श्रीमद् भागवतम् महत्वपूर्ण श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक

(सूत गोस्वामी नैमिषारण्य ऋषि)
शुश्रूषोः श्रद्दधानस्य वासुदेवकथारुचिः ।
स्यान्महत्सेवया विप्राः पुण्यतीर्थनिषेवणात् ।।16।।
(1/2/16)
शुश्रूषोः = श्रवण में व्यस्त; श्रद्दधानस्य श्रद्धापूर्वक; वासुदेव वासुदेव की; कथा संदेश, कथा में; रुचिः लगाव; स्यात् सम्भव बन जाता है; महत्-सेवया = शुद्ध भक्तों की सेवा करके; विप्राः हे द्विजगण; पुण्य-तीर्थ समस्त पापों से शुद्ध हुओं की; निषेवणात् सेवा से।
अनुवाद – हे द्विजो ! जो भक्त समस्त पापों से पूर्णतया मुक्त हैं, उनकी सेवा करने से महत् सेवा हो जाती है। ऐसी सेवा से वासुदेव की कथा सुनने के प्रति लगाव उत्पन्न होता है।
तात्पर्य – जीव के बद्ध जीवन का कारण भगवान् के विरुद्ध विद्रोह है। कुछ व्यक्ति ऐसे हैं जो देव कहलाते हैं और कुछ ऐसे हैं जो असुर कहलाते हैं, क्योंकि ये परमेश्वर की सत्ता के विरुद्ध रहते हैं। भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय में असुरों का विशद वर्णन किया गया है जिसमें कहा गया है कि उन्हें जन्म-जन्मान्तर अज्ञान की निम्नतर अवस्थाओं में रखा जाता है। अतः उन्हें पशु योनियों में रहना होता है जिससे उन्हें परमसत्य भगवान् की कोई सूचना नहीं रहती। ये असुर भगवान् की इच्छानुसार उनके मुक्त सेवकों की कृपा से विभिन्न देशों में धीरे-धीरे ईश्वर-चेतना में परिशोधित किये जाते हैं। ईश्वर के ऐसे भक्त भगवान् के अभिन्न पार्षद होते हैं और जब वे समाज को ईश्वरविहीन होने के खतरे से बचाने के लिए आते हैं, तो वे ईश्वर के शक्तिशाली अवतार, उनके पुत्र, उनके दास या उनके पार्षद कहलाते हैं। किन्तु इनमें से कोई भी मिथ्या तौर पर अपने को ईश्वर नहीं कहता। यह तो असुरों द्वारा घोषित निन्दा है और ऐसे असुरों के दानवी अनुयायी भी इन बहुरूपियों को ईश्वर या उनका अवतार मान लेते हैं। शास्त्रों में भगवान् के अवतार के विषय में निश्चित सूचना प्राप्त है। जब तक शास्त्रों से पुष्टि न हो ले, तब तक किसी को ईश्वर या ईश्वर का अवतार नहीं मानना चाहिए।
वास्तव में जो भक्त भगवद्धाम जाने के इच्छुक हैं, उन्हें चाहिए कि भगवान् के दासों को भगवान् के रूप में मानें। भगवान् के ऐसे दास महात्मा या तीर्थ कहलाते हैं और वे देश-काल के अनुसार उपदेश देते हैं। वे लोगों को भगवद्भक्त बनने के लिए प्रेरित करते हैं। वे कभी यह सहन नहीं कर सकते कि कोई उन्हें ईश्वर कहे। यद्यपि श्रीचैतन्य महाप्रभु शास्त्रों के लक्षण द्वारा साक्षात् भगवान् थे, किन्तु वे भक्त की तरह बने रहे। जो लोग उन्हें ईश्वर रूप में जानते थे वे उन्हें ईश्वर कहकर पुकारते थे, किन्तु तब वे अपने कानों को हाथों से बन्द करके भगवान् विष्णु के नाम का कीर्तन करने लगते थे। वे स्वयं को ईश्वर कहवाने का घोर विरोध करते थे, यद्यपि वे निस्संदेह साक्षात् भगवान् थे। हमें उन धूर्तों से आगाह करने के लिये भगवान् ऐसा आचरण करते हैं जो अपने को ईश्वर कहलवाते हैं।
ईश्वर के दास ईश्वर चेतना के प्रसार करने के लिए आते हैं। बुद्धिमान लोगों को चाहिए कि वे उनके साथ सब तरह से सहयोग करें। भगवान् अपनी सीधी सेवा की अपेक्षा अपने दास की सेवा किये जाने से अधिक प्रसन्न होते हैं। वे तब अत्यधिक प्रसन्न होते हैं जब वे यह देखते हैं कि उनके भक्तों का समुचित आदर हो रहा है, क्योंकि वे भगवान् की सेवा के लिए सभी प्रकार के कष्ट उठाते हैं, अतः वे उन्हें अत्यन्त प्रिय हैं। भगवद्गीता में (१८.६९) भगवान् घोषित करते हैं कि उन्हें उस भक्त के समान अन्य कोई प्रिय नहीं है जो उनकी महिमा का प्रचार करते हुए अपना सर्वस्व संकट में डालता है। भगवान् के सेवकों की सेवा करके धीरे-धीरे कोई भी उन सेवकों के गुणों को प्राप्त करता है और इस प्रकार वह भगवान् की महिमा सुनने के योग्य बन जाता है। भगवद्धाम में प्रवेश पाने के लिए भक्त की पहली योग्यता यह है कि वह भगवान् के विषय में सुनने को उत्सुक हो।
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श्री चैतन्य चरितामृत

आदि लील १.५
(श्रील स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने कहा)
राधाकृष्ण प्रणय विकृतिह्णदिनी शक्तिरस्मा-
देकात्मानावपि भुवि पुरा देह भेदं गतौ तौ ।
चैतन्याख्यं प्रकटमधुना तद्वयं चैक्यमाप्तः
राधाभावद्युति सुवलितं नौमि कृष्णस्वरूपम् ।।
श्री राधा तथा कृष्ण के प्रेम-व्यापार भगवान् की ह्लादिनी शाक्ति की दिव्य अनुभूतियाँ हैं। यद्यपि राधा तथा कृष्ण अभिन्न हैं, किन्तु उन्होने अपने को अनादि काल से पृथकै कर रखा है। अब ये दोनों दिव्य स्वरूप फिर से श्रीकृष्ण चैतन्य के रूप में मिलकर एक हो गये हैं। मैं उनको नमस्कार करता हूँ जो साक्षात् कृष्ण होते हुए श्रीमती राधारानी के भाव तथा स्वरूप में प्रकट हुए हैं।
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श्रीचैतन्य महाप्रभु

बोलता हुआ मृतक बालक
एक रात महाप्रभु श्रीवास आँगन में संकीर्तन कर रहे थे। उसी समय श्रीवास पँडित का लड़का परलोक को प्राप्त हुआ । तो श्रीवास ने नारीगणों को चेतावनी दी “देखो ! अभी स्वयं भगवान् भक्त रूप में हमारे घर में कीर्तन कर रहे हैं। यदि किसी ने भी रो-चिल्लाकर प्रभु संकीर्तन में विघ्न डाली तो मैं अभी गंगा में जाकर आत्महत्या कर लूँगा'”। भय से कोई नहीं रोया। लेकिन कुछ समय पश्चात् सर्व अन्तर्यामी प्रभु बोल उठे – “श्रीवास ! मुझे नृत्य में आनन्द नहीं आ रहा है क्या कुछ अशुभ हुआ है?” श्रीवास ने सब घटना बताई तो प्रभु ने कहा- “तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया” – इतना कह कर प्रभु मृत्त पुत्र के पास गये और उससे कहने लगे ओहे बालक ! “तुम श्रीवास को छोड़ कर क्यों जा रहे हो?” अचानक मृतक बालक जी उठा और बोला – “आपने जो मर्यादा बाँध रखी है उसे कौन तोड़ सकता है? जितने दिन इस शरीर से मेरा सम्बन्ध था, उतने दिन मैंने उसे भोगा। इसके भोग समाप्त होने पर अब मैं दूसरे शरीर में जा रहा हूँ। कौन किस का पुत्र है? कौन किस का पिता है? सब अपना कर्मफल भोग करने आते हैं और भोग कर के चले जाते हैं। हे प्रभु! आपको आपके पार्षदों सहित मेरा प्रणाम” । इतना कह कर उस बालक ने विदा माँगी और उसका शरीर फिर चेतना रहित हो गया । सब भक्तगण इस लीला को देख विस्मित रह गये। सबके चित्त का शोक दूर हो गया। महाप्रभु जी ने श्रीवास के प्रति असीम कृपा प्रकाशित करते हुए कहा – “श्रीवास ! मुझे और नित्यानन्द प्रभु को तुम अपने ही पुत्र जानो।” श्रीवास प्रेमातुर हो उठे और प्रभु के चरण पकड़ कर कहने लगे – “प्रभु गौरांगदेव ! आप ही मेरे जन्म जन्म के पिता, माता, पुत्र एवं स्वामी हो, बस आपके चरणों में मेरी भक्ति बनी रहे, यही प्रार्थना है।
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तत्त्वं भुवाणानि परं परस्तान्मधु क्षरन्तीव मुदावहानि ।
प्रावर्त्तय प्रान्जलिरस्मि जिल्हे, नामानि नारायण-गोचराणि ।।33।।
हे मेरी जिहे! मैं दोनों हाथ जोड़कर तुमसे ये अनुनय कर रहा हूँ कि जो परात्पर तत्त्व हैं और बूंद-बूंदकर रिसने वाले शहद की भाँति नित्य आनन्दप्रद हैं, उन्हीं नारायण सम्बन्धी नामों को तू बारम्बार उच्चारण करती रह।
श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्
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युक्तवैराग्य
स्वच्छन्दरूपमें जीविका निर्वाह करनेके लिए घरमें स्त्री-पुत्रके साथ अनासक्त होकर विषयोंको स्वीकार करते हुए आन्तरिक निष्ठाके साथ भजन करनेसे धीरे-धीरे प्रपञ्च दूर हो जाता है, उस समय आत्मा भक्तिके बलसे बलवान होकर भगवत्-सम्बन्धमें स्थित हो जाती है।
यदि इस क्रम-पथको छोड़कर कोई अकस्मात् मर्कटवैराग्यका अवलम्बनकर वैरागी बन जाए, तो उसकी उन्नति कदापि नहीं होती, बल्कि वह धीरे-धीरे परमार्थके पथसे सदाके लिए दूर हो जाता है। “यथायोग्य विषयको स्वीकार करो” इस आज्ञाका तात्पर्य यह है कि इन्द्रिय-प्रीतिके लिए विषयोंको ग्रहण नहीं करना चाहिए, बल्कि कृष्णके साथ आत्माका सम्बन्ध स्थापन करनेके लिए जितनी आवश्यकता हो, उतनी ही मात्रामें विषयोंको ग्रहण करना चाहिए। इस प्रकार कुछ ही दिनोंमें आत्म-प्रसादरूप फलको प्रदानकर विषय स्वयं ही प्रपञ्चातीत आत्माको छोड़ देंगे। घर-बार, शरीर, पुत्र-परिवार तथा समाज आदिको कृष्णसम्बन्धी जाननेसे वे सभी युक्तवैराग्यके उपकरण हो सकते हैं। अन्तर-निष्ठा होनेसे ऐसा सहज ही सम्भव होता है। बाह्य-निष्ठा केवल लोक व्यवहारके लिए होनी चाहिए। निष्कपट रूपमें अन्तर-निष्ठा होनेपर भवबन्धन और प्रपञ्चसम्बन्ध-ये दोनों शीघ्र ही दूर हो जाते हैं। भक्ति जिस अनुपातमें शुद्धरूपमें उदित होगी, उसी अनुपातमें शुद्ध ज्ञान और शुद्ध वैराग्य भी उदित होंगे।
सरल भक्त-जीवनमें केवल कृष्णनामाश्रय ही सर्वोत्तम साधन है। श्रीमन्महाप्रभुजी सनातन गोस्वामीको इस विषयमें शिक्षा देते हैं-
भजनेर मध्ये श्रेष्ठ नवविधा भक्ति।
‘कृष्णप्रेम’, ‘कृष्ण’ दिते धरे महाशक्ति ॥
तारमध्ये सर्वश्रेष्ठ नाम संकीर्त्तन।
निरपराधे नाम लइले पाय प्रेमधन ॥”
(चै. च. अ. ४/७०-७१)
और भी कहते हैं-
कुबुद्धि छाड़िया कर श्रवण-कीर्त्तन।
अचिराते पाबे तबे कृष्णप्रेम-धन ॥
नीचजाति नहे कृष्णभजने अयोग्य।
सत्कुल विप्र नहे भजनेर योग्य ॥
जेइ भजे, सेइ बड़, अभक्त-हीन छार।
कृष्णभजने नाहि जाति-कुलादि-विचार ॥
दीनेरे अधिक दया करे भगवान् ।
कुलीन, पण्डित, धनीर बड़ अभिमान ॥
(चै. च. अ. ४/६५-६८)
भगवद्भजनके जितने अङ्ग हैं, उन सभीमें नौ अङ्ग प्रधान हैं। वे नौ अङ्ग हैं-श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन। नवधाभक्तिके नौ अङ्गोंमेंसे किसी एक अङ्गका आचरण करनेसे भी कृष्णप्रेमकी प्राप्ति हो सकती है। परन्तु उन नौ अङ्गोंमें श्रीनामका संकीर्त्तन सर्वश्रेष्ठ है। यदि निरपराध होकर हरिनामका कीर्त्तन किया जाए, तो अल्प समयमें ही श्रीनाम प्रभु कृपापूर्वक प्रेमधनको प्रदान करते हैं। अतएव कुबुद्धि अर्थात् अन्याभिलाष, ज्ञान, कर्म आदिका सर्वतोभावेन परित्यागकर शुद्ध रूपसे अर्थात् शुद्धभक्तोंके आनुगत्यमें हरिनामका श्रवण और कीर्त्तन करनेसे शीघ्र ही प्रेमधनकी प्राप्ति होती है। कृष्णभजनमें जीवमात्रका अधिकार है। उसमें छोटे-बड़े, ऊँच-नीचका कोई भी भेद नहीं होता। न नीच जातिमें उत्पन्न व्यक्ति कृष्णभजनके लिए अयोग्य है और न सत्कुलमें उत्पन्न विप्र कृष्णभजनके लिए योग्य है। बल्कि जो भजन करता है, वही श्रेष्ठ है, चाहे उसका जन्म किसी भी कुलमें क्यों न हुआ हो तथा उच्च वंशमें उत्पन्न विप्र भी यदि भजन नहीं करता, तो वह सबसे हीन और घृणित है। कुलीन, पण्डित और धनियोंको बड़ा अभिमान होता है। दीन व्यक्तियोंमें स्वाभाविक रूपमें नम्रता होती है, इसलिए उनपर भगवान् अधिक दया करते हैं।
श्रील सच्चिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर
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जिन-जिन वस्तुओं से हरिसेवा होती है, वे सब वस्तुएँ मठ में ही हैं। मठवासियों की सेवा करने पर ही श्रीनामसंकीर्तन में अधिकार प्राप्त होता है, श्रीनामभजन में रुचि बढ़ती है। किन्तु ऐसा न करके यदि हम बहिर्मुख आत्मीय स्वजनों की सेवा में ही लगे रहे, तो हरिनाम नहीं होगा ।
श्रीलप्रभुपाद
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सभी जीवों का स्वार्थ और परमार्थ श्रीकृष्ण भजन ही है। किसी भी अवस्था में या किसी भी वर्ण अथवा आश्रम में रहकर आप उपरोक्त भजन कर सकते हैं। परन्तु किसी वर्ण अथवा आश्रम में फंसकर निर्गुण श्रीहरि के सान्निध्य की प्राप्ति अथवा उनकी शुद्ध सेवा नहीं हो सकती। इससे तो पुनः पुनः जन्म-मरण में ही फंसे रहना पड़ेगा।
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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जीवात्मा के ऊपर दो आवरण सूक्ष्म और स्थूल
एक सूक्ष्म आवरण इस मन का और एक स्थूल आवरण इस शरीर का। यह स्थूल आवरण परिवर्तित हो रहा है। यह आप अपनी आँखों से देख रहे हैं। मनुष्य मर जाता है, तो उसे जला देते हैं। 50/60/100 साल के भीतर मर रहे हैं। किन्तु मन का जो सूक्ष्म आवरण है, उसके बारे में हम सोच समझ सकते हैं, विचार करके समझ सकते हैं। किन्तु उसके परे की वस्तु आत्मा; पाश्चात्य दर्शन इसे स्वीकार नहीं कर पाया। उनके दिमाग में यह आया ही नहीं।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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कौन-कौन से ग्रन्थ विशेष रूप से अध्ययन करने के योग्य
अपने से श्रेष्ठ वैष्णवों की सेवा और संग के द्वारा ही साधनपथ में असीम कल्याण लाभ होता है। इस संबंध में नीतिशास्त्र का श्लोक “हीयते हि मतिस्तातः हीनैः सह समागमात्। समैश्च समतामेति विशिष्टैश्च विशिष्टताम् ।।” (मति, हीन व्यक्तियों के संग से हीन हो जाती है, समभाव वाले व्यक्तियों के संग से समभावापन्न होती है और विशिष्ट व्यक्तियों के संग से विशेष गुण युक्त हो जाती है) यह स्मरणीय है। भजन पथ पर अग्रसर होने के लिए “साधनपथ” अर्थात् श्रीशिक्षाष्टक, श्रीकृष्णनामाष्टक, श्रीउपदेशामृत, श्रीमनःशिक्षा, श्रीहरिनाम-चिन्तामणि, स्वनियम-द्वादशकम्, श्रीमन्महाप्रभु की शिक्षा, दशमूल-निर्यास, श्रीजैवधर्म, श्रीचैतन्यचरितामृत, श्रीमद्भगवद्गीता (श्रीबलदेव व चक्रवर्ती-टीका), श्रीमद्भागवत (चक्रवर्ती टीका व श्रीधरस्वामी टीका), षट्संदर्भ, भक्ति रसामृतसिन्धु व अन्यान्य प्रामाणिक व्याख्याओं सहित ग्रंथों की चर्चा करना आवश्यक है। साक्षात् साधुसंग का अभाव होने पर शास्त्रीय साधुसंग का उपदेश, साधु-शास्त्र-गुरुवर्ग की वाणी में देखता हूँ। साधन-अवस्था में भक्ति के प्रतिकूल विषयों का वर्जन और सेवा के अनुकूल परिवेश को अवश्य ही ग्रहण करना चाहिए। दूसरों की दोष त्रुटियाँ ढूँढ़ने की अपेक्षा अपनी दोषत्रुटियों की समीक्षा करना आत्म-कल्याणकर है। इससे लाभपूजा-प्रतिष्ठा की आशा दूर होती है और मानसिक शान्ति लाभ होती है।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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इस समय आप अनन्य भाव से दृढ़ निष्ठा के साथ भजन करते रहें। श्रीकृष्ण अंतर्यामी रूप से आपका मार्गदर्शन करेंगे व आपको सुपथ पर अग्रसर करेंगे।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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