श्रद्धाहीन व्यक्ति को हरिनाम का उपदेश करना भी अपराध है

अश्रद्धाने विमुखेऽप्यशृण्वतिच यश्चोपदेशः शिवनामापराधः।

गदाइ गौरांग जय जाहवा – जीवन।
सीताद्वैत जय श्रीवासादि भक्तगण ।।1।।
कर युड़ि’ हरिदास बलेन वचन।
आर नाम अपराध करह श्रवण ।।2।।

श्रीगदाधर जी, श्रीगौरांग व श्रीमती जाहवा देवी जी के प्राणस्वरूप श्रीनित्यानन्द प्रभुजी की जय हो। सीतापति श्रीअद्वैताचार्य जी की तथा श्रीवास पंडित आदि सभी भक्तों की सर्वदा जय हो।

अपने दोनों हाथ जोड़कर श्रीहरिदास ठाकुर जी महाप्रभु जी से कहते हैं — हे प्रभु! अब आगे के नामापराधों के बारे में आप श्रवण कीजिए।

हरिनाम में श्रद्धा होने पर हरिनाम का अधिकार प्राप्त होता है
याहार हृदये श्रद्धा ना हइल उदय।
नाम नाहि सुने बहिर्मुख दुराशय ।।3।।
ना जन्मे से जनार नामे अधिकार।
श्रद्धामात्र अधिकार एइ तत्त्वसार ।।4।।
सजाति, सत्कुल, ज्ञान, बल, विद्याधन।
नामे अधिकार दिते ना हय कारण ।।5।।
नामेर माहात्म्ये येइ सुदृढ़ विश्वास।
शास्त्रमते श्रद्धा सेइ सर्वत्र प्रकाश ।।6।।

हरिनाम में होने वाले दृढ़ विश्वास को श्रद्धा कहते हैं। ये श्रद्धा जिनके हृदय में उदित नहीं हुई, वे बहिर्मुख व दुःखशायी अर्थात् बुरे उद्देश्य वाले व्यक्ति हरिनाम नहीं सुनना चाहते क्योंकि उनका हरिनाम में अधिकार ही उत्पन्न नहीं हुआ होता। श्रद्धावान व्यक्ति ही हरिनाम करने के उचित अधिकारी हैं। ऊँची – जाति, ऊँचा – कुल, दुनियावी – ज्ञान, ताकत, विद्या एवं धन आदि हरिनाम का अधिकार देने के योग्य नहीं हैं। हरिनाम की महिमा में जिनका सुदृढ़ विश्वास है, तमाम शास्त्रों में उन्हीं को श्रद्धावान कहा गया है।

श्रद्धाहीन व्यक्ति को हरिनाम देने से नाम-अपराध होता है

श्रद्धा नाहि जन्मे या’रे, हरिनाम ता’रे।
साधुजन नाहि देन वैष्णव आचारे ।।7।।
श्रद्धाहीनजन यदि हरिनाम पाय।
अवज्ञा करिवे मात्र सर्वशास्त्रे गाय ।।8।।
शूकरके दिले रत्न से चूर्ण करिवे।
वानरके दिले वस्त्र छिड़ियां फेलिवे ।।9।।
श्रद्धाहीन पेये नाम अपराधे मरे।
संगे संगे गुरुके अभक्त शीघ्र करे ।।10।।

वैष्णवों के आचरण के अनुसार उस व्यक्ति को हरिनाम – दीक्षा प्रदान नहीं की जाती, जिनकी भगवान के नाम के प्रति श्रद्धा न हो। श्रद्धाहीन – व्यक्ति यदि हरिनाम – दीक्षा प्राप्त कर लेते हैं तो वह अवश्य ही हरिनाम के प्रति अवज्ञा करेंगे, ऐसा शास्त्रों में कहा गया है। जिस प्रकार सूअर को रत्न देने से वह उसे तोड़ – फोड़ देगा, बन्दर को वस्त्र देने से वह उसे फाड़ देगा, उसी प्रकार श्रद्धाहीन – व्यक्ति नाम को प्राप्त करके खुद अपराधी बन जाता है और साथ ही अपने गुरु को भी शीघ्र ही अभक्त बना देता है।

श्रद्धाहीन व्यक्ति यदि हरिनाम के लिए प्रार्थना करे तो उससे किस प्रकार का व्यवहार करना उचित है

श्रद्धा – विरहित जन शठता करिया।
हरिनाम मांगे वैष्णवेर काछे गिया ।।11।।
ताहार वन्चना – वाक्य बुझि साधुजन।
हरिनाम नाहि देन ता’रे कदाचन ।।12।।
साधु बले ओहे भाइ, शाठ्य परिहर।
प्रतिष्ठाशा दूरे राखि’ नामे श्रद्धा कर ।।13।।
नामे श्रद्धा हैले नाम अनायासे पा’वे।
नामेर प्रभावे ए संसारे तरे या’वे ।।14।।
यतदिन नाहि तव नामे श्रद्धा भाइ।
नाम लैते तोमार त’ अधिकार नाइ ।।15।।
श्रीनाममाहात्म्य साधुशास्त्र – मुखे शुन।
प्रतिष्ठाशा छाड़ि’ दैन्य करह ग्रहण ।।16।।
नामे श्रद्धा ह’ले तबे गुरुमहाजन।
नाम अर्पिबेन भाई, नाम महाधन ।।17।।
श्रद्धाहीनजने अर्थ – लोभे नाम दिया।
नरकेते याय नामापराधे मजिया ।।18।।

श्रद्धाहीन व्यक्ति यदि कपटता करके वैष्णवों के पास जाकर हरिनाम माँगते हैं तो उनके धूर्ततापूर्ण वाक्यों को साधु पुरुष समझ लेते हैं और उन्हें कभी भी हरिनाम नहीं देते। साधु उन्हें बड़े स्नेह से कहते हैं कि तुम कपटता छोड़ दो तथा प्रतिष्ठा की आशा को भी छोड़कर हरिनाम में श्रद्धा करो। हरिनाम में श्रद्धा होने से अनायास ही तुम्हें हरिनाम मिल जायेगा और हरिनाम के प्रभाव से तुम इस संसार से पार हो जाओगे परन्तु जब तक तुम्हारी हरिनाम में श्रद्धा नहीं होती तब तक तुम्हारा हरिनाम लेने का कोई अधिकार ही नहीं है। तुम शुद्ध भक्तों के मुख से शास्त्रों में वर्णित हरिनाम की महिमा श्रवण करो तथा प्रतिष्ठा की आशा छोड़कर दीनता को अपनाओ। जब तुम्हारी नाम में श्रद्धा हो जायेगी, तभी हरिनाम रूपी महाधन के धनी, श्रील गुरुदेव, तुम्हें हरिनाम रूपी महाधन प्रदान करेंगे।

इस अपराध से छुटकारा प्राप्ति का उपाय
प्रमादे यद्यपि नाम – उपदेश हय।
श्रद्धाहीने तबे गुरु पाय महाभय ।।19।।
वैष्णव – समाजे ताहा करि’ विज्ञापन।
सेइ दुष्ट – शिष्यत्याग करे महाजन ।।20।।
ताहा ना करिले गुरु अपराधक्रमे।
भक्तिहीन दुराचार हय मायाभ्रमे ।।21।।
अतएव प्रभु या’रे आदेश करिले।
नाम प्रचारिते ता’रे एइ आज्ञा दिले ।।22।।

असावधानीवश श्रद्धाहीन व्यक्ति को हरिनाम दे दिया जाये तो उससे गुरु के पतन का डर बना रहता है। ऐसी अवस्था में गुरु को चाहिए कि वह वैष्णव – समाज में जाकर श्रद्धाहीन को हरिनाम देने के बारे में बताये और उस दुष्ट – शिष्य को त्याग दे। ऐसा नहीं करने से इसी अपराध के कारण धीरे – धीरे वह गुरु भक्तिहीन और दुराचारी होकर माया के जाल में फंस जाता है।

श्रीचैतन्य महाप्रभु जी को श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि हे प्रभु! आपने हरिनाम का प्रचार करने वाले भक्तों को यही आदेश दिया है कि श्रद्धावान व्यक्ति को ही श्रीहरिनाम का उपदेश प्रदान करें तथा गाँव – गाँव व शहर – शहर में श्रीहरिनाम की महिमा का प्रचार करें। उच्च नाम – संकीर्तन के द्वारा श्रीकृष्ण नाम के प्रति श्रद्धा का प्रचार करें।

इस विषय में महाप्रभु की आज्ञा
श्रद्धावान् जने कर नाम उपदेश।
नाम – महिमय पूर्ण कर सर्वदेश ।।23।।
उच्चसंकीर्त्तने कर श्रद्धार प्रचार।
श्रद्धा लभि’ जीव करे सद्गुरू – विचार ।।24।।
सद्गुरू – निकटे करे श्रीनाम – ग्रहण।
अनायासे पाय तबे कृष्ण – प्रेमधन ।।25।।
चोर, वेश्या, शठ आदि पापासक्तजने।
छाड़ाइया पापमति दिवे श्रद्धाधने ।।26।।
सुश्रद्ध हइले दिवे नाम उपदेश।
एइ रूपे नाम दिया तार सर्वदेश ।।27।।

श्रद्धा प्राप्त करके ही जीव सद्गुरु के सम्बन्ध में विचार करेगा। श्रद्धावान जीव सद्गुरु से श्रीहरिनाम ग्रहण करके अनायास ही श्रीकृष्ण – प्रेमधन प्राप्त कर लेगा। गुरु को चाहिए कि वह चोर, वेश्या तथा कपटी आदि पापों में लिप्त व्यक्तियों की पापमय बुद्धि को समाप्त करके उनके हृदय में श्रीकृष्ण नाम के प्रति श्रद्धा उत्पन्न करें। इस प्रकार के व्यक्तियों की जब हरिनाम में दृढ़ – श्रद्धा हो जाये तो वे उन्हें हरिनाम प्रदान करें। इस प्रकार हरिनाम का उपदेश देकर सारे विश्व का उद्धार करें।

श्रद्धाहीन व्यक्ति को हरिनाम देने का फल
इहा ना करिया यिनि देन नामधन।
सेइ अपराधे तां’र नरके पतन ।।28।।
नाम पेये शिष्यकरे नाम – अपराध।
ताहाते गुरुर हय भक्तिरसबाध ।।29।।
एइ नाम अपराध दुँहे शिष्य गुरु।
नरकेते याय एइ अपराध ऊरु ।।30।।

पापियों की पापमय बुद्धि को खत्म न करके तथा उनके हृदय में भगवद् – नाम के प्रति श्रद्धा उत्पन्न न करके जो व्यक्ति उन्हें हरिनाम – धन प्रदान करता है, उसका इसी अपराध से पतन हो जाता है। श्रद्धाहीन शिष्य हरिनाम प्राप्त करके नामापराध करता है, जिससे गुरु की भक्ति – रस प्राप्ति में बाधा पहुँचती है। इस नाम – अपराध के कारण गुरु और शिष्य, दोनों ही नरक में जाते हैं।

पहले श्रद्धा उत्पन्न कराओ फिर हरिनाम दो

जगा माधा प्रति तुमि महा कृपा करि’।
नामे श्रद्धा दिया नाम दिले गौरहरि ।।31।।
अद्भुत चरित्र तव सर्व जनगण।
श्रद्धाय करूक अनुकरण चरण ।।32।।
भक्तपाद भक्तिते विनोद याहार।
हरिनामचिन्तामणि अलङ्कार ता’रे ।।33।।

श्रीमन्महाप्रभु जी को श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि हे प्रभु! आपने जगाई और माधाई के प्रति कृपा की थी। हे गौरहरि! आपने पहले उनके मन में हरिनाम के प्रति श्रद्धा उत्पन्न की और फिर उन्हें हरिनाम प्रदान किया। इस अद्भुत चरित्र को सभी लोग श्रद्धा के साथ अपने जीवन में आचरण करें।

श्रीभक्ति विनोद ठाकुर जी कहते हैं कि भक्तों के चरण तथा भक्तों की सेवा ही जिनका आनन्द है, “श्रीहरिनाम चिन्तामणि” उनके गले का हार है।

इति श्रीहरिनामचिन्तामणौ श्रद्धाहीनजने नामापराधविचारो नाम दशमः परिच्छेदः।