श्रीमद् भागवतम् महत्वपूर्ण श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक
(सूत गोस्वामी नैमिषारण्य ऋषि)

समस्त अवतारों के उत्स: कृष्ण
एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् ।
इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे ।।28।।
(श्रीमद्भगवतं 1/3/28)
एते ये सब; च तथा; अंश पूर्णाश; कलाः पूर्णाश के भी अंश; पुंसः = परम पुरुष के; कृष्णः = भगवान् कृष्ण; तु लेकिन; भगवान् भगवान्; स्वयम् = साक्षात्; इन्द्र-अरि-इन्द्र के शत्रु से; व्याकुलम् विचलित; लोकम् सारे लोक को; मृडयन्ति सुरक्षा प्रदान करते हैं; युगे युगे विभिन्न युगों में।
अनुवाद – उपर्युक्त सारे अवतार या तो भगवान् के पूर्णाश (अंश) या अंशांश (कलाए) हैं, लेकिन श्रीकृष्ण तो आदि भगवान् हैं। वे सब विभिन्न लोकों में नास्तिकों द्वारा उपद्रव किये जाने पर प्रकट होते हैं। भगवान् सदैव आस्तिकों की रक्षा करने के लिए अवतरित होते हैं।
इस विशिष्ट श्लोक में, भगवान् श्रीकृष्ण को अन्य अवतारों से पृथक् किया गया है। उनकी गणना अवतारों में की जाती है, क्योंकि अहैतुकी कृपावश वे अपने दिव्य धाम से अवतरित होते हैं। ‘अवतार’ का अर्थ है “नीचे उतरने वाला।” भगवान् के सारे अवतार, जिसमें साक्षात् भगवान् सम्मिलित हैं, विशेष उद्देश्यों की पूर्ति के लिए विभिन्न लोकों तथा योनियों में होते हैं। कभी वे स्वयं आते हैं और कभी उनके विभिन्न पूर्णाश (अंश) या अंशांश (कला) या फिर प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से आवेशित अंश इस भौतिक जगत में विशिष्ट कार्यों के सम्पादनार्थ अवतरित होते हैं। भगवान् मूलतः समस्त ऐश्वर्य, तेज, यश, सौन्दर्य, ज्ञान तथा वैराग्य से पूर्ण होते हैं। जब ये पूर्णाशों या भिन्नांशों द्वारा अंशतः प्रकट होते हैं तो यह समझना चाहिए कि उन विशिष्ट कार्यों के लिए उनकी विभिन्न शक्तियों के प्राकट्य की आवश्यकता होती है। जब कमरे में बिजली के छोटे-छोटे लट्टू जलते हैं तो इसका अर्थ यह नहीं होता कि बिजलीघर केवल इन्हीं लटुओं तक सीमित है। उसी बिजलीघर से बड़े-बड़े औद्योगिक डायनैमो चलाये जा सकते हैं। इसी प्रकार भगवान् के अवतार सीमित शक्ति का ही प्रदर्शन करते हैं, क्योंकि उस समय उतनी ही शक्ति की आवश्यकता होती है।
उदाहरणार्थ, भगवान् परशुराम ने विरोधी क्षत्रियों का इक्कीस बार संहार करके, तथा भगवान् नृसिंह ने परम शक्तिशाली नास्तिक हिरण्यकशिपु को मार करके, असामान्य ऐश्वर्य का प्रदर्शन किया। हिरण्यकशिपु इतना शक्तिशाली था कि अन्य लोकों के देवता भी उसके भृकुटि-विलास से काँपने लगते थे। कई बार तो उच्चलोकों के देवता आयु, सौन्दर्य, सम्पत्ति, सामग्री तथा अन्य मामलों में, धनी से धनी मनुष्यों से बढ़-चढ़ कर होते हैं। तो भी वे सब हिरण्यकशिपु से भयभीत थे। इस प्रकार हम कल्पना कर सकते हैं कि इस पृथ्वी में हिरण्यकशिपु कितना शक्तिशाली था। किन्तु भगवान् नृसिंह ने अपने नाखूनों से इस हिरण्यकशिपु के भी खण्ड-खण्ड कर डाले। इसका अर्थ यह हुआ कि कोई चाहे कितना ही बलशाली क्यों न हो वह भगवान् के नाखूनों की शक्ति का सामना नहीं कर सकता। जामदग्न्य ने समस्त अवज्ञाकारी राजाओं को उनके राज्यों में जाकर मारने की दैवी शक्ति दिखलाई। भगवान् के शक्त्यावेश अवतार नारद, पूर्णांश अवतार वराह तथा अप्रत्यक्ष आवेश अवतार भगवान् बुद्ध ने जनसमूह में श्रद्धा उत्पन्न की। राम तथा धन्वन्तरि अवतारों ने उनकी ख्याति का तथा बलराम, मोहिनी एवं वामन ने उनके सौंदर्य का प्रदर्शन किया। दत्तात्रेय, मत्स्य, कुमार तथा कपिल ने उसके दिव्य ज्ञान का प्रदर्शन किया। नर तथा नारायण ऋषियों ने उनके त्याग का प्रदर्शन किया। इस प्रकार भगवान् के समस्त अवतारों ने, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, विभिन्न स्वरूपों का प्रदर्शन किया, लेकिन आदि भगवान् कृष्ण ने भगवान् का पूर्ण स्वरूप प्रकट किया। इस प्रकार इसकी पुष्टि होती है कि वे समस्त अवतारों के उद्गम हैं। और उनका सबसे अलौकिक स्वरूप तो वह था जिसमें उन्होंने गोपियों के साथ अपनी लीलाओं की अन्तरंगा शक्ति का प्रदर्शन किया। गोपियों के साथ उनकी लीलाएँ उनके सच्चिदानन्द स्वरूप को प्रकट करने वाली हैं, यद्यपि ये ऊपर से प्रणय (काम) जैसी लगती हैं। गोपियों के साथ उनकी लीलाओं के प्रति विशेष आसक्ति का कभी गलत अर्थ नहीं लगाना चाहिए। भागवत के दशम स्कंध में इन लीलाओं का वर्णन है। गोपियों के साथ कृष्ण की लीलाओं के दिव्य स्वरूप को समझ पाने के लिए किसी भी जिज्ञासु को यह भागवत अन्य नौ स्कंधों द्वारा धीरे-धीरे अग्रसर कराता है।
श्रील जीवगोस्वामी के कथनानुसार यह शास्त्रसम्मत है कि भगवान कृष्ण अन्य समस्त अवतारों के उद्गम हैं। ऐसा नहीं है कि भगवान् कृष्ण के अवतार का कोई स्रोत है। परम सत्य के सारे लक्षण भगवान् श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व में निहित हैं और भगवद्गीता में भगवान् स्पष्ट घोषित करते हैं कि उनके समान या उनसे बढ़कर कोई सत्य नहीं है। इस श्लोक में स्वयम् शब्द इसकी पुष्टि करता है कि भगवान् कृष्ण स्वयं ही अपने स्रोत हैं। यद्यपि अन्य स्थानों में अवतारों को उनके कार्यों के कारण भगवान् कहा गया है, किन्तु उन्हें कहीं भी परम पुरुष नहीं कहा गया। इस श्लोक में स्वयम् शब्द आश्रय तत्व के रूप में उनकी श्रेष्ठता का सूचक है। आश्रय तत्व कृष्ण अद्वय हैं। उन्होंने अपना विस्तार विभिन्न अंशों, कलाओं तथा कणों के रूप में स्वयं-रूप, स्वयं-प्रकाश, तद्-एकात्मा, प्राभव, वैभव, विलास, अवतार, आवेश तथा जीव के नाम से कर रखा है; ये सभी अनन्त शक्ति से युक्त हैं और अपने-अपने स्वरूपों के लिए सर्वथा उपयुक्त हैं। अध्यात्म विषय के पंडितों ने आश्रय तत्व कृष्ण का अत्यन्त सावधानी से अध्ययन करके, उसके ६४ मुख्य गुण बताये हैं। भगवान् के सारे अंश या श्रेणियों में इन गुणों का कुछ प्रतिशत ही पाया जाता है। लेकिन श्रीकृष्ण में ये गुण शतप्रतिशत पाये जाते हैं। स्वयं-प्रकाश, तद् एकात्म से लेकर अवतार तक के उनके निजी विस्तार विष्णुतत्व हैं और इनमें ९३ प्रतिशत तक ये दिव्य गुण पाये जाते हैं। शिवजी में, जो न तो अवतार हैं, न आवेश और न ही इन दोनों के बीच आते हैं, लगभग ८४ प्रतिशत गुण पाये जाते हैं। किन्तु जीवन की विभिन्न अवस्थाओं वाले जीवों में ये गुण ७५ प्रतिशत तक पाये जाते हैं। इस जगत की बद्ध अवस्थाओं में इन गुणों का लेशमात्र ही पाया जाता है और पवित्र जीवों में इनकी मात्रा भिन्न हो सकती है। जीवों में सर्वाधिक पूर्ण जीव ब्रह्मा हैं जो एक ब्रह्माण्ड के अधिष्ठाता हैं। उनमें ७८ प्रतिशत तक ये गुण पाये जाते हैं। अन्य देवताओं में इन गुणों की मात्रा कम होती जाती है और मनुष्य में तो अत्यल्प मात्रा पाई जाती है। मनुष्य जीवन की पूर्णता का मानदण्ड यह है कि वह इन गुणों को ७८ प्रतिशत तक बढ़ाये। जीव में कभी भी शिव, विष्णु या भगवान् कृष्ण के गुण नहीं आ सकते। कोई भी जीव ७८ प्रतिशत गुणों को पूर्ण रूप से विकसित कर, दिव्यता प्राप्त कर सकता है पर वह कभी भी शिव, विष्णु या कृष्ण नहीं बन सकता। हाँ, कालक्रम से वह ब्रह्मा बन सकता है। स्वर्गलोक के दैवी जीव हरि-धाम तथा महेश-धाम में ईश्वर के निरन्तर सान्निध्य में रहते हैं। सब धामों के ऊपर कृष्ण का धाम कृष्णलोक या गोलोक वृन्दावन कहलाता है। जो जीव अपने में ७८ प्रतिशत या इससे अधिक गुण विकसित कर लेता है वह इस भौतिक शरीर को त्यागने के पश्चात् कृष्णलोक जाने का भागी बन जाता है।
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(भगवान् श्रीकृष्ण ने नारद मुनि से कहा)
नाहं तिष्ठामि वैकुण्ठे योगिनां हृदयेषु वा।
तत्र तिष्ठामी नारद यंत्र गायन्ति मद्भक्ताः ।।
हे नारद ! न तो मैं अपने निवास वैकुण्ठ में रहता हूँ, न योगियों के हृदय में रहता हूँ। मैं तो उस स्थान में वास करता हूँ जहाँ मेरे भक्त मेरे पवित्र नाम का कीर्तन करते हैं और मेरे रूप, लीलाओं तथा गुणों की चर्चा चलाते हैं।
श्लोक संग्रह
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श्रीचैतन्य महाप्रभु

अद्वैतवादी सार्वभौम का उद्धार
बड़ी तीव्र गति से श्रीमन्महाप्रभु जी श्रीजगन्नाथ मन्दिर की ओर चल पड़े और श्रीजगन्नाथ जी के दर्शन करते ही प्रेमाविष्ट हो गये । प्रेमावेश में महाप्रभु जी जगन्नाथ जी को आलिंगन करने के लिए दौड़े किन्तु बेसुध होकर गिर पड़े। दैवयोग से अद्वैतवादी सार्वभौम भट्टाचार्य भी वहीं खड़े थे। वे महाप्रभु जी के शरीर में प्रेम विकारों को देख आश्चर्य चकित हो गये और उन्हें उठवाकर अपने घर ले गये। तीन प्रहर बाद नित्यानन्दादि भक्त गण वहाँ पहुँचे । भक्त गणों का उच्च संकीर्तन सुन कर प्रभु उठ बैठे । सार्वभौम भट्टाचार्य, वेदान्त सूत्रों की व्याख्या में निर्विशेष ब्रह्मवाद की स्थापना करते थे व उनका हृदय कुतर्क द्वारा कठोर व रूरवा हो चुका था । श्रीमन्महाप्रभु ने वेदान्त सुनने व अर्थ समझने के बहाने से सार्वभौम के कठिन हृदय को पलट डाला और उसे पहले अपने चतुर्भुज नारायण स्वरूप का व फिर श्यामसुन्दर स्वयं कृष्ण मुरलीधर रूप का दर्शन कराया। श्रीमहाप्रभु के अपूर्व दर्शन करते ही सार्वभौम ने प्रभु को दण्डवत् प्रणाम किया एवं पुनः पुनः हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे। श्रीगौरचन्द्र की कृपा से उनका हृदय द्रवीभूत हो कर सरस हो गया था। जो ज्योति में ज्योति समाना ही आखिरी लक्ष्य समझते थे अब वे ‘मुक्ति’ नाम उच्चारण करने में घृणा करने लगे व हर समय श्रीकृष्ण प्रेमानन्द में विभोर रहते ।
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कृष्ण! त्वदीय – पदपंकज – पंजरान्त -रद्यैव मे विशतु मानस – राजहंसः ।
प्राणप्रयाणसमये कफवातपित्तैः कंठावरोधनविधौ समरणं कुतस्ते ।।40।।
हे कृष्ण ! मेरा मन रूपी राजहंस आज ही आपके पादपद्मरूपी पिंजरे में प्रविष्ट हो जाये। कारण, प्राण छोड़ने के समय कफ, वात और पित्त के द्वारा कण्ठ रँध जाने पर कैसे आपका स्मरण हो पायेगा? ।।40।।
श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्
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स्वभावके अनुसार वर्ण-निरूपण
स्वभावके अनुसार ही प्रवृत्ति या गुण होता है। इसलिए तदनुसार ही कर्म करना चाहिए। स्वभावके विरुद्ध कर्म करनेसे वह कर्म फलप्रद नहीं होता। स्वभावके किसी अंशको ही अंग्रेजी भाषामें जिनियस (genius) कहते हैं। परिपक्व स्वभावको बदल देना सहज नहीं है। इसलिए स्वभावके अनुसार ही कर्म करते हुए जीविका-निर्वाह और परमार्थके लिए चेष्टा करनी चाहिए। भारतवर्षके मनुष्य चार प्रकारके स्वभाव भेदसे चार वर्णोंमें विभक्त हैं। वर्ण-विभागकी विधियोंका पालन करते हुए समाजमें स्थित होनेपर सब प्रकारकी सामाजिक क्रियाएँ स्वाभाविक रूपसे ही फलवती हो जाती हैं तथा जगतका सर्वाङ्गीण कल्याण होता है। जिस समाजमें वर्ण-विभाग-विधि प्रचलित है, उस समाजकी भित्ति ठोस विज्ञानपर आधारित है तथा वह समाज मानव जातिके लिए पूजनीय है।
कुछ लोग ऐसा सन्देह कर सकते हैं कि यूरोप और अमेरिकामें कहीं भी वर्ण-विभाग आदि विधियाँ प्रचलित नहीं हैं, फिर भी वहाँके लोग अर्थ एवं विज्ञान आदि सभी विषयोंमें सर्वश्रेष्ठ एवं पूजनीय हैं; अतएव वर्ण-विधिको स्वीकार करना व्यर्थ है। परन्तु उनका ऐसा सन्देह निरर्थक है; क्योंकि यूरोपीय जातियाँ अत्यन्त नवीन और आधुनिक हैं। आधुनिक जातियोंके लोग प्रायः अधिक बलवान और साहसी होते हैं। वे उस साहस और बलसे प्राचीन जातियोंके संग्रहीत विद्या, विज्ञान और कला-कौशलसे कुछ-कुछ ग्रहण करके जगतमें अनेक प्रकारका कार्य कर रहे हैं। क्रमशः कुछ दिन बीतनेपर ये नयी जातियाँ ठोस विज्ञानके आधारपर प्रतिष्ठित समाज-व्यवस्थाके अभावमें सर्वथा लुप्त हो जाएँगी। भारतीय आर्य जातिमें वर्ण-व्यवस्था विद्यमान रहनेसे ही इस वार्द्धक्य एवं जीर्ण-शीर्ण अवस्थामें भी उसमें जाति-लक्षण प्रकाशित हो रहे हैं। किसी समय रोम और ग्रीक जातियाँ इन आधुनिक यूरोपीय जातियोंसे भी बल और वीर्यमें कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी हुई थीं। परन्तु आज उनकी क्या दशा है? आज वे अपने जाति-लक्षणसे रहित होकर अन्यान्य आधुनिक जातियोंके धर्म और लक्षणको ग्रहण करके अपनी पूर्वावस्थासे सर्वथा भिन्न रूपमें बदल गई हैं। यहाँ तक कि उन जातियोंके वर्त्तमान लोग अपने वीर पूर्वपुरुषोंकी वीरता आदिपर गर्व तक नहीं करते। यद्यपि हमारे देशकी आर्य-जाति रोम और ग्रीक जातियोंसे न जाने कितनी अधिक प्राचीन है, तथापि इस आर्य जातिके लोग आज भी अपनी जातिके पूर्वजों शूरवीर पुरुषोंके ऊपर गर्व करते हैं। ऐसा क्यों होता है? इसका उत्तर यह है कि केवल वर्णाश्रम-व्यवस्था सुदृढ़ रहनेके कारण उनका जाति-लक्षण दूर नहीं हो पाया है। म्लेच्छों द्वारा पराजित राणाओंके वंशज आज भी अपनेको श्रीरामचन्द्रजीका वीर वंशज मानते हैं।
जातिकी वार्द्धक्य-दशासे भारतवासी जितने भी पतित क्यों न हों, जब तक उनमें वर्ण-व्यवस्था प्रचलित रहेगी, तब तक वे आर्य ही रहेंगे, वे कदापि अनार्य नहीं हो सकेंगे। रोमन आदि यूरोपीय आर्य वंशीय लोग हान और भाण्डाल आदि अन्त्यज जातियोंके लोगोंके साथ मिलजुलकर एक हो गए हैं। यूरोपीय जातियोंके वर्त्तमान समाजका अध्ययन करनेपर हम देख पाएँगे कि उस समाजमें जो कुछ सौन्दर्य है, वह केवलमात्र कुछ-कुछ स्वभावजनित वर्ण-धर्मको धारण करनेसे ही है। यूरोपमें जो व्यक्ति वणिक् स्वभावके हैं, वे वाणिज्य-व्यवसायको ही अच्छा मानते हैं और उसीके द्वारा ही उन्नति साधन कर रहे हैं। जो व्यक्ति क्षत्रिय स्वभावके हैं, वे सैनिक बनना ही पसन्द करते हैं, तथा शूद्र-स्वभाववाले व्यक्ति साधारणतः सेवा-कार्यको ही श्रेष्ठ समझते हैं। वास्तवमें कुछ-न-कुछ अंशोंमें वर्ण-धर्मको अपनाए बिना कोई भी समाज टिक नहीं सकता। विवाह आदि क्रियाओंमें भी वर्णोपयोगी ऊँच-नीच अवस्था और स्वभावकी परीक्षाकी जाती है। यूरोप आदिमें वर्ण-धर्म आशिक रूपमें गृहीत होनेपर भी वह वैज्ञानिक भित्तिके ऊपर प्रतिष्ठित सम्पूर्ण आकारको प्राप्त नहीं है। वहाँ सभ्यता और ज्ञानकी जितनी उन्नति होगी, वर्ण-धर्म भी उतना ही पूर्णताकी ओर अग्रसर होगा। सभी क्रियाओंमें दो प्रकारकी प्रणालियाँ कार्य करती हैं-अवैज्ञानिक प्रणाली और वैज्ञानिक प्रणाली। किसी भी कार्यमें जब तक वैज्ञानिक प्रणालीको अपनाया नहीं जाता, तब तक वहाँ अवैज्ञानिक प्रणालीसे ही कार्य होता है। उदाहरणके लिए पहले जब तक वैज्ञानिक प्रणालीसे जलयान प्रस्तुत नहीं हुए थे, तब तक अवैज्ञानिक नौकाओंके द्वारा ही जल-यात्राएँ हुआ करती थीं; परन्तु वैज्ञानिक जलयानोंका निर्माण होते ही अब जल-यात्राएँ इन वैज्ञानिक जल-यानोंके (जहाजोंके) द्वारा होती है। समाज भी उसी प्रकार है अर्थात् जिस देशमें जब तक वर्ण-व्यवस्थाका सुचारु रूपसे प्रचलन नहीं हो जाता, तब तक एक अवैज्ञानिक प्राथमिक अवस्था ही उस देशके समाजकी परिचालना करती है। आजकल भारतवर्षको छोड़कर संसारके सभी देशोंमें वर्ण-व्यवस्थाकी प्राथमिक अवस्था ही वहाँके समाजकी परिचालना करती है। इसीलिए भारतको कर्मक्षेत्र कहा गया है।
श्रील सच्चिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर
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श्रीगुरुदेव आश्रित को वैकुण्ठनाम प्रदान करते हैं। वे भगवान के ही अभिन्न मूर्ति और सेवक-विग्रह हैं। इसलिए उनको मनुष्य समझकर अवज्ञा नहीं करनी चाहिए, अवज्ञा करने पर महा अपराध होता है। वैकुण्ठ – शब्द से वैकुण्ठ – शब्दी भगवान का भेद नहीं है। जो नाम, वही कृष्ण हैं-नाम और नामी अभिन्न हैं । वैकुण्ठनाम इस जगत की वस्तु नहीं हैं। वैकुण्ठनाम दृश्य वस्तु नहीं हैं, वे स्वयं द्रष्टा हैं ।
श्रीलप्रभुपाद
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प्राकृत – जड़ता प्रबल रहने से तथा दम्भ और मत्सरता के रूप में प्रकट होने पर वैष्णव-पूजन सम्भव नहीं होता। अप्रकटित वैष्णवों की पूजा कभी-कभी तो दाम्भिक लोग भी कर लेते हैं, किन्तु मनुष्य रूपधारी प्रकट वैष्णवों अथवा भगवत्पार्षदों की पूजा मत्सरता के कारण उनके लिए करनी सम्भव नहीं होती। कर्मजड़ स्मार्तगण मन्त्रों के द्वारा श्रीविष्णु का पूजन या श्रीशालग्रामादि का अर्चन करते हैं, किन्तु जब श्रीविष्णु, जीवों पर साक्षात् रूप से कृपा करने के लिये बाहर में मनुष्य रूप धारण कर जगत में अवतीर्ण होते हैं तो एकमात्र निष्किंचन भक्तों के इलावा महा-महापण्डितगण भी उनकी साक्षात् सेवा-पूजा से वन्चित होते हैं। मायिक जड़ता या जड़ प्रतिष्ठा की आकांक्षा ही इस भाव से वन्चित होने का कारण है।
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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श्रीहरि के प्रति शुद्ध-भक्ति ही सनातन धर्म का प्राण श्रीहरि के प्रति भक्ति पालन करना ही जीव का धर्म है। वही सनातन धर्म है। किन्तु इस भक्ति का अभ्यास अकैतव अर्थात् निष्कपट होना चाहिए। भोग की अभिलाषा, मोक्ष की अभिलाषा, सिद्धि की अभिलाषा आदि सब छल है; इसलिए छल-रहित होकर भक्ति, ज्ञान और कर्म के अनुशीलन के साथ मिश्रित न करके केवल कृष्ण के प्रीति-विधान के लिए ही जो भक्ति का अनुष्ठान किया जाता है, वही है परमधर्म या श्रेष्ठधर्म – यही है सनातन धर्म। इस प्रकार की भक्ति के द्वारा ही भगवान् को प्राप्त किया जा सकता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। जैसे श्रुति-प्रमाण-
“भक्त्तिरेवैनं नयति भक्तिरेवैनं दर्शयति भक्तिवशः पुरुषो भक्तिरेव भूयसी ।”
अर्थात् भक्ति ही भक्त को भगवान् के धाम में ले जाकर भगवद्दर्शन कराती है और भक्ति के द्वारा ही भगवान् का प्रेम मिलता है। भगवान् केवल भक्ति के ही वशीभूत होते हैं। इसलिए साधारण भाषा में कह सकते हैं कि, भगवान् की प्रीति के लिए जो कुछ किया जाता है, उसे ही ‘भक्ति’ की संज्ञा दी जाती है। और भगवान् यदि संतुष्ट होते हैं तो भक्त को भी अशेष आनन्द प्राप्त होता है। अतएव भगवत् सेवा-रूप सनातन धर्म या वैष्णव धर्म का पालन करने से ही परमानन्द प्राप्त होता है।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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साक्षात् दर्शन के अभाव में ध्यान ही एकमात्र उपाय
श्रवण, कीर्तन, स्मरण हमारे लिए पूर्ण रूप से अनुष्ठित होना चाहिए। साक्षात् दर्शन की अपेक्षा श्रीगुरु भगवान् की अप्राकृत गुणावली का स्मरण करना ही उनके रूप का ध्यान है। साक्षात् दर्शन न हो पाने पर ध्यान ही हमें वास्तविक दर्शन में सहायता करता है। तुम ब्रज-गोपियों की तरह श्रीभगवान् के अप्राकृत श्रीनामरूप-गुण-लीला आदि के स्मरण द्वारा उनके साक्षात् दर्शन कर सकती हो। वे अखिल जीवात्माओं के अन्तर्यामी परमात्मा हैं। वे ही परम प्रेमास्पद अखिल रसामृतमूर्ति हैं। साधक-साधिका अपने अधिकार अनुसार दास्य-सख्य-वात्सल्य-मधुर आदि प्रेम के द्वारा उस अप्राकृत रसिकशेखर श्रीगोपीनाथ की आराधना कर धन्य होते हैं।
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हमारे लिए क्या करणीय है और क्या अकरणीय, इसको भली भांति समझने के लिए मापदंड स्वयं वेद व्यास मुनि ने पद्म पुराण में दिया है—“हमें सदैव श्रीकृष्ण का स्मरण करना है व उन्हें कभी भूलना नहीं है।” निरन्तर श्रीकृष्ण स्मरण उपयोगी भक्ति अंगों के पालन के विषय में व श्रीकृष्ण विस्मृति कारक कर्मों के निषेध के विषय में शास्त्रों में बताया गया है। इन शास्त्र-विधान के अतिरिक्त यदि कोई क्रिया कृष्ण का स्मरण कराए तो वह स्वीकार्य व श्रीकृष्ण का विस्मरण कराए तो वह परित्यज्य है।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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