च तस्मै महतां महीयसेशीर्णावनामं विदधेऽनुकम्पितः ॥ २६ ॥
इतना कहकर वे आकाशके समान सर्वव्यापी, अशरीरी, सर्वनियन्ता, विभुचैतन्य श्रीहरि मौन हो गये। उनकी कृपाका अनुभव करके महानसे भी महानतम उन भगवान्को मैंने सिर झुकाकर प्रणाम किया ॥ २६ ॥
नामान्यनन्तस्य हतत्रपः पठन्गुह्यानि भद्राणि कृतानि च स्मरन् ।
गां पर्यटंस्तुष्टमना गतस्पृहःकालं प्रतीक्षन्नमदो विमत्सरः ॥ २७ ॥
तभीसे मैं उस (अपनी मलिन-देहको त्यागकर भगवान्के पार्षदत्वको प्राप्त करनेके) कालकी प्रतीक्षा करते हुए लज्जा-सङ्कोचको छोड़कर भगवान् अनन्तदेवके मङ्गलमय नामोंका निरन्तर कीर्त्तन और उनकी रहस्यमय लीलाओंका स्मरण करते-करते पृथ्वीपर पर्यटन करने लगा। इसके फलस्वरूप मेरा हृदय सन्तुष्ट हो गया और समस्त प्रकारकी कामनाओंका परित्याग करके मैं अहङ्कार और मात्सर्यसे रहित हो गया ॥ २७ ॥
एवं कृष्णमतेर्ब्रह्मन्नासक्तस्यामलात्मनः ।
कालः प्रादुरभूत् काले तडित् सौदामनी यथा ॥ २८ ॥
हे ब्रह्मज्ञ ! इस प्रकार मेरा जीवन कृष्णमय हो गया। हृदय कृष्णानुरागमें मग्न रहने लगा तथा अन्तःकरण शुद्ध हो जानेके कारण मेरी स्वरूप-सिद्धि हो गयी अर्थात् मुझे अपने स्वरूपका अनुभव हुआ। इसीके साथ ही स्थूल देहको छोड़नेका समय भी आ गया और आकाशमें बिजलीके चमकनेके समान सहसा मृत्यु आकर उपस्थित हुई ॥ २८ ॥
प्रयुज्यमाने मयि तां शुद्धां भागवतीं तनुम् ।
आरब्धकर्मनिर्वाणो न्यपतत् पाञ्चभौतिकः ॥ २९ ॥
श्रीहरिके कथनानुसार जब मैं भगवत्-कृपासे अपनी उस शुद्धसत्त्वमय, अप्राकृत, चिन्मय, भगवत्-पार्षदोचित भागवती तनु (१) प्राप्त करनेके योग्य हो गया, तब मेरे प्रारब्ध कर्मोंका नाश हो गया और मेरा पाञ्चभौतिक शरीर नष्ट हो गया ॥ २९ ॥
(१) स्वरूप-सिद्ध भक्त द्वारा भगवान्की सेवाके उपयोगी उपकरणरूप अपनी चिन्मय प्रतीतिको ही शुद्ध भागवती तनु कहा जाता है।
कल्पान्त इदमादाय शयानेऽम्भस्युदन्वतः ।
शिशयिषोरनुप्राणं विविशेऽन्तरहं विभोः ॥ ३० ॥
कल्पके अन्तमें इस विश्वका ध्वंस करनेके लिए श्रीनारायणने एकार्णव (प्रलयकालीन समुद्र) के जलमें शयन किया, तब शयन करनेके इच्छुक भगवान्के अन्तरमें उनके निःश्वासके साथ मैंने भी प्रवेश किया ॥ ३०॥
सहस्रयुगपर्यन्ते उत्थायेदं सिसृक्षतः ।
मरीचिमिश्रा ऋषयः प्राणेभ्योऽहञ्च जज्ञिरे ॥ ३१ ॥
इस प्रकार एक हजार चतुर्युगोंके बीत जानेपर भगवान् पुनः जाग्रत हुए। तब उनके द्वारा विश्व-सृष्टि करनेकी इच्छा करनेपर उनकी इन्द्रियोंसे मैं भी मरीचि आदि प्रमुख ऋषियोंके साथ प्रकट हो गया ॥ ३१ ॥
अन्तर्बहिश्च लोकांस्त्रीन् पर्येम्यस्कन्दितव्रतः ।
अनुग्रहान्महाविष्णोरविघातगतिः क्वचित् ॥ ३२ ॥
तभीसे भगवान् श्रीहरिकी कृपासे मैं वैकुण्ठादि अप्राकृत लोकोंमें तथा इस जगत्के तीनों लोकोंमें बाहर और भीतर सर्वत्र बिना किसी रोक-टोकके विचरण किया करता हूँ। भगवत्-भक्तिमें मेरी निष्ठा अखण्ड होनेके कारण ही ऐसा सम्भव हुआ है ॥ ३२॥
देवदत्तामिमां वीणां स्वरब्रह्म-विभूषिताम्।
मूर्च्छयित्वा हरिकथां गायमानश्चराम्यहम् ॥ ३३ ॥
मैं भगवान् द्वारा प्रदत्त सप्तस्वर(१ )-स्वरब्रह्मसे स्वाभाविक रूपमें झंकृत इस वीणापर मूर्च्छनासे आलाप करते हुए अर्थात् तान छेड़कर श्रीहरिके नामों और गुणोंका कीर्त्तन करता हुआ सर्वत्र विचरण करता हूँ ॥ ३३ ॥
(१) षडज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत और निषाद आदि ब्रह्मव्यञ्जक सप्तस्वर।
प्रगायतः स्ववीर्याणि तीर्थपादः प्रियश्रवाः ।
आहूत इव मे शीघ्रं दर्शनं याति चेतसि ॥ ३४॥
जब मैं उन उत्तमश्लोक श्रीहरिकी लीलाओंका भलीभाँति गान करता हूँ, जिनके श्रीचरणकमल समस्त तीर्थोंके उद्गमस्थल हैं, तब वे आह्वान किये गये व्यक्तिकी भाँति तुरन्त ही मेरे हृदयमें प्रकट हो जाते हैं ॥ ३४॥
एतद्ध्यातुरचित्तानां मात्रास्पर्शेच्छया मुहुः ।
भवसिन्धुप्लवो दृष्टो हरिचर्यानुवर्णनम् ॥ ३५ ॥
जिनका चित्त सदैव विषय-भोगकी वासनाओंसे व्याकुल हो रहा है, उनके लिए श्रीहरिचरित्र-कथाका निरन्तर कीर्त्तन ही भवसागरसे पार होनेका एकमात्र उपाय है। प्रत्यक्ष, परोक्ष और अपरोक्ष सब प्रकारसे मेरा यही अनुभव है, अतः इसमें किसी प्रमाणकी आवश्यकता नहीं है ॥ ३५ ॥
यमादिभिर्योगपथैः कामलोभहतो मुहुः ।
मुकुन्दसेवया यद्वत् तथाद्धात्मा न शाम्यति ॥ ३६ ॥
निरन्तर काम-लोभादि रूप शत्रुओंके वशीभूत अशान्त मन भगवान् श्रीमुकुन्दकी सेवाके द्वारा जिस प्रकारसे प्रत्यक्ष शान्तिका अनुभव करता है, यम-नियमादिसे युक्त अष्टाङ्गयोग-मार्गका अवलम्बन करनेसे वह वैसा शान्त नहीं हो पाता ॥ ३६ ॥
सर्वं तदिदमाख्यातं यत् पृष्टोऽहं त्वयानघ।
जन्मकर्मरहस्यं मे भवतश्चात्मतोषणम् ॥ ३७ ॥
हे निष्पाप ! आपने मुझसे जो कुछ पूछा था, उसीके अनुसार मैंने आपको अपने जन्म-कर्मादि गुह्य विषय अर्थात् साधन-सिद्धिका रहस्य तथा आपके चित्तकी प्रसन्नताका उपाय आदि सभी कुछ बतला दिया। ये सब रहस्य वेदान्तदर्शियोंके लिए भी अत्यन्त दुर्लभ है ॥ ३७ ॥
श्रीसूत उवाच –
एवं सम्भाष्य भगवान् नारदो वासवीसुतम् ।
आमन्त्र्य वीणां रणयन् ययौ यादृच्छिको मुनिः ॥ ३८ ॥
श्रीसूत गोस्वामीने कहा- इस प्रकार महर्षि वेदव्यासके साथ सम्भाषण करनेके उपरान्त देवर्षि नारदजीने उनसे जानेकी अनुमति ली। तब इच्छानुसार विचरण करनेवाले वे महायोगी श्रीनारद वीणावादनके साथ श्रीहरिके गुण गाते-गाते वहाँसे चल दिये ॥ ३८ ॥
अहो देवर्षिर्धन्योऽयं यत्कीर्तिं शार्ङ्गधन्वनः ।
गायन्माद्यन्निदं तन्त्र्या रमयत्यातुरं जगत् ॥ ३९ ॥
अहा ! श्रीहरिकीर्त्तनमें रत नारदमुनि धन्य हैं, जो शार्ङ्गपाणि (१) भगवान् श्रीविष्णुके यशोगुणको अपने वीणायन्त्रमें गान करते हुए स्वयं तो प्रसन्नचित्त रहते ही हैं और साथ ही विषयभोगोंसे तप्त विश्ववासियोंको भी सर्वदा कृष्ण-प्रेमानन्द प्रदान करके आनन्दित करते रहते हैं॥ ३९ ॥
(१) शार्ङ्गपाणि अर्थात् शार्ङ्ग नामक धनुषको धारण करनेवाले।)
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे ब्रह्मसूत्र-भाष्ये पारमहंस्यां संहितायां वैयासिक्यां प्रथमस्कन्धे व्यासनारद-संवादो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥