श्रीमद् भागवतम् महत्वपूर्ण श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक

(सूत गोस्वामी नैमिषारण्य ऋषि)
तदा रजस्तमोभावाः कामलोभादयश्च ये।
चेत एतैरनाविद्धं स्थितं सत्त्वे प्रसीदति ।।१९।।
(श्रीमद्भगवतं 1/2/19)
तदा = उस समय; रजः = रजोगुण; तमः तमो गुण; भावाः परिस्थितिः काम = विषय भोग; लोभ लालसा; आदयः आदि आदि; च तथा; ये जो भी हैं; चेतः = मन; एतैः = इनसे; अनाविद्धम् प्रभावित हुए बिना; स्थितम्-स्थित होकर; सत्त्वे सतोगुण में; प्रसीदति परम प्रसन्न होता है।
अनुवाद – ज्योंही हृदय में नैष्ठिक प्रेमा भक्ति स्थापित हो जाती है, प्रकृति के रजो तथा तमो गुणों के प्रभाव, यथा काम, इच्छा तथा लोभ, हृदय से लुप्त हो जाते हैं। तब भक्त सतोगुण में स्थित होकर परम सुखी हो जाता है।
तात्पर्य – अपनी सामान्य स्वाभाविक स्थिति में जीव आध्यात्मिक आनन्द में पूर्णतः तुष्ट रहता है। यह स्थिति ब्रह्मभूत या आत्मानन्दी या आत्मतुष्टि कहलाती है। यह आत्मतुष्टि किसी निष्क्रिय मूर्ख की तुष्टि जैसी नहीं होती। निष्क्रिय मूर्ख अज्ञानावस्था में रहता है, किन्तु आत्मतुष्ट आत्मानन्दी इस भौतिक जगत से परे होता है। यह सिद्धि की अवस्था नैष्ठिक भक्ति में स्थित होते ही प्राप्त होती है। भक्ति कोई निष्क्रियता नहीं, अपितु आत्मा की अनन्य सक्रियता है।
आत्मा की यह सक्रियता पदार्थ के संसर्ग से अपमिश्रित (दूषित) हो जाती है। फलतः काम, इच्छा, लोभ, निष्क्रियता, मूर्खता तथा निद्रा के रूप में रुग्ण कार्यकलापों का उदय होता है। भक्ति का प्रभाव रजो तथा तमोगुणों के इन प्रभावों के पूर्ण निराकरण द्वारा प्रकट होता है। तब भक्त तुरन्त ही सतोगुण में स्थित हो जाता है और वह उन्नति करता हुआ वासुदेव के पद या शुद्ध-सत्त्व के पद को प्राप्त होता है। केवल इसी शुद्ध-सत्त्व अवस्था में कोई व्यक्ति भगवान् के शुद्ध प्रेम के कारण अपने समक्ष कृष्ण को सदा देख सकता है।
भक्त सदैव शुद्ध-सत्त्व में रहता है अतः वह किसी को हानि नहीं पहुँचाता। किन्तु एक अभक्त, चाहे कितना ही शिक्षित क्यों न हो, सदैव हानिप्रद होता है। भक्त न तो मूर्ख होता है न कामी। हानि पहुँचाने वाले, मूर्ख तथा कामी व्यक्ति भगवद्भक्त नहीं हो सकते, भले ही वे अपने बाहरी पहनावे से अपने आपको भक्त क्यों न विज्ञापित करें। भक्त में सदैव ईश्वर के सद्गुण पाये जाते हैं। इन गुणों की मात्रा भले ही भिन्न हो, किन्तु गुणवत्ता की दृष्टि से भक्त तथा भगवान् एक होते हैं।
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जलजानवलक्षाणि स्थावरा लक्ष विंशति ।
कृमयो रूद्र संख्या काः पक्षिणां दश लक्षणम् ।
त्रिंशल्लक्षाणि पशवः चतुर्लक्षाणि मानुषाः ।।
जल में रहनेवाली योनियाँ ९ लाख हैं। स्थावरों (वृक्षों) की संख्या २० लाख हैं। कीडों तथा सरीसृपों की योनियाँ ११ लाख हैं और पक्षियों की १० लाख। चौपायों की योनीयाँ ३० लाख हैं तथा मनुष्यो की ४ लाख हैं।
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श्रीचैतन्य महाप्रभु

महाप्रभु जी का सन्यास ग्रहण का संकल्प
एक दिन महाप्रभु जी कृष्ण लीला रस में मग्न गोपी भाव में विभावित होकर प्रेम में गोपी पक्ष का अवलम्बन करके “गोपी-गोपी” उच्चारण कर रहे थे कि उसी समय एक कर्मजड़ स्मार्त विद्यार्थी आया और कृष्ण प्रेम रस भाव न समझने के कारण महाप्रभु जी के इस प्रकार आचरण की निन्दा करने लगा और कहने लगा आप “गोपी गोपी” न बोलकर ” कृष्ण – कृष्ण” बोलिये। कृष्ण प्रेम में डूबे महाप्रभु जी उसी भाव में छात्र को कृष्ण पक्ष का व्यक्ति देखने लगे और उसी भाव में भावित होकर हाथ में डंडा लेकर उसे मारने के लिए दौड़े। वह विद्यार्थी डर के मारे भागता हुआ अपने अन्य साथियों से जा मिला और महाप्रभु जी के उक्त आचरण के बारे में कहने लगा। इस घटना को सुनकर वे क्षुब्ध हो उठे और श्रीगौरसुन्दर पर प्रहार करने के लिए षड्यन्त्र रचने लगे। श्रीमन् महाप्रभु जी की निन्दा करने से सबकी बुद्धि नष्ट हो गयी, वे पढ़ा-लिखा सब भूल गये परन्तु घमण्डी होने के कारण वे महाप्रभु जी की निन्दा करने से रुके नहीं । तब अन्तर्यामी भगवान एक पहेली के माध्यम् से अपने पार्षदों को अपने सन्यास की बात प्रकट करते हुए कहने लगे –
करिल पिप्पलिखण्ड कफ निवारिते ।
उलटिया आरो कफ बाड़िल देहेते ।।
(चै० भा० म० 26/121)
(कफ दूर करने के लिए पिप्पली खंड बनाया था, पर इससे कफ तो देह में उल्टा बढ़ गया है) अर्थात् महाप्रभु जी कहने लगे के कहाँ तो मैं जगत् उद्धार के लिए पृथ्वी पर अवतीर्ण हुआ लेकिन ये लोग तो उल्टा अपराध ही कर रहे हैं इसलिए मैं अवश्य ही सन्यास लूँगा । मेरे सन्यास लेने से ये मुझे सन्यासी बुद्धि से प्रणाम करेंगे और पापों – अपराधों से मुक्त हो जाएँगे । तत्पश्चात् इनके निर्मल चित में प्रेम भक्ति का उदय कराऊँगा तभी इन पाखण्डियों का उद्धार होगा अन्यथा और कोई उपाय नहीं है।
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भक्तापाय – भुजंग – गारुड़मणि – स्त्रैलोक्य – रक्षामणि –
र्गोपीलोचन – चातकाम्बुदमणिः सौन्दर्यमुद्रामणिः ।
यः कान्तामणि – रुक्मिणी – धनकुचद्वन्द्वैक- भूषामणिः
श्रेयो देवशिरवामणि – र्दिशतु नो गोपालचूड़ामणिः ।।37।।
जो भक्तों के पापरूपी साँप का विनाश करने के लिये गरुड़मन्त्र की तरह श्रेष्ठ औषधि हैं, त्रिभुवन की रक्षामणि हैं, गोपियों के नेत्र रूपी चातकों के लिये श्रेष्ठ जलबिन्दु हैं, सुन्दरता की जो सर्वश्रेष्ठ मुद्रा हैं; तमाम पत्नियों में सर्वश्रेष्ठ रुक्मिणीदेवी के जो उरोजभूषण स्वरूप हैं, ऐसे हे देवश्रेष्ठ गोपालचूड़ामणि श्रीकृष्ण! आप मेरा कल्याण विधान कीजिये।
श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्
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स्वरूपगत और सम्बन्धगत पुण्य
हम यहाँ पुण्य और पापका संक्षेपमें विवेचन करेंगे। उनको वैज्ञानिक रूपमें विभाजित करना अत्यन्त कठिन है। कुछ ऋषियोंने पाप-पुण्यको शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक-इन चार भागोंमें विभक्त किया है। किसी-किसीने उनको कायिक, वाचिक और मानसिक-इन तीन भागोंमें विभक्त किया है। किसी-किसीने कायिक, ऐन्द्रियिक और अन्तःकरणिक-इन तीन भागोंमें बाँटा है। फलस्वरूप हम यह देख पाते हैं कि ये विभाग सर्वाङ्गसुन्दर नहीं हो पाए हैं। हम लोग पहले पुण्यको दो भागोंमें विभक्त करते हैं-स्वरूपगत पुण्य और सम्बन्धगत पुण्य। न्याय, दया, सत्य, पवित्रता, मैत्री, सरलता और प्रीति-ये स्वरूपगत पुण्य हैं। इनको स्वरूपगत पुण्य कहनेका कारण है कि ये पुण्यसमूह जीवके स्वरूपका आश्रयकर सदैव उनके अलङ्कारके रूपमें विराजमान रहते हैं। परन्तु बद्धावस्थामें कुछ स्थूल होकर ये पुण्य नाम धारणमात्र कर लेते हैं। इनके अतिरिक्त दूसरे सभी पुण्य सम्बन्धगत हैं; क्योंकि वे जीवके जड़ सम्बन्धजन्य उत्पन्न हुए हैं। सिद्धावस्थामें उनकी कोई आवश्यकता नहीं होती। पाप कदापि जीवका स्वरूपगत तत्त्व नहीं है। बल्कि वह बद्धावस्थामें जीवको आश्रय करता है। जो पापसमूह स्वरूपगत पुण्यके विरोधी होते हैं, उन्हें स्वरूप-विरोधी पाप कहते हैं। द्वेष, अन्याय, मिथ्या, चित्त-विभ्रम, निष्ठुरता, क्रूरता, लाम्पट्य-ये कतिपय पापसमूह स्वरूप-विरोधी पाप हैं। दूसरे समस्त पाप जीवके साम्बन्धिक पुण्य-विरोधी हैं। हम संक्षेपमें पाप-पुण्यका दिग्दर्शन प्रस्तुत कर रहे हैं। पाठकगण इन संकेतोंसे कुछ परिश्रमकर अनायास ही उनका विस्तृत विचार समझ सकते हैं।
प्रधान-प्रधान पुण्यकर्म दस प्रकारके हैं- (१) परोपकार, (२) गुरुजनोंकी सेवा, (३) दान, (४) आतिथ्य, (५) पवित्रता, (६) महोत्सव, (७) व्रत, (८) पशुपालन, (९) जगत वृद्धिके कार्य, और (१०) न्यायाचरण।
श्रील सच्चिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर
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वैष्णव कृष्ण के आश्रित हैं- कृष्ण के सेवक हैं । उनके हृदय में भगवान के सेवक अभिमान के अतिरिक्त अन्य कोई अभिमान नहीं होता । वे अकिञ्चन होते हैं, इस जगत की कोई भी वस्तु नहीं चाहते । इस जगत की कोई भी वस्तु उन्हें लुब्ध नहीं कर सकती। इस जगत या परजगत में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जो कृष्ण के चरणकमलों के नखचन्द्र से अधिक लोभनीय हो । जब तक हम भगवान की सेवा के प्रति लुब्ध नहीं होते, तब तक समझना होगा कि मोहिनी माया ने बहुत से रूपों में हमें ग्रास कर रखा है, हम पर आक्रमण किया है ।
श्रीलप्रभुपाद
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जीव अपने कर्मफल से भले ही अनित्य परिवेश में पड़ जाये, परन्तु उसका स्वरूपज्ञान जागृत रहने से वह अनित्य परिवेश में वास करते हुए भी अथवा अनित्य पदार्थों का व्यवहार करते हुए भी उनमें कभी भी आसक्त नहीं होता। अनासक्तभाव से ही जागतिक कर्त्तव्यों को पूरा करने में समर्थ होता है। ज़रुरत पड़ने पर विषयों या भोगों को स्वीकार करके भी वह उनमें आसक्त, मोहित या उनके वशीभूत नहीं होता है। त्रिगुणात्मक जगत् में रहने पर भी अपने निर्गुण स्वरूप का स्मरण होने के कारण निर्गुणधाम के प्रति ही उसकी प्रगति होती रहती है। आसक्ति ही जीव के बन्धन और मुक्ति का कारण है। गुणमय विषयों में आसक्ति ही बन्धन का कारण तथा निर्गुण श्रीहरि तथा उनके धाम व उनके परिकर आदि में आसक्ति ही मुक्ति और परम सुख का कारण होती है।
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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श्रीराधाकृष्ण की युगल उपासना ही सनातन धर्म
श्रीश्रीराधाकृष्ण की युगल उपासना ही सनातन धर्म या वैष्णव धर्म है। इस धर्म का उपास्य, उपासना और उपासक नित्य वस्तु है। श्रीश्रीराधाकृष्ण के नाम-रूप-गुण-लीला का कीर्तन करना और उनकी प्रीति के साथ सेवा
करना ही सनातन धर्म या वैष्णव धर्म की मूल प्रतिपाद्य (लक्षित) वस्तु है। जिस धर्म में इस प्रतिपाद्य वस्तु का अभाव देखा जाता है या यह अभाव रहने पर भी उसकी नित्यता स्वीकार नहीं की जाती है, उसे कुधर्म समझना होगा। वेद, वेदान्त, उपनिषद्, महाभारत, इतिहास, पुराण इत्यादि विषय वस्तु ही सनातन धर्म की विषय वस्तु हैं। इसीलिए सनातन धर्म ही एकमात्र शास्त्रीय धर्म है – यही धर्म हमारे लिए एकमात्र ग्रहणीय और पालन करने योग्य है। जो धर्म जितना सनातन धर्म या वैष्णव धर्म का अनुगत होगा, वह उतना ही हमारे लिए ग्रहणयोग्य हो सकता है महाजनों ने यही बात कही है। स्वयं भगवान् अवतारी पुरुष श्रीचैतन्य महाप्रभु ने श्रीधाम मायापुर में आविर्भूत होकर जिस प्रेम धर्म का प्रचार किया था, वह सनातन धर्म की पराकाष्ठा (चरम सीमा) है। अतः वह विमल प्रेम धर्म ही विशुद्ध सनातन धर्म है। श्रीश्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने उसी प्रेम धर्म का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार दिया है-
“आराध्यो भगवान् ब्रजेशतनयस्तद्धाम वृन्दावनं रम्या काचिदुपासना ब्रजवधुवर्गेण या कल्पिता ।
श्रीमद्भागवतं प्रमाणममलं प्रेमा पुमर्थो महान् श्रीचैतन्य महाप्रभोर्मतमिदं तत्रादरो नः परः।।”
स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण, जिन्होंने ब्रजराज श्रीनन्द महाराज को पिता के रूप में स्वीकार किया था और उनकी लीलास्थली वृन्दावन-धाम हमारी आराध्य वस्तु हैं; ब्रज की गोपियों ने जिस प्रकार से श्रीराधाकृष्ण की सेवा-परिचर्या की थी, वही हमारी आराधना अर्थात् अभिधेय है। श्रीकृष्ण-प्रेम ही परम पुरुषार्थ है अर्थात् प्रयोजन है। अमलपुराण श्रीमद्भागवत ही सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजन-ज्ञान का प्रमाण है। यही श्रीचैतन्य महाप्रभु का मत है और यही एकमात्र हमारी प्रीति की वस्तु है।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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श्रीब्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्णचन्द्र ही सर्वाराध्य तत्त्व हैं। उनकी आराधना से ही जीव को सब प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। यह तत्त्व समझकर ही श्रीमद्भागवत की चर्चा करनी चाहिए।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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वास्तव में इस जगत में एक शुद्ध-भक्त का मिलना अत्यंत कठिन है, अत्यंत कठिन!
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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