श्रीमद् भागवतम् श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक

मुनियों की जिज्ञासा

संस्कृत में शुक शब्द का अर्थ तोता होता है। जब कोई पका फल ऐसे पक्षियों की लाल चोंच से काट दिया जाता है तो उसकी मिठास बढ़ जाती है। वैदिक फल ज्ञान में प्रौढ़ तथा पक्व है। यह श्रील शुकदेव गोस्वामी के होठों से निकला है, जिनकी तुलना तोते से की गई है, इसलिए नहीं कि उन्होंने अपने विद्वान पिता से जिस रूप में सुना था उसी रूप में सुना दिया, अपितु अपनी उस क्षमता के कारण जिसके बल पर उन्होंने इस कृति को सभी वर्ग को भाने वाले रूप में प्रस्तुत किया।

थील शुकदेव गोस्वामी के होठों से कथावस्तु इस प्रकार निस्सृत हुई है कि जो भी निष्ठावान श्रोता विनीत भाव से सुनता है वही इसके दिव्य रस का आस्वादन करता है जो भौतिक जगत के विकृत रसों से भिन्न है। यह पक्व फल सर्वोच्च कृष्णलोक से एकाएक नहीं आ टपका। प्रत्युत यह शिष्य-परम्परा की श्रृंखला से होता हुआ, सावधानी पूर्वक बिना किसी परिवर्तन या अवरोध के नीचे तक आया है। ऐसे मूर्ख लोग जो दिव्य शिष्य परम्परा से सम्बद्ध नहीं हैं, वे रास नृत्य के सर्वोच्च दिव्य रस को, उन शुकदेव गोस्वोमी के चरणचिन्हों का अनुगमन किए बिना, समझने का प्रयत्न करके भयंकर भूल करते हैं, जिन्होंने इस फल को दिव्य अनुभूति की अवस्थानुसार प्रस्तुत किया है। मनुष्य को चाहिए कि शुकदेव गोस्वामी जैसे महापुरुषों को ध्यान में रखकर श्रीमद्भागवत की स्थिति को जानें जिन्होंने विषय का प्रतिपादन बड़ी सावधानी से किया है। भागवत की यह शिष्य परम्परा बताती है कि भविष्य में भी श्रीमद्भागवत को ऐसे व्यक्ति से समझा जाय जो श्रील शुकदेव गोस्वामी का पूर्ण प्रतिनिधित्व करता हो। ऐसा व्यावसायिक व्यक्ति जो अवैध रूप से भागवत सुना कर व्यापार चलाता है वह शुकदेव गोस्वामी का सही प्रतिनिधित्व नहीं करता। ऐसे व्यक्ति का पेशा एकमात्र अपनी जीविका कमाना है। अतः ऐसे व्यवसायी व्यक्तियों के भाषण नहीं सुनने चाहिए। ऐसे व्यक्ति इस गम्भीर विषय को समझने की क्रमिक विधि का अभ्यास किये बिना, गुह्यतम अंशों को सुनाते हैं। वे सामान्यतया रास-नृत्य की कथावस्तु में गोता लगाने लगते हैं और मूर्ख लोग इसका बुरा अर्थ लगाते हैं। कुछ लोग इसे अनैतिक बताते हैं, अन्य लोग अपनी धूर्त व्याख्याओं के द्वारा इस पर पर्दा डालते चलते हैं। उनमें श्रील शुकदेव गोस्वामी के चरणचिह्नों पर चलने की लेशमात्र इच्छा नहीं रहती।

अतः निष्कर्ष यह निकलता है कि ‘रस’ के गम्भीर छात्र को श्रील शुकदेव गोस्वामी से चली आने वाली शिष्य-परम्परा से भागवत का सन्देश प्राप्त करना चाहिए, जिन्होंने भागवत का वर्णन उन संसारी लोगों की तुष्टि के लिए, जिन्हें दिव्य विज्ञान का अल्पज्ञान है, किसी मनमानी ढंग से नहीं, अपितु शुरू से सुनियोजित ढंग से प्रारम्भ किया है। श्रीमद्भागवत को इतनी सावधानी से प्रस्तुत किया गया है कि निष्ठावान तथा गम्भीर व्यक्ति तुरन्त वैदिक ज्ञान के इस पक्व फल का आनन्द, शुकदेव या उनके प्रामाणिक प्रतिनिधि के मुख से निस्सृत अमृत रस का पान करके, उठा सकता है। आगे……….

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भगवान्‌ की जन्म कर्मादि लीला अप्राकृत और नित्य है-

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥

(गीता ४/९)

हे अर्जुन ! अचिन्त्य चित्रशक्तिके द्वारा मेरा आविर्भाव और कर्म दिव्य है-इसे जो पुरुष तत्त्वसे जानता है, वह देहको त्यागकर संसारमें फिर जन्म नहीं लेता वरन् मुझे ही प्राप्त होता है।

गौड़ीय कण्ठहार

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श्रीचैतन्य महाप्रभु

निमाई की अध्यापन लीला

निमाई अध्यापक की लीला करने लगे। वे नवद्वीप में हज़ारों छात्रों को पढ़ाते । निमाई पडित की पाँडित्यपूर्ण व्याख्या सिर्फ श्री गंगादास पंडित को छोड़ कर और कोई समझ नहीं पाता था। निमाई पंडित पाठशाला खोलकर छात्रों को पढ़ाने के साथ-साथ सदाचार की शिक्षा भी देते थे । यदि कोई छात्र मस्तक पर ऊर्ध्वपुंडू तिलक नहीं लगा कर आता तो महाप्रभु उसे इस प्रकार लज्जित करते कि दूसरी बार बिना तिलक लगाए वह पढ़ने नहीं आ सकता था । निमाई पंडित कहते जिसके माथे पर तिलक नहीं, वेद में उस माथे को शमशान के बराबर कहा है। ऐसा कहकर प्रभु उस छात्र को पुनः तिलक लगाकर सन्ध्यादि करने के लिए घर भेज देते थे। एक दिन निमाई छात्रों को पढ़ाकर घर लौट रहे थे कि अचानक श्रीईश्वर पुरीपाद के साथ इनका मिलन हुआ। प्रथम मिलन में ही ये दोनों एक दूसरे के प्रति आकृष्ट हो गए । श्रीईश्वर पुरीपाद का प्रेम देखकर सब लोग तो पहले से ही आकृष्ट थे। न जाने क्यों ईश्वर पुरीपाद ने निमाई पंडित से बहुत से प्रश्न किये तथा प्रश्नों के ठीक-ठीक उत्तर पाकर बहुत प्रसन्न हुए। तत्पश्चात निमाई पडित की ही विशेष प्रार्थना पर ईश्वर पुरीपाद जी निमाई पंडित के घर आये और शची माता ने बहुत प्रकार के नैवेद्य श्रीकृष्ण को भोग लगाकर प्रसाद रूप से ईश्वर पुरीपाद के सम्मुख रखे ।

ईश्वर पुरीपाद जब नवद्वीप में गोपीनाथ आचार्य के घर में रहते थे तो एक दिन उन्होने निमाई को कहा कि देखो मैंने “श्रीकृष्ण लीलामृत” नामक ग्रन्थ लिखा है। आप पंडित हो, यदि आप उसमें गल्ती संशोधन कर दें तो बहुत ही अच्छा होगा। लेकिन निमाई भक्त की महिमा बढ़ाते व स्वयं दीनता प्रकट करते हुए कहने लगे कि भक्त के वाक्यों में दोष देखने वाले को ही महादोष लगता है। ऐसा कोई भी दुःसाहसी व्यक्ति नहीं हो सकता जो महाभागवत ईश्वर पुरीपाद जी की हरिकथा वर्णन में दोष देखने में समर्थ हो।

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पृथ्वी रेणुरणुः पयांसि कणिकाः फल्गुः स्फुलिङ्गो लघु-स्तेजो निःश्वसनं मरुत्तनुतरं रन्धं सुसूक्ष्मं नभः।
क्षुद्रा रुद्र – पितामह – प्रभृतयः कीटाः समस्ताः सुराः दृष्टे यत्र स तारको विजयते श्रीपाद – धूलीकणः ।।23 ।।

हे भगवान! आपके सामने तो ये सारी पृथ्वी छोटे से धूल के एक कण के बराबर है। ये सारे समुद्र भी एक कण की तरह हैं। आपके पास चन्द्रमा व सूर्य आदि का तेज, आग की एक छोटी-सी चिन्गारी के बराबर है। पृथ्वी की सारी वायु एक हल्की सी श्वास वायु की तरह अतिशय सूक्ष्म है, आकाश एक छोटे से एक छेद के समान है, रुद्र व ब्रह्मादि भी अत्यन्त छोटे हैं तथा समस्त देवता तो कीटतुल्य होकर रहते हैं – सबके उद्धारक इस प्रकार आपके ये जो श्रीचरणों के धूलि-कण हैं, इनकी जय-जयकार हो रही है।

श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्

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शास्त्रों में विश्वास होना ही श्रद्धा है

श्रीमन्महाप्रभुजीके उपर्युक्त वचनोंमेंसे “कण्ठे करि एइ श्लोक करह विचार।”- इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि शास्त्र विचारसे श्रद्धा पुष्ट होकर उन्नतावस्थाको प्राप्त करती है। श्रीमन्महाप्रभुजीके मतानुसार शास्त्र अर्थात् वेदशास्त्र ही एकमात्र प्रमाण हैं। केवल तर्कशास्त्र आदि कोई प्रमाण नहीं हैं। इस विषयमें श्रीचैतन्यचरितामृत (आ. ७।१३२) में लिखा है-

स्वतःप्रमाण वेद-प्रमाण-शिरोमणि ॥

पुनः (चै. च. म. २०/१२२) सनातन गोस्वामीकी शिक्षाके प्रसङ्गमें लिखा है-

मायामुग्ध जीवेर नाहि कृष्णस्मृति-ज्ञान।
जीवेरे कृपाय कैला कृष्ण वेद-पुराण ॥

श्रील सच्चिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर

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मैं जिसका संग करूँगा या जिससे कथा सुनूँगा, वह श्रौतपन्थी होना चाहिए । साधु गुरु कभी भी प्रेय पथ स्वीकार नहीं करते। वे श्रेयपन्थी या श्रौतपन्थी होते हैं । श्रौतपन्थी साधु अपने गुरुदेव के श्रीमुख से सत्यपथ या भक्तिपथ में चलने की जो शिक्षा प्राप्त करते हैं, उसी को वे दूसरों को बतलाते हैं। वे दूसरों को अपने मनःकल्पित बात कभी भी नहीं कहते । अनेक समय हमलोग गुरु का आश्रय ग्रहण करते हैं अथवा साधु संग करते हैं-अपने आत्मकल्याण के लिए नहीं, बल्कि प्रेय प्राप्ति अथवा अपस्वार्थ (अपनी कामना वासना को) को पूर्ण करने के लिए। आजकल गुरु ग्रहण करना तो एक श्रेणी के लोगों के लिए नाई या धोबी रखने की भाँति एक लौकिक या कुल परम्परा चल पड़ी है, और एक श्रेणी के लोगों के लिए गुरु करना एक फैशन मात्र हो गया है। साधुसंग या हरिकथा सुनना भी उसी प्रकार का एक कार्य हो गया है। अतः हमारा मंगल कैसे होगा ? उपयुक्त गुरु के मुख से कथा न सुनने पर क्या किसी का कल्याण हो सकता हैं ? इसीलिए जो अपना मंगल चाहते हैं, उन्हें साधुसंग के विषय में सावधान रहना चाहिए । साधु नामधारी लोगों के मुख से हरिकथा सुनने पर विपत्ति में ही पड़ना पड़ता है।

श्रीलप्रभुपाद

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“धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः सः पंथाः ।।” अर्थात्

धर्म का तत्त्व महाजनों की हृदय रूपी गुफा में ही छिपा हुआ है। जिस शास्त्र में यह वाक्य लिखित है उसी शास्त्र में महाजन कौन हैं, वह भी बताया गया है। श्रीम‌द्भागवत में केवल बारह महाजनों के नाम का उल्लेख है। उनके पीछे-पीछे चलने की बात ही लिखी हुई है। उक्त द्वादश महाजन ही धर्म प्रचारक गुरु हैं, और कोई नहीं। द्वादश महाजनों के नाम हैं, –

स्वयंभूर्नारदः शम्भु कुमारः कपिलो मनुः ।
प्रह्लादो जनको भीष्मो वलिर्वैयासकिर्वयम् ।।

– (भाः 6/3/20)

स्वयम्भू, नारद, शम्भु, सनत्‌कुमार, देवहूति-पुत्र कपिल, मनु, जनक, भीष्म, बलि, वैयासकि, प्रहलाद, यमराज- यह बारह महाजन हैं।

इसलिए सभी महाजन नहीं हैं। जो उक्त बारह महाजनों के अधीन हैं, उन्हीं को महाजनानुग कहा जाता है। ये सभी वैष्णव हैं। धर्म जगत में प्रत्यक्षवादी, परोक्षवादी, अपरोक्षवादी एवं चतुर्थ ‘अधोक्षज’ से भी अप्राकृत-तत्त्व अधिक श्रेष्ठ है।

अति प्राचीन समय से ही प्रथम तीन श्रेणी (अर्थात् प्रत्यक्षवादी, परोक्षवादी एवं अपरोक्षवादी) के धर्मवेत्ता चले आ रहे हैं। वे शास्त्रीय महाजन नहीं हैं।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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कर्तुमकर्तुमन्यथा कर्तुं यः समर्थः स ईश्वरः ।’

सर्वशक्तिमान् जिस किसी भी स्थान में, जिस किसी मूर्ति से, सर्वशक्तियों के साथ आ सकते हैं। यदि कहें कि नहीं, तब तो हमारे द्वारा उनकी सर्वशक्तिमत्ता और असीमत्व को अस्वीकार करना होगा। मैं किसी वस्तु को भगवान् मानूँ तो वह भगवान् नहीं बन जायेगी, क्योंकि भगवान् हमारे अधीन नहीं हैं।

कई लोग ऐसा सोच सकते हैं कि भगवान् जब पृथ्वी पर आते हैं। तब माया के त्रिगुणों को स्वीकार कर के ही आते हैं, यह सम्पूर्ण अज्ञानजनित धारणा है। भगवान् अपने अप्राकृत स्वरुप से ही जगत में आते हैं; वे माया की पोशाक पहन कर नहीं आते, क्योंकि वे मायाधीश हैं। कर्म फल बन्धन का जो कानून है, वह भगवान् या भगवान् के पार्षदों पर लागू नहीं होता। ये माया का ब्रह्माण्ड बहिर्मुख जीवों का कारागार है। कारागार का मालिक जैसे अपनी पोशाक में ही आता है, कैदी की Dress में नहीं, उसी प्रकार मायाधीश भगवान् अपने ही स्वरूप से जगत में आते हैं। उन निर्गुण स्वरूप भगवान् के प्रकट होने पर भी त्रिगुणों से बँधे जीव अपने त्रिगुणात्मक रंगीन चश्मों से दर्शन करने के कारण निर्गुण स्वरूप भगवान् को भी त्रिगुणमय देखते हैं। दर्शन करने का माध्यम रंग रहित होने पर ही वस्तु की यथायथ प्रतीति हो सकती है। भक्त-लोग निर्गुण, अप्राकृत, प्रेम-नेत्रों से ही भगवान् का वास्तविक स्वरूप दर्शन करते हैं-

‘प्रेमाञ्जनच्छुरित भक्तिविलोचनेन सन्तः सदैवद्वदयेषु विलोकयन्ति ।’

(ब्र.सं. 5/38)

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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सेवक’ बनने के प्रयास में, ‘प्रभु’ मत बन जाना, चरम दुर्दशा को वरण मत करना। दूसरों को उपदेश देने की अपेक्षा स्वयं आत्मसंशोधन करने की चेष्टा करने से अधिक कल्याण होगा।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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सुत-दारा-लक्ष्मी पापी के भी होय

एक बार एक आसाम की महिला हमारे कोलकाता मठ में आई। श्रील भक्ति प्रचार पर्यटक महाराज से उन्हें हमारे मठ के विषय में जानकारी मिली थी। वह मेरे पास आई और रोने लगी।

मैंने उनसे उनके दुःख का कारण पूछा। उन्होंने उत्तर दिया, “मेरा एक बेटा है जिसकी एक आँख क्षतिग्रस्त हो गई है। इतनी कम आयु में ही एक आँख चले जाने से आगे का पूरा जीवन बिताना उसके लिए बहुत कठिन होगा। डॉक्टर कह रहे हैं कि उसकी आँख ठीक नहीं हो सकती। कृपया आप कोई उपाय बताइए।”

मैंने उनसे पूछा, “क्या आपका बेटा आपके साथ आया है?” महिला ने उत्तर दिया “हाँ, वह मेरे साथ आया हुआ है।”

वह अपने बेटे को लेकर मेरे पास आई। मैंने देखा उनके बेटे का शारीरिक स्वास्थ्य अच्छा है पर उसकी एक आँख ठीक नहीं है। मैंने कोलकाता के पी. बैनर्जी नाम के एक होम्योपैथिक डॉक्टर का नाम सुना था जो अनेक रोगों के उपचार के लिए जाने जाते थे। उन दिनों उनकी फीस २०० रुपए थी। मैंने उन्हें पी. बैनर्जी को दिखाने का सुझाव देते हुए कहा, “आपने इतने डॉक्टरों से जाँच करवाई है, तो एक और डॉक्टर को भी दिखा दीजिए।”

वह अपने बेटे को पी. बैनर्जी के पास ले गई। डॉक्टर ने उन्हें दो महीने के लिए कोलकाता में रहकर इलाज करवाने के लिए कहा पर महिला ने बताया कि इतने लंबे समय तक वे कोलकाता में नहीं रह सकते, अधिक से अधिक पंद्रह दिनों तक रह सकते हैं। डॉक्टर ने उन्हें दो महीने की दवाई एक साथ ही दे दी। दवाई से धीरे-धीरे उनके बेटे की आँख ठीक होने लगी और कुछ ही महीनों में उसे ठीक से दिखाई देने लगा। महिला ने सोचा कि उनके बेटे की आँख मेरे आशीर्वाद के कारण ठीक हुई है इसलिए उन्होंने मठ की शिष्या बनने का निर्णय लिया।

हमारे भक्ति प्रचार पर्यटक महाराज के बहुत आग्रह करने पर, आसाम यात्रा के दौरान, भक्तों के साथ मेरा उन माताजी के घर जाना हुआ। माताजी के परिवार वालों ने वहाँ एक बड़े संकीर्तन की व्यवस्था की थी। माताजी के अलावा उनके परिवार के बाकी सभी सदस्यों ने भी दीक्षा ली और मठ के शिष्य बने। उन्होंने और उनके परिवार के सदस्यों ने दीक्षा इसलिए ली क्योंकि उनके बेटे की आँख ठीक हो गई थी जिससे अब वह इस जगत् की वस्तुओं को देख सकता था और सुख अनुभव कर सकता था।

क्या भगवान् का भजन जागतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए है? आँखें कितने समय तक रहेंगी? मृत्यु के समय आँखें और अन्य सभी इन्द्रियाँ नष्ट हो जाएँगी।

अनेक व्यक्ति साधु के पास या भगवान् के पास भगवान् की सेवा के लिए नहीं बल्कि व्यवसाय करने जाते हैं। कन्या के विवाह के लिए धन की आवश्यकता को पूरा करने के लिए भगवान् के पास धन माँगने जाते हैं। वे कहते हैं, “विवाह के लिए पाँच लाख रुपए चाहिए। मेरे पास दो लाख हैं, आपको सौ रुपए देता हूँ, आप बाकी के तीन लाख रुपयों की व्यवस्था कर दीजिए!” यह क्या भगवान् की सेवा के लिए जाना हुआ? यह तो एक प्रकार का व्यवसाय है।

“सुत-दारा-लक्ष्मी पापी के भी होय, संत समागम हरिकथा तुलसी दुर्लभ दोय।” तुलसीदास जी शिक्षा दे रहे हैं कि पुत्र-पुत्री, पत्नी, धन-संपत्ति आदि तो पापी के घर में भी होते हैं किन्तु सच्चा साधु और हरि-कथा दुर्लभ है, सहजता से नहीं मिलते।

अनेकों स्थानों पर देखा जाता है कि केवल, ‘संत समागम हरिकथा तुलसी दुर्लभदोय’ इसी वाक्य की व्याख्या की जाती है, “साधु आ गए हैं। त्रिवेणी संगम आ गया है। गंगाजी-यमुना जी आ गईं हैं। अभी यहाँ डुबकी लगाइए। आपका कल्याण होगा।” किन्तु ‘सुत-दारा-लक्ष्मी पापी के भी होय’ वाक्य की व्याख्या नहीं की जाती। तुलसीदास जी जैसे महात्मा के सभी वचन क़ीमती हैं।

सुत-दारा-लक्ष्मी, करोड़ों रुपयों का घोटाला करनेवाले व्यक्ति के पास जाने से भी मिलेंगे। इन सबके लिए साधु के पास जाने की क्या आवश्यकता है? तुलसीदास जी हमें शिक्षा दे रहे हैं कि यदि हम नाशवान वस्तुओं के लिए साधु के पास जाएँगे तो साधु का वास्तविक संग नहीं होगा। साधु के पास सांसारिक वस्तुओं के लिए जाना उचित नहीं है। ऐसा करने से हम अपना और साधु, दोनों का समय व्यर्थ करते हैं।

मनुष्य जीवन में भगवान् ने सत्-असत् का विवेक दिया है जिसका उपयोग कर जीव असत् (नाशवान वस्तुओं) को छोड़ सत् को ग्रहण कर सकता है। भगवान् कहते हैं, “यदि तुम अपने विवेक का उपयोग करके सत् को ग्रहण नहीं करोगे तो पशुओं से किस प्रकार से श्रेष्ठ कहलाओगे? आहार, निद्रा, भय और मैथुन पशु भी करते हैं। मनुष्य शरीर में जीव यदि सत्-असत् के विवेक के द्वारा असत् को छोड़ सत् को ग्रहण न करे तो वह पशु-तुल्य ही कहलाएगा। मनुष्य जन्म भगवान् के भजन के लिए है। मनुष्य योनि की सृष्टि करके भगवान् को आनंद हुआ क्योंकि केवल मनुष्य योनि में ही जीव भजन करके भगवान् के पास जा सकते हैं, किसी अन्य योनि में नहीं। इसलिए देवता भी मनुष्य जन्म प्राप्त करने की इच्छा करते हैं। मनुष्य जन्म दुर्लभ है। ८० लाख योनियों में भ्रमण करने के बाद मनुष्य जन्म मिलता है, किन्तु उससे भी दुर्लभ है मनुष्य जन्म में शुद्ध-भक्तों के दर्शन का सौभाग्य मिलना। यह अत्यंत दुर्लभ सौभाग्य प्राप्त करने के बाद भी यदि हम शुद्ध-भक्तों से संसार की नाशवान वस्तुएँ माँगे, तो क्या यह बुद्धिमानी कहलाएगी? जो साधु ऐसी नाशवान वस्तुएँ देते हैं, वे वास्तविक साधु नहीं हैं। साधु कभी यह नहीं कह सकते कि आग में कूदकर जलो और मरो। संसार की नाशवान वस्तुएँ आग के समान हैं। ऐसा कौन साधु है जो जीव के सर्वनाश के लिए उसे आग में कूदकर मरने को कहेगा? कोई साधु ऐसा नहीं कह सकता। ये साधु के लक्षण नहीं हैं।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज

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