लम्बे समय के बाद मुझे राधाकृष्ण के झूलन-यात्रा के दौरान कोलकाता मठ में रहने का अवसर मिला है। साधारणतः हम लोग, इस उत्सव के लिए वृंदावन जाते थे और जन्माष्टमी पर हम कोलकाता लौट आते हैं, किन्तु स्वास्थ्य दुर्बल होने कारण मुझे यात्रा करने से मना कर दिया गया, भगवान की इच्छा से मैं यहाँ हूँ। भगवान मंगलमय है, वे जो कुछ भी करते हैं, वह मेरे और सभी के मंगल के लिए होता है। भगवान् की इच्छा के बिना कुछ भी नहीं किया जा सकता है। यदि भगवान की स्वीकृति के बिना पेड़ का एक पत्ता भी हिल सकता है, तो भगवान की भगवत्ता की हानि होती है। इस पूरे संसार में जो कुछ भी हो रहा है, वह भगवान् के नियंत्रण में हो रहा है। भगवान ने हमें कर्म करने का अधिकार दिया है। कृष्ण भगवत गीता में कहते हैं, (i>”कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेशु कदाचना”- आप को कर्म करने का अधिकार है, किन्तु उनके फल पर आपका अधिकार नहीं है। आप अपराध-पाप आदि कर सकते हैं, किन्तु उस कर्म का फल बद्ध जीव के हाथ में नहीं है, भगवान के हाथ में है। आप अच्छे या बुरे कर्म कर सकते हैं, किन्तु उन अच्छे या बुरे कर्मों का परिणाम परमेश्वर पर निर्भर करता है। हमें इस बात की चिंता नहीं करनी चाहिए कि इस संसार में क्या हो रहा है। यह संसार कारागार है, उन सभी व्यक्तियों के लिए, जो परमेश्वर से आए हैं। उनके नित्य सेवक होते हुए भी, अपनी स्वतंत्रता के दुरुपयोग के कारण वे उनके विमुख हो गए हैं। हम भगवान को नहीं चाहते हैं, हम इस संसार को भोग करना चाहते हैं, इसलिए उन्होंने इन सभी लोक एवं विभिन्न योनियों का निर्माण किया। हमें संतुष्ट करने के लिए हम एक चींटी भी नहीं बना सकते। ८० लाख योनियों में भ्रमण करने के बाद हमें यह मानव जन्म मिलता है। इस जन्म में भगवान ने हमें अच्छे और बुरे, नित्य और अनित्य के बीच के अंतर को समझने की विवेकबुद्धि दी। आप को सभी अनित्य वस्तुओं को त्याग कर नित्य सत्य वस्तु का स्वीकार करना चाहिए। भगवान नित्य वास्तव सत्य वस्तु हैं।आपको उनका भजन करना चाहिए। यह मानव जन्म देवताओं के जन्म से अधिक मूल्यवान है, उन (देवताओं) के पास प्रचुर मात्रा में ऐश्वर्य है, जो भजन के लिए अनुकूल नहीं है। मानव जन्म भजन के लिए अनुकूल है। हमें यह दुर्लभ जन्म मिला है, हमें इसका एक क्षण भी अन्य कार्यो में नहीं लगाना चाहिए। मनुष्य की सृष्टि करने के बाद, भगवान संतुष्ट हुए, क्यों? क्योंकि इस मानव जन्म में ही हम भगवान् का भजन कर सकते हैं। यदि आप इस अवसर को पाकर भी भजन नहीं करते हैं और आप इस अवसर को गँवा देते है, तो मृत्यु के बाद आप पुनः मानव जन्म प्राप्त होगा कि नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं है। कोई गारंटी नहीं दे सकता।
आज राधाकृष्ण के झूलन उत्सव का चौथा दिन है। वास्तव में झूलन उत्सव में बद्ध जीवों या साधारण साधकों को प्रवेश करने का अधिकार नहीं है। फिर भी, हमारे गुरुवर्ग ने कुछ हद तक भगवान की इस प्रकार से उपासना का प्रचलन किया। यह भगवान की एक प्रकार की सेवा है।
राधाकृष्ण सभी के प्रेम के पात्र हैं। जहाँ ऐश्वर्य है, वहाँ प्रेम शिथिल हो जाता है। हम वास्तव में अभी लक्ष्मी-नारायण की पूजा कर रहे हैं, राधाकृष्ण की नहीं। हम राधाकृष्ण का भजन करने के अधिकारी नहीं हैं, क्योंकि हम उस अवस्था तक नहीं पहुंचे हैं, जो पूरी तरह माधुर्य-मयी सेवा है। फिर भी चैतन्य महाप्रभु इस कलियुग में ही राधाकृष्ण के उस दिव्य प्रेम को प्रदान करने के लिए इस जगत में प्रकट हुए, इसलिए हम भाग्यशाली हैं। ब्रह्मा जी के १ दिन की, आप गणना भी नहीं कर सकते। अभी हम सातवें मन्वन्तर, ‘वैवस्वत मन्वन्तर’ में हैं। मन्वंतर एक मनु के जीवन की अवधि है। चतुर्युग में चार युग होते हैं – सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग। वैवस्वत मन्वंतर के २८ वे चतुर्युग के द्वापरयुग में, कृष्ण प्रकट हुए, नंदनंदन कृष्ण, ब्रह्मा के एक दिन में केवल एक बार प्रकट होते हैं। हम कहते हैं कि उन्होंने द्वापरयुग में आपनी लीलाएँ कीं किन्तु वास्तव में उनकी लीलाएं निरंतर चल रही हैं। इसलिए हम वर्तमान काल का उपयोग करते हैं। अनंत ब्रह्माण्ड हैं और एक ब्रह्माण्ड में हो सकता है कि उनकी लीलाएँ समाप्त हो जाएँ, फिर भी उनका जन्म, बाल्य और अन्य सभी लीलाएँ अन्य ब्रह्माण्डों में चल रही है। उनकी लीलाएँ नित्य हैं। ये लीलाएं निरंतर चल रही हैं। जब भगवान कृष्ण यहाँ प्रकट हुए, तो उस समय के सभी लोगों का उनसे सीधा संपर्क था। वे उन्हें देख तो सकते थे, किन्तु उन्हें समझ नहीं सकते थे। केवल उत्तम भक्त, जिनका कृष्ण के साथ मधुर रमणीय संबंध था, वे ही उन्हें समझ सकते थे। अन्य तो कृष्ण के विरुद्ध युद्ध भी किया, वे उन्हें समझ नहीं पाए। किन्तु परम करुणामय कृष्ण ने सोचा, “मैं अगले कलियुग में सभी को यह दिव्य प्रेम दूंगा। राधारानी की अंगकान्ति और भाव को लेकर, मैं चैतन्य महाप्रभु के रूप में प्रकट होऊंगा और बिना किसी जाती या धर्म के विचार से इस दिव्य प्रेम को वितरित करूंगा।
इसलिए, यह महाप्रभु का यह आदेश है (प्रत्येक व्यक्ति के द्वार पर जाकर, उस दिव्य प्रेम को वितरित करना)। इसलिए चैतन्य महाप्रभु के अनुयायी, उनके आदेश का पालन करने के लिए अलग-अलग स्थानों पर भ्रमण करते हैं, अन्यथा भ्रमण करने से क्या लाभ है? क्योंकि वृंदावन-धाम और सब कुछ यहीं है और उन्होंने अपना जीवन सेवा के लिए समर्पित कर दिया है इसलिए विभिन्न स्थानों(विदेश) में भ्रमण करने की उन्हें कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन यह चैतन्य महाप्रभु का आदेश है, “हरिनाम के अतिरिक्त भगवान की बहिरंगा शक्ति माया के चुंगल से मुक्त होने का कोई अन्य उपाय नहीं है- यह सभी को सूचित किया जाना चाहिए। उन्हें क्यों वंचित किया जाना चाहिए? अन्य किसी प्रकार से उन्हें बचाया नहीं जा सकता, यह उन्हें सूचित करना चाहिए। इसलिए, आपको जाकर उनसे हरिनाम करने का अनुरोध करना चाहिए, भगवान के पवित्र नाम का जप करना चाहिए।” यह आदेश उन्होंने स्वयं शिक्षा अष्टक के आठ श्लोकों में दिया है।
पहला श्लोक,
चेतो-दर्पण-मर्जनं भव-महा-दवग्नि-निर्वापनम
श्रेयः-कैरव-चंद्रिका-वितरणम् विद्या-वधु-जीवनम्
आनंदबुधि-वर्धनम प्रति-पदम पूर्णमृतस्वादनम्
सर्वात्मा-स्नपानं परम विजयते श्री-कृष्ण-संकीर्तनम्
श्रीकृष्ण संकीर्तन के द्वारा आप सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त कर सकते हैं। ‘श्री’ का अर्थ है, कृष्ण की अन्तरंग शक्ति ‘राधा’। राधाकृष्ण अर्थात् महामंत्र। महामंत्र जप करने से सब कुछ प्राप्त हो जायेगा। आपका मन शुद्ध होगा। सभी प्रकार की जागतिक कामनाएं दूर हो जाएगी। मानसिक अशांति दूर हो जाएगी, जब इच्छाएं ही नहीं होंगी तो ऐसी अशांति कैसे आएगी? हरिनाम करने से आपको जो पहला फल मिलता है, वह है आपकी सभी प्रकार की जागतिक कामनाएं दूर हो जाएगी। आपका चित्त शुद्ध होगा, आपको ज्ञानियों या योगियों की तरह किसी अन्य प्रकार की साधना करने की आवश्यकता नहीं है। दस नाम-अपराध छोड़कर हरिनाम करना से सब कुछ प्राप्त हो जायेगा।
‘भव-महा-दावग्नि-निर्वापणम्’-दावानल अर्थात् जंगल की आग, तुम इससे बच जाओगे। और इससे न केवल तुम बच जाओगे; तुम्हें परम आनंद मिलेगा, परम शांति मिलेगी। परम मंगलमय भगवान वहाँ प्रकट हो जाएँगे। अभी आप केवल श्रवण रहे हैं, “मैं भगवान् की तटस्था शक्ति का अंश हूं। मैं उनका नित्य सेवक हूँ।” किन्तु हमें इसकी अनुभूति नहीं है। भक्ति-योग से, आपको वह अनुभूति प्राप्त होगी। क्या आपको स्मरण है कि स्वामी महाराज ने इस बारे में बहुत ही सरल शब्दों में क्या कहा था? गीता के नौ वें अध्याय में कहा गया है कि यह भक्ति योग ज्ञान का राजा है। भक्ति योग सभी रहस्यों ज्ञान है। यह सबसे शुद्ध ज्ञान है, और क्योंकि वास्तविक स्वरूप की अनुभूति करवाता है इसलिए यह सभी धर्मों की पूर्णता है। यह चिरस्थायी है और आप इसे सरल तरीके से निभा सकते हैं। आपको इस दुनिया में सब कुछ मिलेगा। भक्ति योग में कलियुग में हरिनाम को प्राथमिक महत्व देना है। आप अन्य भक्ति के अंगो को भी कर सकते हैं, किन्तु आपको इसे संकीर्तन के साथ करना होगा, बिना संकीर्तन के नहीं। आपको संकीर्तन के साथ ही सब कुछ करना चाहिए।
झूलन उत्सव में केवल गोपियों को ही प्रवेश की अनुमति है। गोपीयों का प्रेम, प्रेम का उच्चतम स्तर है, जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। कृष्ण के प्रति गोपियाँ का प्रेम हमारी कल्पना से परे है! विधि भक्ति द्वारा हम इन लीलाओं में प्रवेश नहीं प्राप्त कर सकते। झूलन उत्सव को हम प्रतिदिन कार्तिक में मध्याह्न की राधुकुंड की लीलाओं में स्मरण करते हैं। ‘दोला-खेला’ का अर्थ है ‘झूलन उत्सव’। ‘झूलन उत्सव’ में केवल राधा कृष्ण और गोपियां ही होती हैं। यहां तक कि नंद महाराज, यशोदा देवी, अन्य सखा और सेवकों को भी इस लीला में प्रवेश की नहीं है। किन्तु फिर भी हम भक्ति के किसी भी स्तर में हो, हमारे गुरुवर्ग ने हमें विधिभक्ति के द्वारा विग्रह सेवा, अर्चन सेवा का आदेश दिया है। (हम अर्चन-भक्ति द्वारा चार-पांच दिनों तक झूलन लीलाओं की सेवा को कर सकते हैं)। यह वैधी-भक्ति है, शास्त्रों के निति-नियमों द्वारा नियंत्रित किया है। किन्तु कृष्ण कहते हैं,
विधि-भक्ति ते व्रज भाव पाईते नाहीं शक्ति,
विधि-भक्ति में भय है, किन्तु कृष्ण-प्रेम में भय नहीं है। व्रज में कोई भय नहीं होता।
चैतन्य चरितामृत में लिखा है, कृष्ण कहते हैं,
ऐश्वर्य-ज्ञानेते सब जगत मिश्रित
ऐश्वर्य-शिथिल-प्रेमे नहीं मोर प्रीत
“सम्पूर्ण संसार ऐश्वर्य से आकर्षित होता है किन्तु ऐश्वर्य भाव में मेरी पूजा करने से कोई मुझे प्राप्त नहीं कर सकता। मैं ही केवल-प्रेम का पात्र हूँ।”
वह आगे कहते हैं, “आमारे ईश्वर माने अपना के हीन, तार प्रेमे वस अमी न है अधिन” – वे मुझे नियंत्रक (ईश्वर) और स्वयं को मेरे अधीनस्थ मानते हैं। किन्तु इस भाव में मेरी पूजा करने से वे मुझे प्राप्त नहीं कर सकते।
हमें सिखाया जाता है कि भगवान सर्व शक्तिमान हैं, वे सर्वज्ञ हैं, सर्व-व्यापक, सर्व-ज्ञानमय, सर्व-आनंदमय हैं और हमें 32 प्रकार के अपराधों से बचते हुए उनका भजन करना चाहिए। हमें भय है कि हम उनकी सेवा में अपराध करेंगे। किन्तु नंदनंदन कृष्ण सभी जीवो के प्रेम के पात्र हैं। वे कहते हैं, “मोर पुत्र, मोर सखा, मोर प्राणपति, एई-भावे ये मोरे करे शुद्ध-भक्ति आपना के बड़ माने आमाके सम-हीन, सेई भावे हई आमि ताहाँरे अधीन ” – जो मुझे अपना पुत्र मानता है, अपना सखा, अपना प्रियतम और अपने आप को मेरे समान या मुझे हीन समझता, है, मैं उसके अधीन हो जाता हूँ।”
‘वह मेरा पुत्र, मेरा सखा, मेरा प्रियतम है’ – उस सेवा भाव में किसी भी प्रकार के ऐश्वर्य की कोई बाधा नहीं है। गोपियाँ उनकी परकीय भाव से आराधना करती हैं, यह तुम नहीं समझ सकते। इस विषय में आपको सावधान रहना चाहिए।अप्राकृत भगवद धाम वृंदावन वास्तव है और यहाँ इस जगत में जो आप देख रहे हैं वह उस अप्राकृत जगत का विकृत प्रतिबिंब है। यहाँ शांत-रस सर्वोच्च है। यहाँ सब कुछ अनित्य है, यदि आप इस में आसक्त हो जायेंगे, तो आपको दु:ख मिलेगा। अनित्य वस्तुओं से जितनी आसक्ति होगी आपको उतना ही दु:ख मिलेगा। शांत-रस में, आप कृष्ण के साथ प्रत्यक्ष सम्पर्क नहीं कर सकते। वृंदावन में शांत-रस सबसे निम्न है, जबकि यहाँ इस जगत में यह सर्वोच्च है। यहाँ गोपियों का प्रेम सबसे निम्न है, अवैध संबंध को इस जगत में सबसे निम्न माना जाता है। यहां हम अनित्य शरीर में आसक्त है और इसलिए हम भयंकर दु:खों से पीड़ित हैं। यह विकृत प्रतिबिंब है। जब हम कृष्ण का अपने स्वामी के रूप में भजन करना नहीं चाहते हैं तो हमें इस जगत में अनित्य स्वामी की सेवा करनी होगी और यह हमारे लिए दंड विधान है। कृष्ण कहते हैं, “यदि आप मुझे स्वामी के रूप में सेवा नहीं करना चाहते हैं तो मैं आपको अनित्य स्वामी या अनित्य सेवक दे रहा हूँ।” अब स्वामी और सेवक के बीच कुछ संबंध या लगाव विकसित होता है, इसलिए स्वामी की मृत्यु पर सेवक को विरह का दुःख होगा या सेवक की मृत्यु पर स्वामी को विरह का दुःख होगा। किन्तु जब किसी प्रिय साथी की मृत्यु होगी तो विरह का दुःख भी उतना तीव्र होगा।
दास्य से सख्य रस में प्रीति और भी गाढ है। वैकुंठ में भी नारायण के साथ सख्य-रस-मित्रता का संबंध है, किन्तु वहाँ सख्य रस संकुचित है। किन्तु वृन्दावन में ऐसा कोई संकोच नहीं है। वे कृष्ण के कंधों पर भी चढ़ जाते हैं। (यह कैसी भक्ति है! की वे आराध्य वस्तु पर चढ़ते हैं? हाँ, यही भक्ति है।)
वे कहते हैं, “हे कृष्ण,तुम हमारे मित्र हो, तुम हमारे समान हो। किन्तु तुम्हारे पास कुछ अधिक शक्ति है; तुम बहुत शक्तिमान हो, इसलिए तुम सब से निचे रहना और हम तुम्हारे कंधों पर चढ़कर तुम को पेड़ से फल दिलाएंगे।” इस तरह वे ऊपर, ऊपर, ऊपर, ऊपर (एक दूसरे के कंधे पर चढ़ते हुए) जाते हैं और कृष्ण सब से निचे खड़े हो जाते हैं। वे कृष्ण को सब से मीठा फल देना चाहते हैं। सब से ऊपर का सखा पहले फल को चखकर देखता है की यह मीठा है, खट्टा है या कडवा है? “आह, यह बहुत मीठा है! इसे कृष्ण को दे दो” और अगले को जाता है। अगला भी चखता है कि यह सच है या झूठ, “मुझे स्वाद लेने दो।” इस तरह चार-पांच मित्र उस फल का स्वाद चखकर कृष्ण को दे देते हैं, कृष्ण बहुत संतुष्ट होकर उसे ग्रहण करते हैं, इस प्रकार के प्रेम को हम कैसे समझ सकते हैं?
फिर भी, इस झूलन लीला में में सखाओं का भी प्रवेश नहीं है। नंद-यशोदा का प्रेम सखाओं से भी अधिक है, परन्तु उनका भी उसमे प्रवेश नहीं है। गोपियों के प्रेम की स्थिति बहुत उच्च है, इस विषय में मैं और अधिक नहीं कहना चाहता हूँ। इस संसार में उसे निम्न माना जाता है, परन्तु उस संसार में वह सर्वोच्च है, क्योंकि आराधना का विषय कृष्ण हैं। गोपियों का विवाह यावट में होता है और उनका संबंध कृष्ण से है, सर्वोच्च संबंध।
वैराग्य (त्याग) कैसे प्राप्त करें, सिद्धार्थ (बुद्ध) के त्याग और रघुनाथ गोस्वामी के त्याग के बीच बहुत बड़ा अंतर है। इसे हमें समझना होगा। बाह्य रूप से, उन दोनों ने सब कुछ त्याग दिया। किन्तु बुद्ध का त्याग नकारात्मक त्याग है, जबकि रघुनाथ गोस्वामी का त्याग सकारात्मक है। क्योंकि उन्हें राधाकृष्ण से अत्यधिक प्रेम है और इसके परिणाम स्वरूप उन्हें सांसारिक चीजों के प्रति अत्यधिक उदासीनता हो गई। यह सकारात्मक है। किन्तु बुद्ध का त्याग नकारात्मक ही है। “मैं इन अनित्य वस्तुओं से आकर्षित नहीं होऊंगा, नैति, नैति, नैति, नैति … यह नहीं, यह नहीं, यह नहीं …” किन्तु कोई सकारात्मक पहलू नहीं है। गीता में हमारे भक्ति विनोद ठाकुर इस विषय में बताया है,
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते।।
गीता 2.59
“जब कोई व्यक्ति उच्च रस का आस्वादन करता है, तो निम्न रस के प्रति उसका लगाव स्वतः ही समाप्त हो जाता है।“
इस का क्या अर्थ है? हम सोचते हैं कि जब हम उपवास करते हैं, तो हमने भोजन करने की इच्छा छोड़ दी है? नहीं, हमने कोलकाता मठ में देखा है जब भक्त उपवास करते हैं, खासकर युवा ब्रह्मचारी, युवा लड़के, उन्हें अधिक भूख लगती है, वे कई व्यंजन (पहले से) तैयार करते हैं ताकि एकादशी के ठीक बाद, अगले दिन तुरंत सुबह वे खा सकें। एकादशी के दिन उन्होंने खाना छोड़ दिया या कुछ फल ले लिया, किन्तु अगले दिन सुबह वे दोगुना खाते हैं। एकादशी का व्रत करने से भोजन ग्रहण करने की इच्छा समाप्त नहीं होती है। विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः – भोजन न करने या इंद्रियों के विषयों को नहीं ग्रहणकर, हम इंद्रियों को नियंत्रित नहीं कर सकते। किन्तु योगी, ज्ञानी ऐसा करने का प्रयास करते हैं (वे इंद्रियों के विषयों को इंद्रियों से दूर रखकर अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं)। हमारे भक्तिविनोद ठाकुर कहते हैं, यह इंद्रियों को नियंत्रित करने की सही प्रक्रिया नहीं है, यह व्यर्थ होगी। आपको परम आनंद का आस्वादन करना चाहिए, रसो वै सहः पूर्ण सत्, पूर्ण ज्ञान, पूर्ण आनंद- कृष्ण। जब आप इसका स्वाद लेंगे, उस स्वाद का ज़रा भी स्वाद, सांसारिक चीजों की सभी इच्छाएं तुरंत समाप्त हो जाएंगी। आपको जितना उच्च रस का आस्वादन मिलता जाता है, उतना ही इस संसार की वस्तुओं के प्रति त्याग और वैरग्य बढ़ता जाता है। यही वास्तविक त्याग है। यदि एक व्यक्ति किसी निम्न गुणवत्ता के गुड़ का स्वाद ले रहा हो और दूसरा व्यक्ति उससे कहे, ”इसे मत लो, यह आपकी सेहत के लिए ठीक नहीं है।” तब बाहर से वह व्यक्ति कहेगा, “ओह, ठीक है, ठीक है, मैं इसे नहीं लूंगा।” किन्तु चुपके से खा लेगा, क्योंकि इसमें कुछ मिठास है, किन्तु यदि वह अच्छी गुणवत्ता वाले गुड़ या चीनी का स्वाद लेता है, तो उसके अन्दर निम्न गुणवत्ता वाला गुड़ लेने की इच्छा नहीं रहेगी। इसीप्रकार यदि आपको भगवान का अनुभव होता है, जो सभी पूर्ण सत्, पूर्ण ज्ञान, पूर्ण आनंदमय हैं (तब सांसारिक वस्तुओं की कोई कामना नहीं रहेगी)। किन्तु जब हम भगवान् से विमुख हो जाते हैं, तो माया हमें पकड लेती है, जो कि भगवान् की बहिरंगा शक्ति है। ऐसा लगता है कि यह संसार नित्य है, इसमें ज्ञान और सुख है किन्तु वास्तव में यहाँ सत्, ज्ञान, आनंद का पूर्णतया भाव है। यह रेगिस्तान में मृगतृष्णा की तरह है, जहाँ पानी नहीं है, किन्तु रेत पर सूर्य की किरणों के कारण, आप ऑप्टिकल भ्रम देखते हैं। वहाँ पानी का कोई अस्तित्व नहीं है, यदि तुम वहाँ जाओगे तो निराशा हाथ लगेगी। ऐसे ही यदि आप माया या इस भौतिक संसार के पीछे जाते हैं, तो आपको निराशा होगी।आप जिस दिशा में जा रहे हैं उससे पूर्णतया उल्टी दिशा मुड़ना होगा। आपको कृष्ण के बारे में सोचना चाहिए, आप उनके विमुख हैं, इसलिए माया में उलझे हुए हैं। भागवतम् में कहा है,
भक्ति: परेशानुभवो विरक्ति-
रन्यत्र चैष त्रिक एककाल:।
प्रपद्यमानस्य यथाश्नत: स्यु-
स्तुष्टि: पुष्टि: क्षुदपायोऽनुघासम्॥
(श्रीमद भागवतम ११.२.४२)
यहाँ एक उदाहरण दिया गया है, मान लीजिए आप एक किलोग्राम चावल ले सकते हैं, अब यदि आप चावल का एक निवाला लेते हैं तो उस हद तक आपको तुष्टि होगी, फिर पुष्टि, पोषण और भूख का तुष्टिकरण अर्थात् क्षुधा निवृत्ति, तीनों साथ-साथ होते रहेंगे, इस तरह आपको एक और निवाला मिलता है, तो जितने प्रमाण में भोजन आप ग्रहण करते जाते हो, उतने प्रमाण में संतुष्टि, पोषण और भूख का तुष्टिकरण मिलता है। जब आप पूरा ले लेंगे, तो आपको ये तीनों पूरा मिल जाएगा। उसी प्रकार भगवान् में शरणागत व्यक्ति तो भक्ति, भगवान् का अनुभव और संसार से वैराग्य साथ-साथ होता जायेगा, किन्तु ऐसा तब ही होता है, जब कोई पूरी तरह से शरणागत व्यक्ति भक्ति करता है। जहाँ समर्पण नहीं है, वहाँ भक्ति नहीं हो सकती। जिसने वास्तव में भगवान की शरण नहीं ली है, अशरणागत व्यक्ति, वे कर्म कर रहे हैं, भक्ति नहीं। भक्ति क्या है? भक्ति क्या है? रूप गोस्वामी के लेखन में आपने पहले श्रवण किया है। आपको इसका चिंतन करना होगा। हमने रूप गोस्वामी के बारे में दो दिनों से उनके तिरोभाव तिथि के अवसर पर बात की है। रूप गोस्वामी के अनुसार भक्ति की परिभाषा क्या है,
सर्वोपाधि-विनिर्मुक्तं तत्-परत्वेन निर्मलम्।
हृषीकेण हृषीकेश-सेवनं भक्तिर् उच्यते॥
‘भक्ति’ क्या है? जागतिक अहंकार से आप जो कुछ भी करते हैं, वह ‘भक्ति’ नहीं है। तो उस क्रिया का फल आपके जागतिक अहंकार की ही वृद्धि करेगा कि भक्ति नहीं है। जब आपके कर्मों का फल आपके आराध्य की सेवा में जाएगा, तो वह ‘भक्ति’ है। बिना समर्पण या शरणागति के तुम कृष्ण को संतुष्ट नहीं कर सकते। बिना समर्पण के आपके कर्मों का फल आराध्य की सेवा में नहीं जायेगा। भक्ति के लिए पहली आवश्यक चीज है, सर्वोपाधि विनिमुक्तम, उपाधि का क्या अर्थ है? सामान्यत: उपाधि का अर्थ है title। उपाधि का अर्थ है, हमारे कर्म के अनुसार हमारा नामकरण। उदाहरण के लिए, मैंने किसी क्षेत्र में अपनी शिक्षा पूरी की है और मैं किसी एक विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बन गया हूँ, तो मेरे कार्य के कारण प्रोफेसरशिप मेरी विशेषता या योग्यता है। किन्तु ये “मै ‘ नहीं हूँ। यदि मैं वकील डॉक्टर या इंजीनियर बन जाऊं, किन्तु वास्तव में मैं इंजीनियर नहीं हूँ, तो यह उपाधि है। (उपाधि अर्थात् जो वस्तु बाहर से आती है )। मैं लंदन, अमेरिका या भारत में पैदा हुआ हूँ, ये सभी सांसारिक उपाधियाँ हैं। यदि इस प्रकार के सांसारिक अहंकार हैं, तो भक्ति नहीं होगी। वास्तव में हम इस संसार के नहीं हैं। सर्वोपाधि विनिर्मुक्तम, मैं भारत का नहीं हूँ, मैं ग्रेट ब्रिटेन या अमेरिका या रूस का नहीं हूँ। मैं भगवान कृष्ण का हूँ, उनके द्वारा हूँ, उनके लिए हूँ और मुझे उनके लिए रहना चाहिए। अज्ञानवश हम सोचते हैं कि हम इस संसार के हैं, यह मिथ्या अहंकार है। जब तक मिथ्या अहंकार या भ्रांति है, तब तक भक्ति नहीं हो सकती। ‘विनिर्मुक्तम्’ का क्या अर्थ है? मुक्तम् का अर्थ है, इस जागतिक अहंकार से मुक्त होना। रूप गोस्वामी ने यह श्लोक नारद पंचरात्र से दिया है। यही शास्त्रिय प्रमाण है।
साधकों को प्रभावित करने के लिए नारद पंचरात्र में कहा गया है, ‘निर्मुक्तम’ अर्थात, पूर्णतः मुक्त, ‘विनिर्मुक्तम’, वि- अर्थात् सूक्ष्म, सूक्ष्मतम, पूर्णत: मुक्त, उस पर इतना भाव दिया गया है। इस संसार से संबंध की रत्ती भर भी गंध नहीं रहनी चाहिए। यह संसार अमंगलमय- अशुभ है। मंगल या शुभता केवल भगवान् में है। वे परम मंगलमय हैं। जब आप अमंगलमय या अशुभ हो जाते हैं, तो आप मंगलमय या शुभ हरि की सेवा कैसे कर सकते हैं? इन सभी जागतिक अहंकारों से पूरी तरह से मुक्त होना होगा, इस संसार से कोई संबंध नहीं होना चाहिए। अगर मैं इस संसार का नहीं हूँ, तो मैं कौन हूँ? किन्तु केवलमात्र इस से आसक्ति को छोड़ देने से उद्देश्य पूर्ण नहीं होगा, आपको यह ज्ञात होना चाहिए कि मैं कौन हूँ? या मैं क्या हूँ? मैं कृष्ण का हूँ। जब तुम कृष्ण के साथ अपना संबंध पाओगे तो तुम्हें परम आनंद की प्राप्ति होगी आप भगवान के अन्य रूपों (राम, नारायण आदि) के साथ भी संबंध बना सकते हैं, किन्तु आपको वह पूर्णानंद नहीं मिलेगा, जो आपको कृष्ण के साथ सम्बन्ध-युक्त होकर मिलेगा। आपने इस धन्य कलियुग में जन्म लिया है, आप क्यों वंचित रहें? आपको गोपियों के समान परम प्रेम को पाने का अवसर मिला है। जब आप ‘मैं इस संसार का नहीं, कृष्ण का हूँ’ यह विचार में स्थापित हो जाएगे, और उसके बाद इंद्रियों के द्वारा जो कुछ भी आप करते हैं. वह ‘भक्ति’ है, उसके पहले इसे भक्ति नहीं कहा जाता है। भक्ति परेशानुभावो, जब शरणागत भक्त भक्ति करता है, तो उसे कुछ अनुभूति की प्राप्ति होती है, पूर्ण अनुभूति नहीं, जितने परिमाण में वैराग्य होगा उतने परिमाण में अनुभूति होगी। वे सांसारिक वस्तुओ के प्रति उदासीन रहेंगे। जब आप भजन करते हैं, तो क्या भजन में कोई प्रगति हो रही है या नहीं है? यह आप वैराग्य के परिमाण से समझ सकते हैं। जब भजन में प्रगति होगी तब भगवान् के प्रति कुछ परिमाण में अनुभूति या भावना उदित होगी और उस परिमाण में सांसारिक वस्तुओ में वैराग्य होगा। और कृष्ण के साथ आपका जितना संबंध होगा या कृष्ण का आस्वादन होगा, उतना ही संसार से त्याग और वैराग्य होगा। किन्तु यदि आप केवल अनित्य वस्तुओं का त्याग करते हैं, तो यह सुरक्षित नहीं है। हमारे भक्ति विनोद ठाकुर इस श्लोक की व्याख्या में कहते हैं, विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः। रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते।। आप इसे पढ़िए। योगी, ज्ञानी मूर्ख नं. १ हैं, इस प्रक्रिया से इन्द्रियों को वश में नहीं किया जा सकता, क्योंकि ये सारी इच्छाएँ हमें आत्मा से मिल रही हैं। आध्यात्मिक आत्मा की आध्यात्मिक इंद्रियां होती हैं। आप गलत जगह पर हैं और अब आप phantasmagoria (देखी या कल्पना की गई चीजों का लगातार बदलता जटिल क्रम) के पीछे भाग रहे हैं। तुम सांसारिक मदन, कामदेव के पीछे भाग रहे हो। किन्तु तुम्हें मदनमोहन, कृष्ण के पीछे भागना होगा। तब इस संसार के सभी आकर्षण, इंद्रियों के विषय दूर हो जाएंगे। यही वास्तविक वैराग्य है, त्याग है। यह आतंरिक हृदय से त्याग है और तब कोई भी सांसारिक आकर्षण कोई हानि नहीं कर सकता, क्योंकि उसको परम आनंद का आस्वादन हो गया है।
नरहरि चक्रवर्ती द्वारा लिखित एक बंगाली ग्रंथ, भक्ति रत्नाकर में लिखा है कि झूलन-यात्रा ब्रज मंडल के 12 वनों में से एक काम्यवन में होती है। दक्षिण भारत के एक गोस्वामी ने गोवर्धन में भजन किया। उस समय उन्होंने श्रीनिवास आचार्य और नरोत्तम ठाकुर को राधा कृष्ण की लीलाओं के सभी स्थान के दर्शन करवाए थे। जब वे काम्यवन आए तो उन्होंने उन्हें कदंब के पेड़ों के सूंदर उपवन दिखाए, जहाँ राधा कृष्ण और सभी सखियां आनंदमय अप्राकृत लीलाओं में डूब जाते हैं। वहाँ बहुत सी लीलायें संपन्न हुई है। उन लीलाओ में से एक है झूलन लीला। यह श्रावण मास में होती है। यह एकादशी से आरंभ होकर पूर्णिमा के दिन, 4 से 5 दिनों तक चलती है। आप झूलन उत्सव को श्री विग्रह के अन्य अर्चन और पूजन के रूप में कर सकते हैं। किन्तु आपके आराध्य राधाकृष्ण हैं, आप राधाकृष्ण का मंत्र करते हैं। जब आप इसे धीरे-धीरे करेंगे तो आप विधि मार्ग से ऊतीर्ण हो जायेंगे और राग मार्ग में प्रवेश करेंगे। आप छलांग मार कर इसे प्राप्त नहीं सकते, वह धीरे-धीरे आएगा। आप हरिनाम करते हैं और शुद्ध भक्तों का संग करते हैं तो यह धीरे-धीरे आएगा।
यहाँ उन्होंने श्रावण के महीने में झूलन (झूलना) उत्सव किया, किन्तु राधाकुंड में प्रतिदिन गोपियों द्वारा झूलन की जाती है। केवल गोपियाँ ही झूलन उत्सव करती हैं, देवताओं को भी उस लीला में प्रवेश की अनुमति नहीं है। यहां तक कि माता-पिता, मित्र और सेवक जैसे रक्तक, पत्रक, चित्रक को भी इन लीलाओं में प्रवेश की अनुमति नहीं है। हम इस झूलन उत्सव को, प्रतिदिन कार्तिक उत्सव में राधा कृष्ण के मध्याह्न लीला के अंतर्गत स्मरण करते हैं, इसे ‘दोला-खेला’ भी कहते हैं।
हम 5 दिनों तक अर्चन मार्ग की विधि के अनुसार इसे कर सकते हैं। हमारे गुरुवर्ग ने निर्देश दिए कि आप इसे संकीर्तन के माध्यम से, कृपा के लिए प्रार्थना करने के लिए कर सकते हैं, किन्तु उस अप्राकृत धाम में कब और कैसे प्रवेश होगा यह कह नहीं सकते हैं। किन्तु जब तक जागतिक अहंकार है, तब तक कोई संभावना नहीं है। किन्तु हमें निराश नहीं होना चाहिए।
चैतन्य महाप्रभु ने स्वरूप दामोदर का कंधे पर हाथ रखते हुए प्रसन्नता से कहा, “नाम संकीर्तन कलौ परम उपाय। मैंने राधा कृष्ण के संकीर्तन का महामंत्र दिया है। नाम में सब कुछ है। इसे दस नाम अपराधों को छोड़कर करें।