ग्यारहवा परिच्छेद
धर्मव्रतत्यागहुतादिसर्वशुभक्रियासाम्यमपि प्रमादः
जय जय गौरचन्द्र नाम अवतार।
जय जय हरिनाम सर्वतत्त्वसार ।।1।।
हरिदास बोले प्रभु कर अवधान।
अन्य शुभकर्म नहे नामेर समान।।2।।
नाम-प्रचार के उद्देश्य से अवतरित श्रीहरिनाम के अवतार स्वरूप श्रीगौरचन्द्र जी की जय हो। समस्त तत्त्वों के सार श्रीहरिनाम की जय हो। श्रील हरिदास ठाकुर जी बोले— हे प्रभु! दूसरे शुभ कर्म कभी भी हरिनाम की साधना के समान नहीं हो सकते हैं।
हरिनाम का स्वरूप
तुमि त’ चिन्मय सूर्य, तोमार स्वरूप।
सम्पूर्ण चिन्मय – एइ तत्त्व अपरूप ।।3।।
सर्वत्र चिन्मय तव श्रीविग्रह हय।
नाम – धाम – लीला तव सम्पूर्ण चिन्मय ।।4।।
तव मुख्य नाम सब तोमाते अभिन्न ।
जड़ीय वस्तुर नाम वस्तु हैते भिन्न ।।5।।
भक्तमुखे आइसे नाम गोलोक हइते।
आत्मा हैते देहे व्यापि नाचे जिह्वादिते ।।6।।
एइज्ञाने नाम लैले हय तव नाम।
नामे जड़बुद्धि या’र ता’र दुःखग्राम ।।7।।
श्रील हरिदास ठाकुर जी कहने लगे— हे प्रभु! आपका स्वरूप तो चिन्मय सूर्य के समान है। आपका नाम, श्रीविग्रह, धाम तथा लीला सभी चिन्मय हैं। आपके मुख्य नाम आपसे अभिन्न हैं जबकि जड़ीय अर्थात् दुनियावी वस्तुओं के नाम उन वस्तुओं से भिन्न हैं। भक्तों के मुख से उच्चारित भगवन्नाम, गोलोक से आकर प्रकट होते हैं। यह हरिनाम, आत्मा के माध्यम से सारे शरीर में फैलकर जिह्वा के ऊपर नृत्य करते हैं। भगवान का नाम चिन्मय है तथा गोलोक – धाम से अवतरित होता है, इस प्रकार की भावना से हरिनाम करनेपर ही शुद्ध – हरिनाम होता है। जिसका ऐसा दिव्य ज्ञान नहीं है और जो हरिनाम में जड़ीय बुद्धि रखते हैं, उन्हें बहुत लम्बे समय तक नरक की यंत्रणाओं को सहना होता है।
कृष्णपादपद्म उपेय हैं जबकि अधिकार-भेद से उपाय बहुविध हैं
तोमार पाइते शास्त्र उपाय कहिल।
अधिकार भेदे ताहा नानाविध हैल ।।8।।
श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते कि— हे प्रभु! शास्त्रों में आपको प्राप्त करने के जो उपाय बताये गये हैं, अलग-अलग अधिकारों के कारण वे उपाय— कर्म, ज्ञान व भक्ति के विभिन्न अंगों के कारण बहुत से हो गये हैं।
कर्म का स्वरूप
जड़बुद्धिजन जड़द्रव्यकालाश्रये।
तोमार साधन करे समनेर भये ।।9।।
तुमि त’ अभयपद अद्वितीय हरि।
तोमार चरणमात्र भवार्णवे तरी ।।10।।
सेइ पदलाभे यत उपाय सृजिल।
जड़भावाश्रये सब जड़ीय हइल ।।11
इष्टापूर्त्त आर यज्ञादिक पुण्यकर्म।
स्नान, होम, दान, योग, वर्णाश्रमधर्म ।।12।।
तीर्थयात्राव्रत पितृकर्म – ध्यान – ज्ञान।
दैवकर्म तपः प्रायश्चित्तादि – विधान ।।13।।
सकलइ जड़ीय द्रव्य करिया आश्रय।
उपाय – स्वरूपे सदा शुभकर्म हय ।।14।।
उपाय धरिया पाय उपेय चरमे।
अनित्य उपाय छाड़े सिद्धिसमागमे ।।15।।
पूर्णानन्द लाभ हय सर्वसिद्धि सार।
जीवेर उपेय ताहा शुन सारात्सार ।।16।।
जड़-बुद्धि से ग्रसित व्यक्ति जड़ीय-द्रव्यों के द्वारा तथा काल के आश्रय में रहकर मृत्यु के भय से आपकी साधना करता है। हे हरि! आप जीवों को अभय देने वाले हो तथा आपके समान और कोई नहीं है। आपके चरणों का आश्रय लेने मात्र से ही जीव भवसागर से पार हो जाता है। कर्म-मार्ग में आपके चरणों का आश्रय प्राप्त करने के लिए यज्ञ करना, तालाब व कुएँ का निर्माण करवाना, तीनों समय स्नान करना, दान, योग, वर्णाश्रम-धर्म का पालन, तीर्थयात्रा, व्रत, माता-पिता की सेवा, ध्यान, ज्ञान, देवताओं के लिए तर्पण, तपस्या तथा प्रायश्चित आदि विधान— जड़ीय द्रव्यों तथा जड़ीय भावों को आश्रय करने के कारण जड़ीय हैं। इन सब उपायों के द्वारा जड़ीय द्रव्यों को आश्रय करके हमेशा ही शुभकर्म होता है। जड़ीय अर्थात् दुनियावी उपायों का चरमफल भी जड़ीय अर्थात् दुनियावी ही होता है परन्तु जब किसी साधक की भक्ति में सिद्धि प्राप्त होती है तो यह जड़ीय व अनित्य उपाय अपने आप ही छूट जाते हैं क्योंकि तमाम सिद्धियों का सार पूर्णानन्दमय भगवान की प्राप्ति ही है। यही जीवों का सर्वोत्तम उपेय अर्थात् प्रयोजन है तथा यही सभी प्रयोजनों के सारों का सार है।
शुभकर्म के उपाय
जड़द्रव्य काल हय निरानन्दमय।
कौशले जीवेर ताहे क्रमसिद्धि हय ।।17।।
अतएव शुभकर्म सकलइ उपाय।
उपेय चरमसिद्धि प्रेमरूपे भाय ।।18।।
सर्व शुभकर्म सिद्धि विलम्बे उदय।
उपेय उपाये व्यवधानहेतु हय ।।19।।
जड़ीय द्रव्य और जड़ीय काल आनन्द से रहित होते हैं परन्तु बद्धजीव इन जड़ीय वस्तुओं के बिना नहीं रह पाता। उसकी तमाम क्रियाओं में तथा चिन्ता में जड़ीय-भाव अवश्य ही विद्यमान रहता है किन्तु इस जड़ीय वस्तुओं तथा जड़ीय काल में रहते हुये जड़ातीत शुद्ध-भक्ति की खोज करना ही कर्म आदि की कुशलता है। अतः क्रमानुसार देखा जाये तो सभी शुभ-कर्म जीव के प्रयोजन भगवद्-प्रेम के उपाय ही हैं लेकिन इस मार्ग से जीव को भगवद्-भक्ति व भगवद्-प्रेम बहुत विलम्ब से मिलता है क्योंकि यहाँ पर उपाय तो दुनियावी है, जो कि जड़ है व उपेय भगवद्-प्रेम है, जोकि पूर्णतया चेतन है। अतः शुभकर्मों के द्वारा भगवद्-प्रेम की प्राप्ति में होने वाले विलम्ब का कारण कर्मों का जड़ होना और भगवद्-प्रेम का दिव्य होना है।
साधनकाल में हरिनाम किस प्रकार उपाय है?
हरिनाम ए जगते दिले कृपा करि’।
सिद्धि लाभे शिष्ट जीव लइवेक बरि’ ।।20।।
उपाय हइल नाम शास्त्रेर सम्मत।
अन्य शुभकर्ममध्ये हइल गणित ।।21।।
सर्वेश्वर विष्णु येन ब्रह्मा – शिवसने।
देवता – लक्षणे गण्य हइल त्रिभुवने ।।22।।
हे प्रभु! आपने विशेष कृपा करके जगद्वासियों को हरिनाम प्रदान किया इसलिए अपना मंगल चाहने वाले जीव, कृष्ण-प्रेम रूपी सिद्धि को प्राप्त करने के लिए हरिनाम का ही आश्रय लेते हैं। शास्त्रों के मतानुसार हरिनाम ही कृष्ण-प्रेम प्राप्ति का उपाय है इसलिए इसे दूसरे-दूसरे सुकर्मों के साथ गिना गया है; ठीक उसी प्रकार जैसे सर्वेश्वर भगवान श्रीविष्णु जी की ब्रह्मा जी एवं शिवजी के साथ इस त्रिभुवन में देवता के रूप में गणना की जाती है।
श्रीहरिनाम शुद्ध सत्त्वमय हैं
नामेर स्वरूप हय, शुद्ध सत्त्वमय।
जड़गन्ध शुद्धनामे कभु नाहि रय ।।23।।
जड़ीभूतजीव नामे जड़भावदाने।
अन्य शुभकर्म सह एक करि’ माने ।।24।।
मायावाद हइते एइ नाम – अपराध।
याहार दौरात्म्ये सदा हय भक्तिवाद ।।25।।
श्रीहरिनाम का स्वरूप शुद्ध सत्त्वमय होता है। इसमें लेशमात्र भी जड़ीय-गन्ध नहीं होती। जड़ीभूत जीवों ने अर्थात् अविद्याग्रस्त जीवों ने श्रीहरिनाम में जड़ीय-भावना करके उसे अन्य शुभ कर्मों के साथ एक मान लिया है। मायावाद के कारण इस प्रकार का नामापराध होता है, जिस दोष के कारण हमेशा ही भक्ति में बाधा उत्पन्न हो जाती है।
हरिनाम साधन होते हुये भी साध्य हैं
कृष्णनाम हय प्रभु पूर्णानन्दतत्त्व।
उपेय वा सिद्धि बलि’ याहार महत्त्व ।।26।।
उपाय हइया आविर्भूत धरातले।
उपेय उपाय, ऐक्य सर्वशास्त्रे बले ।।27।।
अधिकारभेदे यिनि उपाय – स्वरूप।
तिनिइ उपेय, अन्ये, बड़ अपरूप ।।28।।
हे प्रभु! आपका श्रीकृष्ण-नाम पूर्णानन्द तत्त्व है। यह श्रीकृष्ण नाम साधन भी है और साध्य भी। इसी कारण इसकी विशेष महिमा है। जीवों के ऊपर कृपा करने के लिए श्रीहरिनाम ने साधन के रूप में इस धरातल पर अवतार लिया है। तमाम शास्त्र इसके प्रमाण हैं। यहाँ पर कहा गया है कि श्रीकृष्ण नाम उपाय भी है और उपेय भी अर्थात् ये हरिनाम साधन भी है और साध्य भी। अपने-अपने अधिकार के अनुसार सभी साधक हरिनाम का अनुसरण करते हैं। ये बड़ी विचित्र बात है कि जब तक जीव के हृदय में आत्मरति उत्पन्न नहीं हो जाती, तब तक वह हरिनाम को आत्मरति रूपी उपेय की साधना समझता रहता है।
शुभ कर्म गौण उपाय हैं जबकि हरिनाम मुख्य उपाय हैं
अतएव उपाय द्विविध गुणधाम।
गौणोपाय शुभकर्म, मुख्योपाय नाम ।।29।।
अतएव शास्त्रे यत अन्य शुभकर्म।
नामसह नहे एइ सर्वशास्त्रमर्म ।।30।।
सरल हृदये यबे कृष्णनाम गाय।
अतीन्द्रियसुख आसि’ चित्तके नाचाय ।।31।।
सेइ सुख कृष्णनामस्वभाव – तत्पर।
आत्मरति आत्मक्रीड़ा नाहि यार’पर ।।32।।
ब्रह्मज्ञाने योगे ये – आनन्द – वैभव।
जड़ेर विच्छेद – सुख छाया अनुभव ।।33।।
अभेद्य कैवल्यसुख स्वल्प बलि’ जानि।
कृष्णनामानन्दसुख भूमा बलि’ मानि ।।34।।
उपाय दो प्रकार के होते हैं— गौण उपाय एवं मुख्य उपाय। गौण उपाय शुभकर्म हैं और मुख्य उपाय भगवान का नाम है। शास्त्रों में जितने भी प्रकार के शुभ कर्मों का वर्णन पाया जाता है उनमें से कोई भी हरिनाम के समान नहीं हो सकते। यही सब शास्त्रों का मर्म है। सरल हृदय से जब कोई श्रीकृष्ण-नाम का कीर्तन करता है तब दिव्य-आनन्द प्रकट होकर उसके चित्त को आनन्द से विभोर कराके उससे नृत्य कराता है। श्रीकृष्ण नाम का ऐसा चमत्कारिक स्वभाव है कि ये साधक को ऐसी आत्म रति व आत्म-क्रीड़ा प्रदान करता है कि जिस आनन्द के ऊपर और कुछ होता ही नहीं। ब्रह्मज्ञान और योग में जो आनन्द है, वह तो बहुत थोड़ा है क्योंकि वह तो केवल मात्र इस दुनियाँ के दुःखों से छुटकारा मात्र है। अथवा ये भी कहा जा सकता है कि ब्रह्मज्ञान व योग में तो उस परम-आनन्द की मात्र छाया है जबकि श्रीकृष्ण-नाम में जो सुख है, वह असीम है।
अन्य शुभ-कर्मों से हरिनाम की विलक्षणता
साधनकालेते नाम उपाय – स्वरूप।
सिद्धिकाले उपेय से, एइ अपरूप ।।35।।
उपायस्वरूप नामे उपेयत्त्व सिद्ध।
अन्य शुभकर्मे ऐछे नहे त’ प्रसिद्ध ।।36।।
अन्य शुभकर्म यत, सब जड़ाश्रित।
नाम त’ चिन्मय सदा स्वतःसिद्धोदित ।।37।।
साधन – कालेओ नाम शुद्ध सुनिर्मल।
साधकेर अनर्थे देखाय समल ।।38।।
साधु – संगे नाम लैते जड़बुद्धि याय।
अनर्थ निःशेष हैले शुद्ध नाम भाय ।।39।।
अन्य शुभकर्मी करे त्यजिया उपाय।
उपेय परम भाव चरमे आश्रय ।।40।।
किन्तु नामाश्रयी जन नाम नाहि त्यजे।
नामेर शुद्धता मात्र सिद्धिकाले भजे ।।41।।
अन्य शुभकर्म हैते अति विलक्षण।
नामेर स्वरूप हय अपूर्व लक्षण ।।42।।
साधन दशा य एइ विलक्षण ज्ञान।
गुरुकृपा हैते हय वेदेर प्रमाण ।।43।।
साधन – दशाय यिनि एइ ज्ञानहीन।
नाम – अपराधी तिँह अति अर्वाचीन ।।44।।
नाम सर्वोपरि, नामतुल्य किछु नय।
ए दृढ़ विश्वास करि’ येइ नाम लय ।।45।।
अचिरे ताँहाते हय शुद्ध नामोदय।
पूर्णानन्द नामरस करेन आश्रय ।।46।।
हरिनाम के सम्बन्ध में विलक्षण बात ये है कि साधन काल में हरिनाम उपाय स्वरूप है जबकि सिद्धावस्था में वही नाम उपेय स्वरूप है। उपाय-स्वरूप हरिनाम में ही उपेय सिद्ध है जबकि यह बिल्कुल स्पष्ट है कि अन्य शुभ-कर्मों में ऐसी बात नहीं है। दुनियावी सभी शुभ-कर्म जड़ाश्रित होते हैं जबकि हरिनाम सदा ही चिन्मय है एवं स्वाभाविक ही सिद्ध है। साधन काल में भी हरिनाम शुद्ध और निर्मल होता है किन्तु साधक के अनर्थों के कारण मलिन सा लगता है। साधु-संग प्राप्त होने से ही जड़बुद्धि का विनाश हो जाता है। जड़बुद्धि के नाश होने पर अर्थात् अनर्थ नष्ट हो जाने के बाद ही साधक के हृदय में शुद्ध नाम का स्फुरण होता है। हरिनाम करने वाले साधक को छोड़कर अन्यान्य शुभ-कर्म करने वाले साधक उपेय को प्राप्त कर लेने पर उपाय को छोड़ देते हैं किन्तु हरिनाम करने वाले भगवद्भक्त कभी भी हरिनाम को नहीं त्यागते। यह बात अलग है कि सिर्फ सिद्धावस्था में ही शुद्ध नाम भजन होता है। शुद्ध-नाम अन्य शुभ-कर्मों से अति विलक्षण है। यही नाम के स्वरूप का अपूर्व लक्षण है। वेदों में ऐसा कहा गया है कि साधन काल में ही श्रीगुरुदेव की कृपा से ऐसा विलक्षण ज्ञान होता है। साधनावस्था में जिनको यह ज्ञान नहीं है, वे अभी नामापराधी हैं। श्रीहरिनाम ही सर्वोपरि है। श्रीहरिनाम के समान कोई साधना नहीं है— इस विश्वास के साथ जो हरिनाम करते हैं, बहुत जल्दी ही उनके हृदय में शुद्ध नाम उदित हो जाता है तथा वे पूर्णानन्द स्वरूप श्रीहरिनाम रस का पान करते रहते हैं।
इस अपराध से बचने का उपाय
काहारो यद्यपि अन्य शुभकर्म सने।
नामे समबुद्धि हय दुष्कृति बन्धने ।।47।।
से दुष्कृति – क्षय लागि’ करिवे यतन।
नामे शुद्ध बुद्धि पा’वे, पा’वे प्रेमधन ।।48।।
अन्त्यज गृहस्थ शुद्ध नामपरायण।
ताँ’र पदधूलि देहे करिवे भक्षण ।।49।।
खाइवे अधरामृत पिवे पदजल।
तबे शुद्ध नामे मति हइवे निर्मल ।।50।।
कालिदासे एइरूपे दुष्कृति – खण्डन।
पुनः तव कृपाप्राप्ति गाय जगजन ।।51।।
आमि जड़बुद्धि नाथ, एकमात्र गाइ।
नाम – चिन्तामणि – तत्त्व कभु नाहि पाइ ।।52।।
वैष्णव-अपराध रूपी दुष्कृति के कारण यदि किसी साधक की अन्य शुभकर्मों के साथ श्रीहरिनाम में समबुद्धि होती है तो उस साधक को चाहिए कि वह उस दुष्कृति को समाप्त करने के लिए पूरा प्रयत्न करे, तभी उस साधक की हरिनाम के प्रति शुद्ध बुद्धि होगी और उसे श्रीकृष्ण-प्रेमधन की प्राप्ति होगी। नामाचार्य श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि— हे प्रभु! चारों वर्णों से बाहर यदि अन्त्यज जाति का गृहस्थ भी शुद्ध नाम-परायण हो तथा कोई पवित्र भाव से उसकी चरण रज लेकर अपने शरीर पर लगाये, उसका जूठा प्रसाद सेवन करे तथा उसके चरणों का जल पान करे तो ऐसा करने से उसकी आपके शुद्ध-हरिनाम में निर्मल मति हो जायेगी। बहुत से भक्तों का कहना है कि इसी प्रकार से श्रीचैतन्य महाप्रभु जी के पार्षद श्रील कालिदास जी की दुष्कृति की समाप्ति हुई थी और उन्हें पुनः भगवान की कृपा प्राप्त हुई थी।
बड़ी दीनता के साथ श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि— हे प्रभु! मैं जड़बुद्धि हूँ और एकमात्र आपका ही नाम – कीर्तन करता हूँ परन्तु अभी तक नाम – चिन्तामणि तत्त्व को प्राप्त नहीं कर पाया।
हरिदास ठाकुर जी की हरिनाम में निष्ठा
कृपाकरि’ नामरूपे आमार जिह्वाय।
निरन्तर नाच प्रभु धरि तव पाय ।।53।।
राख हँहा, लओ ताँहा तव इच्छामत।
याँहा राख, देह मोरे कृष्णनाममृत ।।54।।
जगजने नाम दिते तव अवतार।
जगजने – माझे मोरे कर अंगीकार ।।55।।
आमि त’ अधम, तुमि अधमतारण।
उभये सम्बन्ध एइ, पतितपावन ।।56।।
अच्छेद्य सम्बन्ध एइ, तोमाय आमाय।
या’र बले नामामृत ए अधम चाय ।।57।।
श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि— हे महाप्रभु! मैं आपके चरणों में यही प्रार्थना करता हूँ कि आप कृपा करके हरिनाम के रूप में मेरी जिह्वा पर नृत्य करते रहना। आप मुझे इस संसार में रखो या अपने धाम में, जहाँ आपकी इच्छा हो वहीं मुझे रखो परन्तु मुझे कृष्णनामृत का अवश्य पान कराते रहना। जगत् के जीवों को हरिनाम देने के लिए ही आपका अवतार हुआ है और नाम ग्रहण करने वालों में से मैं भी एक हूँ, इसलिए प्रभु! मुझे अवश्य ही अंगीकार करना। मैं तो अधम हूँ परन्तु आप तो अधम – तारणहार हैं।
हे पतितपावन! हम दोनों का सम्बन्ध भी बड़ा विचित्र है। मेरा और आपका सम्बन्ध कभी टूटने वाला नहीं है क्योंकि मैं अधम हूँ और आप अधम – तारण हो। आपसे मेरा नित्य – सम्बन्ध है, इसीलिए मैं आपसे हरिनाममृत प्रदान करने की प्रार्थना करता हूँ।
कलियुग में हरिनाम ही युग-धर्म क्यों हुआ
कलियुगे सुदुःसाध्य अन्य शुभकर्म।
अतएव नाम आसि’ हइल युगधर्म ।।58।।
हरिदास – दास भक्तिविनोद से जन।
हरिनाम – चिन्तामणि गाय अकिन्चन ।।59।।
कलियुग में दूसरे सभी शुभ कार्य दुःसाध्य से हो गये हैं, अतः जीव पर करुणा करने के लिए हरिनाम ही युग – धर्म के रूप में प्रकट हुआ है।
श्रीभक्ति विनोद ठाकुर जी कहते हैं कि नामाचार्य श्रीहरिदास ठाकुर जी के जो दास हैं तथा जो भगवद् – भक्ति का रसास्वादन करते हैं, वे अकिंचन ही ‘श्रीहरिनाम चिन्तामणि’ का गान करते हैं।
इति हरिनामचिन्तामणौ अन्यशुभकर्मणां सह नाम्नः
तुल्यज्ञानरूप अपराधविचारो नाम एकादशः परिच्छेदः