पुरुषोत्तम मास और मलमास (अधिकमास)
श्रीहरिभक्तिविलासके अनुसार पुरुषोत्तम मासमें ही पुरुषोत्तम व्रत हुआ करता है। इस वर्ष 17 मई से 15 जून तक पुरुषोत्तम मास है। स्मार्त्त लोग इसे मलमास या अधिकमास कहते हैं। यही नहीं, वे लोग इस अधिकमासको ‘मलिम्लुच’ (चोर), मलिनमास आदि नाम देकर घृणा प्रकाश करने में भी कुण्ठित नहीं होते। उनके विचार के अनुसार इस महीने कोई भी शुभ कर्म नहीं किया जा सकता है। इसीलिए यह महीनों में मल-स्वरूप है। अतएव उन्हों ने साधारण जनतामें इस अधिकमास को मलमास के नाम से ही प्रसिद्ध कर रखा है। परन्तु वैष्णव-समाज स्मात्तों के इस विचार का किसी प्रकार भी अनुमोदन नहीं करता है।
हमारे देशमें दो प्रकारके शास्त्र परिलक्षित होते हैं। लोग अपनी-अपनी रुचिके अनुसार शास्त्रोंकी युक्तियों को ग्रहण करते हैं। इसलिए पारमार्थिक शास्त्र स्मार्त्तशास्त्रसे अलग हैं। जो लोग विषय-भोगोंको भोगनेके लिए कर्ममार्ग में प्रवेश करते हैं, वे ही स्मार्त्त शास्त्रों का आदर करते हैं। ऐसे स्मार्त्त मत के अनुसार ही मलमास या अधिमास का एक महीना निष्क्रिय होकर बिताये जानेकी विधि है। शरीर और मनके निष्क्रिय रहनेपर ही शैतान वहाँ पर अपना अड्डा जमा लेता है। स्मार्तों या कर्मियों को पीड़ित करने के लिए इसी समय शैतान को सुवर्ण सुयोग प्राप्त होता है।
वैष्णव लोग अपना एक क्षण का समय भी हरि-सेवा के अतिरिक्त किसी दूसरे कर्मोंमें गंवाते नहीं हैं। वैष्णव लोग जिन भक्ति-अंगों का आचरण करते हैं, उनमें ‘अव्यर्थकालत्व’ एक प्रधान अङ्ग है। श्रीपुरुषोत्तम मास २ वर्ष, ८ महीना, १६ दिन, ४ घंटे के बाद एक बार आविर्भूत होता है। अतएव वैष्णवों के लिए यह मलमास नहीं, बल्कि प्रचलित बारह महीनों की अपेक्षा श्रेष्ठ मास है। यहाँ तक कि बारह महीनोंके मध्य वैशाख, कात्तिक और माघ- इन तीन पवित्र महीनों से भी बढ़कर इस अधिक मास की महिमा नारदीय पुराण में बतलायी गई है।
पुरुषोत्तम मास के सम्बन्धमें नारदीय पुराण
बारह सौर मासोंके साथ बारह चान्द्र मासोंका मेल रखनेके लिए प्रति ३२ माह, १६ दिन और ४ घन्टोंके बाद एक चान्द्र मास अर्थात् एक अमावस्यासे लेकर दूसरी अमावस्यातक एक अधिक मास स्वीकार करना पड़ता है। स्मार्त्त मतमें इस अधिक मासको वर्षका मल माना गया है। इस अधिक मासके सम्बन्धमें नारदीय पुराणमें एक आख्यायिकाका वर्णन है। वह आख्यायिका इस प्रकार है-एक समय दूसरे दूसरे मासोंका आधिपत्य और स्मात्तोंके द्वारा अपनी उपेक्षा देखकर ‘अधिक-मास’ बड़े दुःखित हुए और वैकुण्ठपति नारायणके चरणोंमें उपस्थित होकर अपने दुःखका कारण बताए। श्रीवैकुण्ठनाथको इनपर बड़ी दया आई। वे इन्हें साथ लेकर गोलोकमें स्वयं भगवान् कृष्णके पास पहुँचे और अधिक मासका दुःख दूर करनेके लिए उनसे प्रार्थना किए। उनकी प्रार्थनाको सुनकर श्रीकृष्णने मुस्कराते हुए नारायणसे कहा- “हे रमापते! जैसे मैं जगत्में पुरुषोत्तमके नामसे विख्यात है, उसी प्रकार यह अधिक मास भी संसारमें ‘पुरुषोत्तम मास’के नामसे प्रसिद्ध होगा। आजसे मैंने अपने सारे गुणोंको इस मासमें स्थापित कर दिया। यह मेरी सादृश्यताको प्राप्त करके अन्य सभी मासोंका अधिपति होगा। जो व्यक्ति निष्काम होकर अथवा समस्त प्रकारकी कामनाओंसे मुक्त होकर इस मासमें मेरा पूजन करेगा, वह समस्त प्रकारके सुखोंको भोगता हुआ अन्तमें मुझको ही प्राप्त होगा। दूसरे मास सकाम हैं, यह मास निष्काम है अर्थात् कामनावाले मनुष्य फल भोगकी कामनाको पूर्ण करनेके लिए प्रचलित बारह चान्द्र मासोंमें नाना-प्रकारके सकाम कर्मोंके अनुष्ठानमें लिप्त रहते हैं, परन्तु इस अधिक मासमें वैसे सकाम पुरुषोंकी किसी कामनाकी पूत्ति न होनेके कारण यह मास निष्काम है। इसलिए निष्काम भगवद्भक्तगण इस पुरुषोत्तम मासमें भक्तिपूर्वक मेरा पूजन करनेपर धन-जन, पुत्र-परिवार आदिका सुख अनायास ही (स्वयं ही) प्राप्त करते हैं और अन्तमें वे (पुरुषोत्तम मास में मेरी पूजा करने वाले) मुक्ति लाभकर नित्यानन्दमय गोलोकवासी होते हैं-
अहमेतैर्यथा लोके प्रथितः पुरुषोत्तमः ।
तथाऽयमपि लोकेषु प्रथितः पुरुषोत्तमः ।।
अस्मै समर्पिताः सर्वे ये गुणा मयि संस्थिताः।
मत्सादृश्यमुपगम्य मासानामधिपो भवेत् ।।
जगत्पूज्यो जगद्वन्द्यो मासोऽयं तु भविष्यति ।
सर्वेमासाः समामाश्च निष्कामोऽयं भयाकृतः ।।
येनाहमर्चितो भक्त्या मासेऽस्मिन् पुरुषोत्तमे।
धनपुत्रसुखं भुंक्त्वा पश्चाद्रोलोकवासभाक् ।।
(नारदीय पुराण)
अतएव स्वयं भगवान् श्रीकृष्णने वैकुण्ठ के उन्होंने स्वयं कल्याण चाहने वाले प्राणियों को भगवान श्री नारायण की प्रार्थना से भी अधिक इस माह की श्रेष्ठता का वर्णन किया। यही कारण है कि समस्त शास्त्रों के ज्ञाता वैष्णव विद्वान अधिक माह को ‘पुरुषोत्तम मास’ मानते हैं और इसी माह में पुरुषोत्तम व्रत का पालन करते हैं। इस व्रत में कट्टिक व्रत के सभी नियमों का पूर्णतया पालन करना होता है। आहार के संबंध में भी यही विधि अपनाई जाती है। विशेष विधियों और निषेधों को जानने के लिए, इसी लेख के परिशिष्ट में “श्री पुरुषोत्तम मास के कृत्य” शीर्षक से लेख पढ़ें। यह लेख जगद्गुरु श्रीमद् भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा लिखा गया है। यह लेख अगले अंक में प्रकाशित होगा।
सात्विक शास्त्रों की श्रेष्ठता
कोई-कोई ऐसा कह सकते हैं कि यदि किसी शास्त्रमें अधिकमासको मलमास अथवा मलिम्लुच या मलिनमास कहा गया हो, तो वैष्णवगण उसे क्यों नहीं स्वीकार करते? इस विषयमें हमारा यह कहना है कि इस अधिकमासको शास्त्रोंमें पुरुषोत्तम मास भी तो कहा गया है। अब यह देखना है कि इन दो प्रकारके शास्त्रोंमें किस शास्त्रकी प्रधानता स्वीकृत है। पुराण अठारह हैं। ये १८ पुराण तीन भागोंमें विभक्त हैं- सात्त्विक पुराण, राजसिक पुराण और तामसिक पुराण। इनमेंसे सात्त्विक पुराण ही सर्वसम्मत रूपमें श्रेष्ठ हैं। अब यह ठीक हो गया कि सात्त्विक पुराण ही श्रेष्ठ हैं। अतएव सात्त्विक पुराणके अन्तर्गत नारदीय पुराणकी प्रामाणिकता अन्य राजसिक और तामसिक पुराणोंकी अपेक्षा स्वतः सिद्ध है। ऐसा होनेपर नारदीय पुराणमें उल्लिखित ‘अधिक मास’ सम्बन्धी यह विचार कि अधिक मास पुरुषोत्तम मास है-प्रामाणिक और निर्भरयोग्य ठहरता है। यही कारण है कि वैष्णवगण सात्त्विक पुराणोंके प्रमाणको ही श्रेष्ठ प्रमाण स्वीकार करते हैं तथा स्मात्तोंद्वारा समर्थित राजसिक या तामसिक पुराणोंकी प्रामाणिकताको सात्त्विक पुराणोंके मुकाबले स्वीकार करनेमें असमर्थ हैं। तब यह बात ठीक है कि जहाँ राजसिक और तामसिक पुराणोंके वचनसमूह सात्त्विक पुराणोंका आनुगत्य करते हैं अर्थात् विरोध नहीं करते हैं, वहीं राजसिक और तामसिक पुराणेंके वचनोंको भी माननेमें कोई बाधा नहीं है। इसका कारण यह है कि राजसिक और तामसिक स्वभाववाले मनुष्योंको सत्त्वगुणकी तरफ आकर्षित करनेके लिए उन पुराणोंमें (राजसिक और तामसिक पुराणोंमें) ऐसा लिखा गया है।
सात्विक, राजसिक और तामसिक—ये तीनों गुण श्रेष्ठ हैं। श्रेष्ठता और हीनता इनके फल से निर्धारित होती है। जिस गुण का फल सर्वोत्तम होगा, वही श्रेष्ठ होगा। गीता शाखा ने हमें इस बारे में आगाह किया है। गीता के चौदहवें अध्याय का ध्यानपूर्वक अध्ययन करने वालों को इसमें कोई संदेह नहीं होगा। सात्विक गुण ही शुद्ध ज्ञान और सुख प्रदान करके धीरे-धीरे उन्नति की ओर ले जाता है। दूसरी ओर, राजसिक और तामसिक गुण मनुष्य को अपमानजनक, पीड़ादायक और भयानक अज्ञान के अंधकार में धकेल देते हैं। पाठकों की जानकारी के लिए गीता के दो-तीन श्लोक यहाँ उद्धृत किए गए हैं:
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् प्रकाशकमनामयम्।
सुखसांगेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ।।
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनाम् ।।
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तत्रिबध्नाति भारत ।।
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्।
रजसस्तु फलं दुःखम् अज्ञानं तमसः फलम् ।।
उर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्येतिष्ठन्तिराजसाः।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधोगच्छन्ति तामसाः ।।
(गीता १४/६, ७, ८, १६, १८)
गीताको समस्त सनातन धर्मावलम्बियोंने सर्वसम्मतिसे प्रमाण माना है। साक्षात् गोलोकपति श्रीकृष्णकी श्रीमुख-वाणी होनेके कारण वे इसे गीतोपनिषद् मानते हैं तथा इसका पूजन भी करते हैं। अतएव श्रीगीतोपनिषद्की उक्त वाणियोंसे यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि सात्त्विक गुण ही श्रेष्ठ है और इसीके द्वारा विशुद्ध ज्ञान लाभकर उत्तम गति पायी जा सकती है। रजोगुणकी वृद्धि होनेपर जीव सकाम कर्मी हो पड़ता है, यह सकाम कर्म ही जीवके बन्धनका कारण है। उससे लोभ आदि नाना प्रकारकी कामनाएँ और सत्-असत् क्रियाओंमें प्रवृत्ति पैदा होती है। इस विषयमें भी गीताने हमें स्पष्ट सावधान किया है-
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ।।
(गीता १४/१२)
गीताके प्रमाणके अनुसार कोई-कोई यह भी कह सकते हैं कि सात्विक गुण श्रेष्ठ है तथा सात्त्विक शास्त्रोंकी प्रामाणिकता भी स्वीकार्य है; परन्तु नारदीय पुराण सात्त्विक पुराण है, इसका क्या प्रमाण है? इस विषयमें हम ब्रह्मवैवर्तपुराणका प्रमाण देकर इस सन्देहको दूर करते हैं। अठारह पुराणोंमें से कौन-कौन पुराण किस गुणकी श्रेणीमें है, यह स्थिर करते हुए ब्रह्मवैवर्त्तमें इस प्रकार कहा गया है-
वैष्णवं नारदीयञ्च तथा भागवतं शुभम्।
गारुड़ञ्च तथा पाद्यं वराहं शुभदर्शने।
सात्त्विकानि पुराणानि विज्ञेयानि मनीषिभिः ।।
ब्रह्माण्ड ब्रह्मवैवर्त्त मार्कण्डेयं तथैव च।
भविष्यं वामनं ब्राह्यं राजसानि निबोधत ।।
मात्स्यं कौर्म तथा लैङ्ग शैवं स्कान्दं तथैव च।
आग्नेयञ्च षडेतानि तामसानि निबोधत ।।
अर्थात् अठारह पुराणोंमेंसे मनीषियोंने विष्णु पुराण, नारदीय पुराण, मङ्गलमय भागवत पुराण, गरुड़ पुराण, पद्मपुराण एवं बराह पुराण-इन छः पुराणोंको सात्त्विक पुराण माना है। ब्रह्माण्ड, ब्रह्मवैवर्त्त, मार्कण्डेय, भविष्य, वामन और ब्रह्मपुराण- ये छः राजस पुराण हैं एवं मत्स्य, कूर्म, लिङ्ग, शिव, स्कन्द और अग्नि-ये छः पुराण तामस कहे गये हैं।
यहाँ विशेष लक्ष्य करनेकी बात यह है कि ब्रह्मवैवर्त पुराण राजसिक पुराणके अन्तर्गत है और ब्रह्मवैवर्त पुराण अर्थात् राजसिक पुराणमें ही सात्त्विक पुराणोंकी सर्वश्रेष्ठताका उल्लेख है। यदि सात्त्विक पुराणोंकी श्रेष्ठताका यह उल्लेख किसी सात्त्विक पुराणमें होता, तो राजस या तामस व्यक्ति यह कहनेका अवसर पा सकते थे कि अपनी प्रशंसा तो सभी करते हैं; यदि सात्विक पुराणोंमें सात्त्विक पुराणोंकी सर्वोत्तमताका उल्लेख है तो इससे प्रामाणिकता सिद्ध नहीं होती। परन्तु यहाँ तो राजसिक पुराणोंमें सात्त्विक पुराणोंकी सर्वश्रेष्ठताका उल्लेख रहनेके कारण अपनी प्रशंसा आप करनेका दोष स्पर्श नहीं करता है।
अतएव अधिक मासको ‘मलमास’ के रूप में ग्रहण न करके सात्त्विक पुराणोंके अनुसार हम इसे ‘पुरुषोत्तम मास’ के रूपमें इसकी सर्वश्रेष्ठता स्थापित करेंगे। यह सारे शुभ कर्मोंका आकर-स्वरूप और स्वभावतः ही समस्त प्रकारकी मनोकामनाओंको पूर्ण करनेवाला है।
अधिकमासको मलमास कहना अयुक्तिसंगत है
यदि एक ही शास्त्रकर्ताके विभिन्न मत एक ही स्थानमें दिखलायी पड़ते हों, तो उनमेंसे कौन-सा मत ग्रहण करने योग्य है- इस विषयमें और भी विचार करना आवश्यक है। शास्त्रमें परस्पर विरोधी विचार उपस्थित होनेपर वहाँ एक मात्र युक्ति ही उनकी सङ्गति स्थापन करती है-
केवलं शास्त्रामाश्रित्य न कर्त्तव्या विनिर्णयः।
युक्तिहीनविचारे तु धर्महानिः प्रजायते ।।
इस प्रकार पूर्व पक्ष उठानेपर भी हम युक्तिके द्वारा ही इसको स्थापन कर सकेंगे कि अधिकमासको मलमास कहना उचित नहीं है। क्योंकि यह अधिक मास चान्द्र मासका अभाव पूरा करता है। केवल यही नहीं, यह सौर वर्षके साथ मिलन करानेवाला भी है। जो अभाव है पूरा करते हैं, उनको तुच्छ या दीन समझना अन्याय और दुर्नैतिकता है। कर्मजड़ स्मार्त्तलोग मलके द्वारा अभाव पूरा करना चाहते हैं-इसे युक्तिवादी नैतिक सज्जन पुरुष कैसे मान सकते हैं? जो चन्द्र सूर्यके आलोकसे प्रदीप्त होकर आत्मगरिमा व्यक्त करते हैं, उन चन्द्रकी गति ३२ महीनोंमें हासप्राप्त होनेपर उनमें सूर्यके साथ मिलनेकी आकांक्षा बड़ी ही प्रबल हो उठती है। यह अधिक मास चन्द्रकी गतिको बढ़ाकर सूर्यके बराबर पक्तिमें लाता है अर्थात् चान्द्र वर्ष पूरा करके, उसको सौरवर्षके समानान्तर रेखामें उपस्थितकर दोनोंको मिलाता है। अतः यह दोनोंसे मिलन करानेवाला है। इसलिए मिलन करानेवाले इस अधिकमासको सर्वोत्तम ‘पुरुषोत्तम मास’ न जान कर मल या मलिम्लुच माननेसे नैतिकगण उपहास करेंगे। मलिम्लुच शब्दका अर्थ चोर होता है। चोरोंका रात्रिकालमें आपसमें मिलना हास्यास्पद और घृणित है। अतएव अधिक मासको मलिन मास या मलमास कहना किसी प्रकार युक्तिसङ्गत नहीं पूरा करते हैं, उनको तुच्छ या दीन समझना अन्याय और दुर्नैतिकता है। कर्मजड़ स्मार्त्तलोग मलके द्वारा अभाव पूरा करना चाहते हैं-इसे युक्तिवादी नैतिक सज्जन पुरुष कैसे मान सकते हैं? जो चन्द्र सूर्यके आलोकसे प्रदीप्त होकर आत्मगरिमा व्यक्त करते हैं, उन चन्द्रकी गति ३२ महीनोंमें हासप्राप्त होनेपर उनमें सूर्यके साथ मिलनेकी आकांक्षा बड़ी ही प्रबल हो उठती है। यह अधिक मास चन्द्रकी गतिको बढ़ाकर सूर्यके बराबर पक्तिमें लाता है अर्थात् चान्द्र वर्ष पूरा करके, उसको सौरवर्षके समानान्तर रेखामें उपस्थितकर दोनोंको मिलाता है। अतः यह दोनोंसे मिलन करानेवाला है। इसलिए मिलन करानेवाले इस अधिकमासको सर्वोत्तम ‘पुरुषोत्तम मास’ न जान कर मल या मलिम्लुच माननेसे नैतिकगण उपहास करेंगे। मलिम्लुच शब्दका अर्थ चोर होता है। चोरोंका रात्रिकालमें आपसमें मिलना हास्यास्पद और घृणित है। अतएव अधिक मासको मलिन मास या मलमास कहना किसी प्रकार युक्तिसंगत नहीं है।