नाम्नो बलाद् यस्य हि पापबुद्धि र्नविद्यते तस्य यमैहि शुद्धिः।
गौरगदाधर जय जाह्रवा-जीवन।
जय जय सीताद्वैत जय भक्तगण ॥1॥
श्रीगदाधर जी, श्रीगौरांग, महाप्रभु एवं श्रीमती जाह्रवा देवी जी के जीवन-स्वरूप श्रीनित्यानन्द जी की जय हो। सीतापति श्रीअद्वैताचार्य जी और श्रीवास आदि जितने भी भक्त हैं सभी की जय हो, जय हो।
नाम ग्रहण करने से सभी प्रकार के अनर्थ दूर होते हैं
हरिदास बले, नाम—शुद्ध सत्त्वमय।
भाग्यवान् जीव करे नामेर आश्रय ॥2॥
अति शीघ्र ताहार अनर्थ दूरे याय।
हृदय-दौर्बल्य आर स्थान नाहि पाय ॥3॥
नामे दृढ़ हैले नाहि हय पापे मति।
पूर्वपाप दग्ध हय, चित्त शुद्ध अति ॥4॥
पाप आर पापबीज, पापेर वासना।
अविद्या ताहार मूल ए तिन यन्त्रणा ॥5॥
सर्वजीवे दया आसि’ हइवे उदय।
जीवेर मंगल-चेष्टा सतत करय ॥6॥
जीवेर सन्ताप कभु सहिते ना पारे।
याहे परताप याय, ता’र चेष्टा करे ॥7॥
विषयपिपासा अति तुच्छ मने हय।
इन्द्रियलालसा ता’र चित्ते नाहि रय ॥8॥
कनककामिनी-चेष्टा-प्रति घृणा करे।
यथा धर्मलाभे तुष्ट थाकि’ प्राण धरे ॥9॥
भक्ति-अनुकूल सब करये स्वीकार।
भक्तिप्रतिकूल नाहि करे अंगीकार ॥10॥
कृष्ण रक्षाकर्त्ता एकमात्र बलि’ जाने।
जीवने पालनकर्त्ता कृष्ण, इहा माने ॥11॥
अहं मम बुद्ध्याशक्ति ना राखे हृदये।
दीनभावे नाम लय सकल समये ॥12॥
स्वभावतः या’र एइरूप नामाश्रय।
पापे मति पापाचार ताहार कि हय ॥13॥
नामाचार्य श्रील हरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि श्रीहरिनाम शुद्ध सत्त्वमय हैं और भाग्यवान जीव ही श्रीहरिनाम का आश्रय लेते हैं। हरिनाम के प्रभाव से जीव के हृदय में भरे हुये सारे अनर्थ अति शीघ्र दूर हो जाते हैं। हृदय की दुर्बलता नामक अनर्थ का तो उनके मन में स्थान ही नहीं रहता। हरिनाम के जप से साधक के मन में जब दृढ़ता आती है तब उसमें पापमय-बुद्धि नहीं रहती। यहाँ तक कि, हरिनाम के प्रभाव से उसके सारे पिछले पाप भी नष्ट हो जाते हैं और उसका चित्त बिल्कुल शुद्ध हो जाता है। अज्ञान के कारण पाप बीज तथा पाप की वासना जीव के हृदय में रहती है, उसके कारण जीव संसार में कष्ट भोगता रहता है। नाम-जप के द्वारा जब किसी का हृदय निर्मल हो जाता है तो उसके अन्दर सभी जीवों के प्रति दया-भाव उदित होता है और वह सदा-सर्वदा दूसरों का मंगल करने में ही लगा रहता है। उससे दूसरों का कष्ट नहीं देखा जाता। उसकी हर समय यही चेष्टा होती है कि वह कैसे दूसरे जीवों के क्लेश से उत्पन्न ताप को शान्त कर सके। ऐसी स्थिति में विषय-वासना तो उसे बिल्कुल तुच्छ सी प्रतीत होती है। इन्द्रियों के भोगों की लालसा तो उसके हृदय में रहती ही नहीं। धन-दौलत और कामिनी के प्रति वह आकर्षित तो होता ही नहीं, उन्हें प्राप्त करने के लिए वह प्रयास तो करता ही नहीं, बल्कि इन सबसे वह घृणा करने लगता है। संसार में रहने के लिए ईमानदारी से जितना भी वो धन कमा पाता है, उसी में उसको सन्तोष रहता है। उसकी वास्तविक चेष्टा तो भगवान की भक्ति के अनुकूल कार्यों को करने में तथा भक्ति के प्रतिकूल कार्यों को त्यागने में ही रहती है। श्रीकृष्ण ही उसके एकमात्र रक्षाकर्त्ता एवं पालनकर्त्ता हैं, इस प्रकार का दृढ़ विश्वास उसमें होता है। उसके हृदय में शरीर के प्रति “मैं” भाव तथा शरीर सम्बन्धी व्यक्तियों तथा वस्तुओं में “ममता” नहीं रहती। स्वाभाविक रूप से वह तो बड़ी दीनता के साथ हमेशा ही हरिनाम का आश्रय लिए रहता है। ऐसे में उसकी पापों में मति कैसे हो सकती है या ऐसी अवस्था में उसके द्वारा पाप भला कैसे हो सकते हैं।
हरिनाम के द्वारा पिछले पाप तथा पापों की गन्ध भी अति शीघ्र दूर हो जाती है
पूर्व दुष्टभाव ता’र क्रमे हय क्षीण।
पवित्र स्वभाव शीघ्र हइवे प्रवीण ॥14॥
एइ सन्धिकाले पूर्वपापेर सम्बन्ध।
थाकितेओ पारे किछुदिन पापगन्ध ॥15॥
नामेर संसर्गे यत सुमति उदय।
ह’ये सेइ पापगन्ध शीघ्र करे क्षय ॥16॥
प्रतिज्ञा करे’छ नाथ अर्जुन-निकटे।
मोर भक्त कभु नाहि पड़िवे संकटे ॥17॥
संकट-समये आमि हइव सहाय।
अतएव पाप याय तोमार कृपाय ॥18॥
ज्ञानमार्गी कष्टे पाप करिया दमन।
तवाश्रय छाड़ि शीघ्र हयत पतन ॥19॥
तव पदाश्रय या’र सेइ महाजन।
विघ्न ना पाइवे कभु सिद्धान्त-वचन ॥20॥
निरन्तर हरिनाम करते रहने से पहले के जो दुष्ट भाव हैं, वे धीरे-धीरे क्षीण होते चले जाते हैं और उनके स्थान पर साधक के हृदय में पवित्र स्वभाव प्रकटित होने लगता है। जब हरिनाम में थोड़ी-थोड़ी रुचि उत्पन्न हो रही होती है, ऐसे समय में अर्थात् पापमय जीवन एवं हरिनाम के आश्रय में जीवन के सन्धिकाल में कभी-कभी पिछले पापों की कुछ गन्ध रह जाती है। किन्तु निरन्तर हरिनाम करते रहने से या यूँ कहें कि श्रीहरिनाम के प्रभाव से उसके हृदय में विद्यमान पूर्व पापों की वह गन्ध भी शीघ्र ही समाप्त हो जाती है और जीव की भगवद्-भक्तिमय मति उदित हो जाती है।
श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि हे प्रभु! आपने महाभारत के युद्ध के समय अर्जुन के सामने प्रतिज्ञा की थी कि मेरा भक्त कभी भी संकट में नहीं पड़ेगा और यदि कभी किसी कारणवश ऐसा हुआ भी तो आप स्वयं उस की रक्षा करेंगे। यही कारण है कि हरिनाम करने वाले के तमाम पाप आपकी कृपा से खत्म हो जाते हैं, जबकि ज्ञानमार्गी व्यक्ति पापों से छुटकारा पाने के लिए बहुत प्रयत्न करता है परन्तु आपका आश्रय छोड़ने के कारण उसका शीघ्र ही पतन हो जाता है। अतः हे प्रभु! ये सिद्धान्त है कि जो आपके चरणाश्रित है, ऐसे भक्त के निकट विघ्न कभी नहीं आते।
असावधानी वश यदि पाप हो जाता है तो उसके प्रायश्चित की कोई आवश्यकता नहीं रहती
यदि कभु प्रमादे घटय कोन पाप।
भक्त तबु नाहि सहे प्रायश्चित्त-ताप ॥21॥
से पाप क्षणिक, नाहि पाय अवस्थिति।
नामरसे भेसे याय, ना देय दुर्गति ॥22॥
किन्तु यदि कोन जन नामे करि’ बल।
आचरे नूतन पाप, से जन चंचल ॥23॥
से केवल कपटता करिया आश्रय।
नाम-अपराधे पाय शोक-मृति-भय ॥24॥
प्रमाद घटना आर विचारितकर्मे।
सम्पूर्ण प्रभेद आछे भक्तिशास्त्रमर्मे ॥25॥
श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि यदि कभी किसी भक्त से प्रमाद वश अथवा असावधानीवश कोई पाप हो जाये तो उसे उसके लिए प्रायश्चित की कोई आवश्यकता नहीं होती क्योंकि वह पाप तो क्षणिक है। वह ज्यादा समय तक भक्त के पास टिक नहीं सकता। वह क्षणिक पाप तो हरिनाम के रस के प्रवाह में बह जाता है। इसलिए असावधानीवश भक्तों के द्वारा हुये किसी भी पाप से उनकी दुर्गति नहीं होती।
परन्तु यदि कोई चंचल व्यक्ति हरिनाम के बल पर नये-नये पाप करता चला जाता है तो उसकी ये क्रिया केवल मात्र कपटता ही होगी क्योंकि इसमें उसने कपटता का आश्रय लिया हुआ है अर्थात् यदि कोई व्यक्ति यह सोच कर नये-नये पाप करता रहे कि हरिनाम के प्रभाव से मेरे समस्त पाप नष्ट हो जायेंगे तो वह कपटी है। नामापराध से व्यक्ति को शोक एवं मृत्यु रूपी भय की प्राप्ति होती है। भक्ति शास्त्रों के अनुसार असावधानी और जानबूझ कर किये जानेवाले पापों में ज़मीन-आसमान का अन्तर है।
पापों में मति होने से ही नामापराध होता है
संसारी मानव येवा आचरये पाप।
प्रायश्चित्त आछे ता’र आर अनुताप ॥26॥
किन्तु नामबले यदि पापे करे मति।
प्रायश्चित्त नाहि ता’र बड़इ दुर्गति ॥27॥
बहुयमयातनादि पाइलेओ ता’र।
सेइ अपराध हइते ना हय उद्धार ॥28॥
पापे मतिमात्रे हय एरूप यन्त्रणा।
पापाचारे यत दोष ता’र कि गणना ॥29॥
संसारी व्यक्ति जब पाप करता है तो उसके लिए प्रायश्चित तथा पश्चाताप का विधान है परन्तु यदि कोई यह सोचकर कि मेरे द्वारा किया गया हरिनाम मेरे पाप धो डालेगा, ऐसे हरिनाम के बल-बूते पर पाप करने की भावनाओं को हृदय में रखने से उसका कोई प्रायश्चित नहीं है, उसकी तो दुर्गति ही होगी। यहां तक की बहुत तरह की नरक यन्त्रणाओं में कष्ट पाने पर भी उसका उद्धार नहीं होता।
मन में पाप की भावना आने से जब इतना कष्ट मिलता है तो नाम के सहारे पाप कर्म करना कितना बड़ा दोष है, उसके बारे में भला क्या कहा जाये।
धूर्त व्यक्ति के द्वारा हरिनाम के बलबूते पर पाप करना मर्कट वैराग्य ही हैं
शास्त्रे शुनियाछे, नाम यत पाप हरे।
कोटि जन्मे महापापी करिते ना पारे ॥30॥
पञ्चविध पाप, महापातक अवधि।
नामाभासे याय, शास्त्र गाय निरवधि ॥31॥
सेइत भरोसा करि’ प्रवञ्चक जन।
शठता करिया नाम करये ग्रहण ॥32॥
कष्टेर संसार छाड़ि’ वैरागीर वेशे।
कनक-कामिनी आशे फिरे देशे देशे ॥33॥
तुमि त’ बलेछ प्रभु मर्कट-वैरागी।
कामिनी सम्भाषि’ फिरे धर्म गृहत्यागी ॥34॥
श्रील हरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि मैंने शास्त्रों से सुना है कि भगवान का एक नाम जितने पापों को धो सकता है उतने पाप कोई महापापी करोड़ों जन्मों में भी नहीं कर सकता। घर में मसाला पीसते हुए, झाड़ू-पोचा लगाते हुए तथा रसोई बनाने के लिए आग जलाते हुए इत्यादि तरीकों से कीड़े-मकोड़ों के अनजाने में भी मर जाने से जो पाँच तरह के पाप लगते हैं तथा दुनिया के महापाप भी नामाभास मात्र से दूर हो जाते हैं। परन्तु शास्त्रों के इन वाक्यों के बलबूते पर धोखेबाज लोग हरिनाम करने का ढोंग करते हैं। गृहस्थी के झंझटों से बचने के लिए वे वैरागी का वेश धारण करके दौलत और कामिनी की लालसा से जर्जरित होकर देश-विदेश में घूमते रहते हैं।श्रीहरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि हे प्रभु! आपने ही तो कहा था कि जो मर्कट-वैराग्य करता है अर्थात् वह व्यक्ति जो गृहत्यागी होते हुये भी स्त्रियों के संग सम्भाषण करता है अर्थात् उनसे अश्लील मज़ाक करता है, उसका वैराग्य-वेश सिर्फ दिखावे के लिए ही होता है। निष्कपट रूप से हरिनाम का आश्रय न करने पर अर्थात् मर्कट-वैराग्य करने पर इस प्रकार का अपराध होना अनिवार्य है
वैराग्येर छले केह गृहे काटे काल।
सम्भाष्य ना हय सब विश्वेर जन्जाल ॥35॥
गृहे थाकु वने याउ, ताते नाहि दोष।
निष्पापे करुक नाम पाइया सन्तोष ॥36॥
नामबले पापमति महा अपराध।
ताहाते मज़िले हय भक्त्ततत्त्वे बाध ॥37॥
वैरागी का वेश धारण करके जो ढोंगी अपनी स्त्री के साथ घर में रहता है, वह पृथ्वी पर भार-स्वरूप है। ऐसे ढोंगियों से ज्यादा बातचीत नहीं करनी चाहिए। जिस भक्त ने हरिनाम का आश्रय लिया है, वह घर में रहे या जंगल में, इसमें कोई दोष नहीं है। हरिनाम के बल पर पाप करना या पाप की भावना को हृदय में पाले रखना महा-अपराध है, ऐसा करने से भजन में बाधाएँ आती हैं। निष्कपट होकर हरिनाम करने से भगवान श्रीहरि को बड़ा संतोष होता है।
नामाभासी व्यक्तिगण इन कपटी लोगों का संग करके अपराधी हो पड़ते हैं
नामाभासी जनेर कुसंग यदि हय।
तबे एइ अपराध घटिवे निश्चय ॥38॥
शुद्ध नामोदय या’र हृदये हइवे।
एइ नाम अपराध ता’र ना घटिवे ॥39॥
नामाभासी-व्यक्ति को यदि बुरी संगति मिल जाये तो निश्चय ही उससे यह अपराध होगा अर्थात् जिसके हृदय में शुद्ध-हरिनाम का उदय हो चुका है, उसके द्वारा यह अपराध नहीं होगा।
शुद्ध-नामाश्रित-व्यक्ति को नामापराध स्पर्श भी नहीं करते
शुद्धनामाश्रितजने अपराध दश।
कोनरूपे कोनकाले ना करे परश ॥40॥
नामाश्रितजने नाम सदा रक्षा करे।
अपराध कभु ता’र ना हइते पारे ॥41॥
यतदिन शुद्ध नाम ना हय उदय।
ततदिन अपराध-आक्रमणे भय ॥42॥
अतएव नामाभासी यदि भाल चाय।
नामबले पापबुद्धि हइते पलाय ॥43॥
शुद्ध-नामाश्रित-व्यक्ति को कभी भी एवं किसी भी रूप से शास्त्रों में वर्णित दस-नामापराध स्पर्श नहीं कर सकते क्योंकि नामाश्रित-व्यक्ति की सदा श्रीहरिनाम ही रक्षा करते हैं। उससे अपराध कभी हो ही नहीं सकता। जब तक जीव के हृदय में शुद्ध नाम उदित नहीं होता, तब तक ही अपराध होने का भय बना रहता है। इसलिए नामाभासी-साधक यदि अपना मंगल चाहता है तो उसे नाम के बल पर पापबुद्धि जैसे अपराधों से दूर रहना चाहिए।
सावधानी से कब तक अपराधों को छोड़ना चाहिए
शुद्ध नामाश्रितजन संगबल धरि।
अपराधे सतर्कता सर्वदा आचरि।।
आपके द्वारा दी गई पुस्तक “श्रीहरिनाम चिन्तामणि” के अगले दो पृष्ठों (पृष्ठ 146 और 147) का यथा रूप टाइप किया गया टेक्स्ट नीचे प्रस्तुत है:
शुद्धनाम या’र मुखे ता’र दृढ़ मन।
कृष्ण हैते विचलित नहे एकक्षण ॥45॥
अतएव नामे बल यतदिन नय।
ततदिन अपराधे करिवेक भय ॥46॥
विशेष यतने पापबुद्धि दूर करि’।
अहर्निशि मुखे बलिवेक हरि हरि ॥47॥
श्रीगुरुकृपाय ह’वे सुसम्बन्धज्ञान।
कृष्णभक्ति, कृष्णनाम ताहाते विधान ॥48॥
शुद्ध-नामाश्रित-व्यक्तियों के संग में रहकर सर्वदा ऐसा आचरण करते रहना चाहिए जिससे हमारे द्वारा कोई अपराध न हो। जिनके मुख से शुद्ध-नाम उच्चारित होता है, उनका मन सदैव दृढ़ रहता है। उनका दृढ़ मन एक क्षण के लिए भी श्रीकृष्ण के पादपद्मों से विचलित नहीं होता। अतः जितने दिन तक साधक के अन्दर नाम का बल विद्यमान नहीं होता अर्थात् जब तक उसके हृदय में शुद्ध-नाम उदित नहीं होता, तब तक उसे अपराधों से भयभीत रहना ही चाहिए। साधक को चाहिए कि वह विशेष-यत्न के साथ पापमय-बुद्धि को दूर करके दिनरात निरन्तर मुख से हरिनाम करता रहे। श्रीगुरुदेव की कृपा से जब उसे सम्बन्ध ज्ञान होगा, तब ही उसके द्वारा श्रीकृष्ण-भक्ति व श्रीकृष्ण-नाम ठीक प्रकार से हो
पायेगा।
इस अपराध का प्रतिकार
यद्यपि प्रमादे नामबले पापबुद्धि।
शुद्ध वैष्णवेर संगे करि ता’र शुद्धि ॥49॥
पापस्पृहा बाटपाड़ पथे आसि’ धरे।
विशुद्ध वैष्णवगण पथरक्षा करे ॥50॥
उच्चैःस्वरे डाकि रक्षकेर नाम धरि’।
पलाइवे बाटपाड़, आसिवे प्रहरी ॥51॥
आदरे बलिवे भाइ, नाहि कर भय।
आमि त’ रक्षक तब शुन महाशय ॥52॥
केवल वैष्णवपद-दास्यव्रत या’र।
हरिनाम-चिन्तामणि गाय सेइ छार ॥53॥
यदि प्रमाद से अर्थात् असावधानीवश नाम के बल पर पापबुद्धि होती है तो शुद्ध-वैष्णवों के संग के द्वारा उसे दूर करने की चेष्टा करनी चाहिए। पाप-वासना एक ऐसा लुटेरा है जो भक्ति मार्ग में सब कुछ लूट कर ले जाता है। ऐसे समय पर विशुद्ध-वैष्णव ही भक्तिमार्ग में हमारी इन लुटेरों से रक्षा करते हैं। यदि उच्च स्वर से हम इन भक्ति-मार्ग के रक्षकों का अर्थात् वैष्णवों का नाम पुकारेंगे तो पापवासनामय लुटेरे हमारे हृदय से भाग जायेंगे और हमारे भक्तिमार्ग के रक्षक हमें बचाने के लिए आ जायेंगे, इसलिए शुद्ध-वैष्णवों को आदर के साथ स्मरण करते रहना चाहिए अथवा आदर के साथ शुद्ध-वैष्णवों का नाम उच्चारण करते रहना चाहिए।
श्रील हरिदास ठाकुर जी कहते हैं कि बड़े आदर के साथ वैष्णवों को पुकारें। ऐसा करने से “डरो मत, मैं तुम्हारा रक्षक हूँ”—ऐसा कह कर वह वैष्णव तुम्हारे पास आ जायेंगे।
इति श्रीहरिनामचिन्तामणौ नामबलेन पापबुद्धि विचारो नाम नवमः परिच्छेदः