श्रीमद् भागवतम् महत्वपूर्ण श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक

(सूत गोस्वामी नैमिषारण्य ऋषि)
यदनुध्यासिना युक्ताः कर्मग्रन्थिनिबन्धनम् ।
छिन्दन्ति कोविदास्तस्य को न कुर्यात्कथारतिम् ।।15।।
(श्रीमद्भगवतं 1/2/15)

यत्-जो; अनुध्या स्मृति रूपी; असिना तलवार से; युक्ताः युक्त, समन्वितः कर्म कर्म की; ग्रन्थि गाँठ; निबन्धनम् बंधी हुई; छिन्दन्ति काटते हैं; कोविदाः = बुद्धिमान; तस्य उसका; कः कौन; नः नहीं; कुर्यात्करेंगे; कथा सन्देश, कथाएँ; रतिम् ध्यान ।

अनुवाद – हाथ में तलवार लिए बुद्धिमान मनुष्य भगवान् का स्मरण करते हुए कर्म की बंधी हुई ग्रंथि को काट देते हैं। अतएव ऐसा कौन होगा जो उनके सन्देश की ओर ध्यान नहीं देगा ?

तात्पर्य – भौतिक तत्वों के सम्पर्क में आने से आध्यात्मिक स्फुलिंग एक ग्रंथि उत्पन्न कर देती है। अतः जो कर्म के घात-प्रतिघात से मुक्त होने का इच्छुक होता है, उसे इस ग्रंथि को काटना होता है। मुक्ति का अर्थ है कर्म के चक्र से छूटना। जो व्यक्ति निरन्तर भगवान् की दिव्य लीलाओं का स्मरण करता है उसे स्वतः मुक्ति मिल जाती है। इसका कारण यह है कि भगवान् की सारी लीलाएँ भौतिक शक्ति के गुणों से परे होती हैं। ये दिव्य लीलाएँ परम आकर्षक होती हैं, अतः इनके निरन्तर सान्निध्य से बद्धजीव क्रमशः आध्यात्मिक बनता जाता है और अन्ततः उसकी भवबन्धन की ग्रन्थि कट जाती है।

अतएव भवबन्धन से मुक्ति मिलना भक्ति का गौण फल है। केवल आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति से ही मुक्ति निश्चित नहीं होती। ऐसे ज्ञान के ऊपर भक्ति का लेप चढ़ाना होता है जिससे अन्ततः भक्ति ही प्रधान रहे। तभी मुक्ति सम्भव होती है। यहाँ तक कि सकाम कर्मियों के कर्म, यदि वे भक्ति से लेपित हों, तो मुक्ति दिला देते हैं। भक्ति से लेपित कर्म कर्मयोग कहलाता है। इसी प्रकार भक्ति से लेपित अनुभव-गम्य ज्ञान ज्ञानयोग है। किन्तु शुद्ध भक्तियोग ऐसे कर्म तथा ज्ञान से स्वतन्त्र है, क्योंकि यह अकेले, न केवल बद्धजीवन से मोक्ष दिलाने वाला है, अपितु भगवान् की प्रेमाभक्ति भी प्रदान करने वाला है।

अतएव किसी भी ऐसे विवेकशील व्यक्ति को जो अल्पज्ञ मध्यम पुरुष से ऊपर है श्रवण, कीर्तन, स्मरण तथा पूजन द्वारा भगवान् को निरन्तर स्मरण करना चाहिए। भक्ति की यही सम्यक् विधि है। वृन्दावन के गोस्वामी, जिन्हें श्रीचैतन्य महाप्रभु ने भक्ति सम्प्रदाय का उपदेश देने के लिए अधिकृत किया था, इस नियम का दृढ़ता से पालन करते रहे और उन्होंने हमारे लाभ के लिए दिव्य विज्ञान का प्रभूत साहित्य तैयार किया। उन्होंने विभिन्न वर्णों तथा आश्रमों के लोगों के लिए श्रीमद्भागवत तथा ऐसे ही अन्य प्रामाणिक शास्त्रों के आधार पर विविध मार्ग बनाये हैं।

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श्री चैतन्य चरितामृत
(आदि लीला १.४)

अनर्पित चरीं चिरात् करुणयावतीर्णः कलौ समर्पयितुमुन्नतोज्ज्वलरसां स्वभक्तिश्रियम् ।
हरिः पुरद सुन्दर द्युतिकदम्बसन्दी पितः सदा हृदयकन्दरे स्फुरतु वः शचीनन्दनः ।।

श्रीमती शचीदेवी के पुत्र के नाम से विख्यात् वे महाप्रभु आपके हृदय के अन्तरतम कक्ष में दिव्य रूप से विराजमान हों। पिघले सोने की आभा से दीप्त, वे कलियुग में अपनी अहैतुकी कृपा से अपनी सेवा के अत्यन्त उत्कृष्ट तथा दीप्त आंध्यात्मिक रस के ज्ञान को जिसे इसके पूर्व अन्य कोई अवतार प्रदान नही कर सका था, प्रदान करने के लिए अवतीर्ण हुए।

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श्रीचैतन्य महाप्रभु

महाप्रभु जी का गोपाल चापाल के प्रति क्रोध और कृपा

श्रीमन् महाप्रभु “हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैवकेवलम् ।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिर्यथा ।।”

वृहदनारदीय पुराण के उक्त श्लोक की व्याख्यानुसार हरिनाम की महिमा समझाते हुए अपने अन्तरंग भक्तों के साथ वर्षभर प्रत्येक रात्रि को श्रीवास पँडित के घर में दरवाज़ा बन्द कर संकीर्तन करते थे । उस समय बहुत से बहिर्मुख लोग ब्राह्मण वैष्णवों को लक्ष्य करके अभद्र तरीके से कटाक्ष करते रहते थे। एक दिन पाखण्डी प्रधान गोपाल चापाल नाम का ब्राह्मण वहाँ आया और अन्दर प्रवेश न कर पाने के कारण ईर्ष्या से जल उठा तथा उसने श्रीवास को बदनाम करने के लिए जवाफूल, लाल चन्दन और शराब की बोतल इत्यादि भवानी पूजा का सामान रात में चुपके से उसके घर के सामने रख दिया ताकि सवेरे सब लोग उसे देख श्रीगौराँग एवं श्रीवासादि भक्तों की निन्दा करेंगे कि ये सब हरिनाम संकीर्तन का ढोंग रच कर देवी पूजा करते हैं (क्योंकि महाप्रभु जी के सभी जन अनन्य कृष्ण भक्त थे। यदि कोई देवी पूजा और कृष्ण भजन में अन्तर जानना चाहे तो गीता जी के सातवें अध्याय का 20वां तथा 23वां श्लोक देखे)।

लेकिन प्रातः काल होते ही जब श्रीवास की नज़र इन सब पर पड़ी तो वे क्रोधित होने की बजाए ज़ोर ज़ोर से हँसने लगे और लोगों को कहने लगे देखो – “मैं जो शाक्त हूँ उसका ये स्पष्ट प्रमाण है।” सभी सभ्य लोग ये देख कर दुःखी हुए और इसे दुष्टों की क्रिया जान सब अपवित्र वस्तुएँ हटा कर सबने मिलकर उस जगह को गोबर इत्यादि से लीप दिया । किन्तु इधर पाखण्डी गोपाल चापाल का सारा शरीर वैष्णव अपराध के फल से कुष्ट रोग से ग्रस्त हो गया और सड़ने लगा। रोग दुःख से व्याकुल गोपाल-चापाल एक दिन गंगा घाट के किनारे आकर महाप्रभु जी से रोग से छुटकारे के लिए गिड़गिड़ाने लगा। किन्तु भक्तवत्सल गौरहरि ने उसे डाँट दिया और कहा- अरे पापी! तूने मेरे भक्त से द्वेष किया, उसे बदनाम करना चाहा । तुग्ने मैं इस जन्म ही नहीं करोड़ों जन्म इसी प्रकार कीड़ों से खिलवाऊँगा । सन्यास के बाद महाप्रभु जी जब नीलाचल से “अपराध भंजन पाट” आये तो गोपाल चापाल फिर महाप्रभु जी के चरणों में गिड़गिड़ाने लगा तो कृपा सागर महाप्रभु जी ने उसे रास्ता दिखा दिया कि यदि दुःखों से छुटकारा चाहते हो तो भक्त श्रीवास के पास जाओ, जिसके चरणों में तुमने अपराध किया है। उन्हीं की कृपा से तुम दुःखों से छुटकारा पा सकते हो ।

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मज्जन्मनः फलमिदं मधुकैटभारे !
मत्प्रार्थनीय – मदनुग्रह एष एव।
त्वद्धृत्यभृत्य – परिचारक – भृत्यभृत्य –
भृत्यस्य भृत्य इति मां स्मर लोकनाथ ।।32।।

मधु तथा कैटभ नामक दैत्यों का उद्धार करने वाले हे मधुकैटभारे ! मेरे जन्म धारण करने का मुख्य उद्देश्य यही है कि आप मुझे अपने भक्तों के सेवकों के दासों का दास समझें। आपका मुझे अपने भक्तों के सेवकों का दासानुदास समझना ही मुझ पर बहुत बड़ा अनुग्रह होगा।

श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्

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फल्गुवैराग्य

युक्ति और युक्तिके अनुकूल वेद-वाक्योंके लक्षणा-अर्थके द्वारा कुछ लोग ऐसा समझते हैं कि “मैं ब्रह्म हैं, किन्तु प्रपञ्चमें फँस जानेके कारण ब्रह्म अनुभवसे दूर हो पड़ा हूँ”। प्रपञ्चसे मुक्त होनेका उपाय क्या है? मनुष्यशरीर प्रपञ्च है, गृह भी प्रपञ्च है, स्त्री-पुत्र भी प्रपञ्च है, आहार आदि सब कुछ प्रपञ्च ही है। इस प्रपञ्चसे किस प्रकार छुटकारा मिले? इस भावनासे व्यस्त होकर शरीरमें भस्म रमाकर कौपीन आदि द्वारा उसे ढक लेते हैं, सूखे चने आदि चबाकर, स्त्री-पुत्र आदिका परित्यागकर अपनेको त्यागी कहलवानेके लिए गृह त्याग करके वनमें विचरण करते हैं या मठमें वास करते हैं। ऐसा करनेसे लाभ क्या होगा- इसपर भलीभाँति विचार किए बिना ही केवलमात्र शुष्क ज्ञान मात्राकी भावना करते हैं। परन्तु हरि सम्बन्धसे ही प्रपञ्चसे छुटकारा मिल सकता है-इस विषयसे सर्वथा उदासीन रहते हैं। पाप भी गया, पुण्य भी गया, मैं और मेरा सभी कुछ चला गया; परन्तु लाभ क्या हुआ? इसपर तनिक भी विचार नहीं किया। वेदान्तके अधिकरणोंके साथ अपना समय बिताने लगे। मृत्यु हुई, उनके मतके दो-चार लोग उपस्थित हुए तथा उनके मस्तकपर नारियल तोड़कर भूमिपर रख दिया। परन्तु इससे हुआ क्या? हरि तो मिले नहीं। उनका ब्रह्म होना वहीं तक रहा। ऐसा न कर यदि वे देहमें, गृहमें, भोजनमें, शयनमें, कालमें और दिशाओंमें हरिसम्बन्ध स्थापनकर भगवदनुशीलन करते-करते भक्तिकी वृद्धि करते, तो प्रेमरूपी चरम फलको अवश्य ही प्राप्त करते। ऐसे वैराग्यका नाम फल्गुवैराग्य है। श्रीमन्महाप्रभु जी ने ऐसे वैराग्यका निषेध करके श्रीसनातनजीको युक्तवैराग्यकी शिक्षा दी है। श्रीरघुनाथदास गोस्वामीको भी उन्होंने युक्तवैराग्यकी ही शिक्षा दी है-

“स्थिर हइया घरे जाह, ना हओ बातुल ।
क्रमे क्रमे पाय लोक भवसिन्धुकूल ॥
मर्कट-वैराग्य ना कर लोक देखाइया।
यथायोग्य विषय भुञ्ज’ अनासक्त हइया ॥
अन्तरे निष्ठा कर, बाहो लोकव्यवहार ।
अचिराते कृष्ण तोमाय करिबेन उद्धार ॥

(चै. च. म. १६/२३७-२३९)

अर्थात् जब श्रीरघुनाथदास बचपनमें प्रथम बार घरसे भागकर श्रीमन्महाप्रभुके समीप आए तथा उनके साथ ही रहनेकी इच्छा प्रकट की, तब श्रीमन्महाप्रभुने बड़े प्यारसे उनके मस्तकपर अपना करकमल फेरते हुए कहा-रघुनाथ! अभी चित्तको स्थिरकर घर लौट जाओ। चञ्चलता मत करो। घरपर रहकर ही भक्तिका साधन करो। ऐसा करनेसे क्रमशः भवसागरको पार किया जा सकता है। याद रखो, लोगोंको दिखलाकर मर्कटवैराग्य (बन्दरसा दिखावटी वैराग्य) करनेकी आवश्यकता नहीं, उससे कुछ भी लाभ नहीं; भजनके अनुकूल जीवन-निर्वाहके लिए आवश्यकतानुसार यथायोग्य विषयोंको अनासक्त होकर भोगो; साथ ही भीतर-ही-भीतर निष्ठा रखो तथा बाहरमें लोक-व्यवहार करते रहो। ऐसा करनेसे कुछ ही दिनोंमें करुणासागर श्रीकृष्ण तुम्हारा उद्धार कर देंगे।

श्रील सच्चिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर

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कर्मी होना या ज्ञानी होना जीव का प्रयोजन विषय नहीं है। कर्म और ज्ञान जीवात्मा के धर्म नहीं हैं। जीव भगवान का सेवक है, इसीलिए कृष्णसेवा ही जीव का नित्यधर्म है। ‘जीवेर स्वरूप हय कृष्णेर नित्यदास’ कर्मी और ज्ञानी दोनों ही स्वार्थी हैं, दोनों ही अपने सुख को लेकर व्यस्त हैं। वे लोग भगवान के भक्त नहीं हैं, बल्कि अभक्त हैं। इसीलिए भाग्यवान् सज्जन व्यक्ति कर्मी या ज्ञानी न होकर भगवान् के चरणकमलों का आश्रय करते हुए भक्तिपथ पर विचरण करते हैं ।

श्रीलप्रभुपाद

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पूजा करना भी कर्म ही है, दूसरे की हत्या करना भी कर्म ही है। हाँ, एक सुकर्म-पुण्य है और दूसरा कुकर्म-पाप है। ‘काम तुम मन से चले जाओ’ – बोलने से काम मन से नहीं जायेगा। भक्ति-शास्त्रों में काम को छोड़ने की नहीं, प्रयोग करने की विधि बतलाई गई है-

‘काम कृष्णकर्मार्पणे, क्रोध भक्तद्वेषीजने,
लोभ साधु-संगे-हरि-कथा।
मोह इष्ट-लाभ बिने, मद् कृष्ण- गुण-गाने,
नियुक्त करिव यथा तथा।’
(प्रेम भक्ति चन्द्रिका)

(अर्थात् काम को कृष्ण सेवा के कर्मों में, क्रोध को भक्तों के साथ द्वेष करने वालों के लिए, लोभ को साधुओं के संग में हरिकथा श्रवण में, मोह को भगवद्-विरह में, मद् को कृष्ण गुणगान करने में नियुक्त करें, ऐसा श्रील नरोत्तम ठाकुर कहते हैं।)

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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बाहरी दृष्टि से श्रील बाबाजी महाराज व श्रील प्रभुपाद में आदर्श का विरोध

श्रील सरस्वती ठाकुर, श्रील ठाकुर गौरकिशोर के साथ किस प्रकार के सम्बन्ध से आबद्ध थे, वह हमारी विशेष चर्चा का विषय है। श्रील बाबाजी महाराज ने प्रभुपाद को बहुत बार आदेश दिया था “आप मेरे पास ही रहिए, कलि के राज्य (अर्थात् कलकत्ता) में कभी मत जाइये।” हम श्रील प्रभुपाद के आचरण को बाह्यदृष्टि से देखते हैं कि उन्होंने गुरु आज्ञा का उल्लंघन कर कलि के राज्य कलकत्ता में ही जाकर श्रीगौड़ीय मठ की स्थापना की। इससे हम क्या समझेंगे कि प्रभुपाद को गुरुदेव का उल्लंघन करने पर उनके द्वारा महा-अपराध हुआ है?

फिर देखा जाता है कि, श्रील बाबाजी महाराज बहुत शिष्यादि न बनाकर निर्जन-भजनानन्दी थे। उन्होंने केवल हमारे गुरुपादपद्म को ही शिष्य के रूप में ग्रहण किया था। किन्तु श्रील प्रभुपाद अपने गुरुदेव की वरन् उन्होंने सारी पृथ्वी में प्रचार करते तरह निर्जन-भजनप्रयासी नहीं थे हुए बहुत से लोगों को शिष्य बनाया था। यह समस्त कार्यकलाप, विविक्तानन्दी (एकान्त-भजनानन्दी) बाबाजी महाराज के आदर्श के विरुद्ध जैसा लग सकता है। किन्तु वास्तव में श्रील प्रभुपाद के समस्त कार्य ही गुरुसेवा के सर्वोत्तम आदर्श के रूप में प्रतिष्ठित हुए हैं। बाह्यदृष्टि से वे श्रील बाबाजी महाराज के निकट न रहने पर भी अन्तर्दृष्टि के द्वारा देखा जा सकता है कि, वे सर्वदा बाबाजी महाराज के पास ही अवस्थान करते थे – बाबाजी महाराज और उनका भजन आचरण-आदर्श सम्पूर्ण रूप से Morphology (बाहरी विज्ञान) को छोड़कर Ontology (आंतरिक विज्ञान) का सहारा लेने पर उनमें अभिन्नता को उपलब्ध किया जा सकता है। अतः पास नहीं रहकर बहुत दूर से भी गुरु सेवा का चरम आदर्श प्रस्तुत किया जा सकता है। जो लोग करीब रहते हैं, वे ही गुरुसेवा में नियुक्त हैं- इस प्रकार की सोच भ्रमित और अपराधजनक है। श्रील प्रभुपाद का यह आदर्श नया नहीं है।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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मत्सर होने पर मठवासी की सेवा भी ग्रहणनीय नहीं

ईर्ष्या-हिंसा-मात्सर्य-परायण मठ-सेवकों की तथाकथित सहायता, सहानुभूति, सहयोग के बिना ही स्वयं स्वावलम्बी (स्वयं समर्थवान्) होने की चेष्टा करना। सेवकगण जब दांभिक अहंकारी हो जाते हैं तब वे श्रीहरि-गुरु-वैष्णव सेवा से बहुत दूर हो जाते हैं। दलबाजी या Grouping के द्वारा मठ-मिशन का किसी भी रूप में कोई कल्याण नहीं कर सकता है। तुम सब इस संबंध में सावधान रहना।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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साधक के भजन व पारमार्थिक उन्नति के लिए शुद्ध भक्तों का संग आवश्यक है। शुद्ध भक्तों के संग के अभाव में, साधक को भक्ति-शास्त्रों का अध्ययन कर, साधुजनों द्वारा वर्णित वीर्यवती उपदेशों का आश्रय करना है। श्रद्धा के साथ तुलसी देवी की सेवा व कृपा-प्रार्थना करनी है।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज

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