श्रीमद् भागवतम् श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक

दिव्यता तथा दिव्य सेवा
स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे ।
अहैतुक्यप्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति ।।
(1/2/6)
सः वह; वै निश्चय ही; पुंसाम् मनुष्यों के लिए; परः दिव्य; धर्मः वृति; यतः = जिससे; भक्तिः भक्ति; अधोक्षजे अध्यात्म के प्रति; अहैतुकी अकारण; अप्रतिहता अभंग; यया जिससे; आत्मा आत्मा; सुप्रसीदति पूर्णतया प्रसन्न होता है।
अनुवाद – सम्पूर्ण मानवता के लिए परमवृत्ति (धर्म) वही है जिसके द्वारा सारे मनुष्य दिव्य भगवान् की प्रेमा-भक्ति प्राप्त कर सकें। ऐसी भक्ति अकारण तथा अखण्ड होनी चाहिए जिससे आत्मा पूर्णतया तुष्ट हो सके।
तात्पर्य – इस कथन के द्वारा श्रीसूत गोस्वामी नैमिषारण्य के ऋषियों के प्रथम प्रश्न का उत्तर देते हैं। उन्होंने सूत जी से अनुरोध किया था कि वे समस्त शास्त्रों का सार प्रस्तुत करें जिससे पतितात्माएँ या जनसामान्य उसे सरलता से ग्रहण कर सके। वेदों में मनुष्य के लिए दो प्रकार की वृत्तियाँ बताई गई हैं। एक प्रवृत्ति-मार्ग या इन्द्रिय-भोग का मार्ग और दूसरा निवृत्ति-मार्ग या संन्यास का मार्ग। भोग का मार्ग निकृष्ट है और निवृति का मार्ग श्रेष्ठ है। जीव का भौतिक जीवन एक प्रकार से वास्तविक जीवन की रुग्ण अवस्था है। वास्तविक जीवन तो ब्रह्मभूत अवस्था है जहाँ जीवन सत्, चित् तथा आनन्दमय है। भौतिक जीवन नाशवान, मोहपूर्ण तथा कष्टमय है। इसमें सुख तो नहीं ही है। कष्टों से छुटकारा पाने के प्रयास व्यर्थ हैं और कष्टों का क्षणिक नाश ही झूठा सुख कहलाता है। अतः प्रगतिशील भौतिक भोग का मार्ग नाशवान, कष्टमय तथा मोहपूर्ण होने के कारण निकृष्ट है। भगवद्भक्ति श्रेष्ठ धर्म कहलाती है, क्योंकि इसमें सच्चिदानन्द जीवन बीतता है। जब इसमें निकृष्ट गुण मिल जाते हैं तो यह कभी-कभी दूषित हो जाती है। उदाहरणार्थ, भौतिक लाभ के लिये की गई भक्ति निवृत्ति मार्ग में बाधक है। इस रुग्ण जीवन को भोगने की अपेक्षा संन्यास या सर्वत्याग श्रेष्ठतर वृत्ति है। ऐसे भोग से रोग के लक्षण बढ़ते हैं और उसकी अवधि भी बढ़ जाती है। अतः भगवद्भक्ति शुद्ध होनी चाहिए, अर्थात् उसमें भौतिक सुखोपभोग की रंचमात्र कामना नहीं रहनी चाहिए। अतः मनुष्य को चाहिए कि वृथा की कामना, सकाम कर्म तथा दार्शनिक कल्पना से रहित भगवद्भक्ति रूपी उच्चकोटि की वृत्ति को स्वीकार करे। इसी से उनकी सेवा में शाश्वत सन्तोष प्राप्त होगा।
हमने जानबूझ कर धर्म को वृत्ति कहा है, क्योंकि धर्म का मूल अर्थ है “जो किसी के अस्तित्व का पोषण करे।” जीव के अस्तित्व का पोषण भगवान् कृष्ण के साथ अपने कर्मों को समन्वित करना है। कृष्ण समस्त जीवों के केन्द्र-बिन्दु हैं और वे अन्य समस्त जीवों में या शाश्वत रूपों में सर्वाकर्षक जीव हैं। प्रत्येक जीव का दिव्य जगत में शाश्वत रूप होता है और कृष्ण उन सबों के लिए परम आकर्षक हैं। कृष्ण ही पूर्ण हैं और अन्य सभी उनके अंश रूप हैं। इनमें सेवक तथा सेव्य का सम्बन्ध है; यह दिव्य है और हमारे सांसारिक अनुभव से सर्वथा भिन्न है। यह सेवक-सेव्य भाव घनिष्ठता का सर्वोत्कृष्ट रूप है। भक्ति की प्रगति से इसका अनुभव होगा। हर व्यक्ति को इस बद्ध अवस्था में भी भगवान् की प्रेमा-भक्ति करनी चाहिए। इससे वास्तविक जीवन का संकेत प्राप्त हो सकेगा और तुष्टि मिल सकेगी।
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भगवद्दास्यका महत्त्व –
अल्प करि’ ना मानिह दास हेन नाम।
अल्प भाग्ये ‘दास’ नाहि करे भगवान् ॥
अग्रे हय मुक्ति, तबे सर्व-बन्ध-नाश ।
तबे से हइते पारे श्रीकृष्णेर दास ॥
(चै. च. म. १७/१०३-१०४)
हीन नहीं समझना चाहिए। बड़े कृष्ण दासकी पदवीको छोटा अथवा सौभाग्यवानको ही भगवान् दासके रूपमें ग्रहण करते हैं, यह अल्प भाग्यसे नहीं होता। पहले मुक्ति होती है। तत्पश्चात् सब प्रकारके बन्धन छूट जाते हैं। इसके पश्चात् ही वह सौभाग्यवान जीव श्रीकृष्णका दास हो सकता है।
गौड़ीय कण्ठहार
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श्रीचैतन्य महाप्रभु

ज्योतिषी क्या जाने त्रिकालदर्शी की बात ?
एक दिन एक सर्वज्ञ ज्योतिषी श्रीमहाप्रभु के घर आया । उसका यथायोग्य सम्मान कर प्रभु ने उससे प्रश्न किया “मैं पूर्व जन्म में कौन था ? गणना करके बताइये।” प्रभु के वाक्य सुनकर वह सर्वज्ञ ज्योतिषी गणना करने लगा, गणना करते हुए ज्योतिषी ध्यान में एक महान् ज्योतिर्मय मूर्ति को देखने लगा, जो अनन्त वैकुण्ठों एवं अनन्त ब्रह्माण्डों का आश्रय रूप है, जो परमतत्व है, परब्रह्म एवं स्वयं भगवान् है प्रभु के इस रूप को देख कर सर्वज्ञ ज्योतिषी चित्रवत् रह गया ।
ज्योतिषी के मुख से कुछ वचन न निकल सके। चुप साध कर रह गया वह । प्रभु ने पुनः प्रश्न किया तो वह सचेत होकर कहने लगा – “पूर्व जन्म में आप समस्त जगत् के आश्रय, सर्व ऐश्वर्यमय, परिपूर्ण स्वयं भगवान् थे” । सर्वज्ञ ने और कहा “जो स्वरूप पहले जन्म में आपका था, अब भी वही स्वरूप है। श्रीनित्यानन्द भी तुम्हारा ही एक स्वरूप है जिसका निर्णय सहज में कोई नहीं कर सकता।” श्रीप्रभु उसके मुख से ये वचन सुन कर हँस पड़े और कहने लगे “तुम कुछ नहीं जानते हो। मैं तो पिछले जन्म में जाति का ग्वाला था ।”
प्रभु ने कहा – “मेरा पहले एक गोप के घर में जन्म हुआ था, वहाँ मैं गायों को चराने वाला ग्वाला था। उसी पुण्य के प्रभाव से अब ब्राह्मण का लड़का हुआ हूँ” सर्वज्ञ ने कहा यह बात तो मैंने भी ध्यान में देखी है। किन्तु उस ग्वालवेष में आपका ऐश्वर्य देख कर मैं अवाक् रह गया हूँ। आपके उस रूप को (श्रीकृष्ण रूप) और इस (श्रीगौरांग) रूप को मैं एक ही देखता हूँ। कभी कभी कुछ भेद देखता हूँ। यह सब तुम्हारी माया ही है। आप जो हो, सो हो, मैं तो आपको नमस्कार करता हूँ।” श्रीमहाप्रभु ने सन्तुष्ट होकर उसे प्रेम प्रदान कर कृतार्थ कर दिया।
उस समय नवद्वीप में नास्तिक लोगों की सँख्या बहुत थी। जो थोड़े से भगवद् भक्त थे भी, उनकी नास्तिक लोग निन्दा किया करते थे । तथापि भक्तगण उनके मंगल के बारे में चिन्ता किया करते और उनकी उस भगवद् बहिर्मुख दशा को देखकर बहुत दुःखी होते थे। इधर गौरांग देव अपने भक्तों को दुःखी देखकर दुःखी होते थे। तब मन ही मन प्रभु ने अपने स्वरूप को प्रकट करने की इच्छा की और माता से आज्ञा माँग कर, बहुत से शिष्यों को लेकर पितृ श्राद्ध करने के बहाने ‘गया’ की ओर चल पड़े। रास्ते में अपने भक्त ब्राह्मणों के चरण जल की महिमा समझाने के लिए बुखार की लीला भी की। ‘गया’ में जाकर आपने पुनपुन नदी (तीर्थ) पर पितृदेव का अर्चनादि किया। ब्रह्म-कुण्ड पर तर्पण करते समय वहाँ के पुजारी से भगवान् की महिमा सुनकर प्रेमाविष्ट हो गये, आँखों से आँसु बहने लगे तथा प्रभु का प्रत्येक अंग थरथर काँपने लगा। यहाँ से ही श्रीगौरांग देव ने कृष्ण – प्रेम – भक्ति का प्रकाश करना आरम्भ किया। इसी प्रेमावस्था में जब गौरांग देव निमग्न थे तो दैवयोग से श्रीईश्वर पुरी भी वहाँ आ पहुँचे। उन्हें देखते ही प्रभु ने उन्हें प्रणाम किया और पुरी जी ने इन्हें उठा कर गले से लगा लिया ।
महाप्रभु जी ने अपनी ‘गया’ यात्रा के मूल उद्देश्य को प्रकट करते हुए कहा – “जिस क्षण तुम्हारे चरण दर्शन हुए उसी क्षण मेरी गया यात्रा सफल हो गयी । तीर्थ में पिण्ड दान करने से वह तर जाता है जिसको पिण्ड दान किया हो लेकिन आपके दर्शन मात्र से करोड़ों पितृगण समस्त दुःखों से मुक्त हो जाते हैं । अतएव तुम्हारे समान तीर्थ नहीं है। आप तीर्थ को भी पवित्र करने वाले हो इसलिए मैंने यह देह आपको समर्पित कर दी है। आप अपनी अहैतुकी कृपा द्वारा मुझे भी पार लगाओ एवं मुझे भी श्रीकृष्ण चरण-कमल के अमृत रस का आस्वादन करा दो।” अर्थात् महाप्रभु जी विश्व को बताना चाहते थे कि “साधु-संग” ही तीर्थ यात्रा का सर्वश्रेष्ठ फल है। जब तक मनुष्य के भाग्य में सद्गुरु का दर्शन नहीं होता तब तक जीव सद्गुरु के चरण कमलों में शरणागत होकर भगवान् के सेवा-माधुर्य को नहीं समझ सकता। ये दान, ध्यान, तीर्थस्नान, श्राद्ध, लौकिक पूजा-पाठ आदि वेद – विहित कर्मों की तभी तक आवश्यकता है जब तक साधु-संग में कृष्ण – कथा श्रवण करने की प्रबल आकाँक्षा जागृत न हो ।
निमाई पँडित श्राद्धादि कार्य समाप्त करके जब अपने डेरे पर लौट आये तो उन्होंने अपने हाथों से रसोई तैयार कर के श्रीईश्वर पुरी पाद को प्रसाद खिलाया एवं एकान्त में जाकर अत्यन्त दीनता के साथ मन्त्र-दीक्षा प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की। पुरीपाद तो मन ही मन ये सोच ही रहे थे, अतः उन्होंने सहर्ष निमाई को मन्त्र दीक्षा प्रदान की। श्रीनिमाई पंडित ने श्रीईश्वर पुरी की प्रदक्षिणा करके उनसे आत्मसमर्पण और कृष्ण प्रेम की प्रार्थना की। समस्त संसार के गुरु जी ने लोक शिक्षा के लिए गुरु धारण की लीला प्रकट की । अर्थात् महाप्रभु जी जगत वासियों को जनाना चाहते हैं कि शुद्ध भक्त के चरणों का आश्रय लेकर अपने को पूर्ण रूप से समर्पण किये बिना कोई भी, कभी भी परमार्थ राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता ।
एक दिन श्रीगौराँग देव एकान्त में बैठकर अपने इष्ट मन्त्र का एकाग्र चित्त से जप कर रहे थे कि अचानक वे प्रेमावेश में ज़ोर-ज़ोर से पुकारने लगे – हे कृष्ण ! आप कहाँ हो ! कृष्ण रे ! बाप रे ! मेरे जीवन सर्वस्व हरि ! तुम मेरे प्राणों को चुराकर कहाँ छिप गये हो ? इस प्रकार आर्तनाद करते हुए निमाई क्रदन करने लगे। परम गम्भीर श्रीनिमाई पडित अतिशय विह्वल होकर धूलि में लोट पोट होने लगे व उच्चस्वर से रोने लगे। साथ के छात्रों ने आकर उनको शान्त करने की बहुत सी चेष्टाएं की, परन्तु प्रभु ने कहा “तुम सब घर जाओ मैं अब संसार में नहीं रहूँगा। मैंने निश्चय कर लिया है कि मैं मथुरा दर्शन करने जाऊँगा, जहाँ मैं अपने प्राणनाथ श्रीकृष्ण चन्द्र को पाऊँगा।” और फिर कृष्ण ! कहाँ कृष्ण ! आदि आर्तनाद करते मथुरा की ओर दौड़ पड़े परन्तु कुछ दूर जाकर आकाश वाणी हुई – हे द्विजश्रेष्ठ, अभी मथुरा मत जाओ, अभी गृह त्याग का समय उपस्थित नहीं हुआ है, अभी कुछ समय के लिए आपको अपनी जन्म भूमि श्रीनवद्वीप मंडल में ही प्रेम – भक्ति वितरण करना आवश्यक है। आकाशवाणी सुनकर श्रीमन्महाप्रभु जी को बाह्य ज्ञान हुआ, वे डेरे की ओर मुड़े और श्रीईश्वर पुरीपाद से आज्ञा लेकर छात्रों के साथ नवद्वीप लौट आये ।
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यत् कृष्णप्रणिपात – धूलिधवलं तद्वर्त्म तद्वै शिरस्ते नेत्रे
तमसोज्झिते सुरुचिरे याभ्यां हरि – दृश्यते।
सा बुद्धि – विमलेन्दु – शङ्खधवला या माधव – ध्यायिनी
सा जिह्वाऽमृतवर्षिणी प्रतिपदं या स्तौति नारायणम् ।।26।।
ज़मीन पर लेटकर श्रीकृष्ण को प्रणाम करने पर जिनका शरीर धूलि से धूसरित हो गया हो, उस शरीर को ही शरीर कहते हैं तथा वह मस्तक ही सार्थक मस्तक है जो श्रीकृष्ण के चरणों में झुका हो। जिन दो नेत्रों द्वारा श्रीहरि का दर्शन किया जाता है, वह आँखें ही तमोगुण-वर्जित सुन्दर नयनयुगल कहलाने लायक हैं। जिससे माधव का ध्यान किया जाता है, वह बुद्धि ही चन्द्र और शंव की भाँति स्वच्छ है और जो प्रतिक्षण श्रीनारायण की स्तव-स्तुति करती है वह जिहा ही अमृत बरसाने वाली जिहा है।
श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्
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रसतत्त्व
श्रीकृष्ण ही स्वयं रसतत्त्व हैं- वेदोंमें ऐसा कहा गया है। सप्तम वृष्टि की प्रथम धारा में रसतत्त्व का विशद विवेचन होगा। उसमें यह बतलाया जाएगा कि रस किसे कहते हैं। वाक्य प्राकृत है। अतएव वाक्य जो कुछ कहते हैं या कहेंगे-वे चाहे जितना भी सावधानीके साथ ही क्यों न कहें-वह सब कुछ प्राकृत अथवा प्राकृतवत् ही होगा। यदि पाठक वास्तवमें श्रद्धालु हों, तभी उनके निर्मल चित्तमें अप्राकृत रस उदित होगा। परन्तु सत्सङ्ग और महासौभाग्यके फलस्वरूप ही ऐसा होना सम्भव होता है। तर्कके द्वारा लाख प्रयत्न करनेपर भी इसका उदय नहीं हो सकता। यदि जिज्ञासु व्यक्ति कुसङ्गमें पड़कर प्राकृत रसके अनुशीलनको ही अप्राकृत रसका अनुशीलन मानकर अनुशीलन करता है, तो वह प्राकृत रस-सहजियाका रूप धारण करके उसे सदाके लिए अधोगामी बना देता है। इसलिए विशेष सतर्कताके साथ रसतत्त्वका अनुभव करना चाहिए। श्रीकृष्ण स्वयं अखण्ड रस है। उनमें चौसठ अप्राकृत गुण हैं। (१४) इन चौसठ गुणों में से प्रथम पचास गुण बिन्दु-बिन्दुरूपमें जीवोंमें होते हैं। वे पचास गुण कुछ अधिक मात्रामें तथा इनके अतिरिक्त और भी पाँच अधिक गुण शिव, ब्रह्मा, गणेश और सूर्य आदि देवताओंमें लक्षित होते हैं। इसीलिए ये देवतागण विभित्रांश होनेपर भी ईश्वर कहलाते हैं। पुनः पहलेके पचपन गुण पूर्णमात्रामें तथा इनके अतिरिक्त पाँच गुण पूर्ण रूपमें अर्थात् साठ गुण पूर्ण मात्रामें नारायण, विष्णु और उनके अवतारों में देखे जाते हैं। विष्णुतत्त्वके साठ गुण तथा इनके अतिरिक्त और भी चार अप्राकृत असाधारण गुण कृष्णमें विराजमान होते हैं।
ये चार गुण कृष्णके अतिरिक्त और किसीमें भी नहीं होते। इसलिए कृष्ण ही एकमात्र सर्वेश्वर, सर्वशक्तिमान और सर्वरसमय परतत्त्व हैं। स्वरूपशक्तिकी जितनी प्रकारकी विचित्रताएँ हैं, वे सब मूत्ति धारण करके श्रीकृष्णके शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर रसके उपकरण हैं। ह्लादिनीके सारस्वरूप श्रीवृषभानुनन्दिनी राधिका श्रीकृष्णकी सर्वाधिक प्रियतमा हैं। गोलोक व्रजमें इस रसकी नित्य स्थिति होनेपर भी कृष्णकी इच्छासे योगमाया चित्-शक्ति उस रसको अखण्ड रूपमें भौमव्रजमें प्रकाशित करती हैं। जिनकी बुद्धि प्राकृत गुणोंको पार करनेकी शक्ति प्राप्त नहीं करती, वे इस अपार रसतत्त्वकी मीमांसा या उपलब्धि करनेमें समर्थ नहीं होते और इसलिए वे लोग व्रजरसको प्राकृत रस समझकर उसकी अवज्ञा करते हैं। श्रीमद्भागवतमें ऐसा कहा गया है कि जो लोग श्रद्धापूर्वक व्रजरसका वर्णन करते हैं अथवा श्रवण करते हैं, वे शीघ्र ही पराभक्तिस्वरूप कृष्णप्रेम प्राप्त करते हैं (१५) तथा जड़ोदित हृद्रोगरूप कामसे सदाके लिए छुटकारा पा लेते हैं। यही श्रीमन्महाप्रभु की चरम शिक्षा है।
श्रील सच्चिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर
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यदि श्रेयःपथ (नित्यकल्याणकारी मार्ग) चाहूँ तो असंख्य लोगों के विचारों का परित्याग करके, श्रौतवाणी का ही, श्रवण करूँगा ।
श्रीलप्रभुपाद
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भक्ति साथ में मिश्रित हो, तभी कर्म, ज्ञान एवं योग अपना-अपना फल प्रदान कर सकते हैं। किन्तु भक्ति रहित होने पर ये सब फल देने में असमर्थ हैं। जहाँ पर भागवत और वेद के वाक्यों का आनुगत्य है, वहीं पर कर्म का फल- इस लोक और उस लोक में इन्द्रिय सुख की प्राप्ति, ज्ञान का फल-मुक्ति या ब्रह्मसायुज्य की प्राप्ति और योग का फल-सिद्धि या ईश्वर-सायुज्य आदि की प्राप्ति हो सकती है। ‘भक्ति मुख निरीक्षक कर्म-ज्ञान-योग’ किन्तु वे अर्थात कर्म व ज्ञान भगवान को या भगवान के प्रेम को प्राप्त नहीं करा सकते। केवल मात्र निष्काम शुद्धभक्ति के द्वारा ही भगवान या भगवत-प्रेम प्राप्त होता है।
इसलिए भक्ति रहित सभी व्यक्ति ही लंगड़े हैं। प्रेम के द्वारा ही प्रेम की वृद्धि होती है, और किसी साधन से नहीं। भक्ति ही साधन और भक्ति ही साध्य है। जो भगवान को नहीं चाहते, और और वस्तुएँ चाहते हैं, वे भगवान को कैसे प्राप्त कर सकते हैं? ‘शुद्ध-भक्त एकमात्र भगवान को ही चाहते हैं, अन्य वस्तुओं के लिए आकाँक्षा उनके मन में नहीं होती, इसलिए वे ही भगवान को प्राप्त करते हैं। मायावादियों के विचार में शुद्ध-भक्ति नित्य नहीं है, जबकि शुद्ध-भक्ति में भगवान नित्य हैं, भक्त नित्य है और भक्ति नित्य है। जहाँ पर भगवान के स्वरूप को नहीं मानते हैं, बल्कि ऐसी धारणा करते हैं कि स्वरूप को मानने से तो वह मायिक हो जाएगा, वहाँ पर भक्ति हो ही नहीं सकती’-
‘प्राकृत करिया माने विष्णु- कलेवर।
विष्णु निन्दा आर नाहि इहार उपर’
(चै.च.आ. 7/115)
(अर्थात् विष्णु के शरीर को प्राकृत मानना, विष्णु भगवान की सबसे बड़ी निन्दा है)। जहाँ पर भगवान के नित्य चिन्मय स्वरूप को स्वीकार किया जाता है, वहीं भगवान की कृपा से कर्म, ज्ञान एवं योग साधना का फल प्राप्त होता है और जहाँ भगवान के स्वरूप का अस्तित्व नित्य नहीं माना जाता, वहाँ किसी भी फल की प्राप्ति नहीं होती।
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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हमें संसार के लोगों को शान्ति का पथ दिखलाना है। जो पथिक रास्ता भटक गया है या अंधा है वह ठीक पथ पर या उपयुक्त मार्ग पर चलना नहीं जानता है और न ही चल सकता है। अंधे व्यक्ति की क्षमता नहीं होती और अज्ञानी रास्ता भटक जाता है। अज्ञानी को ज्ञान एवं विज्ञान सिखाना होगा। आजकल जो विज्ञान है, वही अज्ञान है यही विज्ञानियों का विचार है। ‘ज्ञान’ शब्द के पहले ‘वि’ उपसर्ग लगने से ‘विज्ञान’ हो जाता है। व्याकरणिकों के विचार से ‘वि’-उपसर्ग ‘विशेष’ एवं ‘विच्युति’- यह दो प्रकार के अर्थ में व्यवहार होता है। जैसे-विश्री, विस्मृति, विफल, विकृति आदि शब्दों का ‘वि’-उपसर्ग विच्युति अर्थ में व्यवहृत हुआ है। विकृति शब्द का ‘वि’ दोनों अर्थों में व्यवहृत होता है। इसलिए आजकल ‘विज्ञान’ शब्द का अर्थ अज्ञानियों के लिए एक प्रकार का है और वास्तविक ज्ञानियों के लिए अन्य प्रकार का। अतएव ‘विज्ञान’ कहने पर दोनों प्रकार के अर्थ को ही समझना होगा।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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गुरु-वैष्णवों से तत्त्व-जिज्ञासा करने पर अपराध नहीं होता
साधन-भजन के विषय में जितने प्रकार के प्रश्न और जिज्ञासाएँ उदित होती हैं, उन सभी को ही गुरुपादपद्म से भलिभाँति जान लेना चाहिए। इसमें भूल-त्रुटि व अपराध की कोई बात नहीं है। “दाय लागि पुछ, – एइ साधुर स्वभाव” (साधु का यही स्वभाव है कि वे दृढ़ता के लिए पूछते हैं)- इस विचार के अनुसार सब समय तत्त्व-जिज्ञासा करने में कोई दोष नहीं है। श्रीगुरु-वैष्णव अन्तर्यामी होने पर भी, मन की बात या चिन्ता-धारणा उनके निकट प्रकाशित करने से किसी प्रकार की गलती नहीं होती है।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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भगवद् सम्बंधित वस्तु बासी नहीं होती
हमारा कोलकाता मठ जब रासबिहारी एवेन्यू में था, तब एक व्यक्ति नियमित रूप से हरिकथा श्रवण करने के लिए मठ में आते थे। ख़राब मौसम में भी अन्य व्यक्ति भले ही न आएँ, किन्तु वे अवश्य आते थे। उनकी प्रशंसा करते हुए हम उनसे कहते, “आपको भगवान् की कथा श्रवण में रुचि है, यह बड़े सौभाग्य की बात है।”
आठ-नौ महीने तक प्रतिदिन हरिकथा श्रवण के लिए आते रहने के बाद अचानक उन व्यक्ति का मठ में आना बंद हो गया। हमने सोचा कि उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं होगा या वे कोलकाता छोड़कर कहीं और चले गए होंगे। हरिकथा सुनने आनेवाले अन्य व्यक्तिओं से उनके विषय में पूछने पर पता चला कि वे कोलकाता में ही हैं। उन्होंने कहा, “हमने उन्हें देखा है, किन्तु हम उनका पता नहीं जानते।” हमारे पास उनसे संपर्क करने का कोई उपाय नहीं था।
किन्तु एक दिन जब मैं किसी सेवा-कार्य के लिए मठ से बाहर गया था, तब मार्ग में मेरा उन व्यक्ति से मिलना हुआ। “ओह,” मैंने कहा, “हम सब लम्बे समय से आपके संग से वंचित हैं। क्या आप कोलकाता में नहीं थे?”
उन्होंने कहा, “मैं कोलकाता में ही था।”
है?” मैंने कहा, “फिर, आप मठ में क्यों नहीं आ रहे हैं? क्या आपका स्वास्थ्य ठीक नहीं
उन्होंने कहा, “नहीं, मेरा स्वास्थ्य भी ठीक है। मेरा मठ में न आने का कारण कुछ और है। मैं बहुत दिन तक मठ में आता रहा। मठ में दी जानेवाली सभी शिक्षाऐं मैंने श्रवण कर ली हैं। आपकी शिक्षा है कृष्ण-भजन करो, हरिनाम करो। यदि कोई नई बात सुनने को मिलेगी तो मैं फिर से आ सकता हूँ।”
उनकी यह बात सुनकर मुझे समझ में आ गया कि वे केवल ज्ञान प्राप्त करने की उत्सुकता से मठ में आते थे, भगवान् के भजन के लिए नहीं।
भगवान् अनंत हैं और उनकी महिमा भी अनंत है। भगवद् संबंधित कोई वस्तु बासी (पुरानी) नहीं होती। भगवान् का प्रसाद या भगवान् की कथा कभी बासी नहीं होती। नारद गोस्वामी अनंत काल से भगवान् का नाम-कीर्तन कर रहे हैं फिर भी कृष्ण-नाम-रस का पूर्ण रूप से आस्वादन नहीं कर पाए हैं।
यदि कोई कहे, “मैं व्रज-धाम के बारह वनों के विषय में कई बार श्रवण कर चुका हूँ। यह विषय पुराना हो गया है। मुझे किसी नए वन के विषय में सुनना है”- तो समझना होगा कि उसने कुछ श्रवण किया ही नहीं। यदि इन वनों में से किसी एक वन की महिमा भी हम वास्तविक रूप में श्रवण कर लें तो हमारा पूरा जीवन बदल जाएगा और हम पुनर्जन्म से बच जाएँगे। कृष्ण के अनंत गुणों में से यदि किसी एक गुण की महिमा भी हमारे हृदय में प्रकाशित हो जाए तो हमारा जीवन सफल हो जाएगा और हमारे सभी दुःख दूर हो जाएँगे। किन्तु भगवान् के गुणों के विषय में श्रवण-कीर्तन करने के बाद भी हम संसार के दुःखों का अनुभव करते हैं। इससे यही प्रमाणित होता है कि उन दिव्य गुणों के गान ने हमारे कर्णों को अभी तक स्पर्श भी नहीं किया है, हम भले ही सोचें कि हमने उन गुणों के विषय में श्रवण कर लिया है! ‘फलेन फल-कारणम् अनुमीयते’, श्रवण-कीर्तन से मिलनेवाले अनुभव से समझ सकते हैं कि हमारा कृष्ण से संपर्क हुआ है या नहीं।
यदि कोई कहे, “मैंने भगवान् और भक्तों की गुण महिमा का श्रवण कर लिया है, अब मुझे कुछ नया श्रवण करना है,” तो समझना होगा कि अभी तक उसका हरिकथा के साथ संपर्क ही नहीं हुआ। श्रीचैतन्य महाप्रभु ने ध्रुव और प्रह्लाद के चरित्र को सौ-सौ बार सुनने के बाद और सुनने की इच्छा प्रकट की। यदि भगवान् और भक्तों की महिमा अनेकों बार श्रवण करने के बाद और श्रवण करने की इच्छा हो तो समझना होगा कि हमने भक्तिराज्य में प्रवेश किया है। अन्यथा, हम भक्तिराज्य से बाहर ही हैं।
हमारे मठ में प्रत्येक दिन तीनों समय भगवान् की आरती और पाठ-कीर्तन होता है। क्या कुछ नया किया जाता है? सभी ने आरती और हरिकथा का श्रवण कर लिया है। किन्तु मेरे गुरुदेव और परमगुरुदेव की शिक्षा है कि हमें भगवान् की कथा बार-बार श्रवण करनी है। इसी से हमारा कल्याण होगा।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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