चौदहवां परिच्छेद
जय गौर-गदाधर जाहवाजीवन ।
जय सीतापति श्रीवासादि भक्तगण ।।1।।
श्रीगदाधर पंडितजी तथा श्रीगौरांग महाप्रभु जी की जय हो। श्रीमती जाहवा देवी जी के प्राण स्वरूप श्रीनित्यानन्दजी, सीतापति श्रीअद्वैताचार्य जी की जय हो तथा श्रीवास आदि जितने भी गौर भक्त हैं, सभी की जय हो, जय हो।
श्रीहरिदास ठाकुर जी को हरिनाम का आचार्य कहा गया है
महाप्रभु बले, शुन भक्त – हरिदास।
नाम – अपराध – तत्त्व करिले प्रकाश ।।2।।
इहाते कलिर जीव लभिवे मङ्गल ।
नामतत्त्वे तुमि हओ आचार्य प्रबल ।।3।।
श्रीमन् महाप्रभु जी ने कहा- मेरे प्रिय भक्त हरिदास ! आपने जिस प्रकार सभी नामापराधों के तत्त्व को प्रकाशित किया है, उससे कलियुग के सभी जीवों को मंगल की प्राप्ति होगी। इसीलिए तुम नाम-तत्त्व के एक प्रतिष्ठित आचार्य हो।
तव मुखे नामतत्त्व करिते श्रवण ।
आमार उल्लास बड़ शुन महाजन ।।4।।
आचारे आचार्य तुमि, प्रचारे पण्डित।
तोमार चरित नामरत्ने विभूषित ।।5।।
रामानन्द शिरवाइल मोरे रसतत्त्व।
तुमि शिखाइले मोरे नामेर महत्व ।।6।।
एवे बल, सेवा – अपराध कि प्रकार।
शुनिया घुचिवे जीवेर चित्त – अन्धकार 117।।
हरिदास बले से सेवक – जन जाने।
आमि नामाश्रये थाकि, जानिव केमने ।।18।।
तबु तव आज्ञा आमि लधिंवारे नारि।
याहा बलाइवे, ताहा बलिव विस्तारि ।।9।।
हे महापुरुष! तुम्हारे मुख से नाम-तत्त्व का श्रवण करके मैं भी उल्लसित हो गया हूँ। आप आचरण में आचार्य एवं प्रचार में भी सुनिपुण हो। आप हरिनाम रूपी धन से धनी हो। श्री रामानन्द राय जी ने मुझे रस-तत्त्व की शिक्षा दी और अब आपने मुझे हरिनाम की महिमा सिखाई। अब आप सेवा – अपराधों के बारे में बताइये कि ये कितने प्रकार के होते हैं ताकि उसे सुनकर जीवों के चित्त में भरा अन्धकार खत्म हो।
श्रील हरिदास ठाकुर बोले- महाप्रभु! आप एक ऐसे विषय की मुझसे जिज्ञासा कर रहे हैं जिसे केवल आपके सेवक लोग ही जानते हैं। मैं तो हर समय श्रीहरिनाम के आश्रय में रहता हूँ, हरिनाम करता रहता हूँ इसलिए इस विषय के बारे में में क्या बोलूँ, मुझे समझ नहीं आ रहा। परन्तु फिर भी आपकी आज्ञा का मैं उल्लंघन नहीं कर सकता। इसलिए आप मुझसे जो बुलवायेंगे, मैं उसी को विस्तार से बोलूँगा।
सेवा-अपराधों की संख्या
सेवा – अपराध हय अनन्त प्रकार।
श्रीमूर्त्ति – सम्बन्धे सब शास्त्रेर विचार ।।10।।
कोन शास्त्रे द्वात्रिंशत् अपराध गणि।
कोन शास्त्रे पन्चाशत् गणि गुणमणि ।।11।
हे गुणमणि गौरहरि जी ! शास्त्रों के अनुसार सेवा अपराध अनन्त प्रकार के होते हैं और यह सभी श्रीविग्रह से ही सम्बन्धित होते हैं। किसी-किसी शास्त्र में 32 प्रकार के और किसी-किसी शास्त्र में 50 प्रकार के सेवापराधों का वर्णन है।
सेवा-अपराधों के चार विभाग
सेइ अपराध चतुर्विधादि प्रकारे।
विभाग करेन बुधगण शास्त्रद्वारे ।।12।।
श्रीमूर्तिसेवक – निष्ठ कतगुलि तार।
श्रीमूर्ति – स्थापक – निष्ठ अपराध आर ।।13।।
श्रीमूर्ति-दर्शक निष्ठ आर कतिपय ।
सर्वनिष्ठ अपराध कतिविध हय ।।14।।
बुद्धिमान व्यक्ति शास्त्रों की सहायता द्वारा इन सभी सेवा-अपराधों को चार भागों में विभाजित करते हैं।
1. श्रीमूर्ति सेवक निष्ठ अर्थात् जो मूर्ति की सेवा करते हैं, उनके सम्बन्ध में अपराध।
2. श्रीमूर्ति स्थापक निष्ठ अर्थात् जो मूर्ति की स्थापना करते हैं, उनके सम्बन्ध में कुछ अपराध ।
3. श्रीमूर्ति दर्शक निष्ठ अर्थात् जो श्रीमूर्ति के दर्शन करने जाते हैं, उनके कुछ अपराध।
4. सर्व निष्ठ अपराध अर्थात् इन सबके लिए कई तरह के अपराध।
सेवा-अपराधों के प्रकार
पादुका – सहित याय ईश्वरमन्दिरे।
यानि चड़ि याय तथा स्वच्छन्द शरीरे ।।15।।
उत्सवे ना सेवे आर प्रणति ना करे।
उच्छिष्ठ अशौच देहे वन्दन आचरे ।।।6।।
एक हस्ते प्रणाम, सन्मुखे प्रदक्षिण।
देवाग्रे प्रसारे पद, हय वीरासीन ।।।7।।
देवाग्रे शयन आर भक्षण करय।
मिथ्या कथा, उच्चभाषा जनवनादिचय ।।8।।
निग्रहानुग्रह, युद्ध, अभक्ति, रोदन।
कुरभाषा, परनिन्दा, कम्बलावरण ।।19।।
परस्तुति, अश्लीलता – वायुविमोक्षण।
शक्ति सत्त्वे गौण उपचारेर योजन ।।20।।
देवानिवेति द्रव्य भक्षणे स्वीकार।
कालोदित फलादिर अनर्पण आर ।।21।।
अन्यभुक्त अवशिष्ट खाद्य निवेदन ।
देवप्रति पृष्ठ करि’ सम्मुखे आसन ।।22।।
देवाग्रे अन्येर अभिवादन पूजन।
गुरु- प्रति मौन, निज- स्तोत्र आलोचन ।।23।।
देवता – निन्दन एइ द्वात्रिंश प्रकार।
सेवा – अपराध महापुराणे प्रचार ।।24।।
पादुका पहनकर मन्दिर में कोई जाये, किसी वाहन में चढ़कर मन्दिर के सामने जाये, नंगे बदन मन्दिर में जाये, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी आदि उत्सव न मनाये, मन्दिर के सामने जाकर भी भगवान को प्रणाम न करे, जूठे मुँह या अपवित्र अवस्था में भगवान की वन्दना करे, एक हाथ से भगवान को प्रणाम करे, भगवान की ओर पीठ करके घूम जाये, भगवान की ओर पैर पसारे, भगवान से ऊँचे आसन पर बैठे, भगवान के खुले मन्दिर के आगे सोये या भोजन करे, भगवान के आगे झूठ बोले, ज़ोर से चिल्लाये या गप्पे मारे, भगवान के आगे किसी को प्रणाम करे या किसी को आशीर्वाद दे, भगवान के मन्दिर के आगे झगड़ा करे, भगवान के आगे उनकी भक्ति के विरुद्ध कार्य करे या रोये, क्रूर भाषा का प्रयोग करे, दूसरों की निन्दा करे, भगवान के मन्दिर में कम्बल ओढ़ कर जाये, दूसरों की तारीफ करे, भगवान के आगे अश्लील बातें या हरकतें करे अथवा अधोवायु छोड़े, समर्थ होते हुए भी भगवान की सेवा में कंजूसी करे, भगवान को भोग लगाये बगैर द्रव्य खा जाये, मौसम के अनुसार फल व सब्जियाँ भगवान के भोग में न दे, किसी ने पहले खा लिया है और उसका बाकी बचा हिस्सा कोई भगवान के भोग में लगाये। भगवान के मन्दिर के सामने इस प्रकार बैठे कि उसकी पीठ भगवान की ओर हो, भगवान के आगे किसी और का सम्मान या पूजन करे, गुरु की महिमा न बोलकर अपनी तारीफ करना तथा भगवान के आगे किसी देवता की निन्दा करना इस प्रकार 32 प्रकार के सेवा अपराधों के बारे में महापुराण में वर्णन किया गया है।
दूसरे शास्त्रों के अनुसार सेवा-अपराधों का वर्णन
अन्यत्र आछये अपराध अन्यतम ।
संक्षेपे बलिव प्रभु तव इच्छामत ।। 25।।
राजान्न भोजन आर अन्धकार घरे।
प्रवेशिया देवमूर्ति संस्पर्शन करे ।।26।।
अविधि – पूर्वक हरि मूत्र्युपसर्पण।
बिना वाद्ये मन्दिरेर द्वारा उद्घाटन ।।27।।
सारमेयदृष्ट – खाद्य देवे समर्पण।
अर्चन समये मौनभंग अकारण ।।28।।
बहिर्देशे गमनादि पूजार समये ।
गन्धमाल्य नाहि दिया धूपन करये ।।29।।
अनर्हपुष्येते कृष्ण – पूजादि करण।
अधौत वदने कृष्णपूजा आरम्भन ।।30।।
स्त्रीसंग करिया किम्वा रजःस्वला नारी।
दीप, शव स्पर्शिया, अयोग्य वस्त्र परि’ ।।3111
शव हेरि’, अधोवायु करिया मोक्षण।
क्रोध करि’, श्मशानेते करिया गमन ।।32।।
अजीर्ण उदरे आर कुसुम्भ पैनाक ।
सेवन करिया आर ताम्बुल गुवाक ।।33।।
तैल मारिख करे हरि – श्रीमूर्त्तिस्पर्शन ।
एरण्डपत्रस्थ पुष्पे करय अर्चन ।।34।।
आसुरिककाले पूजे पीठे भूमे बसि ।
स्नपन – समये मूर्त्ति वामहस्ते स्पर्शि 113511
बासि वा याचित फुले देवता – अर्चन ।
पूजाकाले गर्व उक्ति, अयथा ष्ठीवन ।।3 611
तिर्यक् – पुण्ड्र धरे आर अधौत चरणे ।
मन्दिरे प्रवेश करे पूजार कारणे ।।37।।
अवैष्णव – पक्व करे देवे निवेदन ।
अवैष्णवे देखाइया करये पूजन ।।38।।
विश्वक्सेने ना पूजिया, कापालि देखिया।
हरि-पूजे नवजले श्रीमूत्ति स्मरिया ।।39।।
घर्माम्बुसंस्पृष्ट जले करये अर्चन ।
कृष्णेर शपथ करे, निम्लय – लंगन ।।40।।
एइ सब कार्य हय सेवा अपराध।
सेवाकारी जनेर याहाते भक्तिबाध ।।41।।
नामाचार्य श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि हे प्रभो! अन्यान्य शास्त्रों में भी कुछ और सेवा अपराधों के बारे में कहा गया है जिन्हें मैं आपकी इच्छानुसार संक्षेप में वर्णन करूँगा, सेवा – अपराध निम्न प्रकार से हैं
धनी-विषयी का दिया हुआ भोजन करना, अन्धेरे में ही मन्दिर में प्रवेश करके भगवान के विग्रह को स्पर्श करना, शास्त्रों में दी गयी विधियों को छोड़कर भगवान को भोग व वस्त्रादि निवेदन करना, घन्टा व ताली इत्यादि बजाये बगैर मन्दिर का दरवाज़ा खोलना, कुत्ते की नज़रों में पड़े भोजन को भोग लगाना, भगवान का अर्चन करते हुए बिना किसी कारण के बोलना, पूजा करते हुए बीच में ही उठकर मन्दिर से बाहर जाना, भगवान को माला दिये बगैर उनकी पूजा करना, सुगन्ध रहित फूलों के द्वारा श्रीकृष्ण की पूजा करना, बिना नहाये श्रीकृष्ण की पूजा करना, स्त्री संभोग करके व रजःस्वला स्त्री का स्पर्श करके बिना नहाये मन्दिर में पूजा करना, शव को देखने, स्पर्श करने या शमशान घाट से वापस लौटने के बाद भगवान की पूजा करना, भगवान के सामने अधोवायु छोड़ना, अटपटे कपड़े पहन कर भगवान की सेवा पूजा करना, गुस्से में या पेट में खाना पूरा हज़म न हुआ हो अथवा पान चबाते हुए मन्दिर में पूजा के लिए जाना, अपनी तेल मालिश करके सीधे मन्दिर में जाकर विग्रह को स्पर्श करना, अरंड के फूलों से भगवान का अर्चन करना, आसुरिक काल जैसे आधी रात में अथवा ज़मीन में बिना आसन के बैठकर भगवान की पूजा करना, भगवान को शयन देते समय बायें हाथ से उन्हें स्पर्श करना, बासी फूलों से या माँग कर लाये गये फूलों से भगवान का अर्चन करना, पूजा करते हुए डींगें हाँकना अथवा अनुचित बातें बोलना, त्रिपुण्ड्र लगाकर भगवान श्रीकृष्ण की सेवा करना, बिना पैर धोये ही मन्दिर में पूजा करने के लिए जाना, अवैष्णव के हाथों से बनाये भोजन को भगवान को निवेदन करना, अवैष्णवों को दिखा – दिखाकर भगवान का अर्चन करना, भगवान की पूजा – अर्चना किये बगैर ही कपाली इत्यादि तान्त्रिकों का दर्शन करना, नाखुन द्वारा स्पर्श हुए जल के द्वारा भगवान की पूजा करना, पसीने की बूँदों से मिले पानी से भगवान का अर्चन करना, भगवान श्रीकृष्ण की कसम खाना, भगवान को अर्पित माला व तुलसी इत्यादि को लाँघना इन सब कार्यों को करने से सेवा – अपराध होते हैं। भगवान की सेवा करने वाले साधक को चाहिए कि वह इन सबसे सावधान होकर रहे ताकि उसके द्वारा की जाने वाली भगवान की सेवा में कोई बाधा न हो।
सेवक को सेवा-अपराधों का त्याग करना चाहिए
श्रीमूर्त्तिसम्बन्धे या’र भजन-पूजन ।
सेवा – अपराध तँह करुन वर्जन ।।42।।
वैष्णव सर्वदा नाम – सेवा – अपराध।
वर्जिया श्रीकृष्णसेवा करुन आस्वाद ।।43 ।।
एइ सब अपराध-मध्ये याँ’र याहा।
सम्बन्धे पड़िवे, ताँ’र वर्जनीय ताहा ।।44।।
किन्तु नाम – अपराध सकल वैष्णव ।
सर्वकाल त्यजि’ लभे भक्तिर वैभव ।।45।।
श्रीमूर्ति के सम्बन्ध में जिनका भजन और पूजन है अर्थात् जो श्रीविग्रह सेवा करते हैं व निष्ठा के साथ करना चाहते हैं उनको सेवापराधों का परित्याग करना चाहिये। वैष्णव सदा ही नामापराध एवं सेवापराध का परित्याग करके श्रीकृष्ण सेवा का आस्वादन करते हैं। सेवापराधों में, जिसकी जिस प्रकार की सेवा है, वह उसी प्रकार की सेवाओं में होने वाले अपराधों पर विशेष ध्यान रखे व उनसे बचे परन्तु नाम अपराधों को त्यागना तो सभी वैष्णवों के लिये हमेशा के लिए अति आवश्यक है तभी भक्ति रूपी सम्पदा की प्राप्ति होगी।
भाव-सेवा करने वाले साधक का सेवापराध न के बराबर होता है
श्रीमूर्त्तिविरहे यिनि निर्जनेते बसि’।
भजन करेन भावमार्ग अहर्निशि ।।46।।
नाम अपराध सदा वर्जनीय ताँ’र।
नाम – अपराध दश सर्व केशाधार ।।47।।
नाम – अपराध गते भाव-सेवा हय।
अतएव अपराध ताहे नाहि रय ।।48।।
जो साधक श्रीमूर्ति के विरह में एकान्त में रोते-रोते सदा-सर्वदा भाव से भजन करते हैं, ये नामापराध तो उनके लिये भी वर्जनीय हैं। ये दस प्रकार के नामापराध ही सारे क्लेशों का आधार हैं। नामापराध नष्ट होने से ही भावमय सेवा हो सकती है। भावमय सेवा करने से ही सेवापराध नहीं होते।
नाम-स्मरण वाले को ही भाव सेवा करनी चाहिए
श्रीनाम – स्मरणे भाव-सेवार उदय।
तोमार कृपाय प्रभु जीवे भाग्योदय ।।49।।
भक्तिर साधन यत आछय प्रकार।
से सब चरमे देय नामे प्रेमसार ।।50।।
अतएव नाम लय, नामरसे मजे ।
अन्य ये प्रकार सब ताहा नाहि भजे ।।51।।
हरिदास – आज्ञाबले अकिन्चन जन।
हरिनामचिन्तामणि करिला कीर्त्तन ।।52।।
हे प्रभु! हरिनाम करते-करते आपकी कृपा से जब जीव का भाग्य उदित होता है, तभी नाम सेवा से उसकी भाव सेवा उदित होती है। भक्ति के जितने भी प्रकार के साधन हैं, सब अन्त में नाम में प्रेम प्रदान करते हैं, इसलिए नाम साधक हरिनाम करता रहता है और उसी में मग्न रहता हैं। हरिनाम में निष्ठा रखने वाला साधक दूसरे प्रकार की किसी भी साधना को नहीं करता है।
श्रील भक्ति विनोद ठाकुर जी कहते हैं कि नामाचार्य श्रीहरिदास ठाकुर जी की आज्ञा के प्रभाव से ही में, अकिंचन “हरिनाम – चिन्तामणि” का कीर्तन कर रहा हूँ।
इति श्रीहरिनामचिन्तामणौ सेवापराधविचारो नाम चतुर्दशः परिच्छेदः ।