नित्यलीला प्रविष्ट ॐ विष्णुपाद परिव्राजकाचार्य त्रिदण्डि स्वामी १०८ श्री श्रीमद्भक्तिसारंग गोस्वामी महाराज

प्रणाम एवं अष्टक
श्रीधाम माहात्म्य प्रकाश कृत्ये, विशुद्ध सिद्धान्तगिरां प्रचारे।
गुर्वानुगत्यं दधतः सदैव, यस्य प्रचेष्टा लिखचित्त लग्ना ।।
वाग्मी प्रधानः प्रवरो वुधनोत्, यो भक्ति सारंग पदाश्रयश्च।
अप्राकृताख्य द्विजवन्द्य वंशः, साधुचिताशेष गुणैक वासः ।
श्रीभक्तिसारंग गोस्वामी नामा, वन्दे गुरोः श्रीचरणारविन्दम् ।।
शारदीय निर्मल आकाश में जिस प्रकार चन्द्रमा उनके विशिष्ट तारा-ग्रहों के साथ समग्र विश्व पर उनकी स्निग्ध-सुशीतल सुखमय ज्योत्सनालोक किरण माला वितरण करने के लिए एक विशेष सभा की सूचना किया करते हैं, ठीक उसी प्रकार आज से सौ-साल पहले गौड़ीय गगन में सुन्दर सुनिर्मल एवं स्निग्ध सुशीतल नित्य परमानन्द सुखमय भक्ति चन्द्रमा के दिव्य ज्योतिपुंज किरणमाला सदृश एक विशेष नक्षत्र के रूप में हजार-हजार यात्री भक्तों सहित अपराह्न के समय श्रीलप्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर कुलिया पोड़ामा तला तक पहुँचे एवं साथ ही श्रीश्री गुरु-गौरांग गान्धर्विका गिरिधारी जू हाथी की पीठ पर दिव्य सिंहासन पर विराजित थे। श्रील प्रभुपाद श्रीधाम माहात्म्य कीर्तन करते थे। इसी समय बहुत असत् प्रकृतिस्थ दुष्ट ब्राह्मण, जातगोसांई इत्यादि सहजिया अपसम्प्रदायी लोगों ने श्रील प्रभुपाद को लक्ष्य कर एवं भक्तों के ऊपर बड़े-बड़े ईंट, पत्थर आदि फेंकने लगे और जोर-जोर से चिल्लाकर कहने लगे- प्रभुपाद कहाँ हैं? हम सब उसी को चाहते थे। यहाँ तक कि महिलाओं के ऊपर भी अत्याचार करने लगे। इस प्रकार भयंकर परिस्थिति में श्रीपाद विनोदविहारी ब्रह्मचारी जी श्रील प्रभुपाद को एक गृहस्थ के घर के अन्दर ले जाकर स्वयं संन्यास वेष पहन लिया और अपनी धोती, कुर्ता श्रील प्रभुपाद को पहनाकर गोपनीय रूप से एक विश्वस्त भक्त के साथ श्रीधाम मायापुर श्रीचैतन्य मठ में भेज दिया। इधर श्रीविनोदबिहारी ब्रह्मचारी जी श्री प्रभुपाद के रूप से पोड़ामातला को अस्वाभाविक अत्याचारिता परिस्थिति को सम्हाल कर समस्त यात्रियों के साथ रात ८ बजे मायापुर श्रीचैतन्य मठ में पहुँचे।
श्रील प्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर के आश्रित विश्व वरेण्य वाग्मीश्रेष्ठ विशिष्ट संन्यासी एवं ब्रह्मचारी को लेकर भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु की, कलिहत दुरतिक्रमा मायामुग्ध दुर्भागा समस्त जीवकुल के लिए परम मंगलमय अमोघ वाणी को समग्र विश्व में प्रचार करने के लिए एक महती सभा का आयोजन किया गया। उसी महती सभा में विशिष्ट व्यक्तियों में अन्यतम रूप से आत्मप्रकाश हुआ श्रीमद्भक्तिसारंग गोस्वामी महाराज का नाम, जिन्होंने एकदिन समग्र विश्व के कोने-कोने में जाकर कलिकाल ग्रस्त जीव के लिए एकमात्र साध्य-साधन भागवतीय भक्तिधर्म अर्थात् श्रीचैतन्य महाप्रभु के उपदिष्ट तथा मनोऽभीष्ट विशुद्ध प्रेमभक्ति धर्म एवं श्रीहरिनाम संकीर्तन की कथा बृहद् रूप से प्रचारित की। भक्ति और प्रेम से जिनका देह-मन गठित है, केवल भक्ति को ही जिन्होंने आदर पूर्वक ग्रहण किया, वे और कोई नहीं भक्ति सारंग और षडूवेग जयी १०८ श्री संन्यास नाम के अन्दर गोस्वामी नाम से समस्त वैष्णव समाज में अति आदरपूर्वक सुपरिचित हुये।
उन्हीं यतिश्रेष्ठ श्रीमद्भक्तिसारंग गोस्वामी महाराज का आज से १३० साल पहले बंगला १२९४ बंगाब्द, ३ फरवरी, सन् १८८८ वैशाखी कृष्णषष्ठी तिथि में बाँकुड़ा जिला, विष्णुपुर महकुमा के अन्तर्गत पात्रसाय ग्राम के एक विशेष उच्च ब्राह्मणकुल में पितृदेव श्रीयुत रामचन्द्र बन्दोपाध्याय एवं मातृदेवी ज्ञानदा सुन्दरी देवी के यहाँ सु-सन्तान के रूप में शुभ आविर्भाव हुआ। पितामाता नित्य ही परम धार्मिक थे। इनके परिवार में नित्य गृहदेवता श्रीश्रीराधाश्यामसुन्दर को प्रेमपूर्वक सेवा होती थी एवं नित्य गीता-भागवतादि पाठ कीर्तन होता था। इस प्रकार शुद्ध भक्तिदेवी के नित्य अधिष्ठान रूप गृह को दिव्य आलोकित कर परम मंगलमय भगवान् के अभिन्न मंगलमय मूर्ति स्वरूप एक दिव्य अतिमर्त्य महापुरुष का शुभाविभर्भाव हुआ। सर्व सुलक्षण युक्त बहु गुण सम्पन्न पुत्र को प्राप्त कर आनन्द पूर्वक समस्त ब्राह्मण-वैष्णव, दीन-दुःखी, अतिथियों को बहुत कुछ दान-दक्षिणा दी गई। मातापिता ने आदर पूर्वक शिशु का नाम रखा श्रीअतुल चन्द्र बन्दोपाध्याय। सत्य ही एकदिन श्रीअतुलचन्द्र ने तुलना रहित अतुलनीय एक उज्वल नक्षत्र की भाँति समस्त गौड़ीय गगन में सर्वदा शुभ भक्तिमय उज्वल एवं निर्मल करुणा धारा समस्त जीव के प्रति वर्षण कर वास्तविक मुक्ति का मार्ग दिखाया।
इनके अन्नप्राशन के दिन शिशु को परीक्षा के लिए सामने बहुत कुछ मिट्टी, रूपया, लेखनी एवं श्रीमद्भागवत आदि वस्तुएं रखी गई। आश्चर्य की बात है- शिशु अतुल ने सब कुछ छोड़कर मधुर हँसते हुए श्रीमद्भागवत को दोनों हाथों से उठाने की बार-बार चेष्टा की। यह देखकर उपस्थित सभी लोगों ने कहा- यह शिशु भविष्य में निश्चय ही महाविद्वान, पण्डित एवं भक्त होगा। फिर किसी ने कहा- यह भविष्य में एक बड़ा साधु महापुरुष होगा। लोगों की यह कथा एकदिन इनके जीवन में सत्य हुई। पिता श्रीरामचन्द्र बाबु ने ५/६ साल की उम्र में अतुल को विद्याध्ययन के लिए ग्राम्य विद्यालय में भर्ती किया। विद्यालय के शिक्षक महाशंय इतने छोटे से शिशु अतुल की ऐसी तीक्ष्ण मेधा-बुद्धि एवं स्मृतिशक्ति देखकर विस्मित एवं मुग्ध हो गये इसलिए वे अतुल को बहुत प्यार करते थे। इस प्रकार अतुल विद्यालय के अन्यान्य छात्रों में अधिक नम्बर लेकर प्रत्येक विषय में प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण होकर विद्यालय के सभी शिक्षक एवं पितामाता आदि सबको बहुत आनन्द प्रदान किया करते एवं बहुत प्रशंसा के पात्र हुये। एकदिन शिक्षक महाशय ने श्रीरामचन्द्र बाबू को कहा- रामचन्द्र बाबू! आपका पुत्र अतुल इतनी छोटी सी उम्र में इतना सुन्दर महद् आचरण, विनम्र स्वभाव, मधुरभाषी, मेधावी, बुद्धिमान एवं भक्तिमान हैं, मैं श्रीभगवान् के चरणों में प्रार्थना करता हूँ एवं आशा भी करता हूँ- यह बड़ा होकर एकदिन पिता-माता, शिक्षक तथा समाज एवं देश का गौरव बढ़ायेगा।
मातापिता दोनों निर्मल आदर्शवान, महत्, धर्मप्राण, ज्ञानी, भक्तिमान-भक्तिमयी एवं अध्यात्म चेतना सम्पन्न, भगवत विश्वासी थे। अतुल विद्यालय में जाते समय नित्य पितामाता एवं दादी को प्रणाम करके जाते थे। माता नित्य पुत्र को गीता, भागवत एवं महाभारत की कहानी समझा कर सुनाती थीं। बालक अतुल माता के मुख से सुनी हुई सभी व्याख्या कथा स्मरण रखते थे। कभी-कभी अतुल स्कूल के बन्धुओं को एकत्रित बैठा कर माता के पास सुनी हुई गीता, महाभारत, भागवत की कथा सुनाते थे। धर्मप्राण पिता भी प्रायः समय पर विभिन्त्र शास्त्र का मर्मार्थ व्याख्या करके उपदेश करते थे। गृह देवता श्रीश्रीराधाश्यामसुन्दर की सेवा में अतुल की बहुत प्रीति भक्ति देखी गयी। पिता जैसे श्रीभगवान की सेवा के पूर्व एक बूँद जल भी नहीं लेते थे, उसी प्रकार अतुल भी पिता का आचरण एवं आदर्श का अभ्यास करते थे। इस प्रकार विद्या और शिक्षा के साथ-साथ अतुल के जीवन में अध्यात्म चेतना का विकास होने लगा। अतुल हमेशा दीन-दुःखी, अनाथ एवं दरिद्र के प्रति बहुत दयाशील थे। कोई भी इनसे खाली हाथ नहीं लौटता था। अपनी भोजन थाली क्षुधार्त्त को, अपने वस्त्र वस्त्रहीन को देरकर उनको सुखी किया करते थे। बाल्यावस्था से ही अतुल अत्यन्त सरल, उदार, धर्मप्राण, परदुःख कातर थे एवं अत्यन्त मेधा सम्पन्न ज्ञानी-गुणी, आदर्शवान् एवं लोकातीत व्यक्तित्व के मार्ग पर अग्रसर होने लगे। बालक के इतने सुन्दर विचार-भावना एवं आचार-आचरण आदि ने परिवार व समाज में सब की दृष्टि आकर्षण की।
सन् १९०० में चौथी कक्ष में सबसे अधिक नम्बर लेकर प्रथम स्थान प्राप्त किया। अत्यन्त मेधावी अध्यवसायी आदर्शवान् छात्र अतुल को उच्चशिक्षा के लिए पिता रामचन्द्र बाबू ने बाँकुड़ा जिला विष्णुपुर थाना अन्तर्गत कुचियाकोल राधावल्लभ इनस्टीट्यूट् यूट में भर्ती किया। घर से बहुत दूर विद्यालय होने के कारण अतुल छात्रावास में रहकर पढ़ने लगे। विद्यालय के धर्मात्मा प्रधान शिक्षक पूर्णानन्द सेन महाशय इलाहाबाद विश्वविद्यालय के इंग्लिश एम. ए.) क्लास में नित्य छात्रों के साथ गीतापाठ एवं शास्त्र आलोचना करते थे। विद्यालय के अन्यान्य शिक्षकगण प्रायः संन्यासी, त्यागी, वैराग्यवान् यथार्थ आचार-आदर्शवान, ईश्वर विश्वासी शास्त्रज्ञ पण्डित एवं धर्मानुरागी थे। विद्यालय में अध्ययन के समय नित्य गीतापाठ एवं विभिन्न शास्त्र आलोचना में अतुल को बहुत आनन्द आता था। विद्यालय का परिवेश मुनि-ऋषियों की तपस्यास्थली आश्रम जैसा था। स्कूल जीवन में ही अतुल को शास्त्र के बारे में बहुत ज्ञान प्राप्त हुआ, साथ-साथ अंग्रेजी एवं संस्कृत में विशेष ज्ञान लाभ हुआ। प्रधान शिक्षक स्वामी पूर्णानन्द महाशय के यह पितृदेव के बराबर स्नेह एवं प्यार करते थे। एक समय वर्द्धमान विभाग विद्यालय समूह के परिदर्शक महाराज श्रीयुत राधानाथ राय बहादुर एवं डाक्टर सी. ए. मार्टिन डायरेक्टर कुचियाकोल ने स्कूल निरीक्षण के लिए आकर छात्रों से बहुत प्रकार के विषय में प्रश्न किये। इसमें अतुल से प्रश्न किया- कहो तो अतुल! गीता में कितने अध्याय हैं? गीता के वक्ता एवं श्रोता कौन हैं? समुत्पन्नमति प्रखर बुद्धि एवं मेधा सम्पन्न अतुल ने उत्तर में कहा-गीता में अठारह अध्याय हैं। गीता के प्रवक्ता पार्थ सारथी स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण एवं श्रोता तृतीय पाण्डव अर्जुन हैं। बालक अतुल के मुख से इतना सुन्दर उत्तर सुनकर महाराज राय बहादुर एवं डाक्टर सी. ए. मार्टिन डायरेक्टर ने अतुल की पीठ पर हाथ रखकर कहा-शाबाश अतुल ! तुमने बहुत सुन्दर ज्ञान प्राप्त कर सही उत्तर दिया। तुम्हारे उत्तर से हम सब बहुत प्रसन्न हैं।
सन् १९०७ प्रवेशिका परीक्षा में अतुल ने द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण होकर विद्यालय के सभी शिक्षक एवं परिवार के पिता-माता सभी को उच्च गौरव एवं सम्मान प्रदर्शन करके बहुत आनन्द दिया। विद्यालय के बगीचा में काम करने वाले मृदंग वादक एवं गायक वनमाली के साथ अतुल का बहुत बन्धुत्व था। उनके पास मृदंग की शिक्षा एवं उसके साथ प्रायः कृष्णकथा एवं कीर्त्तन गान करके अतुल और वनमाली दोनों मिलकर बहुत आनन्द प्राप्त करते थे।
सन् १९०७ में महाराज राय बहादुर के तत्त्वावधान में वर्द्धमान विभाग के उच्च विश्व विद्यालय के आई. ए. एवं बी. ए. विभाग में उच्चशिक्षा प्राप्ति के लिए अतुल चन्द्र भर्ती हुये। उस कॉलेज में एक समय आई. ए. पास किये गये छात्र-छात्रिओं को लेकर कॉलेज कर्तृपक्ष के एक वार्षिक अनुष्ठान के आयोजन में गीता के ऊपर एक आलोचना सभा की व्यवस्था की गई। उस सभा में एक-एक छात्र-छात्री ने कोई कर्म, कोई ज्ञान, कोई योग, कोई तपस्या का श्रेष्ठत्व स्थापित किया। अन्त में सभा के बीच सभापति के रूप में महामान्य महाराज राय बहादुर एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में कलकत्ता विश्वविद्यालय के परिदर्शक माननीय प्रथेरो साहब एवं अन्यान्य विशेष व्यक्तियों के बीच अतुल चन्द्र ने उद्दीप्त कण्ठ से एवं मधुर भाषा में सब के सब सिद्धान्त यथार्थ शास्त्रोचित युक्ति एवं प्रमाण स्वरूप खण्डन करके सिद्धान्त पूर्ण हृदयस्पर्शी भाषण के द्वारा शुद्ध भक्तियोग का श्रेष्ठत्व एवं अपरिसीम महिमा सबके सम्मुख स्थापित की। यह सुनकर समस्त श्रोताओं ने असंख्य ताली बजाकर अतुल को अभिनन्दित किया एवं सभी ने बहुत सम्मान के साथ प्रशंसा करके अतुल को आनन्द प्रदान किया। परिदर्शक महामान्य प्रथेरो साहब ने बहुत सन्तुष्ट होकर अतुल का हाथ पकड़ कर करमर्दन करके कहा- “in future you will be an eloquent speaker and a greatest devotee of Lord Sree Krishna” भविष्य में तुमबहुत बड़े महान् वक्ता के रूप में प्रशंसित होंगे एवं एकदिन श्रेष्ठ कृष्णभक्त के रूप में परिचित होंगे। यह कहकर साहब ने खुश होकर आनन्द पूर्वक अतुल को एक फूलों का दस्ता उपहार में दिया।
सन् १९०९ में आई. ए. प्रथम श्रेणी में पास करके बी. ए. क्लास के विश्वदर्शन विभाग में अध्ययन शुरु किया, जिससे विश्व के दार्शनिकों में कौन ने क्या बताया है यह जान सके। इस वर्ष कॉलेज के वर्षिक अनुष्ठान में अतुल के मुख से इंग्लिश में वक्तव्य सुनकर वर्द्धमान विभाग के रेल कमिशनर साहब इनकी ओर आकर्षित हुये। वर्द्धमान के महाराजा राय बहादुर के पुत्र महाराज श्रीविजयचाँद महताब कॉलेज में अतुल के सहपाठी थे। इन दोनों के बीच बहुत बन्धुत्व हुआ। दोनों के पिता इन दोनों को बहुत प्रीति करते थे। अतुल के साथ मिलकर राजकुमार श्रीविजयचाँद भी खूब धर्मानुरागी हो गये। इसी साल बी. ए. परीक्षा में प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण होने के साथ-साथ रेल कमिश्नर साहब ने अतुल को रेल विभाग में कार्यभार ग्रहण करने का विशेष रूप से सादर आमन्त्रण किया। उस समय भारत में बंग भंग आन्दोलन बहुत भयंकर रूप से चल रहा था। रेल कमिश्नर साहब के कहने से अतुल ने नौकरी करने की इच्छा प्रकाश की। तब कमिश्नर साहब ने अत्यन्त खुश होकर एक चिट्ठी लिख कर अतुल के हाथों में देकर धनबाद विभाग के रेलवे ऑफिस में यूरोपियन बड़े साहब जन बुकार के पास भेजा। जन बुकार ने कमिश्नर साहब का पत्र अतुल के हार्थे से पाकर बहुत प्रसन्नता पूर्वक कहा- पण्डित बनर्जी बाबू। आपका दर्शन कर एवं वार्तालाप कर मैं बहुत खुश हुआ। आपको रेल विभाग के धनबाद शाखा में इन्जीनियर के पद पर नियुक्त किया जाता है। उसके साथ आपके लिए एक सुन्दर क्वाटर भी मंजूर किया जाता है।
श्रीअतुल चन्द्र का धनबाद रेल विभाग में इन्जीनियर पद पर काम करते समय उसी विभाग में एक बड़े आफिसर श्रीयुत अतुल चन्द्र दत्त के साथ परिचय हुआ और पूर्वबंग निवासी अध्यापक श्रीनिशिकान्त सान्याल महाशय धनबाद कॉलेज में अध्यापन करते थे उनके साथ भी परिचय हुआ। दोनों श्रील प्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर के श्रीचरणाश्रित थे। इन दोनों के साथ श्रीअतुल चन्द्र का खूब बन्धुत्व रहा। प्रतिदिन ऑफिस छुट्टी होने पर तीनों मिलकर विभिन्न शास्त्र आलोचना के साथ समय सार्थक करते थे। श्रीअतुल चन्द्र का इस प्रकार धर्मानुराग एवं वैष्णव धर्म के प्रति गभीर श्रद्धा, अनुराग एवं शास्त्र ज्ञान देखकर बड़े बाबू एवं अध्यापक महोदय बहुत सन्तुष्ट हुये। एक समय ऑफिस अवकाश के समय कलकत्ता गौड़ीय मठ में आने पर दोनों ने मिलकर श्रील प्रभुपाद भक्ति सिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर के श्रीचरणों में एकबार श्रीअतुल चन्द्र के घर शुभयात्रा करने की प्रार्थना की। इन दोनों के मुख से श्रीअतुल चन्द्र की इस प्रकार भक्ति और धर्मानुराग की कथा सुनकर उनके घर में शुभयात्रा करने की इच्छा श्रील प्रभुपाद ने प्रकाश की। कर्मरत अवस्था से ही श्रील प्रभुपाद के श्रीचरणाश्रित श्रीअतुल चन्द्र दत्त और अध्यापक श्री निशिकान्त सान्याल इन दोनों की प्रेरणा से एवं परमात्मा रूपी चैत्यगुरु की प्रेरणा से एक समय श्रीधाम मायापुर दर्शन की अभिलाषा से श्रीधाम नवद्वीप मायापुर की यात्रा की।
ज्येष्ठ महीना के भयंकर ग्रीष्म के सूर्यताप से समस्त संसार प्रायः दग्धीभूत हो रहा था। दोपहर के समय श्रीचैतन्य मठ के आँगन में कठल वृक्ष के नीचे बैठकर श्रीमद् विनोद विहारी ब्रह्मचारी जी (श्रीमद्भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज) श्रीचैतन्य मठ की जमींदारी कागज पत्र देख रहे थे। उस समय उन्होंने देखा कि ग्रीष्म की प्रखर उत्तप्त धूप में सारा शरीर पसीना-पसीना, श्रान्त-क्लान्त, पिपासार्त्त प्रायः दग्धीभूत अवस्था में दो रेल आफिसर श्रीपाद अतुल चन्द्र दत्त एवं श्रीअतुल चन्द्र बन्दोपाध्याय श्रीधाम मायापुर दर्शन की आशा लेकर श्रीचैतन्य मठ में पहुँचे। बहुत पहले ही सभी मठवासियों की प्रसाद सेवा हो चुकी थी। तब श्रीपाद विनोद विहारी ब्रह्मचारी जी ने इन दोनों का दर्शन कर यथार्थ सम्मान एवं आदर पूर्वक आश्रय, आसन एवं जल देकर स्वस्थ किया। कुछ समय बाद ब्रह्मचारी जी ने इन दोनों को गंगा स्नान करने के लिए भेजा। इन्होंने उनके स्नान करके लौटने के पहले ही ४/५ प्रकार के व्यंजन सहित गरम-गरम अन्न प्रस्तुत करके दो सीं अतिथियों को परम तृप्ति पूर्वक भोजन कराया। इन दोनों को आश्चर्य हो गया कि इतने शीघ्र ही इतनी सुन्दर व्यवस्था के साथ गरम-गरम प्रसाद कैसे बनाया ? प्रसाद पाकर उन्हें बहुत प्रसन्नता एवं सन्तोष हुआ। उसके साथ-साथ तेजपुंज, सौम्य, प्रशान्त श्रीविनोद बिहारी ब्रह्मचारी जी के दिव्य दर्शन एवं अति सुन्दर माधुर्यपूर्ण व्यवहार से दोनों का मन आकर्षित हो गया। श्रीअतुल चन्द्र बन्दोपाध्याय ने श्रीगौड़ीय मठवासी भक्तों के इस प्रकार सुन्दर मधुर आचरण, व्यवहार परोपकारिता-परदुःख कातरता एवं सेवागत उदार प्राण देखकर बहुत प्रशंसा करते-करते कुछ समय विश्राम किया।
विश्राम के उपरान्त श्रीपाद विनोद बिहारी ब्रह्मचारी जी ने इन दोनों को श्रील प्रभुपाद के कमरे में ले जाकर उनका दर्शन कराया। अनिन्द्य सुन्दर, गौरकान्ति, आजानुलम्बित भुज, सुवलित-सुदीर्घ देह विशिष्ट अमित तेजपुंज अतिमर्त्य महापुरुष श्रील प्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर के दर्शन मात्र ही से श्रीअतुल चन्द्र हृदय के गंभीरतम भक्ति से विह्वल हो गये एवं निज मस्तक श्रीलप्रभुपाद के श्रीचरणों में समर्पित कर दिया। दोनों अतुल चन्द्र ने मिलकर कुछ दिन रहकर श्रीधाम मायापुर के दर्शन किये एवं श्रीलप्रभुपाद के मुखारविन्द से अविराम ओजस्विनी भाषा में अत्यन्त वीर्यवती हरिकथा सुनकर दोनों के मन-प्राण-हृदय सम्पूर्ण विगलित हो गये। श्रील प्रभुपाद से विदाई लेने के समय श्रीअतुल चन्द्र बन्दोपाध्याय ने श्रीचैतन्य मठ की सेवा के लिए प्रत्येक महिना (१०) रुपया भेजने का वचन दिया। बीच-बीच में श्रीअतुल चन्द्र बन्दोपाध्याय अपने सहपाठी गणों को लेकर श्रीधाम मायापुर एवं श्रील प्रभुपाद के दर्शन के लिए आना-जाना करने लगे। इसके साथ-साथ धीरे-धीरे संसार से वैराग्य पैदा होने लगा।
कुछदिन बाद पितृदेव श्रीरामचन्द्र बाबू को श्रीबैकुण्ठ गति प्राप्त हुई। तब पुत्र वत्सला मातृदेवी गाँव का घर छोड़कर धनबाद श्रीअतुलचन्द्र के रेलवे क्वाटर में आकर रहने लगीं एवं पुत्र अतुल की पसन्द के अनुसार भोजन एवं अन्यान्य परिचर्या करके पुत्र को आनन्द प्रदान करती रहीं। माता ठाकुराणी पुत्र के विषय में वैराग्य और साधु संग के प्रति विशेष अनुराग एवं आसक्ति देखकर अतुल संसार छोड़कर साधु हो जायेगा यह सोचकर माता ने पुत्र का विवाह करने का विचार किया तथा समझाया। श्रीअतुल चन्द्र ने माता को घर का काम करने में विशेष कष्ट हो रहा है यह सोचकर माता की इच्छा पूर्ण करने के लिए विवाह करने की इच्छा प्रकाश की। किन्तु अन्तर में विषय वैराग्य की तीव्रता एवं कृष्णानुराग की सुगन्ध अतुल के जीवन को बहुत चंचल करने लगी।
ठीक उसी समय रेलवे के बड़ेबाबू श्रीअतुल चन्द्र दत्त एवं श्रीनिशिकान्त सान्याल दो चरणाश्रित प्रियजनों की विशेष प्रार्थना से सन् १९१९ में कलकत्ता १ नं, उल्टाडांगा जंक्शन रोड स्थित श्रीभक्तिविनोद आसन मठ का वार्षिक महोत्सव अनुष्ठान के बाद श्रील प्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर और श्रीमद् कुंजविहारी विद्याभूषण को लेकर कुछ सेवकों के साथ धनबाद जाने के लिए शुभयात्रा की। शुभक्षण एवं शुभयोग में अपने भक्तों सहित श्रील प्रभुपाद श्रीअतुल चन्द्र वन्दोपाध्याय के धनबाद रेलवे क्वाटर में पहुँचे। श्रीअतुल चन्द्र को अपने घर में श्रील प्रभुपाद के दर्शन कर अत्यन्त आश्चर्य हो गया और प्रगाढ़ भक्ति गद्-गद् भाव से हृदय विगलित होकर उनकी श्रीचरण सेवा-पूजा करने लगे। उनकी सेवा से अत्यन्त सन्तुष्ट होकर श्रील प्रभुपाद ने तीन दिन तक श्रीअतुल चन्द्र दत्त, श्रीनिशिकान्त सान्याल एवं श्रीअतुल चन्द्र वन्दोपाध्याय के द्वारा की गई व्यवस्था से स्थानीय अंचल की विशेष विशेष सभा में बहुत ज्ञानी-गुणी उच्चतर शिक्षित, विद्वान व्यक्तियों के बीच सनातन धर्म, साधुसंग, श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु का अवदान वैशिष्ट, कलियुग में जीव का धर्म एवं कलिहत जीव का साध्य साधन एकमात्र श्रीहरिनाम संकीर्तन है इत्यादि विषय में अत्यन्त वीर्यवती वाणी से हृदयग्राही भाषण प्रदान किया। श्रील प्रभुपाद के मुखारविन्द से इस प्रकार जगत् कल्याण मूलक सुन्दर वक्तृता सुनकर सभी लोग अत्यन्त मुग्ध हो गये एवं बहुत शिक्षित, ज्ञानी-गुणी सज्जन व्यक्तियों ने श्रील प्रभुपाद के श्रीचरणों में आश्रय ग्रहण किया। श्रीअतुल चन्द्र ने श्रील प्रभुपाद के चरणों में अश्रु विसर्जन करते हुए हरिनाम-दीक्षा कृपा पाने के लिए विशेष रूप से प्रार्थना की। श्रील प्रभुपाद ने इनके हृदय विगलित सेवा से अत्यन्त सन्तुष्ट होकर शुभदिन, शुभक्षण में श्रीअतुल चन्द्र बन्दोपाध्याय एवं उनकी माता ठाकुराणी को एकसाथ श्रीनारद पांचरात्रिक विधानानुसार एवं वैदिक सिद्धान्तानुसार श्रीहरिनाम एवं मन्त्रदीक्षा प्रदान की। दीक्षा के बाद श्रीअतुल चन्द्र का पारमार्थिक श्रीअप्राकृत भक्तिसारंग गोस्वामी प्रभु दिव्यनाम श्रील प्रभुपाद ने दिया। इसी नाम से उसी दिन से सबके बीच सुपरिचित हुये। श्रीअप्राकृत भक्तिसारंग प्रभु की इस प्रकार भक्ति गद-गद हृदय से सुन्दर सेवा परायणता, भक्ति एवं भक्तसंग के लिए प्रबल आकांक्षा और ऐसी सुन्दर गुरु-वैष्णव सेवा के लिए व्यवस्था देखकर श्रील प्रभुपाद ने बहुत प्रशंसा की।
दीक्षा के बाद श्रीअप्राकृत भक्तिसारंग प्रभु तुरन्त ऑफिस का काम करके बाकी समय श्रील गुरुपादपद्म और श्रीधाम मायापुर की सेवा के लिए आनुकूल्य संग्रह करने जाते थे। कुछदिन बाद इस मामले में ऑ फिस स्टाफ के कुछ व्यक्तियों ने बड़े बाबू के पास श्रीअप्राकत प्रभु के विरुद्ध शिकायत की। यह सुनकर भी बड़ेवाबू चुपचाप रहे। क्योंकि बड़े बाबू जानते थे कि श्रीअप्राकृत प्रभु जो करते हैं वह सही काम करते हैं। विषय कार्य के बीच में कुछ समय निकालकर गुरु वैष्णव भगवान् की सेवा करना प्रत्येक मनुष्य का एकान्त कर्तव्य है। श्रीअप्राकृत प्रभु कभी टैक्सी, कभी जीप लेकर विशेष ज्ञानी-गुणी जान पहचान व्यक्तियों से मिलकर हरिकथा सुना-समझाकर उन लोगों को श्रीधाम मायापुर और श्रीमन्महाप्रभु की सेवा कराते थे। एकदिन भी खाली हाथ नहीं लौटे। यह देखकर ऑफिस के बड़े बाबू बहुत सन्तोष प्रकाश करते थे। ऑ फिस की ड्यूटी के समय रात दस बजे तक एवं छुट्टी के दिन दस बजे से रात दस बजे तक द्वार-द्वार जाकर बहुत परिश्रम करके श्रीधाम मायापुर और श्रील गुरुपादपद्म की सेवानुकूल्यता का संग्रह करते थे।
एक समय श्रीधाम मायापुर श्रीचैतन्य मठ के सेवक खण्ड निर्माण के लिए बहुत ईंटों का आवश्यकता हुई। वह ईटों को जलाने के लिए बहुत से कोयलों की जरूरत हो पड़ी। सन् १९२० नवम्बर के प्रथम सप्ताह में श्रील प्रभुपाद ने श्रीमद्भक्तिविवेक भारती महाराज एवं श्रीमद्भक्तिस्वरूप पर्वत महाराज को धनबाद श्रीमद् भक्तिसारंग गोस्वामी प्रभु के पास कोयलों का संग्रह करने के लिए भेजा। इन दो गुरुभ्राताओं के मुख से श्रील प्रभुपाद के मन की इच्छा एवं आदेश सुनकर श्रील प्रभुपाद ने मुझे इतना प्रियतम सेवक के रूप से अपने हृदय में स्थान दिया यह सोचकर अपने को धन्यातिधन्य माना। दूसरे दिन परम आनन्द पूर्वक प्रातः काल श्रीलगुरुदेव के श्रीचरण स्मरण एवं प्रणाम करके अपने परिचित स्थान झरिया कोल्डफील्ड में जाकर कोलीयारी के मैनेजर साहब के साथ साक्षात् किया। मैनेजर साहब ने श्रीमद् भक्तिसारंग प्रभु को यथार्थ सम्मान एवं आदर पूर्वक आसन प्रदान किया। श्रील गोस्वामी प्रभु ने उनको बहुत समय तक सुमधुर सुललित भाषा में हरिकथा सुनाई। साहब हरिकथा सुनकर अति प्रसन्न हुये एवं विनीत स्वर में पूछा कहिये मुझे क्या सेवा करना होगी। मैं अपने मन से प्रीति पूर्वक आपकी सेवा करूंगा। तब श्रील गोस्वामी प्रभु ने श्रीलगुरुदेव प्रभुपाद के मन की इच्छा सुनाई। यह सुनकर साहब ने तुरन्त प्रसन्न मन से रेलवे के पाँच डिब्वा कोयला मंजूर कर दिया। उसके साथ-साथ केला श्रीधाम मायापुर पहुँचाने की भी सारी व्यवस्था की। एक महीना के अन्दर कोयला के साथ दो हजार रुपया संगृहीत भिक्षा श्रीधाम मायापुर श्रील प्रभुपाद के श्रीचरणों में पहुँचाई इससे श्रील प्रभुपाद ने अत्यन्त खुश होकर श्रीमद् भक्तिसारंग प्रभु को अन्तर से बहुत कृपाशीर्वाद प्रदान किया।
उज्वल गौरवर्ण सुदीर्घकाय पूर्ण युवक श्रीमद् भक्तिसारंग प्रभु को ठीक विदेशी साहब के बराबर देखा जाता था। एक समय वर्द्धमान से धनबाद स्टेशन पर ट्रेन से उतरकर कुछ लोगों के मुख से सुना कि धनबाद में कुछ दिन हुये विलायत से एक साहब आये हैं, उनका व्यवहार एवं कथावार्ता बहुत सुन्दर है। बहुत सुन्दर बंगला बोलना जानते थे। फिर साहब को देखा कि भारत के साधु-सन्तों के साथ बहुत मेलजोल करते थे। मालूम हुआ कि साहब ईसाई नहीं हैं। जीवन में तेरह साल तक रेलवे में नौकरी की है।
नौ साल बाद नौकरी छोड़कर धनबाद क्वार्टर से समस्त सामान गाड़ी में उठाकर एकदिन श्रील गुरुदेव प्रभुपाद की इच्छा से एकान्त रूप में सेवा करने के लिए १ नं उल्टाडिंगी जंक्शन रोड गौड़ीय मठ में आये। अपना यथा सर्वस्व यहाँ तक कि जीवन पर्यन्त श्रील प्रभुपाद के श्रीचरणों में सम्पूर्ण रूप से समर्पण कर दिया। मन में विचार किया कि श्रील गुरुदेव प्रभुपाद श्रीभक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर का मनोभीष्ट पूर्ण करना ही, इस मनुष्य जीवन की वास्तविक सार्थकता है। यह सोचकर हमेशा के लिए श्रीमठ में आश्रय लिया। यह देखकर श्रील प्रभुपाद ने हँसते हुए कहा- अप्राकृत भक्तिसारंग प्रभु! आपने नौकरी तो छोड़ दी, इतने दिन श्रीचैतन्य मठ की सेवा के लिए महिना में १० रुपया आते रहते थे, आज वह बन्द हो गया।
श्रीभक्तिसारंग प्रभु निज व्यय से श्रीगौरजन्म स्थान में अप्राकृत कुटीर बनाकर श्रीलगुरुदेव की सेवा करते थे। उसी दिन से समस्त ज्ञान-विद्या-पाण्डित्य-बुद्धि एवं पार्थिव अपार्थिव सभी सम्पत्ति श्रील गुरुदेव के श्रीचरणों में अर्घ्य रूप से निवेदन कर उनकी सेवा ही जीवन का एकमात्र व्रत हुआ। सर्वेक्षण श्रील गुरुदेव प्रभुपाद की इच्छा पूर्ति करना एवं उनकी प्रसत्रता विधान ही श्रीभक्तिसारंग प्रभु का एकमात्र लक्ष्य था। इनकी इस प्रकार की सेवा परायणता और भक्ति निष्ठा देखकर श्रीलप्रभुपाद ने श्रीगौरजन्म तिथि पूजा की आयोजित सभा में भक्तिशास्त्री महा महोपदेशक उपाधि एवं प्रौढ़ सेवाधिकारी नाम से भूषित किया। इनके स्वेच्छा पूर्ण अर्थानुकूल्य से श्रीगौड़ीय मिशन का साप्ताहिक मुखपत्र गौड़ीय पत्रिका पहली बार प्रकाशित हुई। उसी पत्रिका के अन्यतम सम्पादक के रूप में श्रील प्रभुपाद ने इनको सम्मानित किया। १५ अगस्त, सन् १९२५ को गौड़ीय सम्पादक मण्डली गठन कर श्रील प्रभुपाद ने इनको गौड़ीयसंघपति पद पर अभिषिक्त किया एवं विश्ववैष्णव राजसभा के अन्यतम सम्पादक के रूप में मनोनीत किया गया। श्रील गुरुदेव प्रभुपाद का दिया हुआ श्रीअप्राकृत भक्तिसारंग प्रभु नाम का सार्थक स्वरूप हमेशा अप्राकृत वाद्ययन्त्र स्वरूप में श्रील प्रभुपाद के सब प्रकार की सेवा एवं गुण-महिमा कीर्तन में अपने को अर्पित कर दिया। इनका जीवन श्रीरूपानुग भजनादर्श में गठित था। सन् १९२० से सन् १९३६ तक दीर्घ (१६) वर्ष साप्ताहिक गौड़ीय पत्रिका के आवरण में श्रीअतुल चन्द्र वन्दोपाध्याय श्रीभक्तिसारंग नाम बादल में बँके हुए सूर्य के समान विराजित रहे।
एक समय किसी पण्डित ने श्रील भक्तिविनोद ठाकुर के बारे में बहुत प्रकार की निन्दा एवं समालोचना की थी। यह जानकर श्रील प्रभुपाद बहुत दुःखी हुये। इस विषय में श्रील प्रभुपाद ने श्रीभक्तिसारंग प्रभु को बताया, तव उन्होंने तुरन्त पण्डित के घर जाकर उनकी समालोचना को उच्च कण्ठ से वीर्यवती कथा के द्वारा ऐसा खण्डन किया कि, उनका मुख बन्द कर दिया, उस पण्डित ने अत्यन्त भयभीत होकर काँप-काँप कर श्रीमद् भक्तिसारंग प्रभु के चरणों में पड़कर क्षमा प्रार्थना की। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर के प्रति श्रीभक्तिसारंग प्रभु की इस प्रकार श्रद्धा भक्ति देखकर श्रील प्रभुपाद बहुत प्रसन्न हुये। श्रील प्रभुपाद अपने श्रीभक्तिविनोद रिसर्च इन्स्टिट्यूट विद्यापीठ के सभापति थे एवं श्रीभक्तिसारंग प्रभु को उप सभापति के पद पर मनोनीत किया। किसी प्रकार की समस्या उपस्थित होने पर श्रील प्रभुपाद पहले श्रीभक्तिसारंग प्रभु को स्मरण करते थे। जैसे श्रीहनुमान जी ने भगवान् श्रीरामचन्द्र की सेवा की, ठीक उसी प्रकार श्रीलप्रभुपाद के जीवन में श्रीभक्तिसारंग प्रभु ने सेवा की। वह श्रीलप्रभुपाद के अति प्रियतम विश्रम्भ सेवक थे। श्रील प्रभुपाद ने इनको श्रीगौड़ीय मिशन के एक अन्यतम स्तम्भ के रूप में स्थान दिया। एक विशेष आलेख में श्रील प्रभुपाद कहते थे- सुदूर हिमालय के उच्च शृंग काश्मीर से भारत महासागर के तट देश तक इस बृहद् भारतवर्ष के बीच श्रीभक्तिसारंग प्रभु को कौन नहीं जानता, श्रीभक्ति सारंग प्रभु के बारे में सभी को पता है। वे गौड़ीय सम्पादक संघ के संघपति, किन्तु सम्पादक होने से भी वे कोई वेतन भोगी भृत्य नहीं थे। वे एक अस्वाभाविक वदान्यवर एवं श्रीमन्नित्यानन्दान्वय अशूद्र प्रतिग्राही ब्राह्मणोत्तम थे।
एक बार उपस्थित कुछ भक्तों ने हरिकथा कीर्तन करते समय एक व्यक्ति ने प्रभुपाद से आकर कहा-बंगरत्न पत्रिका के सह सम्पादक श्रीपञ्चानन बाबू ने उस पत्रिका में वैष्णवधर्म के प्रति बहुत निन्दा की है एवं आपके सम्बन्ध में बहुत कुछ समालोचना भी छापी। ऐसा कह कर पत्रिका की एक श्रीलप्रभुपाद के हाथ में दी। श्रीमद् भक्तिसारंग प्रभु भिक्षा करके मठ में लौटकर आये, तब श्रील प्रभुपाद ने उक्त विषय में सब कुछ बताकर पत्रिका उनके हाथ में दी और कहा- मैंने कुंजबाबू को साथ लेकर एटानिं साहब श्रीकमलकृष्ण दत्त महाशय के घर जाकर सब कुछ बताया किन्तु आज तक कुछ खबर नहीं मिली।
यह सुनकर श्रीमद् भक्तिसारंग प्रभु श्रील प्रभुपाद को प्रणाम कर सीधे श्रीपाद रासविहारी प्रभु को साथ लेकर एटनिं साहब के साथ साक्षात् करके समस्त विषय पुनः बताया और कहा पंचानन बाबू के विरुद्ध में तुरन्त मानहानि का मामला दायर कर उनके पास नोटिस भेजिये। आज ही यह व्यवस्था होना चाहिए।
उनके कहे अनुसार एटर्नि साहब ने नोटिस भेजा। नोटिश पाकर बंगरत्न पत्रिका का सम्पादक पंचानन बाबू एकदम घबड़ा गया। इतना नहीं सोचा था कि उनके विरुद्ध में ऐसा नोटिस आयेगा। अत्यन्त भयभीत होकर शीघ्र ही श्रीमद् भक्तिसारंग प्रभु के पास गया और चरण पकड़ कर भूल स्वीकार की एवं निज कृत कर्म के लिए क्षमा प्रार्थना की और कहा अब कभी ऐसा नहीं होगा। तब श्रीमद् भक्तिसारंग प्रभु ने कहा- मैं किसलिए क्षमा करूंगा। मेरे पास आपने कोई अपराध नहीं किया। आपने जिन महापुरुष के चरण में इतना बड़ा अपराध किया उनके श्रीचरण में क्षमा प्रार्थना कीजिये वे आप को क्षमा कर सकते हैं। इस प्रकार कहकर करीब दो घण्टे तक वैष्णव के ? और श्रील प्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर की महिमा के विषय में पंचानन बाबू को कथा सुनाई। कथा सुनकर पंचानन बाबू का वैष्णव एवं श्रील प्रभुपाद के विषय में विचार व धारणा सम्पूर्ण रूप से बदल गई। अत्यन्त व्याकुल होकर श्रीमद् भक्तिसारंग प्रभु के साथ पंचानन बाबू श्रील प्रभुपाद के दर्शन के लिए गये। उनके दर्शन कर श्रीचरण में साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करके रो-रो कर निज कृत अपराध के लिए हाथ जोड़ कर बार-बार क्षमा याचना की। श्रीभक्तिसारंग प्रभु के मुख से वैष्णव और आपकी महिमा कथा सुनकर मुझे समझ में आया कि वैष्णव कितने दयालु, उदार एवं पवित्रतम होते हैं। पतित पावन अतिमर्त्य महापुरुष श्रील प्रभुपाद ने तत्क्षणात् पंचानन बाबू को क्षमा किया एवं बहुत समय तक हरिकथा सुनायी। श्रील प्रभुपाद ने श्रीभक्तिसारंग प्रभु को कहा- ये कार्य केवल आपके लिए सम्भव था और बहुत आशीर्वाद किया। उसी दिन से बंगरत्न पत्रिका के सम्पादक महाशय श्रीपंचानन बाबू बहुत बड़े भक्त बनगये एवं श्रील प्रभुपाद के श्रीचरण में नित्यकाल के लिए आश्रय लेकर हरिभजन करने लगे।
फिर एक समय श्रील प्रभुपाद ने जालानी कोयला के लिए बोलने से श्रीमद् भक्तिसारंग प्रभु ने उनके श्रीचरण में प्रणाम करके आशीर्वाद लेकर शीघ्र ही कलकत्ता ३३ नं, क्यानिंग स्ट्रीट स्थित श्रीमती युगल किशोरी के भवन में जाकर श्रील प्रभुपाद की इच्छा एवं हरिकथा सुनाई। श्रीमती जी वह सुनकर बहुत सन्तुष्ट हुई, साथ-साथ रेलवे की तीन डिब्वा कोयला मंजूर किया एवं सौ रुपया श्रील प्रभुपाद की सेवा के लिए देकर श्रीभक्तिसारंग प्रभु को प्रणाम किया। श्रील गुरुदेव की सेवा ही साक्षात् ब्रजेन्द्र नन्दन की सेवा है ये विचार हमेशा श्रीभक्तिसारंग प्रभु के मन में रहता था। इसलिए उन्होंने जीवन में निद्रा और विश्राम को विदाई दी। जैसे भगवान् श्रीरामचन्द्र की सेवा के लिए श्रीलक्ष्मण जी ने कहा- ओहे निद्रादेवी! मैं अभी भगवान् श्रीरामचन्द्र का सेवक हूँ। अनिद्र प्रहरी होकर उनकी सेवा करता हूँ। आप अभी चली जाइये। जब मैं अयोध्या लौटकर जाऊँगा उस समय आप का सम्मान करूँगा। उसी प्रकार श्रीमद्भक्तिसारंग प्रभु भी श्रील प्रभुपाद की सेवा में निर्मल-निष्कपट-निरलस उज्ज्वल रत्न स्वरूप विश्रम्भ सेवक थे।
एक समय श्रीमद् भक्तिसारंग प्रभु कान के बहुत दर्द और खाँसी एवं बुखार से अस्वस्थ होकर शैया में पड़े थे। श्रील प्रभुपाद को जब पता चला तो शीघ्र ही डाक्टर एवं दवाई की व्यवस्था की। श्रील प्रभुपाद ने स्वयं ही अपने हाथों से सर्वक्षण सिरपर पानी देना, जलपट्टी देना, दवाई खिलाना, दिन-रात उनके पास रहकर अस्वाभाविक आन्तरिक स्नेह पूर्वक सेवक के रूप में सेवा करके उनको स्वस्थ किया। जैसे माता सन्तान की असीम स्नेह पूर्वक सेवा करती है, उसी प्रकार कोटि मातृ सम श्रील गुरुदेव सन्तान स्वरूप शिष्य की सेवा करके अपार्थिव गुरु-शिष्य के बीच अविच्छेद्य-अभेदत्व निज प्राण सदृश निबिड़ मधुर सम्बन्ध का परिचय के साथ श्रील प्रभुपाद ने संसार में आदर्श स्थापित किया। स्वस्थ होने के बाद यह जानकर श्रीमद् भक्तिसारंग प्रभु ने बहुत अश्रु विसर्जन कर श्रील गुरुदेव प्रभुपाद के श्रीचरण छाती पर लेकर एकदम पागल के समान रो-रो कर क्षमा माँगी और सोचने लगे कि यह कैसा अद्भुत स्नेह एवं प्रेम है। तब श्रील प्रभुपाद ने आँखों में आँसू भरकर कहा- जिस सेवा के लिए श्रीगौरहरि आपको लाये वह सेवा खो जाती थी। आपका बहुत दायित्व एवं काम पड़ा है। आपकी इस प्रकार अवस्था देखकर मैं आपको खो दूँगा यह सोचकर बहुत दुःखी हो गया था। किन्तु परम दयालु श्रीगौरहरि ने मेरी अवस्था देखकर बहुत कृपा कर आपको मेरे हाथ में लौटा दिया।
श्रील प्रभुपाद ने कहा- १६ वें, शनिवार सुबह में नगर संकीर्तन होगा आपका शरीर ठीक है कि नहीं? आप जा सकेंगे? जवाब में कहा हाँ। नगर संकीर्तन में योगदान करके ४ बजे, भिक्षा के लिए गये और पाँच टीन तेल संग्रह कर लाये, वह देखकर श्रील प्रभुपाद बहुत खुश हुये। श्रीमद् भक्तिसारंग प्रभु ने कहा अस्वस्थता के कारण आपकी कोई सेवा नहीं कर पाया, आज थोड़ी सी आपकी सेवा करके बहुत आनन्द हुआ। तब श्रील प्रभुपाद ने कहा- हमेशा मन को कुछ ना कुछ सेवा में नियुक्त रखने से मन स्वस्थ रहेगा। मन स्वस्थ रहने से देह स्वस्थ रहेगा। सेवाकार्य के द्वारा भवरोग दूर हट जाते है। इस प्रकार दुर्लभ मानव जन्म प्राप्त होकर श्री गुरु-वैष्णव की सेवा में दैवीशक्ति प्राप्त होती है। उस शक्ति के निकट कोई बाधा नहीं रहती है।
अगस्त महीना, सन् १९२५ में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के लिए कलकत्ता, धर्मतला, आमड़ातला, खिदिर पुर, चेतला, टालिगंज इत्यादि स्थान पर घूम-घूम कर दो दिन में १७ मन मूंगदाल, ८ टीन तेल, २० किलो मिरच, नगदी ४१ रुपया, दूसरे दिन २२ मन चावल, ८ मन आलू, ७ मन मूंगदाल, नगदी ७६ रुपया भिक्षा करके एक ट्रक किराये से लेकर चिट्ठी लिखके श्रीधाम मायापुर श्रीचैतन्य मठ में श्रील प्रभुपाद के पास भेजी। श्रील प्रभुपाद की चिठ्ठी और भिक्षा का इतना द्रव्यादि देखकर मठवासी सहित सभी को आश्चर्य हो गया एवं बहुत प्रसत्रता हुई। शाम के समय श्रीगोस्वामी प्रभु के लौटने पर श्रील प्रभुपाद ने कहा- अच्छा, अप्राकृत प्रभु! आपके दर्शन मात्र से ही क्या लोग देने के लिए व्यस्त हो जाते हैं? यह केवल आपके समान गौर प्रियजनों के लिए ही सम्भव है। श्रीगौरसुन्दर आपका नित्य मंगल करें, उनके श्रीचरण में यही प्रार्थना है। श्रीमद् अप्राकृत प्रभु अदम्य साहसी थे, मिष्ट भाषी थे, कठोर परिश्रमी थे, बुद्धिमान, सरल, उदार, श्रीगुरुदेव और श्रीभगवान् में दृढ़ विश्वासी थे। आसमुद्र हिमाचल तक समग्र भारत वर्ष में अलौकिक गुरुकृपा मूर्ती श्री भक्तिसारंग प्रभु तेजस्वी और औदात्त कण्ठ से अति वीर्यवती वाणी के द्वारा समस्त मानव समाज में श्रीगौरसुन्दर के विशुद्ध प्रेमभक्ति धर्म की कथा एवं भक्तिसिद्धान्त वाणी का प्रचार करते थे, जिसे सुनकर राजा-महाराजा राणी साहिबा, बड़े-बड़े ज्ञानी-गुणी, विद्वान पण्डित यहाँ तक कि बड़े-बड़े मुसलमान नवाब के भी हृदय विगलित हो जाते थे। इस प्रकार अपार करुणाघन विग्रह, परमौदार्य, प्रेममय ठाकुर श्रीगौरसुन्दर श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु के श्रीचरण में सभी को आकर्षित किया। इनकी भक्तिसारंग वीणा की मधुर आवाज से मुग्ध होकर समस्त प्रकार की जाति-वर्ण, धर्माधर्म, विचार-विवाद छोड़कर स्वतःस्फूर्त भाव से श्रीगुरु-वैष्णव-भगवान् की सेवा में निज-निज आत्म समर्पण किया। गोस्वामी प्रभु ने उन लोगों को संसार समुद्र से पार होने का वास्तविक सही मार्ग दिखाया। जीवों का एकमात्र आश्रय और विषय अर्थात् नित्य प्रयोजन तत्त्व परमानन्दमय स्वयं भगवान् श्रीश्रीराधागोविन्द युगल किशोर के श्रीचरण कमल की नित्य सेवा प्रदान करके परम कल्याण का साधन किया। उनकी इस प्रकार सेवा प्रचेष्टा और असाध्य साधन कार्य देखकर समस्त गुरुभ्रातायों ने बहुत सन्तोष प्रकाश और प्रशंसा की। उन्होंने जो कुछ किया वह सभी एकमात्र गुरुकृपा हि केवलम् इस सत्य वचन में दृढ़ श्रद्धा और विश्वास का फल है। श्रीगुरुदेव की प्रसन्नता में निष्कपट शरणागत शिष्य को समस्त कार्य में सफलता प्राप्त होती है। श्रीगुरुदेव के प्रसन्न हृदय का आशीर्वाद, वास्तविक शरणागत, आत्म समर्पितात्मा शिष्य एवं सेवक के जीवन में अमित विक्रम पराशक्ति का कार्य करता है, इस का प्रमाण श्रीमद् भक्तिसारंग गोस्वामी प्रभु की गुरुसेवा का ज्वलन्त जीवनादर्श है।
सन् १९२९को श्रीनवद्वीप धाम प्रचारिणी सभा में आमन्त्रित भारत के अगणित राजा-महाराजा, विद्वान, पण्डित, ज्ञानी-गुणी बहुत विशिष्ट सभासद गणों के बीच श्रीमद्भक्तिविवेक भारती गोस्वामी महाराज, श्रीमद् सुन्दरानन्द विद्याविनोद प्रभु इत्यादि सभी ने श्रीमद् भक्तिसारंग गोस्वामी प्रभु के जन्म-कुल, वैराग्य, त्याग, परम पवित्रतम, निष्कपट, निरलस, निरुपाधि, श्रीगुरु-वैष्णव-भगवान् के सेवानुराग, मानव समाज में अत्यन्त महा-मूल्यवान महान चरित्र एवं आदर्श के विषय में बहुत सुन्दर गुण-महिमा कीर्तन किया। ये भी सत्य कहा है कि श्रीमद् भक्तिसारंग गोस्वामी प्रभु श्रील प्रभुपाद के गौर मनोभीष्ट प्रचार पताका के दो स्तम्भ के बीच एक अन्यतम स्तम्भ स्वरूप है, जैसे निष्कपट, सरल वैसे ही निर्भीक अदम्य साहसी श्रीबलदेव शक्ति के मूर्त प्रकाशमय विग्रह, यह उनके चरित्र एवं कार्य का आदर्श पूर्ण रूप से प्रकाशित है। वे श्रील गुरु पादपद्म के एक अनुगत निर्भीक सैनिक हैं। श्रील गुरुदेव का समस्त मनोभीष्ट पूर्ण करने वाले एक महान् उज्ज्वल आदर्श स्वरूप हैं। इनके आदर्श एवं गुरुसेवा निष्ठा, पवित्र जीवन चरित्र अनुसरण करने से हम सबके विपथगामी जीवन में सत्य स्वरूप, दिव्य प्रेममय, भगवद् ज्ञानालोक का सन्धान अवश्य ही मिलेगा।
श्रीमती राधारानी के कृपादेश से श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर के मन में अभिलाषा थी कि श्रीनवद्वीप धाम को अभिन्न ब्रजधाम वृन्दावन के रूप में समस्त जगत्वासियों के लिए प्रकाशित करूँ। इसके एक उज्ज्वल दृष्टान्त स्वरूप श्रीमद् भक्तिसारंग प्रभु हैं। १२ जनवरी, सन् १९३० मथुरा वृन्दावन आकर समस्त चौरासी कोस ब्रजमण्डल श्रीधाम वृन्दावन के सभी स्थान दर्शन करके बहुत आनन्द प्राप्त हुआ। श्रील प्रभुपाद का मनोऽभिलाष चिन्तन कर उनकी इच्छा पूर्ति के लिए श्रीब्रजमण्डल तथा वृन्दावन के सभी स्थान से रज, मिट्टी और गिरि गोवर्द्धन शिला अधिक मात्रा में संग्रह कर श्रीमद् भक्तिसारंग गोस्वामी प्रभु ने श्रीधाम मायापुर के लिए, श्रील प्रभुपाद के निकट श्रीमद् कुंजविहारी विद्याभूषण प्रभु के नाम से रेलवे माध्यम से पार्सल करके भेजी थी। वह सब प्राप्त कर श्रील प्रभुपाद ने अत्यन्त खुश होकर श्रीमती राधारानी के निर्देशानुसार श्रीधाम मायापुर श्रीचैतन्य मठ में श्रीधाम वृन्दावनाभिन्न श्रीगोकुल, श्रीराधाकुण्ड, श्रीश्यामकुण्ड, श्रीगिरिराज गोवर्द्धन, केलिकदम्ब, तमाल वृक्ष इत्यादि श्रीमद्गोस्वामी प्रभु के द्वारा भेजी हुई श्रीवृन्दावन की रज-मिट्टी और गिरिराज गोवर्द्धन पर्वत रचित कर श्रील प्रभुपाद ने जगद्वासियों के नित्य कल्याण के लिए श्रीमती राधारानी की कथानुसार अभिन्न श्रीधाम वृन्दावन प्रकाशित किया।
नवम्बर, सन् १९३४ में डोलापुर राजपूतना के राजाधिराज ने पत्र द्वारा उनके प्रासाद में श्रीगोस्वामी प्रभु को विशेष अनुरोध करके आमन्त्रित किया। श्रीगोस्वामी प्रभु ने राजा का आमन्त्रण पत्र श्रील प्रभुपाद के श्रीचरणों में रख कर समस्त विषय निवेदन किया। श्रील प्रभुपाद का कृपाशीर्वाद लेकर श्रीगोस्वामी प्रभु डोलापुर राज प्रासाद में पहुँचे। महामान्य राजा ने श्रीगोस्वामी प्रभु का अपने राज प्रासाद में दर्शन कर अपने को अतिशय धन्यातिधन्य माना और श्रीगोस्वामी प्रभु की यथोचित राज सम्मान के द्वारा अभ्यर्थना कर आसन प्रदान किया। दोनों के बीच सुदीर्घ चार घण्टे तक विभिन्न शास्त्र के विषय में और श्रील प्रभुपाद, श्रीभक्तिविनोद ठाकुर एवं श्रीमन्महाप्रभु के प्रचारित विशुद्ध श्रीकृष्ण प्रेमभक्ति धर्म के विषय में आलोचना हुई। श्रीगोस्वामी प्रभु के मुख से अपूर्व सुसिद्धान्त पूर्ण आलोचना सुनकर राजा एवं राज परिवार सभी को बहुत आनन्द प्राप्त हुआ। राजा ने विशेष रूप से उपलब्धि की कि शुद्ध वैष्णव और महद् व्यक्ति का संग लाभ कितना महत्वपूर्ण है। आज राजा के मन में श्रीगौड़ीय मठ मिशन के सम्बन्ध में विशेष रूप से निर्मल धारणा एवं श्रद्धा भक्ति पैदा हुई।
सन् १९३५, में महामान्य राजपूत राजा ने अपने द्वारा आयोजित एक महती सभा में सम्मिलित भारतके समस्त राजन्यवर्ग सेश्रीमद् भक्तिसारंग प्रभु का परिचय कराया और श्रीगौड़ीय मिशन का आदर्श एवं संन्यासियों के भजनमय पवित्र जीवन के सम्बन्ध में बहुत कथा राजपूत राजा ने वर्णन की तथा बहुत आनन्द प्राप्त किया। राजा ने श्रीधाम मायापुर दर्शन के लिए समस्त राजन्य वर्ग को सादर आमन्त्रित किया। श्रील प्रभुपाद सरस्वती ठाकुर ने श्रीमद् भक्तिसारंग प्रभु को श्रीमन्महाप्रभु की वाणी प्रचार के लिए विलायत भेजने के लिए मन में संकल्प कर लिया। समस्त मठवासी यह जानकर बहुत आनन्दित हुये। इसलिए श्रील प्रभुपाद के निर्देश में विभिन्न राजन्य वर्ग के साथ मिलन किया। उन सबसे यह कथा जानकर बहुत उत्साहित एवं आनन्दित होकर राजपूत राजा बहादुर ने कहा- श्रीनाथ जी की अशेष कृपा हुई जो उनकी महिमा प्रचार के लिए आपको एक योग्य व्यक्ति समझकर ये व्यवस्था की है। आज हम सब विशेष रूप से गर्वित हैं कि- भारत वर्ष के शुद्ध सनातन धर्म की कथा, स्वयं भगवान् श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु के विशुद्ध प्रेमभक्ति धर्म की कथा और श्रीवृन्दावनाधिपति लीला पुरुषोत्तम श्रीश्रीराधागोविन्द की परम पवित्रतम प्रेममाधुर्य की कथा एवं श्रीचैतन्य महाप्रभु के महा अवदान की कथा आज समग्र विश्व आपके माध्यम से प्रचारित होगी इसलिए हम सब आपके साथ हैं।
२३ अक्टुबर, सन् १९३६ में कलकत्ता श्रीगौड़ीय मिशन की एक विशेष सभा में सभापति श्रील प्रभुपाद के निर्देशानुसार श्रीमद् भक्तिसारंग गोस्वामी प्रभु ने विश्व वैष्णव राजसभा एवं गौड़ीय संघ इस विषय के ऊपर अंग्रेजी में दीर्घ समय तक बहुत गुरुत्व पूर्ण भाषण प्रदान किया। यह सुनकर श्रील प्रभुपाद बहुत आनन्दित हुए।
अक्टूबर को श्रील प्रभुपाद ने अन्यान्य संन्यासी और ब्रह्मचारी सहित श्रीमद्भक्तिसारंग गोस्वामी प्रभु को लेकर विदेश प्रचार के लिए पुरी एक्सप्रेस से मद्रास की शुभयात्रा की। २६ अक्टूबर को मद्रास सेन्ट्रल स्टेशन् से श्रीरामानन्द गौड़ीय मठ के सभी भक्तवृन्द फूलमाला से विभूषित कर श्रील प्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर एवं श्रीमद् भक्तिसारंग प्रभु को मठ में ले गये। २७ अक्टूबर को श्रीमद् गोस्वामी प्रभु भारतीय वैदिक सनातन धर्म प्रचार के लिए विदेश जा रहे हैं, यह जानकर स्थानीय प्रेस फोटोव्युरो मद्रास एवं इन्टर नेशनल प्रेस फोटो सर्विस के संवाददाताओं ने श्रीलप्रभुपाद सहित अन्यान्य संन्यासी एवं ब्रह्मचारी के साथ श्रीमद् भक्तिसारंग गोस्वामी प्रभु का फोटो लिया। फिर अलग रूप में केवल श्रीमद् गोस्वामी प्रभु का फोटो लिया। २८ अक्टूबर को समस्त संन्यासी, ब्रह्मचारी के साथ श्रील प्रभुपाद श्रीमद् भक्तिसारंग प्रभु को लेकर मद्रास बन्दरगाह पर पहुँचे। रात्रि ९ बजे श्रील प्रभुपाद ने अपने गले की प्रसादी फूलमाला श्रीमद् भक्तिसारंग गोस्वामी प्रभु के गले में अपने हाथ से पहना दी और प्रसन्न हृदय से श्रीमद् गोस्वामी प्रभु को यथेष्ट सम्मानित एवं वक्ष में लेकर बहुत आशीर्वाद करके विदेश प्रचार की शुभयात्रा के लिए शुभ सूचना की। श्रील गुरुदेव प्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर ने विदेश में श्रीमन्महाप्रभु के विशुद्ध प्रेमभक्ति धर्म प्रचार की सफलता के लिए श्रीमद् गोस्वामी प्रभु को श्रीशालग्राम शिला, गोमती शिला, और गोवर्द्धन शिला प्रदान की। श्रीमद् भक्तिसारंग प्रभु ने अजस्र अश्रु विसर्जन करते हुए श्रील प्रभुपाद के श्रीचरण में भू-लुण्ठित साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करके उनको जय ध्वनि देते हुए शुभ विदाई लेकर जहाज द्वारा कोलम्बो पहुँचने की शुभयात्रा शुरू की।
३०/१०/१९३६ ई को सुबह ८ बजे कोलम्बो पहुँच कर प्रथम ए. सी. मुदालिया के साथ मिलन् किया और उनके वास भवन में आये हुए कोलम्बो यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डा. गुप्ता एवं अन्यान्य विद्वान-शिक्षित विशिष्ट व्यक्तियों की सभा में सनातन धर्म के विषय में बहुत समय तक आलोचना की। उक्त आलोचना सुनकर सभी लोगों ने बहुत प्रसन्नता एवं सन्तोष प्राप्त किया। १ नवम्बर, अपराह्न ६-३० बजे कोलम्बो से फिनेक्स नामक जहाज में लंदन के लिए शुभयात्रा की। जहाज के अन्दर विभिन्न देश के बहुत ज्ञानी-गुणी धर्म पिपासु लोगों के साथ भारतीय संस्कृति, धर्मीय आलोचना एवं श्रीमन्महाप्रभु के विमल प्रेमभक्ति धर्म की कथा आलोचना करते हुए लोगों को बहुत आनन्द प्रदान किया। जहाज के अन्दर श्रीविग्रह की सेवा-पूजार्चन समाप्त कर आकाश की तरफ देखते हुए श्रील गुरुदेव प्रभुपाद की कथा चिन्तन कर रहे थे। उसी समय अचानक निर्मल आकाश में श्रील गुरुदेव प्रभुपाद के उज्ज्वल मुख मण्डल का साक्षात् रूप से दर्शन किया। श्रील प्रभुपाद कहते हैं- भक्तिसारंग प्रभु! आपकी विदेश यात्रा सफल होगी। कभी भी हतोत्साह नहीं होना। आकाश वाणी के रूप में अस्फुट शब्दों में ये दो-चार बातें कह कर श्रील प्रभुपाद का करुणा पूर्ण मुख मण्डल अदृश्य हो गया। यह सुनकर श्रीमद् गोस्वामी प्रभु पूर्ण उत्साह व शक्ति प्राप्त होकर गुरु कृपा ही केवलम् इस प्रकार विचार पूर्वक श्रील गुरुदेव प्रभुपाद के श्रीचरण में बार-बार प्रणाम करके मालिका में हरिनाम करने लगे।
७ नवम्बर, अफ्रीका महादेश का इटालियान सोमालिया, ८ नवम्बर, सूडन के डिजिवुटी पहुँचे। डिजिवुटी के छोटे से शहर का दर्शन करते समय एक दुकान पर सउदी अरब एवं डिजिवुटी दो देशों के लोगों के साथ वार्तालाप हुआ। उन लोगों ने श्रीमद् भक्तिसारंग प्रभु को भारतीय जानकर उनके दर्शन और कथा श्रवण करने के लिए दौड़-दौड़ कर आना शुरू किया। तब श्रीमद् गोस्वामी प्रभु ने दो देशों के समवेत जनसभा के बीच श्रीमन्महाप्रभु किसलिए हरिनाम महामन्त्र जगत् में लाये थे, इस हरिनाम महामन्त्र संकीर्तन से फायदा क्या है, इस प्रकार श्रीहरिनाम महामन्त्र की अपार महिमा और पंचतत्त्व की महिमा एवं श्रील प्रभुपाद की कथा का कीर्तन किया। इनके मुख से भारतीय संस्कृति और मानव धर्म की कथा सुनकर सब लोग बहुत सन्तुष्ट हुये। इसके बाद स्वेज कोनाल, मिशर का पोर्ट सैयद, इटली का सिसिली, लंदन का मारविलास बन्दरगाह होकर पेरिस का गिरिडि, लायन नर्ड, वेन लोहन, फ्याल्काष्टन होकर शाम को लंदन विक्टोरिया स्टेशन पहुँचे। वहाँ से श्रीमद् कुंजविहारी विद्याभूषण प्रभु के छोटे भाई वैरिष्टर श्रीपाद सम्विदानन्द प्रभु श्रीमद् भक्तिसारंग प्रभु को लंदन ग्लोष्टार हाउस गौड़ीय मिशन में लाये।
१ दिसम्बर, सन् १९३६ को लंदन में मि. साटलार साहब, आर. एस. नेहरू, एन. डि. ट्यांरी और ओनरेबल सेक्रेटरी हिन्दु रीलिजन, हिन्दुस्तान टाइम्स पत्रिका के प्रतिनिधि हेनरीबीच, भारत के आर्य समिति के आचार्य पण्डित ऋषिराम, एडवोकेट पिप्रि पालसि लंदन एवं लंदन स्थित तारापद चटर्जी की एकान्त चेष्टा से ओयेष्ट बैंक रोड ह्याण्ड उइक प्लेस में एक बृहद् धर्मसभा का आयोजन किया। उस धर्मसभा में भारतीय और विभिन्न देश के विशिष्ट महोदय की उपस्थिति में प्रथम श्रीमद् भक्तिसारंग प्रभु ने भारत के नित्य सनातन धर्म के विषय में एवं श्रीमन्महाप्रभु के नित्य प्रियजन षडू गोस्वामी, श्रीनिवास, श्रीनरोत्तम, श्रीश्यामानन्द प्रभु के कठोर वैराग्य एवं निष्किंचन शुद्ध श्रीकृष्ण भजनमय जीवन आलेख्य के विषय में एवं गोस्वामियों के श्रीहस्त लिखित सु-सिद्धान्त पूर्ण प्रकाशित अनेक ग्रन्थ समूह द्वारा भारत में किस प्रकार श्रीगौरवाणी एवं श्रीमन्महाप्रभु की विशुद्ध निर्मल प्रेमभक्ति धर्म का अत्यन्त बृहद् रूप से प्रचार प्रसार हुआ, इस विषय में बहुत समय तक विशेष रूप से सुदीर्घ भाषण प्रदान किया। इनका भाषण सुनकर सभी सदस्यों ने कहा- आज तक भारत से बहुत धर्म प्रचारक आये, वे सब लोग केवल वेद-वेदान्त की नीरस कथा सुनाकर चले गये। किन्तु इस प्रकार मधुर, सहज, सरल, अकाट्य शास्त्र प्रमाण युक्ति पूर्ण भाषण सुनकर आज हम सबको बहुत आनन्द मिला। ये सब कथा हम लोग कभी खण्डन नहीं कर सकेंगे। इस प्रकार कह कर उपस्थित समस्त श्रोताओं ने करतालि बजाकर सभा को मुखरित किया एवं श्रीमद् गोस्वामी प्रभु की बहुत प्रशंसा करके उनका यथोचित सम्मान प्रदर्शन किया।
एकदिन लंदन के राजा षष्ठ जार्ज के राजप्रासाद में आमन्त्रित होकर उनसे सम्मानित होकर प्रासाद में आमन्त्रित राजा सैयद अली, लेडी अली, कादेर अली, यूरोपीयन जार्नलिष्ट इन्डियन न्यूज सर्विस एवं ओरियेण्टल न्यूज एजेन्सी तथा विशिष्ट व्यक्तियों की सभा में श्रीमद् भक्तिसारंग गोस्वामी प्रभु किस लिए भारत से लंदन आये, इस विषय में खुली आलोचना के साथ पवित्र धर्मक्षेत्र भारतवर्ष का विशेषता एवं परिचय बताया- भारतवर्ष अनन्त युग-युगान्त से विशुद्ध धर्मात्मा ऋषि-मुनि एवं भक्त-वैष्णव की तपस्या एवं साधन-भजन धर्मानुशीलन का स्थान विशेष है। सर्वोपरि स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण एवं उनके अनन्त अवतार विशेष का नित्य लीला क्षेत्र है। भारतवासी श्रीभगवान् के अति प्रियजन देवशिशु हैं। अनादिकाल से पवित्र भारत की मिट्टी पर असंख्य धर्मवक्ता श्रीभगवद् परिकरों, महान व्यक्तियों का आविर्भाव हुआ।
जहाँ अनादिकाल से अलौकिक श्रीधाम वृन्दावन और श्रीधाम मायापुर नित्य विराजित है। जहाँ स्वयं भगवान् ने अनादिकाल से मानव शरीर धारण कर जगत् में आकर्षक अनिन्द्य सुन्दर लीला की एवं आगे भी करेंगे। इस दिव्यभूमि भारतवर्ष को मैं असंख्य साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करता हूँ।
सनातन धर्म अनादिकाल से है और अनादिकाल तक रहेगा। वेद, भगवान् और धर्म तीन मिलकर एक अभिन्न तत्त्व, नित्य सनातन वस्तु हैं। उस नित्य सनातन वेद रूप कल्पवृक्ष का प्रपक्व फल प्रेमभक्ति सम्पत्ति है। अनादिकाल से जीव विमोहिनी मायादेवी की गोद में समस्त जीव मोहनिद्रा में निद्रित हैं। द्वापर युग में स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ने प्रपंचगत अपनी लीला के अन्त में बहुत चिन्तन किया। आने वाले कलिकाल दोषों से ग्रस्त समग्र विश्व साधन, तपस्या, भगवद् आराधना करने में असमर्थ रहेगा। उसे माया के अधीन संसार बन्धन से कैसे मुक्त किया जाएगा। तब भगवान् श्रीकृष्ण ने अति सहज सरल एक सुन्दर उपाय निकाला, जो जीव मात्र के लिए आश्रय करना सम्भव होगा। जो पूर्व किसी युगों में नहीं दिया गया। स्वयं भगवान् ने देखा अनादिकाल से मेरा युगल स्वरूप श्रीश्रीराधाकृष्ण नाम- हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।। युगलमन्त्र का रूप कठोर विधि-निषेधान्तर्गत होकर पूर्व से नित्य अपौरुषेय वेद में विराजित है। कलियुग के अभागे, मन्दमति, दुर्बल, अजितेन्द्रिय समस्त जीवों को भयंकर असहाय और दुःख-दुर्दशा में देखकर मन में सोचने लगे इनका कैसे उद्धार होगा। तब स्वयं भगवान् श्रीश्रीराधाकृष्ण युगलकिशोर ने परम करुणाघन विग्रह श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु के रूप में अवतार लेकर जीव का नित्य मंगल करने की अतिशय करुणा वत्सल होकर सकल प्रकार का विधि-निषेध हटा दिया। देव-दैत्य, दानव, मानव, पशु-पक्षी, कीट-पतंग, वृक्ष प्रस्तरादि सकल प्रकार के जीवों को अत्यन्त सहज सरल रूप में नित्य साध्य-साधन तत्त्व वही युगलमन्त्र को उल्टा करके युगलनाम के रूप में- हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।। महामन्त्र को प्रकट करके पहले स्वयं आचरण कर फिर समस्त जगद्वासियों को श्रीकृष्णनाम संकीर्त्तनधर्म रूप भजन मार्ग प्रवर्तित कर प्रदान किया। संकीर्तन प्रवर्तक श्रीकृष्णचैतन्य। संकीर्तन यज्ञे तौरे भजे सेइ धन्य।। सेइ त’ सुमेधा आर कु-बुद्धि संसार। सर्व यज्ञ हैते कृष्णनाम यज्ञ सार।। अर्थात् इस कलियुग के जीवों को अन्यान्य युगोपयोगी साधक के अति कठोर साधन लब्ध पूर्ण फल को यह श्रीनाम महामन्त्र ही दे सकता है। संसार कारागार में अनन्त काल के दुःख-दुर्दशा रूप असहनीय जीवन यन्त्रणा से नित्यकाल के लिए मुक्त कर सकता है। चिरन्तनी शाश्वत मुक्ति के साथ जीव का स्वरूपोचित शाश्वत नित्य दास्य रूप सर्वोपरि एवं सर्वोत्तम श्रीगोलोक वृन्दावनाधिपति नित्य अनन्त प्रेमभक्ति माधुर्य रसकदम्ब श्रीश्रीराधाकृष्ण युगलकिशोर के युगल चरणारविन्द की प्रेमसेवा के साथ चरमतम मुक्ति की पराकाष्ठावस्था में पहुँचने का सर्वावस्था में सर्वेक्षण सकल जीव के लिए एक अपूर्व अत्यन्त सहज सरल सर्वोत्तम साधनोपाय निरन्तर श्रीकृष्णनाम संकीर्त्तनधर्म अनुशीलन इस विश्व सभा में श्रीमन्महाप्रभु ने प्रवर्त्तन किया। उसी साधन भजन को स्वयं भगवान् श्रीमन्महाप्रभु ने अपने नित्य साथियों को लेकर अपने मुख से निरन्तर संकीर्तन करके सबको सिखाया और समग्र विश्व में प्रचार किया। प्रभु कहे कहिलाम एइ महामन्त्र। इहा जप गिया सबे करिया निर्वन्ध।। इहा हैते सर्वसिद्धि हइवे सवार। सर्वक्षण बल इथे विधि नाहि आर।। कि भोजने कि शयने किम्वा जागरणे। अहर्निश चिन्त कृष्ण बलह वदने।। श्रीमन्महाप्रभु का दिया हुआ यह श्रीकृष्णनाम महामन्त्र कलियुग में प्रत्येक जीवात्मा का एकमात्र परम साधन और साधन का अन्तिम अवस्था में अर्थात् नित्य कृष्णदास्य रूप स्वरूपावस्था में एकमात्र साध्य रूप सर्वाराध्याराध्य शिरोमणि श्रीश्रीराधाकृष्ण युगलकिशोर की नित्य प्रेममाधुर्य सेवा रसास्वादन प्राप्ति है। श्रीमन्महाप्रभु के इस चरम महोत्तम अवदान से समग्र जीव जगद् हमेशा ऋणी रहेगा।
नित्य शाश्वत प्रेमभक्ति धर्म किसी के द्वारा आविष्कार नहीं, अचानक किसी कारणवश प्रकाश होने का धर्म विशेष भी नहीं। यह धर्म आत्मा का नित्यधर्म, स्वधर्म है। आत्मा नित्य, शाश्वत, सनातन वस्तु, उसका धर्म भी नित्य शाश्वत सनातन वस्तु। आत्मधर्म अर्थात् परमेश्वर श्रीकृष्ण में विश्वास, श्रद्धा, और विशुद्ध भक्ति-प्रेम जैसे नित्य स्वभाव सिद्ध आत्मा के साथ अविच्छिन्न है ठीक वैसे ही आत्मधर्म के साथ परमशान्ति एवं परमानन्द का अस्तित्व भी नित्य शाश्वत स्वभावसिद्ध अविच्छेद्य है। जीवात्मा के निज कर्त्तव्य, स्वधर्म अर्थात् भगवद् सेवा से विमुख होने के कारण ही उसको सकल प्रकार की अशान्ति, दुःख-दुर्दशा भोग है। आत्मा जब अपने धर्म में अर्थात् खोये हुये भगवान् श्रीकृष्ण के चरण में लौट आएगा और उनकी नित्य सेवा स्वीकार कर लेगा तब वह हमेशा के लिए परमशान्ति एवं परमानन्द का अधिकारी बन जाएगा। कारण आराध्य भगवान् सबके लिए एक हैं, दो नहीं। एक-एक देश, एक-एक जाति व वर्ण के भेद से अपनी-अपनी भाषा में अलग-अलग नाम देकर आराधना करते हैं और उनको पुकारते हैं, केवल इतना ही पार्थक्य है। जीव के परम कल्याण के लिए इस कथा प्रचार की सूचना पहले श्रीधाम वृन्दावन से बंगदेश होकर आसमुद्र हिमाचल समग्र भारतवर्ष में हुई। ये जड़ जगत् किसी उपाय से कभी भी किसी को भी एक बूँद भी शान्ति एवं आनन्द दे नहीं सकता। कारण इस जगत् की सभी वस्तु मात्र ही क्षणस्थायी, अनित्य, सर्वदा दुःख दायक, अशान्त निरानन्द एवं असुखमय है। मायाबद्ध जीव प्रकृति के माया छल में आकृष्ट होकर केवल दुःखदायी अशान्ति का ही आदर करते हैं। इसलिए हम सबको सर्वत्र एक दूसरे के साथ हिंसा-द्वेष, युद्ध-लाभहानि हमेशा देखने में आते है। स्वयं भगवान् श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु ने समस्त जीव जगत् को इस प्रकार अशान्त, दानवीय चरित्र एवं हिंसात्मक जीवन से उद्धार करके, समस्त भेदाभेद हटा कर, एक अभिनव दिव्य प्रेमभक्ति रूप बन्धन में जोड़ी अर्थात् स्वयं भगवान् श्रीश्रीराधाकृष्ण हम सबके एकमात्र विषय प्रयोजन, मालिक, आश्रय और हम सब हमेशा के लिए उनके नित्य दास हैं। हम सबका एक ही परिचय है नित्य कृष्णदास। समग्र विश्व में इस प्रकार एक अपार्थिव समन्वयवाद स्थापन किया गया। मैं केवल यह चाहता हूँ कि जाति, वर्ण छोड़कर सबको इस विषय में विशेष रूप से समझने की चेष्टा करना चाहिए, ये मेरा निवेदन है। उपस्थित सांवादिकों ने सभा में श्रीमद् भक्तिसारंग गोस्वामी प्रभु का फोटो ले लिया। उस सभा में सभी सदस्यों ने एकसाथ कहा इसके पहले किसी ने भी इस प्रकार सुन्दर कथा नहीं कही एवं इस प्रकार नये स्वाद से नयी कथा हम सब ने कभी सुनी भी नहीं। यह कहकर सभा के अन्दर इस्लाम धर्मावलम्बी मुसलमान होकर भी मि. अली एवं लेडि अली ने अत्यन्त मनोयोग पूर्वक सम्पूर्ण आलोचना सुनी। अन्त में बहुत सन्तुष्ट होकर श्रीमद् भक्तिसारंग गोस्वामी प्रभु के चरण स्पर्श कर प्रणाम किया एवं कर मर्दन करके उनका सम्मान प्रदर्शन किया।
भारत में श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर का शरीर अस्वस्थ होने लगा। विदेश प्रचार काल में श्रीमद् भक्तिसारंग प्रभु हमेशा श्रीमद्भक्तिहृदय वन गोस्वामी महाराज, श्रीमद्भक्तिविवेक भारती गोस्वामी महाराज, श्रीमद्भक्तिप्रदीप तीर्थ गोस्वामी महाराज, श्रीमद् कुंजविहारी विद्याभूषण प्रभु, श्रीमद् विनोदविहारी प्रभु एवं श्रीमद् राधारमण प्रभु के साथ चिट्ठी-पत्र का आदान-प्रदान करते रहते थे। श्रील प्रभुपाद भी स्वयं अपने प्रियतम शिष्य श्रीमद् भक्तिसारंग प्रभु को अपने हस्त से लिख कर पत्र के माध्यम से हमेशा कृपाशीर्वाद प्रदान और प्रचार कार्य में परम उत्साह प्रदान करते थे। अत्यन्त अस्वस्थ अवस्था में भी १४/१७ दिसम्बर, सन् १९३६ का लंदन में श्रीमद् अप्राकृत प्रभु को दो अन्तिम पत्र भेजे थे। वह इस प्रकार, १४ दिसम्बर का पत्र-
मेरे स्नेहविग्रहेषु अप्राकृत प्रभो!
आपका वहाँ के राजा एवं संसद के साथ साक्षात्कार तथा आलोचना इत्यादि विषय न्यूज पेपर में सब कुछ देख-सुन कर बहुत आनन्द हुआ। निश्यय ही आपको पता है कि मेरा इस संसार से आप सबको छोड़कर श्रीकृष्ण चैतन्यमहाप्रभु के एवं श्रीराधारानी के निर्देशानुसार अपने स्थान जानेका समय हो आया है। आगामी दिन पाश्चात्य में बृहद् रूप से भक्ति विमुख प्रतिपक्ष लोगों के बीच आपको श्रीचैतन्य महाप्रभु की वाणी बहुत उद्यम व उत्साह के साथ प्रचार करनी होगी। ये आपका विशेष दायित्व है। मैं समझता हूँ कि वहाँ ठण्ड के कारण आपको बहुत कष्ट होता होगा। फिर मेरे मन में होता है कि ठीक-ठीक रूप से आपका भोजन भी नहीं होता होगा। इस समय मैं आपके पास होता तो आपकी सेवा-परिचर्या कर सकता। आप कितनी प्रतिकूलता के बीच भी रहकर प्रभु की सेवा करते हैं। किन्तु विदेश में वहाँ आपकी सेवा-परिचर्या के लिए साथ में कोई भी नहीं। आपका इस प्रकार कष्ट और प्रचार व्यस्तता की कथा सोचकर मैं तो दिशाहारा हो जाता हूँ। श्रीगौरहरि आपका सर्व प्रकार से अनुकूल करें मैं उनके श्रीचरण में हमेशा के लिए प्रार्थना करता हूँ।
इति आशीर्वादक-
१७ दिसम्बर, सन् १९३६ का पत्र,
मेरे प्रिय अप्प्राकृत प्रभो!
आपका पूर्व पत्र पाकर बहुत आनन्द हुआ। किन्तु लार्ड जेंटल्याण्ड के साथ आपका किस प्रकार साक्षात्कार हुआ, यह जानने के लिए मैं बहुत उत्सुक होकर रहा हूँ। किस प्रकार प्रचार होता है और कैसे प्रचार कार्य आगे बढ़ाते हैं, यह जानने के लिए मैं इन्तजार में हूँ। मेरे विचार से उस देश में जाकर आपने नये प्रकार से रसोई पकाना सीखा होगा। निश्चय ही आपने वहाँ प्रचार के लिए एक मन पसन्द परिवेश तैयार किया होगा। आपके प्रचार का लक्ष यही होना चाहिए कि सभी प्रकार के लोग इस प्रचार के विषय को समझ सके और इससे जुड़े। इसलिए हमेशा विशिष्ट व्यक्ति एवं संवादिक बैठक में अवश्य ही विशेष रूप में प्रयोजनीय है, यह कथा अवश्य ही आप समझते हो। फिर भी स्मरण रखना कि बड़े-बड़े हाल में धर्मसभा होना विशेष जरूरी है। उस में श्रीमन्महाप्रभु की वाणी का व्यापक रूप से प्रचार होगा।
इति आशीर्वादक-
श्रील प्रभुपाद का स्वास्थ्य धीरे-धीरे बहुत खराब होने लगा। डा. नीलरतन बाबू ने रोगी को किसी प्रकार की कथा कहना सम्पूर्ण मना किया। फिर भी श्रील प्रभुपाद निरन्तर आश्रित एवं अनाश्रित समस्त लोगों के नित्य कल्याण के लिए असंख्य हितोपदेश कथा सुनाते थे। श्रीमद् कुंजबिहारी प्रभु, श्रीमद् कृष्णकान्ति प्रभु, श्रीमद् सज्जनानन्द प्रभु, श्रीकृष्णानन्द प्रभु, श्रीसुन्दरानन्द प्रभु, श्रीमद्भक्तिरक्षक श्रीधरदेव गोस्वामी महाराज की उपस्थिति में इस विश्व के समस्त अपार्थिव दिव्य प्रकाश बुझाकर श्रीश्रील प्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर ने १ जनवरी, सन् १९३६ के शभारम्भ ब्राह्ममुहूर्त में ५-३० बजे कलकत्ता बागबाजार श्रीगौड़ीय मिशन में अपने समस्त प्राणप्रिय अगणित भक्तवृन्द को छोड़कर अनन्त काल के लिए विरह सागर में डुबाकर हमेशा के लिए विदाई ली।
विदेश में श्रीमद् भक्तिसारंग गोस्वामी प्रभु का स्वास्थ्य बिलकुल ठीक नहीं था, बुखार में बहुत कष्ट पा रहे थे। फिर सात दिन बिजली नहीं रही। इस दुःखदायी अवस्था में भी श्रीलगुरुदेव प्रभुपाद का कुशल संवाद पाने के लिए चातक पक्षी के समान उत्कण्ठा में थे। उसी समय अचानक दूसरे कमरा में बहुत जोर से झन् झनात् का शब्द सुना। उसी समय शीघ्र वहाँ गये और देखा कि दीवाल में लटकी हुई कांच में जड़ी श्रील प्रभुपाद की छवि नीचे गिरने से कांच के टुकड़े सारे कमरे में फैल गये है। यह देखकर मूकवत् होकर मन में सोचा कि इसका कारण क्या हो सकता है? उसी समय श्रीमद् कुंजबिहारी प्रभु के पत्र से लंदन स्थित गौड़ीय मठ में संवाद आया कि श्रील प्रभुपाद इस संसार में नहीं रहे। यह जानकर श्रीमद् भक्तिसारंग प्रभु को हृदय में अत्यन्त दुःख हुआ और अपनी डायरी में लिखा कि-
त्रिताप दग्ध समग्र विश्व के जीवों में मात्र थोड़ी सी एक स्थायी शान्ति प्राप्ति की आशा की थी। यह शान्ति कहाँ मिलेगी ? उसी भयंकर त्रिताप ज्वाला यन्त्रणामय तप्त मरुभूमि में अवस्थित जीवों को एक दिव्य रसायन प्रदान करने के लिए थोड़ा ही आयोजन किया गया। उसके बाद समग्र विश्व में धीरे-धीरे यह प्रेमामृत वर्षण भी होने लगा। किन्तु ठीक उसी समय जगत् जीव को हमेशा के लिए दुःख मुक्त करने में समर्पित आत्मा, परम कल्याण कामी, करुणाघन विग्रह, परदुःख-दुःखी, अतिमर्त्य महापुरुष गुरुदेव श्रील प्रभुपाद की अकस्मात् अन्तर्धान लीला से पुनः समस्त विश्व पूर्ववत् अंधकारमय हो गया। श्रील गुरुदेव ऐसे समय चले गये जिस समय उनके श्रीचरण में निष्कपट रूप से समर्पित आत्मा कुछ सु-सन्तान ने उनकी दिव्यवाणी को समस्त विश्व में पहुँचाने का प्राणपण से व्रत ग्रहण किया था। श्रीलगोस्वामी जी ने श्रीलप्रभुपाद के सम्बन्ध में यह लिखा कि-
(१) अतुलनीय चारित्रिक विशिष्ट गुण सम्पन्न एक अति अद्भुत वैचित्रीमय जीवनादर्श स्वरूप थे मेरे परमाराध्यतम श्रीलगुरुदेव प्रभुपाद।
(२) श्रीलप्रभुपाद श्रीकृष्ण कृपा के मूर्त विग्रह थे। जिस व्यक्ति ने उनके एकबार दर्शन किया, उसने उनके श्रीचरण में समस्त समर्पण कर जीवन पर्यन्त के लिए आश्रय ले लिया। सबके हृदय गुहा का अंधकार दूर करने में एक उज्ज्वल ज्योति स्वरूप थे।
(३) कनक, कामिनी एवं प्रतिष्ठा कभी उनको छू नहीं सकी। वे वास्तविक परमहंस थे। धन-सम्पद, यश, प्रतिष्ठा जड़वस्तु को किस प्रकार श्रीभगवत सेवा में व्यवहार किया जाता है उनके जीवनादर्श में यह देखा गया। इस विषय में उनके पवित्र जीवनादर्श की आलोचना करने से पता चलेगा।
(४) वे सम्पूर्ण निर्भीक थे। समस्त प्रकार के भयों ने उनके श्रीचरणों में आत्म समर्पण किया। उच्च आदर्श, सरलता के मूर्त्तविग्रह, सदा ही सत्य के पुजारी थे। सनातन धर्म का सर्वश्रेष्ठ आदर्श यही है कि भगवत प्रेम हो। गोलोक के छिपे हुये उसी सु-दुर्लभ अप्राकृत चिन्मय दिव्य प्रेमभक्ति परम धन को परम औदार्यमय विग्रह श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु ने समग्र पृथ्वीपर अभागे दुर्भागे सभी जीवों को परम उदार होकर दान किया था। श्रीलप्रभुपाद उसके प्रकृत प्रचारक थे।
परमाराध्यतम श्रील गुरुदेव श्रीमद्भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर प्रभुपाद की अन्तर्धान लीला सोचते हुये रो-रो कर प्रचार कार्य का समस्त उद्यम-उत्साह एवं शक्ति खोकर बैठे थे। दो-चार दिन बाद बहुत चेष्टा कर अपने अशान्त मनको समझाकर फिर विभिन्न स्थानों पर सभा में बहुत ज्ञानी-गुणी लोगों के बीच श्रीलप्रभुपाद के निर्देशानुसार श्रीमन्महाप्रभु की वाणी प्रचार की। इनके मुख से अत्यन्त सहज सरल भाव से हरिकथा सुनकर विदेशी लोगों ने बार-बार ताली बजा कर श्रीमद् गोस्वामी प्रभु को बहुत सम्मानित किया। इनका भाषण सुनकर सभा के अन्दर जाति-वर्ण निर्विशेष सभी लोग निज-निज आसन छोड़कर खडे होकर स्वतःस्फूर्त भाव से इनकी समस्त कथा यथार्थ सु-सिद्धान्त पूर्ण है यह स्वीकार कर इनका करमर्दन करते हुये कहने लगे कि Brilliant, excellent, wonderful, well done इस प्रकार बहुत प्रशंसा की। सभा के सभापति महोदय आसन छोड़ कर आये और इनका हाथ पकड़ कर करमर्दन करके बहुत आनन्द पूर्वक कहा कि Explendid, I have never heard such a soul touching discourse in my life. अर्थात् अति चमत्कार, अति चमत्कार इतनी सुन्दर मन मोहक एवं सुसिद्धान्त पूर्ण कथा मैंने जीवन में कभी श्रवण नहीं की। आज आपके द्वारा विलायत में गौड़ीय मिशन क्या है? श्रीलप्रभुपाद परमहंस कुल चूड़ामणि भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर जो श्रीचैतन्य वाणी के एवं विमल प्रेमधर्म के एक अन्यतम प्रवर्तक थे, यह आज समग्र विश्ववासियों को पूर्ण रूप से पता चला। आपके भारत लौट जाने पर भी आपका यह अवदान हम सब कभी भूल नहीं पायेंगे। आप इस प्रकार विशुद्ध प्रचार के माध्यम से समस्त लोगों को यथार्थ सत्य क्या है यह विशेष रूप से पता चला। गौड़ीय मिशन आगामी दिनों में इस प्रकार की व्यवस्था और अधिक करेंगे यह हमेशा के लिए आशा करता हूँ। आपका भाषण वास्तविक रूप में अतुलनीय एवं हृदयग्राही है। आपके समान सुन्दर प्रचारक पूर्वसे आज तक इस स्थान में कभी देखे नहीं गये। आपने बहुत कष्ट कर अत्यन्त दुर्बोध धर्मतत्त्व को अति सहज सरल करके इतने सुन्दर रूप से समझाया एवं सबके मस्तिष्क में बिठाया वह अत्यन्त प्रशंसनीय है। आज तक जिस व्यक्ति ने आपके मुख से जो कथा सुनी वह कभी भी भूल नहीं पाएगा। आपके साथ इस प्रकार बन्धुत्व होने के कारण हम सब अपने-आप को बहुत सौभाग्यवान मानते हैं। उस सभा में समस्त श्रोता के बीच कोई वाद-प्रतिवाद नहीं, स्वाभाविक रूप से एक प्रश्न आया था कि आप हम सबके सामने श्रीभगवान् के हस्त-पद-चक्षु-कर्ण-मुख और हम लोग के समान शरीर व रूप विशिष्ट वाला साक्षात् अस्तित्व का कोई प्रमाण सिद्ध कर पायेंगे कि नहीं? ताकि हम सब कृत-कृतार्थ हो सकें। यह सुनकर
श्रीमद् भक्तिसारंग गोस्वामी प्रभु ने उस सभा में कहा- आप सब मुझे केवल पाँचदिन का समय दीजिये।
उस समय उनके पास एकमात्र श्रीलप्रभुपाद द्वारा दी हुई केवल तीनों शिला छोड़कर कमसे कम एक चित्रपट भी नहीं था। तब केवल श्रीलगुरुदेव और श्रीभगवान् को दिन रात दीनातिदीन होकर पुकारने लगे। तीन दिन तक रात्रि में नींद के अन्दर उनके सेवित शिला में हस्त-पद विशिष्ट चतुर्भुज श्रीविग्रह के दर्शन किया करते थे। तब श्रीमद् गोस्वामी प्रभु ने शिलारूपी भगवान् एवं श्रीगुरुदेव के चरण में साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करके हाथ जोड़कर प्रार्थना की मुझे पता नहीं आप कौन सी लीला करना चाहते हैं। मैं प्रत्येक दिन शिला के मध्य में आपके दिव्य रूप का दर्शन करता हूँ। प्रभो! इस संकट में अधम दास का मान रख कर रक्षा कीजिए और आपका निज दिव्य स्वरूप दर्शन दान करके संसार में अपनी महिमा प्रकाश कीजिए। उसी दिन निद्रा में स्वप्न देखा कि भगवान् ने दर्शन देकर कहा- क्यों चिन्तित हो, मैं इस बगीचा में इस वृक्ष के नीचे विराजित हूँ। गोस्वामी प्रभु ने स्वप्न में देखा कि अति सुन्दर चतुर्भुज वासुदेव मूर्ति लंदन के केन् सिंटन बगीचा में पाम वृक्ष के नीचे पत्ते के अन्दर विराजित है। नींद छूटने के बाद शैया पर बैठकर ये स्वप्न है कि सत्य, हे गुरुदेव! आपने क्या दिखाया, यह सोचने लगे। तुरन्त प्रातः कृत्य करके हरिनाम मालिका में जप करते-करते स्वप्न में देखे हुये उसी स्थान पर केन् सिंटन बगीचा में गये और श्रीभगवान् के निर्देश अनुसार पाम वृक्ष के नीचे बहुत सावधानी से थोड़ा सा ढूँड़ा तो पत्ते से बँके हुए श्रीविग्रह के दर्शन किये उन्हें उठाकर वक्ष में धारण किया। श्रीविग्रह को अपने स्थान पर लाये एवं उनका महाभिषेक स्नान पूजा आदि किया। उस समय श्रीगोस्वामी प्रभु के पास एक पैसा भी नहीं था। तब रो-रो के हाथजोड़ कर श्रीभगवान से कहा- प्रभो! यह आपकी कौन सी लीला है। मेरे प्रति इतनी कृपा करके दर्शन दिये और घर में भी आये, किन्तु आज मेरे पास एक पैसा भी नहीं, मैं कैसे आपकी सेवा करूँ। यह कहकर मालिका में हरिनाम करने लगे, उसी समय सम्मुख आँगन में देखा कि फिके हुये कागज-पत्र के मध्य में मुख बन्द एक सुन्दर लिफाफा पड़ा है। तुरन्त उसको उठाकर सेवक को पूछा- ये लिफाफा यहाँ कैसे आ गया? सेवक ने जवाब दिया कि बाबू! आपके कमरे में पुराना कागज के अन्दर था, मैंने पुराने कागज समझ कर फेक दिया। श्रीगोस्वामी प्रभु ने वह लिफाफा खोल कर देखा कि उसके अन्दर सौ पाउण्ड का चेक है। वह चेक दरभंगा के महाराज ने भेजा था। भक्त वत्सल भगवान् की इतनी कृपा देखकर अजस्र आँसू गिराते हुए तुरन्त बैंक में जाकर चेक चेञ्ज किया एवं अति सुन्दर रूप से परम करुणामय श्रीभगवान् की सेवा में लगाया।
अगस्त महिना, सन् १९३७ में लार्ड जेटल्याण्ड के सभापतित्व में पूर्व वचनानुसार शाम को उपस्थित असंख्य जनसभा के बीच शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी अति मनोहर भगवान् श्री वासुदेव श्रीमूर्ति के साथ श्रीमद् गोस्वामी प्रभु उपस्थित हुये। समस्त सभासदों को श्रीभगवान् का अप्राकृत शरीर विशिष्ट श्रीविग्रह दिखाकर बताया कि श्रीभगवान् हम सबके समान अप्राकृत चिन्मय हस्त-पद विशिष्ट साकार रूप विग्रह हैं, निराकार नहीं। सभा के बीच समस्त सदस्यों ने श्रीभगवान् का साकार रूप श्रीविग्रह दर्शन कर सिर झुका लिया और भगवान् साकार हैं निराकार नहीं ये स्वीकार कर लिया। तुरन्त श्रीमद्भक्तिसारंग गोस्वामी प्रभु की गोद में श्रीवासुदेव विग्रह सहित विभिन्न पत्रकारों ने फोटो खींचा। दूसरे दिन छवि सहित ये संवाद विभिन्न पत्र-पत्रिका में प्रकाशित हुआ। इस प्रकार श्रीमद् गोस्वामी प्रभु के द्वारा श्रील गुरुदेव प्रभुपाद एवं श्रीचैतन्य महाप्रभु की वाणी प्रचार ने सार्थक रूप धारण किया।
श्रीमद् गोस्वामी प्रभु के श्रीचैतन्य वाणी प्रचार कार्य से अति सन्तुष्ट होकर कुछ लोगों ने इनके श्रीचरण में आश्रय लेकर हरिनाम दीक्षा के साथ अशेष कृपा प्राप्त की। इस प्रकार विदेश प्रचार समाप्त करके २३ सितम्बर, सन् १९३७ को श्रीवासुदेव मूर्ति सहित भारत लौटे। मद्रास के मुख्यमन्त्री माननीय श्रीराज गोपालाचारी सहित देशी-विदेशी बहुत भक्तजनों की पुष्पमाला द्वारा विशेष रूप से अभ्यर्थित होकर मद्रास श्रीगौड़ीय मठ से कलकत्ता बागबाजार श्रीगौड़ीय मठ में पहुँचे। श्रीवासुदेव मूर्ति को श्रीमठ के श्रीमन्दिर में विराजित कर उनकी विशेष रूप से सेवा पूजा का व्यवस्था की। अति सुन्दर भगवान् श्रीवासुदेव मूर्ति का दर्शन कर परमानन्द प्राप्त होकर बहुत भक्त श्रद्धालुओं ने परम भक्ति पूर्वक बहुत स्वर्ण-चाँदी, मणि-माणिक्य के अलंकार से श्रीविग्रह को साजाया। कुछदिन बाद श्रीमद्भक्तिसारंग प्रभु भारत में प्रचार कार्य पर व्यस्त रहे। दो महीने बाद एकदिन पुजारी ने सुबह मंगला आरती करने के लिए मन्दिर खोलकर देखा कि समस्त अलंकार जैसे थे वैसे ही हैं, किन्तु श्रीवासुदेव विग्रह नहीं, अन्तर्हित हो गया। बहुत खोजा पर
नहीं मिला। ये खबर जब श्रीमद् गोस्वामी प्रभु के पास पहुँची, तब श्रील महाराज बहुत रो-रोकर भगवान् को पुकारने लगे, आप क्यों चले गये, मेरा क्या अपराध हो गया, मुझे क्षमा करो। आप कृपा करके मुझे दर्शन दो और श्रीमन्दिर के सिंहासन पर विराजित होवें। उस समय भगवान् श्रीवासुदेव ने कहा- तुम क्यों रोते हो ? मेरा स्वविग्रहत्व प्रमाण करने के लिए तेरी भक्ति के वश होकर मैं तेरे पास आया था। जो प्रयोजन था, वह पूरा हो गया, इसलिए में चला आया हूँ। दुःखी नहीं होना, मैं हमेशा के लिए तेरे साथ ही हूँ।
विदेश प्रचार के अन्त में भारत लौटकर वे श्रील गुरुदेव प्रभुपाद की अप्रकट लीला स्मरण कर अत्यन्त विरह वेदना से व्यथित अन्तर होकर अपने जन्मस्थान पर चुप-चाप भजन करने लगे। इनकी इस प्रकार अति दुःखदायी अवस्था देखकर बहुत श्रद्धालु एवं अन्यान्य गुरुभ्रातओं ने बहुत कुछ समझाया और संन्यास लेकर प्रचार करने के लिए परामर्श दिया एवं उत्साह बढ़ाया। तब गुरुभ्राताओं के परामर्श एवं उत्साह से संन्यास लेने की इच्छा प्रकाश की। विश्व वैष्णव राजसभा के अन्यतम सम्पादक यूरोप अमेरिका, लंदन, फ्रान्स, जर्मनी, अस्ट्रेलिया एवं सउदीअरब इत्यादि बहुत स्थान पर श्रील प्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी ठाकुर के कृपादेश से विदेश में भारप्राप्त प्रचारक प्रवर श्रीगौड़ीय संघपति श्रीअतुल चन्द्र वन्दोपाध्याय (श्रीमद् अप्राकृत भक्तिसारंग प्रभु ने ७ विष्णु, ३५५ गौराब्द, ६ चैत्र १३४७ बंगाब्द, २० मार्च, सन् १९४१ बृहस्पतिवार को श्रीगौड़ीय वैष्णवों के सुप्रसिद्ध तीर्थ रेमुणा के श्रीश्रीक्षीरचोरा गोपीनाथ ज्यू के श्रीमन्दिर में सभी गुरुभ्राताओं की उपस्थिति में श्रीगोपाल भट्ट गोस्वामी के लिखित सत्क्रियासार दीपिका के वैदिक विधानानुसार यथा नियम पूर्वक गुरुभ्राता श्रीमद्भक्तिरक्षक श्रीधरदेव गोस्वामी महाराज से संन्यास मन्त्र ग्रहण के साथ संन्यास वेष धारण कर त्रिदण्ड संन्यास ग्रहण किया। श्रीमद्भक्तिप्रकाश अरण्य गोस्वामी महाराज डोर, कौपीन, बहिर्वास एवं दण्ड सहित सुपवित्र ने संस्कार कार्य किया, श्रीमद्भक्तिविचार यायावर गोस्वामी महाराज ने श्रीविष्णु होम किया और श्रीमद्भक्तिगौरव वैखानस गोस्वामी महाराज ने शास्त्र विहित मन्त्र में यज्ञादि कार्य सुसम्पन्न किया। संन्यास के अन्त में सभी गुरुभ्राताओं को यथायोग्य दक्षिणा सह वस्त्रादि दान, पुष्पार्घ माला पहना कर पुनः पुनः दण्डवत् प्रणाम करके श्रील गुरुदेव भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर के आलेख्य एवं श्रील रसिकानन्द प्रभु के समाधि मन्दिर की संकीर्तन के साथ प्रदक्षिण करके संन्यास यज्ञानुष्ठान समाप्त किया। श्रीलगुरुदेव प्रभुपाद पहले ही श्रीगौड़ीय संघपति एवं भक्तिसारंग गोस्वामी नाम से कृपाशीर्वाद करके गये थे। उस कृपाशीर्वाद अनुसार इनका शुभ संन्यास नाम हुआ त्रिदण्डि भिक्षु श्रीमद्भक्तिसारंग गोस्वामी महाराज। संन्यास के अन्त में श्रील माधवेन्द्र पुरीपाद के समाधि मन्दिर के समस्त भक्तों के साथ संकीर्त्तन सहयोग में प्रदक्षिणा करके श्रीगोपीनाथ जू के अमृतकेलि क्षीरभोग प्रसाद द्वारा उपस्थित अगणित भक्तों की सेवा करके बृहद् महोत्सव किया। इस संन्यास यज्ञानुष्ठान में वैष्णव सेवा महामहोत्सव का समस्त व्यय भार श्रीयुत सखीचरण राय भक्तिविजय प्रभु ने ग्रहण किया।
त्रिदण्ड संन्यास ग्रहण कर पूजनीय गुरुभ्राताओं के उत्साह से उन सबके साथ श्रील गोस्वामीमहाराज ने समस्त भारत वर्ष में श्रील प्रभुपाद एवं श्रीमन्महाप्रभु की वाणी का प्रचार किया। श्रीगौड़ीय संघपति ने श्रीधाम वृन्दावन में श्रील सनातनगोस्वामी प्रभु के सेवित श्रीश्रीराधामदनमोहन जू के सेवाइत महन्त श्रीयुत विश्वेश्वरदेव गोस्वामी ने द्वापर युग के श्रीकृष्ण लीला के इमलितला में श्रीश्रीगौर-नित्यानन्द प्रभु के श्रीविग्रह सहित सेवा रजिस्ट्री करके श्रीमद्भक्तिसारंग गोस्वामी महाराज के श्रीहस्त में समर्पण कर दी। सोरों में चक्रतीर्थ घाट पर श्रीमन्महाप्रभु के पादपीठ सहित श्रीश्रीलक्ष्मीवराह देव के श्रीविग्रह स्थापन कर सेवा प्राप्त की। श्रीधाम मायापुर में श्रीनन्दनाचार्य भवन की सेवा एवं श्रीविग्रह प्रकाशित किये। इस प्रकार श्रीगौड़ीय संघपति श्रील भक्तिसारंग गोस्वामी महाराज ने जीवन में समस्त भारत वर्ष में बहुत मठ-मन्दिर और श्रीश्रीराधाकृष्ण की श्रीविग्रह-सेवा प्रकाशित एवं श्रील प्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर की महिमा, श्रीमन्महाप्रभु का दिया हुआ श्रीहरिनाम एवं विशुद्ध प्रेमभक्ति धर्म की कथा बृहद् रूप से प्रचार करके समग्र विश्व के जीवों का नित्य कल्याण विधान किया।
परमाराध्य श्रील भक्तिसारंग गोस्वामी महाराज पृथिवीते आछे यत नगरादि ग्राम। सर्वत्र प्रचार हइवे मोर नाम।। जगत् कल्याणकारी और जीव उद्धारक श्रीमन्महाप्रभु की इस दिव्य वाणी को पूरा करके ३० मधुसूदन, १२ ज्यैष्ठ, १३७१ बंगाब्द २६ मई, सन् १९६४ मंगलवार को श्रीबुद्ध पूर्णिमा, श्रीकृष्ण का फूलदोल महोत्सव, श्रीनिवासाचार्य प्रभु का आविर्भाव, श्रील माधवेन्द्र पुरीपाद का तिरोभाव एवं सर्वोत्तम प्रतिपद तिथि को आश्रय कर अयि दीन दयार्द्र नाथ! हे मथुरानाथ! कदावलोक्यसे। हृदयं त्वदलोक कातरं दयित भ्राम्यति किं करोम्यहम्।। श्रीमती राधारानी के माथुर विरह एवं श्रील माधवेन्द्र पुरीपाद के श्रीमती राधारानी के विप्रलम्भ भव का रसास्वादन करते हुए कलकत्ता २३ नं डाक्टर लेन स्थित श्रीगौड़ीय संघाश्रम में श्रीश्रीराधाश्यामसुन्दर के निगूढ़ निकुँज विलास लीला स्मरण करते हुए समस्त भक्त मण्डली परिवृत श्रीहरिनाम संकीर्तन की दिव्यध्वनि मुखरित श्रीलप्रभुपाद भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर गुरुदेव के नित्यलीला राज्य में प्रवेश किया। समस्त गुरुभ्राताओं ने सम्मिलित होकर उनकी अन्तिम इच्छानुसार उनके प्रियस्थान श्रीधाम मायापुर ईशोद्यान श्रीलनन्दनाचार्य भवन में श्रीश्रीगौरनित्यानन्द प्रभु के श्रीमन्दिर प्रांगण में उनका चिन्मय शरीर समाधिस्थ किया।
श्रील भक्तिसारंग गोस्वामी महाराज के कुछ उपदेशात
(१) श्रीभगवान् और उनके भक्त का शुभाविर्भाव एवं अन्तर्धान तिथि को महोत्सव रूप से माना जाए अथवा जहाँ पालन होता है वहाँ योगदान करने से अध्यात्म जीवन का विकास तथा भगवद् अनुराग धीरे-धीरे वर्धन होता रहेगा।
(२) श्रीभगवान् और उनके भक्त के लिए जो समय, अर्थ एवं दैहिक कष्ट स्वीकार किया जाएगा, वह नित्य श्री भगवद् धाम में जमा हो जाता है। हम सबकी शक्ति और सामर्थ्य जो कुछ भगवान् के लिए व्यवहार होती है, उसका फल हम सब आगामी जीवन में प्राप्त करते हैं।
(३) भगवद् भावोन्मत्तता, देह और मन का संयम, पवित्रता यथार्थ भगवत् प्रीति के लिए वैराग्य प्रधान महापुरुषों का संग निष्कलंकित शुद्ध श्रीकृष्णभजन, आदर्शमय जीवन चरित्र, प्रीति पूर्वक शुद्धभक्ति प्राप्त करने के उद्देश्य से मनोयोग पूर्वक नित्य अनुशीलन, परस्पर श्रवण-कीर्तन इत्यादि करने से अति शीघ्र ही जीवन में पवित्रता प्राप्त होती है तथा भगवान् की शुद्धभक्ति प्राप्त होती है। यह छोड़कर कोई मार्ग अन्य नहीं है।
(४) भगवद् तत्व का सर्वोत्तम प्रकाश स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ने उनके नित्य लीलाधाम श्रीवृन्दावन में ही किया है। शान्त, दास्य, सख्य और वात्सल्य रस का पूर्णतम प्रकाश, सर्वोत्तम मधुर रस का उत्कर्ष आश्रय विग्रह ब्रजगोपी भाव के आनुगत्य में उन्हीं अखण्ड रसवल्लभ विषय विग्रह स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण का भजन ही साधना का चरम एवं परम लक्ष्य है।
(५) मन्त्र श्रेष्ठ महामन्त्र जो श्रीगौरहरि ने संसार को प्रदान किया वही हरेकृष्ण हरेकृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरेराम हरेराम राम राम हरे हरे।। वह भक्ति और प्रेम पूर्वक उच्चस्वर से जिह्वा में कीर्त्तन करना ही प्रत्येक जीव का एकमात्र साधन है। शुद्धान्तकरण से वही कृष्णनाम का कीर्तन, श्रवण और मन के द्वारा निरन्तर स्मरण करने से जीव के अनन्त जीवन के निखिल पाप पूर्ण रूप से विनाश हो जाते हैं। इसी जीवन में संसार से मुक्त होकर श्रीकृष्णधाम में परमानन्दमय प्रेम सेवा प्राप्त कर सकते हैं।