बारहवाँ परिच्छेद
प्रमाद नामक नामापराध
जय जय महाप्रभु जय भक्तगण।
याँ’देर प्रसादे करि नामसंकीर्त्तन।।1।।
श्रीमन् महाप्रभु जी की तथा उनके भक्तों की जय हो, जिनकी कृपा से मैं नाम संकीर्तन करता हूँ।
प्रमाद-नामक अपराध
हरिदास बले प्रभु, हेथा सनातने।
आर त’ गोपाल भट्टे दक्षिण-भ्रमणे ।।2।।
शिखाइले अप्रमादे श्रीकृष्णभजन।
प्रमादके अपराधे करिले गणन ।।3 ।।
अन्य अपराध त्यजि’ सदा नाम लय।
तबु नामे प्रेम नाहि हयत उदय ।।4।।
तबे जानि ‘प्रमाद’ नामेते अपराध।
प्रेमभक्ति-साधनेते करितेछे बाध ।।5।।
श्रीमन् महाप्रभु जी को श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं— हे प्रभु! आपने यहाँ श्रीजगन्नाथ पुरी में सनातन गोस्वामी जी को एवं दक्षिण भारत-भ्रमण के समय गोपाल भट्ट गोस्वामी जी को प्रमाद रहित श्रीकृष्ण-भजन करने की शिक्षा दी थी। आपने नामापराधा के अन्तर्गत प्रमाद की गिनती की थी। इस नामापराध के बारे में बोलते हुए आपने कहा था कि अन्य-अन्य नामापराधों को छोड़कर यदि कोई साधक हरिनाम करता है और उसके हृदय में श्रीकृष्ण-प्रेम उदित नहीं होता, तब समझना होगा कि “प्रमाद” रूपी अपराध हो रहा है जिसके कारण प्रेम-भक्ति की साधना में बाधा उत्पन्न हो रही है।
असावधानी को ही प्रमाद कहते हैं
प्रमाद-अनवधान एइ मूल अर्थ।
इहा हैते घटे प्रभु सकल अनर्थ ।।6।।
औदासीन्य, जाड्य आर विक्षेप ए तिन।
प्रकार अनवधान बुझिबे प्रवीण ।।7।।
प्रमाद का मुख्य अर्थ असावधानी ही है। इसी से सारे अनर्थ उदित होते हैं। विद्वान-वैष्णव लोग कहते हैं कि प्रमाद भी तीन प्रकार के होते हैं— साधन-भजन में उदासीनता अर्थात् निष्ठा का अभाव, आलस्य तथा दूसरी ओर मन का जाना।
अनुराग होने तक पूरे यत्न के साथ हरिनाम करना आवश्यक है
कोन भाग्ये कोन जीवेर श्रद्धा यदि हय।
तबे तिँह हरिनाम ग्रहण करय ।।8।।
यत्न करि’ स्मरे नाम संख्यार सहित।
तबे नामे अनुराग हयत’ उदित ।।9।।
ये पर्यन्त अनुराग ना हय उदय।
से पर्यन्त यत्न करि’ नाम सदा लय ।।10।।
किसी भाग्य से किसी जीव के अन्दर यदि श्रद्धा उत्पन्न होती है तो वह जीव श्रीहरिनाम लेता है। हरिनाम करते समय जब वह बड़े यत्न से भगवान को स्मरण करता हुआ, भगवान के नाम में मन को लगाकर तथा संख्या-पूर्वक हरिनाम करता है तो तब उसका हरिनाम में अनुराग उत्पन्न होता है। हमें ये याद रखना चाहिए कि जब तक हमारा हरिनाम में अनुराग उत्पन्न नहीं हो जाता, तब तक बड़े यत्न के साथ हमेशा हरिनाम करते रहना होगा।
यत्न के अभाव में साधक का चित्त स्थिर नहीं होता
निसर्गतः लोक सब विषये आसक्त।
स्मृतिकाले विषय-अन्तरे अनुरक्त ।।11।।
रुचि याय अन्यस्थाने, नामे उदासीन।
नामे चित्त मग्न नहे, जपे प्रतिदिन ।।12।।
चित्त एकदिके, आर अन्यदिके नाम।
ताहार मंगल किसे हय गुणधाम ।।13 ।।
लक्षणाम हैले पूर्ण संख्यामाला गणि’।
हृदये नहिल रस-बिन्दु गुणमणि ।।14।।
एइ त’ अनवधान-दोषेर प्रकार।
विषयी-हृदये प्रभु बड़ दुर्निवार ।।15।।
साधक का मन स्वाभाविक ही संसार के विषयों में आसक्त रहता है जो हरिनाम करते समय भी श्रीहरि की बजाय कहीं और ही अनुरक्त रहता है। ऐसे में साधक हरिनाम तो प्रतिदिन जपता है परन्तु हरिनाम जपते समय उसका चित्त हरिनाम में तो उदासीन रहता है तथा कहीं और मग्न रहता है। अब आप ही बताओ, हे गुणधाम गौरहरि! जब किसी का चित्त कहीं ओर हो तथा वह हरिनाम भी कर रहा हो तो ऐसे में उसका मंगल कैसे होगा? ये ठीक है कि वह गिनकर एक लाख माला कर लेता है परन्तु इतना सब करने पर भी उसके हृदय में उस हरिनाम के अप्राकृत रस की एक बूँद का आस्वादन भी नहीं होता। हे प्रभु! यही वो प्रमाद रूपी अपराध है जो कि असावधानी से होता है। जहाँ तक रही बात संसार के विषयी लोगों की, उनके लिए मन को हरिनाम में लगाना बड़ा मुश्किल है।
यत्न करने की विधि
साधुसंगे स्वल्पकाल छाड़िया विषय।
निर्जने लइले नाम एइ दोष क्षय ।।16।।
क्रमे क्रमे कृष्णनामे चित्त हय स्थिर।
निरन्तर नामरसे हयत अधीर ।।17।।
तुलसीर सन्निकटे कृष्णलीला-स्थाने।
साधु-सन्निधाने बसि’ सात्वत-विधाने ।।18।।
क्रमे कालवृद्धि करि’ सेइ नाम स्मरे।
अति शीघ्र विषयेर छन्द हइते तरे ।।19।।
थोड़ी देर के लिए विषय भोगों की सारी चिन्ताओं को छोड़कर साधक को चाहिए कि वह साधु-संग में रहकर एकान्त भाव से हरिनाम करें। ऐसा करने से धीरे-धीरे साधक का ये प्रमाद रूप दोष खत्म हो जाता है। इतना ही नहीं, धीरे-धीरे उसका चित्त भी कृष्ण नाम में स्थिर होने लगता है और उसके हृदय में निरन्तर श्रीहरिनाम का दिव्य-रसास्वादन चलने लगता है। तुलसी जी के वृक्ष के पास अथवा श्रीकृष्ण लीला के स्थान अथवा
भगवद्-भक्तों के पास बैठकर यदि उस प्रकार हरिनाम किया जाये जैसा कि पूर्व समय में भगवान के प्रेमी-भक्तों ने किया तथा साथ ही हरिनाम करने के समय को हरिनाम चिन्तन करते-करते धीरे-धीरे बढ़ाया जाये तो इससे बड़ी जल्दी ही सांसारिक विषयों की भोग-वासनाओं से हम छुटकारा पा लेंगे।
अन्य प्रक्रिया
अथवा निर्जने बसि’ स्मरि साधुरीति।
इन्द्रिय-पिधान करि’ नामे करे मति ।।20।।
सत्वरे नामेते निष्ठा रुचि क्रमे हय।
औदासीन्य दोष ता’र क्रमे हय क्षय ।।21।।
भगवद्-भक्तों के हरिनाम करने के सही तरीके को स्मरण करते हुए किसी एकान्त स्थान पर बैठकर, अपने कमरे के दरवाज़े बन्द करके अथवा किसी कपड़े से अपनी आँख, कान व नाक को ढककर हरिनाम करने से जल्दी ही साधक की हरिनाम में निष्ठा व रुचि इत्यादि होने लगती है तथा साथ ही इससे साधक का साधना में आया उदासीन भाव भी खत्म हो जाता है।
आलस्य रूपी रुकावट के लक्षण
जाइये ये अनवधान अलसेर मने।
ताहे रुचि नाहि हय श्रीनाम-ग्रहणे ।।22।।
स्मृतिकाले पुनः शीघ्र विरामे प्रयास।
एइ दोषे नामरस ना हय प्रकाश ।।23।।
अन्यकार्य वृथा काल ना हय यापन।
साधुगण इहा चिन्ति’ स्मरे अनुक्षण ।।24।।
नाम स्मरे, रसे मजे, अन्य नाहि चाय।
सेइरूप साधुसंगे एइ दोष याय ।।25।।
अन्वेषिया सेइरूप साधुसंग करे।
तदनुकरणे चित्त जाइय परिहरे ।।26।।
अव्यर्थकालत्त्व-धर्म साधुर चरित।
देखिले ताहाते रुचि हइबे निश्चित ।।27।।
मने ह’बे आहा कबे इँहार समान।
स्मरिब गाइव नाम ह’ये भाग्यवान् ।।28।।
सेइ त’ उत्साह आसि’ अलसेर मने।
जाइय दूर करे कृष्णनामेर स्मरणे ।।29।।
मने ह’बे आज लक्ष नाम ये करिव।
क्रमे क्रमे तिन लक्ष नाम ये स्मरिव ।।30।।
महाग्रह ह’वे चित्ते नामेर संख्याय।
अचिरे जाइवे जाड्य साधुर कृपाय ।।31।।
हरिनाम की साधना में आलस्य के कारण भी रुचि नहीं होती। भगवद्-स्मरण के समय यदि ये आलस्य आ जाये तो साधक के इस दोष के कारण भी साधक के हृदय में हरिनाम-रस प्रकाशित नहीं होता। दुनियाँ के फालतू कार्यों में जैसे उनका समय बरबाद न हो, इस बात को ध्यान में रखते हुए भगवान के भक्त लोग हर समय भगवान का नाम करते रहते हैं परन्तु साधक के जीवन में ये सब तभी होता है जब उसे ऐसे साधु की संगति मिले जो हर समय हरिनाम का स्मरण करता रहता है व हर समय ही हरिनाम के रस में डूबा रहता है तथा साथ ही वह साधु, हरिनाम के अलावा और कुछ चाहता ही नहीं।
साधक को चाहिए कि ऐसे दुर्लभ साधु की खोज करके उसकी संगति में उठे-बैठे। सच्चे साधु के आदर्श चरित्र को देखकर वैसा आचरण करते रहने से साधक का चित्त आलस्य का परित्याग कर देता है। स्वभाव से ही अच्छे साधु अपने अनमोल समय को व्यर्थ नहीं गँवाते हैं। अतः साधु का ये आदर्श देखने से ये निश्चित है कि साधक की रुचियों में भी उसी प्रकार का बदलाव आता रहेगा। यही नहीं, साधु का वह सुन्दर आदर्श देखकर साधक के मन में भी आता है कि कब मैं भी इनकी तरह बन पाऊँगा। कब मेरे जीवन में ऐसा सौभाग्य उदित होगा जब मैं भी इन साधु-भक्तों की तरह हृदय में भगवान का स्मरण करूँगा व मुख से भगवान का नाम-कीर्तन करूँगा? साधक का यही उत्साह, उसके आलस्य को खत्म करके उससे निरन्तर श्रीकृष्ण-स्मरण करवायेगा। वह स्वयं मन ही मन में यह धारणा बनाने लगता है कि आज मैं एक लाख हरिनाम करूँगा और धीरे-धीरे मैं प्रतिदिन तीन लाख किया करूँगा। भक्तों के बढ़िया आचरण को देखकर साधक के मन में हरिनाम की निश्चित संख्या करने का व उस संख्या को लगातार बढ़ाने का आग्रह पक्का होता रहता है और उसे मालूम भी नहीं पड़ता कि साधु-भक्तों की कृपा से बड़ी जल्दी उसके अन्दर भरा आलस्य भाग गया होता है।
विक्षेप से उत्पन्न बाधा
विक्षेप हइते येइ प्रमाद उदय।
बहुयत्ने सेइ अपराध हय क्षय ।।32।।
कनक-कामिनी आर जय पराजय।
प्रतिष्ठाशा, शाठ्यवृत्ति ताहार निलय ।।33 ।।
एसब आकृष्टि हृदय हइले उदय।
नामेते अनवधान स्वभावतः हय ।।34।।
साधक के चित्त में आये विक्षेप से जो प्रमाद रूपी अपराध उदित होता है, बड़ी कोशिशों के बाद वह अपराध जाकर खत्म होता है। दौलत, स्त्री, हार-जीत, मान-सम्मान की भावना तथा धूर्तता ही उस आलस्य के अड्डे हैं। उपरोक्त चीजें जब साधक के हृदय को अपनी ओर खींचती हैं तो स्वाभाविक ही हरिनाम में रुकावट आ जाती है।
विक्षेप को त्यागने का उपाय
क्रमे क्रमे सेइ सब चिन्ता परिहारे।
यतिवे सौभाग्यवान् वैष्णव-आचारे ।।35।।
प्रथमेते हरिदिने भोगचिन्ता त्यजि’।
साधुसंगे रात्रिदिन हरिनाम भजि ।।36।।
हरिक्षेत्रे हरिदास हरिशास्त्र ल’ये।
उत्सवे मजिबे सुखे परम निर्भये ।।37।।
क्रमे भक्तिकाल मन करिवे वर्द्धन।
हरिकथा महोत्सवे मजाइया मन ।।38।।
श्रेष्ठरस क्रमे चित्ते हइवे उदय।
जड़ेर निकृष्ट रस छाड़िबे निश्चय ।।39।।
महाजन-मुखे हरिसंगीत श्रवणे।
मुग्ध ह’वे मनःकर्ण रस-आस्वादने ।।40।।
निकृष्ट विषयस्पृहा हइवे विगत।
नामगाने चित्त स्थिर हवे अविरत ।।41।।
अतएव बहुयत्ने ए प्रमाद त्यजे।
स्थिरचित्ते नामरसे चिरदिन-मजे ।।42।।
श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि सौभाग्यवान साधक को चाहिए कि वह कनक, कामिनी व प्रतिष्ठा इत्यादि की भावनाओं को त्यागकर श्रेष्ठ वैष्णवों के आचरण के अनुसार साधना करने का प्रयत्न करे। इसमें सबसे पहले वह एकादशी, जन्माष्टमी व वैष्णवों की आविर्भाव-तिरोभाव तिथियों में अपने भोग-विलास के चिन्तन का परित्याग करते हुए दिन-रात साधु-संग में रहकर हरिनाम करे। उसके बाद वह बड़े उत्साह के साथ भगवान के वृन्दावन, नवद्वीप व श्रीजगन्नाथपुरी इत्यादि धामों में भगवान के भक्तों के साथ विभिन्न महोत्सवों में शामिल हो तथा श्रीमद् भगवद् गीता, श्रीमद्भागवत व वैष्णव-ग्रन्थों का अनुशीलन तथा श्रवण-कीर्तन करता रहे। धीरे-धीरे उपरोक्त कार्यों के समय को स्वेच्छा से बढ़ाता रहे तथा श्रीहरिकथा के महोत्सव में अपने को रमाये रखे।
नामाचार्य श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि इस प्रकार साधना करते रहने से साधक के चित्त में श्रेष्ठ-रस उदित होने लगता है, जिससे दुनियावी निकृष्ट-रस से मन अपने-आप ही शत-प्रतिशत हटने लगता है। ऐसे समय पर यदि साधक महाजनों के मुख से भगवान का संगीतमय कीर्तन सुनें तो वह कीर्तन उसके मन व कानों को दिव्य-रस का आस्वादन करवाकर भगवान में मुग्ध कर देगा। दुनियाँ के तुच्छ विषय-भोगों की लालसा साधक के चित्त से कब खत्म हो गयी, ये उसे मालूम भी नहीं पड़ेगा तथा साथ ही महाजनों के मुख से सुना वह कीर्तन हमेशा के लिए साधक के चित्त को भगवान में स्थिर कर देगा। अतएव, यदि साधक अपने अन्दर भरे प्रमाद को हटाने के लिए ये रास्ता अपनाये तो यह दिव्य-मार्ग उसके चित्त को स्थिर करके उसे चिर-दिन के लिए दिव्य रसानन्द में डुबा देगा।
आग्रह
संकल्पित नामसंख्या पूर्ण करिवारे।
ना हय अयत्न नामे देखि बारे बारे ।।43 ।।
सतर्क हइया करि-नाम संकीर्त्तन।
प्रमाद छाड़िया करि नामेर भजन ।।44।।
संख्याधिक स्पृहा छाड़ि एकाग्रमानसे।
निरन्तर करि नाम तव कृपावशे ।।45।।
एइ कृपा कर प्रभु नामेते प्रमाद।
ना बाधे आमार चित्ते नामरसास्वाद ।।46।।
नामाचार्य श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि हरिनाम की संख्या के लिए आपने जो संकल्प लिया है, उसमें ढीलापन न हो इसके लिए बार-बार व विशेष ध्यान देना होगा तथा साथ ही सतर्क होकर अर्थात् प्रमाद छोड़कर हरिनाम-संकीर्तन करना होगा। श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि साधक को चाहिए कि वह संख्या बढ़ाने के चक्करों में ज्यादा न पड़े। संख्या बढ़ाने की बजाय हरिनाम के दिव्य अक्षरों का स्पष्ट रूप से उच्चारण हो, इसकी ओर ध्यान दे। ऐसा होने से भगवान श्रीहरि की कृपा से उसका निरन्तर हरिनाम होने लगेगा।
नामाचार्य श्रीहरिदास ठाकुर जी भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु जी को कहते हैं कि हे प्रभु! आप मुझ पर ऐसी कृपा करना जैसे ये प्रमाद रूपी अपराध मुझे हरिनाम के रसास्वादन में बाधा न पहुँचा सके।
प्रक्रिया
एकाग्र मानसे निर्जनेते स्वल्पक्षण।
नामस्मृति-अभ्यास करिवे भक्तजन ।।47।।
अतएव स्पष्ट नाम भावलग्न मने।
सदा हय, ए प्रार्थना तोमार चरणे ।।48।।
आपन यत्नेते केह नाहि पारे।
तोमार प्रसाद बिना ए भवसंसारे ।।49।।
श्रील हरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि भक्तों को चाहिए कि वे कुछ समय के लिए एकान्त में बैठकर एकाग्र मन से नाम-स्मरण करने का अभ्यास अवश्य करें। हे गौरहरि! आपके चरणों में मेरी प्रार्थना है कि आप मुझ पर ऐसी कृपा करें जैसे मैं भगवद्-भावों में डूबकर स्पष्ट हरिनाम के दिव्य अक्षरों का हमेशा उच्चारण कर सकूँ क्योंकि ऐसा हरिनाम इस दुनियाँ में कोई भी अपनी कोशिश से नहीं कर सकता, आपकी कृपा के बिना तो ये सम्भव ही नहीं है।
हृदय से शुद्ध हरिनाम की इच्छा तथा यत्न का होना आवश्यक है
यत्न करि’ कृपा मागि व्याकुल अन्तरे।
तुलि कृपामय कृपा कर अतःपरे ॥50॥
तव कृपालाभे यदि ना करि यत्न।
तबे आमि भाग्यहीन हे शचीनन्दन ॥51॥
हरिनाम-चिन्तामणि अलंकार यार।
हरिदास-पदयुग भरसा ताहार ॥52॥
हरिनाम करने में अशेष यत्न की व आग्रह की अति आवश्यकता है। निष्कपट हरिनाम करने के लिए तो ये बहुत जरूरी है, अन्यथा साधक से अपराध होते रहेंगे।
अतः साधक को चाहिए कि वह भगवान के प्रति व्याकुल हृदय से कृपा माँगता रहे। श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि हे प्रभो! आप तो स्वभाव से ही कृपामय हैं, साधक के द्वारा व्याकुल-भाव से प्रार्थना करने पर आप उस पर कृपा कर ही देते हो। ऐसे में हे प्रभु! यदि मैं आपकी कृपा को प्राप्त करने के लिए प्रयत्न न करूँ तो मैं समझूँगा कि हे शचीनन्दन गौरहरि! स्वयं मैं ही भाग्यहीन हूँ।
श्रील भक्ति विनोद ठाकुर जी कहते हैं कि ‘श्रीहरिनाम चिन्तामणि’ जिनका अलंकार है, उन श्रील हरिदास ठाकुर जी के चरण-कमल ही मेरा भरोसा हैं।
इति श्रीहरिनामचिन्तामणो नामापराध-प्रमादविचारो नाम द्वादशः परिच्छेदः।