श्रीमद् भागवतम् महत्वपूर्ण श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक
अतः पम्भिर्द्विजश्रेष्ठा वर्णाश्रमविभागशः ।
स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिर्हरितोषणम् ।।13।।
(भगवत1/2/13)
अतः = अतएव; पुम्भिः = मनुष्य द्वारा; द्विज-श्रेष्ठाः हे द्विजों में श्रेष्ठ; वर्ण-आश्रम = चार वर्षों तथा जीवन के चार आश्रमों के; विभागशः = विभाजन से; स्वनुष्ठितस्य अपने कर्तव्यों का; धर्मस्य वृत्तिपरक; संसिद्धिः सर्वोच्च सिद्धि; हरि भगवान् को; तोषणम्-तुष्ट या प्रसन्न करना।
अनुवाद – अतः हे द्विजश्रेष्ठ ! यह निष्कर्ष निकलता है कि वर्णाश्रम धर्म के अनुसार अपने कर्तव्यों को पूरा करने से जो परम सिद्धि प्राप्त हो सकती है, वह है भगवान् को प्रसन्न करना।
तात्पर्य – सारे विश्व भर में मानव समाज चार वर्णों तथा चार आश्रमों में विभक्त है। चार वर्ण हैं: बुद्धिमान वर्ग, योद्धा वर्ग, उत्पादक वर्ग तथा श्रमिक वर्ग। ये वर्ण अपने कर्म तथा गुण के अनुसार विभाजित हैं, जन्म के अनुसार नहीं। जीवन के भी चार आश्रम हैं। इनके नाम हैं: विद्यार्थी जीवन, गृहस्थ जीवन, वानप्रस्थ तथा भक्त जीवन। मानव समाज का परम हित इसी में है कि जीवन इसी तरह ही विभाजित हो अन्यथा कोई भी संस्था स्वस्थ विकास नहीं कर सकती। इनमें से जीवन के प्रत्येक विभाग का लक्ष्य भगवान् को प्रसन्न करना है। मानव समाज के इस संस्थागत कार्य को वर्णाश्रम धर्म के रूप में जाना जाता है जो संस्कृत जीवन के लिए अत्यन्त स्वाभाविक है। वर्णाश्रम धर्म का निर्माण इसलिए किया गया है कि परमसत्य की अनुभूति हो सके। यह एक विभाग का दूसरे पर कृत्रिम आधिपत्य नहीं है। जब इन्द्रियतृप्ति की अत्यधिक आसक्ति के कारण जीवन लक्ष्य, अर्थात् परमसत्य का साक्षात्कार चूक जाता है, जैसा कि पहले कहा जा चुका है, तो स्वार्थी लोगों द्वारा वर्णाश्रम धर्म का उपयोग कमजोर वर्ग पर कृत्रिम आधिपत्य दिखाने के लिए किया जाता है। कलियुग में, अर्थात् कलहप्रधान युग में, यह कृत्रिम आधिपत्य पहले से चालू है, किन्तु जो लोग सयाने हैं वे जानते हैं कि वर्ण तथा आश्रम विभाग सहज सामाजिक व्यवहार तथा उच्च विचारयुक्त आत्म-साक्षात्कार के लिए है, अन्य किसी कार्य के लिए नहीं।
यहाँ पर भागवत का कथन है कि जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य या वर्णाश्रम धर्म की चरम सिद्धि यह है कि हम सब मिलकर परमेश्वर को प्रसन्न रखें। इसकी पुष्टि भगवद्गीता में (४.१३) भी हुई है।
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श्री चैतन्य चरितामृत
(आदि लीला 1/117)
सिद्धान्त बलिया चित्ते ना कर अलस ।
इहा हइते कृष्णे लागे सुदृढ मानस ।।
जिज्ञासू को चाहिए कि ऐसे सिद्धान्तों की व्याख्या को विवादास्पद मान कर उनकी उपेक्षा न करे क्योंकि ऐसी व्याख्याओं से मन दृढ होता है। इस तरह उसका मन श्रीकृष्ण के प्रति अनुरक्त होता है।
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श्रीचैतन्य महाप्रभु
मौलाना सिराजुद्दीन का उद्धार
बंगाल के सुलतान हुसेन शाह (ई0 1493-1519) द्वारा उड़ीसा की चढ़ाई में किये गये अमानुषिक अत्याचारों को देख दबिरखास और साकर मल्लिक (महाप्रभु जी का चरणाश्रय ग्रहण करने के बाद परम भक्त रूप गोस्वामी तथा सनातन गोस्वामी) को विशेष मनोव्यथा हुई। हुसेन शाह ने उड़ीसा पर आक्रमण कर वहाँ के सभी मन्दिरों को नष्ट कर दिया। इधर तत्कालीन नवद्वीप के शासन कर्ता मौलाना सिराजुद्दीन (चाँद काज़ी) ने महाप्रभु जी के संकीर्तन आन्दोलन का कट्टर विरोध किया । यहाँ तक कि उसने भक्तों के कीर्तन के मध्य घुसकर उनका मृदंग इत्यादि तोड़ दिया और चेतावनी दी कि यदि उसके इलाके में कोई संकीर्तन करेगा तो उसे कठोर महाप्रभु जी को जब ये बात पता लगी तो वे अत्यन्त क्रुद्ध हो गये तथा उन्होंने सबको और भी ज़ोर-ज़ोर से कीर्तन करने का आदेश दिया । इसके इलावा उन्होंने श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीअद्वैत प्रभु तथा श्रीहरिदास ठाकुर आदि भक्तों को लेकर विशाल नगर संकीर्तन का आयोजन भी किया । श्रीमन् महाप्रभु संकीर्तन जुलूस के साथ समस्त मवद्वीप भ्रमण करते-करते मौलाना सिराजुद्दीन (चांद काज़ी) के घर पहुँचे। महाप्रभु जी के अद्भुत प्रभाव के कारण अन्ततः काज़ी ने क्षमा माँगी तथा प्रतिज्ञा की कि आज के बाद उनके वंश में कोई भी कीर्तन में बाधा नहीं देगा और उसने बताया कि जिस दिन उसने मृदंग तोड़ा था उसी रात को एक विशाल मनुष्य के समान शरीर तथा सिंह के समान मुँह वाली महाभयंकर मूर्ति उसकी छाती पर कूदकर चढ़ गयी और दाँत किटकिटाती हुई उसे भय दिखला कर बोली “तूने हरि कीर्तन का मृदंग तोड़ा, मैं तेरा कलेजा फाड़ दूँगा ।” इतना कहते हुए उसने अपनी छाती पर सिंह के नखों के निशान दिखाए । इसके इलावा अचानक एक आग की लपट ने, उसके एक प्यादे की (जिसे उसने कीर्तन में बाधा देने के लिए भेजा था) दाड़ी और मूँछ को जला डाला । काज़ी के बार-बार अनुनय विनय करने पर क्षमा अवतार महाप्रभु जी ने मुस्कराते हुए उसे क्षमा कर दिया और उसे भी हरिनाम करने का आदेश दिया। आज भी श्रीधाम मायापुर (नवद्वीप) में उस मुसलमान काज़ी के वंशधर नवद्वीप धाम परिक्रमा में कृष्ण संकीर्तन में योगदान देते हैं।
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नाथे धातरि भोगि भोगशयने नारायणे माधवे,
देवे देवकिनन्दने सुरवरे चक्रायुधे शाङ्किणि।
लीलाशेष – जगत्प्रपंच – जठरे विश्वेश्वरे श्रीधरे,
गोविन्दे कुरु चित्तवृत्तिमचलामन्यैस्तु किं वर्त्तनैः ? ।।30।।
जो भगवान श्रीहरि सर्वरक्षक, विधाता, अनन्तशायी, नारायण, माधव, क्रीड़ाशील, देवकीनन्दन, सुरश्रेष्ठ, सुदर्शनधारी व शाडु धनुष को धारण करने वाले हैं तथा लीला समाप्ति के समय सारा जगत जिनके उदर में प्रविष्ट हो जाता है तथा जो विश्व के ईश्वर और श्रीधर हैं, उन्हीं श्रीगोविन्द में अपनी चित्तवृत्ति को स्थिर करो, उनसे अभिन्न दूसरे विषयों की चिन्ता से भला क्या प्रयोजन है?
श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्
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प्रेम नित्यसिद्ध है
जीवका ईश्वरके प्रति जो प्रेम होता है, वही प्रेम जीवका स्वाभाविक नित्य धर्म है। वही वास्तविक साध्य वस्तु है। यहाँ यह वितर्क उठ सकता है कि यदि साध्य वस्तु नित्यसिद्ध है, तब वह किस प्रकार साध्य हो सकती है? श्रीमन्महाप्रभुजी इस विषयमें कहते हैं-
एवे साधनभक्ति-लक्षण शुन, सनातन ।
जाहा हइते पाइ कृष्णप्रेम-महाधन ॥
(चै. च. म. २२/१०१)
श्रवणादि-क्रिया-तार ‘स्वरूप’ लक्षण।
‘तटस्थ’-लक्षणे उपजय प्रेमधन ॥
नित्यसिद्ध कृष्णप्रेम ‘साध्य’ कभु नय।
श्रवणादि-शुद्धचित्ते करये उदय ॥
(चै. च. म. २२/१०३-१०४)
श्रीमन्महाप्रभुजीके इन वचनोंका तात्पर्य यह है कि प्रेम ही सिद्ध वस्तु है। जीवकी मायामोहित दशामें यह प्रेम तटस्थलक्षणमें पाया जाता है। उस समय वह अपने स्वरूपलक्षणमें उदित नहीं होता। कृष्णनाम, कृष्णगुण, कृष्णरूप और कृष्णकी लीलाकथाओंका श्रवण-कीर्त्तन-स्मरण आदि कार्य ही साधनभक्तिका स्वरूपलक्षण है। यह साधन करते-करते छिपी हुई आगकी भाँति प्रेम सबसे पहले तटस्थ रूपमें उदित होता है और अन्तमें लिङ्गशरीर छूट जानेपर अर्थात् वस्तुसिद्धिके समय स्वरूपलक्षणमें प्रकट होता है। अतएव कृष्णप्रेम सिद्धवस्तु है। यह किसी साधनसे पैदा नहीं होता, अपितु श्रवण आदि द्वारा शुद्ध चित्तमें उदित हो पड़ता है। इसीलिए साधनकी आवश्यकता स्पष्ट ही दीख पड़ती है।
यह साधनभक्ति दो प्रकारकी होती है-वैधी साधनभक्ति और रागानुगा साधनभक्ति। महाप्रभुजी कहते हैं-
एइ त’ साधनभक्ति-दुइ त’ प्रकार।
एक ‘वैधीभक्ति’, ‘रागानुगाभक्ति’ आर ॥
रागहीन जन भजे शास्त्रेर आज्ञाय।
‘वैधीभक्ति’ बलि’ तारे सर्वशास्त्रे गाय ॥
(चै. च. म. २२/१०५-१०६)
श्रील सच्चिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर
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शुद्ध कीर्तन क्या है ?
कीर्तन श्रवण के ऊपर निर्भर करता है। जिसके द्वारा अपना या दूसरों का इन्द्रिय तर्पण होता है, वह कीर्तन या भक्ति नहीं है। भगवान के सुख के लिए जो कीर्तन होता है, वही शुद्ध कीर्तन है। श्रीचैतन्य महाप्रभु ने कहा है- श्रीहरि का कीर्तन ही Cent percent education अर्थात् हरिकीर्तन ही असली शिक्षा है। हरिकथा जितनी सुनी जाय, उतना ही मंगल होगा ।
श्रीलप्रभुपाद
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युग धर्म हरिनाम संकीर्त्तन
संकीर्त्तन का अर्थ है सम्यक् कीर्तन, सुष्ठु कीर्तन अथवा निरापराध कीर्त्तन। इसके इलावा भगवान् के नाम, रूप, गुण, लीला, परिकर, धाम- इन सब का कीर्त्तन भी संकीर्त्तन कहलाता है। बहुत से श्रद्धालु व्यक्तियों द्वारा मिलकर उच्च स्वर में होने वाले हरिनाम-कीर्त्तन को भी संकीर्त्तन कहते हैं।
हरिनाम जप से कीर्त्तन श्रेष्ठ है। होठों को हिलाये बिना हरिनाम जप करने से जप करने वाले का मंगल होता है। किन्तु कीर्त्तन से अपना व दूसरे का या यूँ कहें कि दोनों का मंगल होता है। दृष्टान्त स्वरूप कहा जा सकता है कि जो कमाता है, वह अपने भोजन की व्यवस्था करता है, वह अच्छा है किन्तु उसकी अपेक्षा और भी उत्तम है जो कमा कर अपना और अन्य दसों आदमियों के भोजन की व्यवस्था करता है। उच्चकीर्त्तन द्वारा वृक्ष इत्यादि व पशु-पक्षी आदि जंगम प्राणियों का भी मंगल होता है। इसके इलावा जप से तो चित्त विक्षिप्त भी हो सकता है किन्तु उच्च-संकीर्त्तन में विक्षेप की आशंका नहीं रहती। दरवाज़े खिड़कियाँ बन्द करके जप करने का प्रयत्न करने पर भी पहले हमने जिन जिन विषयों का संग किया है, उन सब का चिन्तन आकर हृद्रड्डह्यग करेगा। मेरी इच्छा के विरुद्ध भी अनजाने में मेरा चित्त कहीं और चला जायेगा। थोड़ी सी आवाज़ होने पर भी मेरा चित्त भटक जायेगा किन्तु उच्च-संकीर्त्तन में ध्येय वस्तु श्रीहरि में आसानी से चित्त लग सकेगा। इसलिये जप की अपेक्षा उच्च कीर्त्तन में अधिक लाभ है। विशेषतः कलियुग में जब जीव अत्यन्त विषयाविष्ट, कामातुर, व्याधिग्रस्त और बड़ी कम उम्र वाला हो गया है – ऐसे समय में हरिसंकीर्त्तन ही मंगल प्राप्ति के एकमात्र उपाय के रूप में निर्दिष्ट हुआ है:-
कृते यद्ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मरवैः ।
द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात् ॥
(भा० 12/3/52)
ध्यायन् कृते यजन् यज्ञैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन् ।
यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संकीत्त्र्य केशवं ॥
(पद्मपुराण उत्तरखण्ड अ. 42, श्लोक 25)
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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“असत्संग त्याग एइ वैष्णव आचार” “असत्संग को त्याग देना ही वैष्णव आचरण है”- यह श्रीचैतन्यचरितामृत में देखा जाता है। असत्संग का त्याग ही वैष्णवाचार में मुख्य आचरण है। भगवान् की इच्छा से तुम्हारा स्वाभाविक रूप से यह हो रहा है। जो भी हो, तुम अत्यन्त कठोर नियम के साथ चलना। किसी प्रकार से नियम का उल्लंघन मत करना। सभी सज्जन व्यक्ति तुम्हारे आदर्श को ग्रहण करने के लिए बाध्य होंगे।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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तुम वैष्णवों की सेवा के लिए कुछ नहीं कर पा रही हो, यह यदि सच में हृदय की अनुभूति है, तो निश्चित ही किसी न किसी दिन तुम्हारा मंगल होने की संभावना है।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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हमारे परम आराध्यतम श्रील गुरुदेव ने अपनी अप्रकट लीला से पूर्व निज आश्रित शिष्यों को अपनी अन्तिम उपदेश वाणी में कहा था कि कनक(धन), कामिनी(स्त्री-संग) व प्रतिष्ठा की आकांक्षा हरि-भजन में सबसे बड़ी बाधा है। साधक के लिए भक्ति के प्रतिकूल सभी कामनाओं का परित्याग करना आवश्यक है।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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