श्रीमद् भागवतम् श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक

मुनियों की जिज्ञासा

अतएव जो व्यक्ति कार्यकलापों के मूल तत्व रूप इन विभिन्न रसों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेता है वही मूल रसों के छद्म स्वरूपों को भौतिक जगत में प्रतिबिम्बित होते समझ सकता है। विद्वान लोग वास्तविक रस का उसके आध्यात्मिक रूप में आस्वादन करना चाहते हैं। प्रारम्भ में वे परमेश्वर से एकाकार होना चाहते हैं। इस प्रकार अल्पज्ञ अध्यात्मवादी, विभिन्न रसों को जाने बिना, पूर्ण आत्मा से एकाकार के बोध से ऊपर नहीं जा पाते।

इस श्लोक में निश्चित रूप से कहा गया है कि वह आध्यात्मिक रस, जिसका आस्वादन मुक्त अवस्था में भी होता है, श्रीमद्भागवत के साहित्य में अनुभव किया जा सकता है, क्योंकि यह वैदिक ज्ञान का पक्व फल है। इस दिव्य साहित्य का विनीत भाव से श्रवण करने पर मनवांछित आनन्द पूर्णतया प्राप्त किया जा सकता है। किन्तु उपयुक्त स्रोत से ही यह संदेश सुना जाना आवश्यक है। इसकी सतर्कता बरतनी होगी। श्रीमद्भागवत को उपयुक्त स्रोत से ही यथारूप में ग्रहण किया जा सकता है। इसे वैकुण्ठलोक से ले आने वाले नारद मुनि हैं जिन्होंने इसे अपने शिष्य श्रीव्यासदेव को प्रदान किया। श्रीव्यासदेव ने इस संदेश को अपने पुत्र शुकदेव गोस्वामी को और फिर उन्होंने इसे महाराज परीक्षित को उनकी मृत्यु से केवल सात दिन पूर्व प्रदान किया। श्रीशुकदेव गोस्वामी अपने जन्म से ही मुक्त जीव थे। यहाँ तक कि वे अपनी माता के गर्भ में ही मुक्त हो गए थे और जन्म के पश्चात् उन्हें किसी प्रकार की आध्यात्मिक शिक्षा नहीं ग्रहण करनी पड़ी। जन्म के समय कोई भी व्यक्ति न तो लौकिक दृष्टि से, न ही आध्यात्मिक दृष्टि से योग्य होता है। किन्तु पूर्णतया मुक्त जीव होने के कारण, श्रीशुकदेव गोस्वामी को आध्यात्मिक साक्षात्कार के लिए किसी प्रकार की विकास विधि का अनुसरण नहीं करना पड़ा। अपितु तीनों गुणों से परे पूर्णतया मुक्त पद पर स्थित रह कर भी, वे उन भगवान् के इस दिव्य ‘रस’ के प्रति आकर्षित हुए जिनकी अर्चना मुक्त जीवों द्वारा वैदिक मन्त्रों से की जाती है। परमेश्वर की लीलाएँ मुक्त जीवों को, संसारी लोगों की अपेक्षा, अधिक आकर्षक लगती हैं। भगवान् किसी भी दृष्टिकोण से निराकार नहीं हैं, क्योंकि दिव्य रस की निष्पत्ति केवल व्यक्ति के साथ ही सम्भव है।

श्रीमद्भागवत में भगवान् की दिव्य लीलाओं का वर्णत है और श्रील शुकेदव गोस्वामी ने क्रमबद्ध रूप में इनका वर्णन किया है। इस प्रकार विषय-वस्तु सभी वर्ग के मनुष्यों को भाने वाली है, चाहे वे मुक्तिकामी हों या परब्रह्म के साथ तादात्म्य की इच्छा करने वाले हों। आगे……….

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जगत्का भार हरण और पालन-लीला-

स्वयं भगवानेर कर्म नहे भार-हरण।
स्थितिकर्त्ता विष्णु करेन जगत् पालन ॥
किन्तु कृष्णेर जेइ हय अवतार-काल।
भारहरण-काल ता’ते हइले मिशाल ॥
पूर्ण भगवान् अवतरे जेइ काले।
आर सब अवतार ताँ’ते आसि’ मिले ॥
अतएव विष्णु तखन कृष्णेर शरीरे।
विष्णुद्वारे कृष्ण करे असुर संहारे ॥

(चै. च. आ. ४/८-१०,१३)

स्वयं भगवान्‌का कार्य पृथ्वीका भार हरण करना नहीं है। भू-भार हरण करना अथवा जगत्‌का पालन करना विष्णुका कार्य है किन्तु जिस समय स्वयं भगवान् श्रीकृष्णका अवतार ग्रहण करनेका समय होता है, उसी समय संयोगवशतः भू-भार हरणका भी काल उपस्थित हो गया। पूर्ण भगवान जिस समय अवतरित होते हैं, उस समय सारे अवतार उनमें मिल जाते हैं। इसलिए कृष्णके अवतरित होनेपर विष्णु भी उनके शरीरमें प्रविष्ट रहते हैं। उन विष्णुके द्वारा ही कृष्ण असुरोंका संहार करते हैं।

गौड़ीय कण्ठहार

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श्रीचैतन्य महाप्रभु

निमाई का जूठी हाँड़ियों पर बैठना एवं दत्तात्रेय भाव में तत्व उपदेश

विश्वरूप के सन्यास से दुःखी शची माता और श्रीजगन्नाथ को प्रसन्न करने के लिए निमाई अब खूब ध्यान से पढ़ाई लिखाई करने लगे । लेकिन बालक का अद्भुत पॉडित्य देखकर जगन्नाथ मिश्र के मन में सन्देह हुआ कि कहीं ऐसा न हो कि निमाई भी शास्त्रों में प्रवीण होकर संसार की अनित्यता को समझ जाए और फिर विश्वरूप की तरह ही सन्यास ले ले । इसलिए मिश्र जी ने शची माता को कह कर निमाई का स्कूल जाना बंद करा दिया। इससे निमाई क्रोध लीला प्रदर्शन करते हुए वहाँ जाकर बैठ गये जहाँ विष्णु की प्रसादी (जूठी) हाँड़ियाँ पड़ी थीं। सखाओं ने जाकर शची माता को जब शिकायत की तो वह हाय! हाय! करती दौड़ी चली आयीं और निमाई को कहा कि तुम गन्दे स्थान पर क्यों बैठे हो, चलो गड्ढे से बाहर आओ । तब बड़े भोलेपन से निमाई ने कहा कि मैं तो पाठशाला जाता नहीं, मैं तो मूर्ख हूँ – मुझे क्या पता कि क्या पवित्र है, क्या अपवित्र? उसके बाद निमाई विष्णुवतार दत्तात्रेय के भाव में माता जी को तत्व उपदेश करने लगे। माता ने देखा कि निमाई किसी प्रकार से भी अपवित्र स्थान नहीं छोड़ रहा है तो ज़बरदस्ती वह उसे खींच कर ले गयीं, स्नान कराया और मिश्र जी से कहकर निमाई को दुबारा पाठशाला भेजना प्रारम्भ कर दिया ताकि उनका लाड़ला निमाई मूर्ख ही न रह जाए ।

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तृष्णातोये मदन – पवनोदधृत – मोहोम्मि – माले, दारावर्त्त तनय – सहज – ग्राह – संघाकुले च ।
संसाराख्ये महति जलधौ मज्जतां नस्त्रिधामन् ! पादाम्भोजे वरद ! भवतो भक्तिनावं प्रयच्छ ।।

हे त्रिलोकपति ! हे वरदान देने वाले प्रभो! जहाँ पर आशा रूपी जल की मोह रूपी तरंगें, कामना-वासना रूपी वायु के द्वारा उछल रही हों तथा जहाँ पर पत्नी रूपी भंवर तथा पुत्र व भाई रूपी मगरमच्छों से व्याकुलता हो, ऐसे संसार नामक महा-समुद्र में डूबते हुए हम जैसे असहाय व्यक्तिों का उद्धार करने के लिए अपने पादपद्म रूपी नाव प्रदान कीजिए अर्थात् भयंकर संसार रूपी समुद्र में डूबते हुए हमको अपने चरण – कमलों का आश्रय प्रदान कीजिए।

श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्

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श्रीनाम-प्रचार

श्रीचैतन्य महाप्रभुजीने सम्पूर्ण भारतमें विशुद्ध वैष्णव-धर्म या जीवके स्वरूप-धर्मका प्रचार किया था। कहीं स्वयं जाकर और कहीं अपने प्रचारकोंको भेजकर उन्होंने यह कार्य पूरा किया था। उन्होंने प्रचारकोंमें असीम शक्तिका सञ्चार करके उनको उत्तर और दक्षिण भारतके विभिन्न प्रदेशोंमें प्रचार करनेके लिए भेजा था। ये प्रचारक किसी प्रकारके वेतन या पुरस्कारकी आशासे नहीं, वरन् श्रीमन्महाप्रभुके प्रेमसूत्रमें बँधकर स्वेच्छासे प्रचार करते थे। उनका चरित्र बड़ा ही उज्ज्वल एवं सदाचारपूर्ण था। यदि प्रचारकोंका चरित्र विशुद्ध और सदाचारपूर्ण न हो, तो विशुद्ध धर्मका प्रचार सम्भव नहीं है। इसीलिए ऐसा देखा जाता है कि आजकल वेतनभोगी लोग प्रचार करते हैं, परन्तु उनके प्रचारका फल जैसा होना चाहिए, वैसा नहीं होता। श्रीचैतन्यचरितामृतमें ऐसा लिखा है-

एई पञ्चतत्त्वरूपे श्रीकृष्णचैतन्य ।
कृष्ण-नाम-प्रेम दिया विश्व कैला धन्य ॥
मथुराते पाठाइल रूप-सनातन।
दुइ सेनापति कैल भक्ति-प्रचारण ॥
नित्यानन्द-गोसाऐं पाठाइला गौड़देशे।
तेहों भक्ति प्रचारिला अशेष विशेषे ॥
आपने दक्षिण देश करिला गमन।
ग्रामे ग्रामे कैला कृष्णनाम-प्रचारण ॥
सेतुबन्ध पर्यन्त कैला भक्तिर प्रचार।
कृष्णप्रेम दिया कैला सबार निस्तार ॥

(चै. च. आ. ७/१६३-१६७)

अर्थात् स्वयंभगवान् श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुजीने- भक्तरूप (स्वयं), भक्तस्वरूप (श्रीनित्यानन्द प्रभु), भक्तावतार (श्रीअद्वैताचार्य प्रभु), भक्त (श्रीवास आदि भक्तवृन्द) और भक्तशक्ति (गदाधर प्रभु)- इस पञ्चतत्त्वके रूपमें कृष्णनाम और कृष्णप्रेमका दानकर विश्वको धन्य कर दिया। उन्होंने कृष्णनाम और कृष्णप्रेमका प्रचार करनेके लिए अपने दो प्रधान सेनापतियों- श्रीरूप गोस्वामी एवं श्रीसनातन गोस्वामीको मथुरामें और श्रीनित्यानन्द प्रभुको गौड़देश (बंगाल) में भेजा। इन लोगोंने अपने-अपने क्षेत्रोंमें शुद्धभक्तिका प्रचार किया। महाप्रभुजीने स्वयं दक्षिण भारतका भ्रमणकर वहाँ गाँव-गाँवमें कृष्णनामका प्रचार किया। इस प्रकार उन्होंने भारतके पश्चिमोत्तर और पूर्वी प्रदेशोंसे आरम्भकर दक्षिणमें रामेश्वर तक कृष्णनामका प्रचार किया और कृष्णप्रेम-दानकर सबका उद्धार किया।

श्रील सच्चिदानन्द भक्ति विनोद ठाकुर

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सद्गुरु के श्रीचरणकमलों का आश्रय लेने से ही क्या सब कुछ प्राप्त हो जायेगा ?

श्रीगुरुदेव का चरणाश्रय करने पर कृष्णनाम, कृष्णमन्त्र इत्यादि सभी कुछ प्राप्त हो जाता है। किन्तु श्रीगुरुदेव की प्रचुरमात्रा में सेवा करने की बुद्धि न होने पर इन सब अप्राकृत (भगवान एवं भक्ति) वस्तुओं की अनुभूति नहीं होती । विश्रम्भपूर्वक अर्थात् दृढविश्वास या प्रीतिपूर्वक श्रीगुरुदेव की सेवा न करने पर तथा श्रीगुरुदेव के निर्देशानुसार भक्तिमार्ग में अग्रसर न होने पर हमारा वास्तविक कल्याण नहीं हो सकता अर्थात् हमें भक्ति प्राप्त नहीं हो सकती । क्योंकि आध्यक्षिक लोग तर्कपन्थी होते हैं। तर्कपथ का अवलम्बन करने पर श्रौतपथ या भक्तिमार्ग की बातें समझ में नहीं आ सकतीं । क्योंकि तर्क बुद्धि की उपज है, परन्तु भक्ति बुद्धि से अतीत होती है। किसी भक्तगुरु के चरणों के आश्रय में रहकर ही उनके आनुगत्य में भक्तिपथ में विचरण न करने पर बुद्धि का उपयुक्त व्यवहार नहीं हो सकता । इसीलिए शास्त्रों में कहा गया है- आदौ गुरुपदाश्रय तस्माद् कृष्ण दीक्षादि शिक्षणम्, विश्रम्भेण गुरोः सेवा, साधु वर्मानुवर्तनम् । अर्थात् सर्वप्रथम साधक को गुरुपदाश्रय करना चाहिए । तत्पश्चात् उनसे कृष्णदीक्षा एवं शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए, तत्पश्चात् प्रीतिपूर्वक गुरुसेवा एवं महाजनों के द्वारा प्रदर्शित मार्ग का अवलम्बन करना चाहिए ।

श्रीलप्रभुपाद

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भक्ति में कोई प्रादेशिकता का विचार नहीं है। स्वयं भगवान् देश और काल के परे हैं, इसीलिए देश और काल के अतीत चित्त के द्वारा ही उनको प्राप्त किया जा सकता है। श्रीमन् महाप्रभु की शिक्षा किसी देश या काल के अन्तर्गत नहीं है। फिर भी किसी-किसी महाजन के द्वारा बंगाली लोगों के ऊपर कृपा करके बंगला भाषा में कुछ ग्रंथ लिखने पर भी उन महाजनों को बंगाली समझना उचित नहीं है।

महाप्रभु के द्वारा प्रदर्शित विचारधारा किसी भी भाषा में प्रकाशित हो सकती है। प्रोफेसर सान्याल आदि ने अंग्रेजी भाषा में प्रचार किया है। श्रीनिमानन्द प्रभु ने आसामी भाषा में, नारायण महाराज ने हिन्दी भाषा में एवं मधुसूदन महाराज आदि ने उड़िया भाषा में महाप्रभु की कथा का प्रचार किया है एवं कर रहे हैं। आप शिक्षित व्यक्ति हैं। महाप्रभु की कथा को अच्छी तरह से समझकर दृढ़तापूर्वक आसाम प्रदेश में आसामी भाषा में प्रचार कीजिये। श्रीमन् महाप्रभु का प्रेमधर्म ही सम्पूर्ण विश्व में शान्ति, मैत्री एवं प्रेम स्थापित करेगा। आज तक कोई भी देश राजनैतिक कारणों से शांति नहीं प्राप्त कर पाया है। राजनैतिक विचारधारा अत्यन्त प्राकृत (सांसारिक) एवं जड़ीय-भावपुष्ट है, इसलिए अनित्य (नाशवान्) है। अनित्य विचारधारा मनुष्य को कभी भी शाश्वत सुख-शांति प्रदान नहीं कर सकती है। श्रीमन् महाप्रभु का धर्म आत्मा का धर्म है; यह कोई जड़ीय अनात्म-धर्म नहीं जिससे शरीर और मन की तुष्टि होती है। शरीर और मन जड़-वस्तु हैं। इनमें फँसे रहना ही बद्धता है। आप निष्ठावान् और बुद्धिमान् व्यक्ति हैं। इसलिए सदैव नित्यधर्म में प्रतिष्ठित रहना। अनात्म-धर्म में प्रतिष्ठित होने की आवश्यकता नहीं है।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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जो वस्तु चेतन है, उसमें तीन लक्षण पाये जायेंगे- इच्छा, क्रिया और अनुभूति ॥ अचेतन अर्थात् जड़ वस्तु में इच्छा, क्रिया और अनुभूति नहीं होती। जिसमें इच्छा, क्रिया और अनुभूति है, उसे व्यक्ति रूप से स्वीकार करना ही होगा, चाहे वह वस्तु छोटी से छोटी हो या बड़ी से बड़ी। मैं यदि अचेतन होता तो मुझ में अनुभव नहीं होता, क्योंकि मुझ में अनुभव है, इसलिये मैं चेतन हूँ। ज्ञान होने पर मुझ में सर्वज्ञता व सर्वव्यापकता हर समय विद्यमान रहती। पूर्ण ज्ञान एक है- दो, तीन नहीं- ‘एकमेवाद्वितीयम्’; पूर्ण के बाहर यदि परमाणु का भी अस्तित्व मान लिया जाये तो पूर्ण-पूर्ण नहीं रहता। पूर्ण का ही दूसरा नाम असीम है। असीम के बाहर कुछ है-ऐसा मानने से असीम सीमित हो जाएगा; क्योंकि असीम एक है और जितनी भी वस्तुएँ हैं, सभी उसके अन्दर हैं, अधीन हैं। मैं यदि असीम होता तो सब वस्तुएँ मुझ में रहतीं और मैं सभी का नियन्ता (controller) होता। मैं सर्वशक्तिमान नहीं हूँ, सर्वव्यापक, भूमा चेतन भी नहीं हूँ किन्तु चेतन ज़र हूँ। पाश्चात्य दार्शनिक लोग Absolute की परिभाषा देते हुये कहते हैं- Absolute is for itself and by itself, अर्थात् ‘पूर्ण अपने लिये है, और सब वस्तुएँ उसके लिए हैं।’

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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गुरुसेवा ही कर्त्तव्य, उनको अभिन्न मानते हुए वैष्णवों की सेवा करनी चाहिए

तुम सब सेवक मिलजुलकर मठ में सेवाकार्य आदि करना और मठ की दैनन्दिन सेवा को जारी रखना। यदि आपस में झगड़ा-विवाद-बहस में लिप्त होओगे तो सुविधावादी दल को तुम लोगों का उपहास करने का मौका मिल जायेगा। तुम लोग कभी भी इस प्रकार का निन्दनीय कार्य मत करना। निरपेक्ष दृष्टिकोण रखकर गुरु-वैष्णवों की सेवा के सम्बन्ध में सदैव सतर्क रहना। गुरु-वैष्णवों की सेवा का परित्याग कर कभी भी किसी का मंगल नहीं हो सकता है। जो दीक्षागुरु की सेवा को छोड़कर वैष्णव-सेवा या शिक्षागुरु, नामगुरु के अधिक महिमा-महात्म्य का प्रचार करते हैं, उन्हें दुःसंग समझकर परित्याग करना होगा। गुरु-सेवा और वैष्णव-सेवा एक ही तात्पर्यपर है। तुम लोग मेरा स्नेहाशीष ग्रहण करना।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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भजन करनेवाला ही चतुर

एक दिन एक व्यक्ति मेरे पास आए और मुझसे कहने लगे, “स्वामी जी! मठ में आने की और सत्संग करने की हमारी बहुत इच्छा होती है पर क्या करें, हम लोग बहुत व्यस्त रहते हैं। आपने तो संसार (घर-परिवार) छोड़ दिया है, मठ में आ गए हैं, अभी आपको और कोई काम नहीं है, इसलिए आप हर समय ‘हरि-हरि’ कर सकते हैं, किन्तु हमें तो घर-परिवार चलाना है, हमें तो बहुत सारा काम करना पड़ता है। हम यदि ‘हरि-हरि’ करते रहें तो हमारा घर-परिवार कैसे चलेगा?”

इस सम्बन्ध में हमारे गुरु महाराज (श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज) एक उदाहरण दिया करते थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय हिटलर जर्मनी का तानाशाह (डिक्टेटर) था तथा जनरल गोबल उसका दाहिना हाथ (मुख्य सहायक) थे। जनरल गोबल को एक बार पूछा गया कि वे फौज (आर्मी) में व्यक्तियों की भर्ती कैसे करते हैं?

उनका उत्तर इस प्रकार थाः “फौज में भर्ती के लिए आए हुए व्यक्तियों को मैं चार श्रेणियों में विभाजित करता हूँ:

1. ‘चतुर और कर्मठ’

2. ‘चतुर और सुस्त (आलसी)’

3. ‘मूर्ख और सुस्त’

4. ‘मूर्ख और कर्मठ’

मैं साधारणतः ‘चतुर और कर्मठ’ श्रेणी के व्यक्तियों को पसंद करता हूँ, किन्तु प्रधान-कर्ता (कमांडर-इन-चीफ़) के पद के लिए उन्हें नियुक्त नहीं करता। उस पद के लिए मैं ‘चतुर और सुस्त’ व्यक्तियों को नियुक्त करता हूँ।”

कोई यह प्रश्न कर सकता है कि ‘चतुर और कर्मठ’ व्यक्ति ‘चतुर और सुस्त’ व्यक्तियों से अधिक योग्य है, फिर भी उन्हें प्रधान पद क्यों नहीं देते? उत्तर में जनरल गोबल ने कहा, “हर समय युद्ध करना हमारे देश के लिए ठीक नहीं है। यदि ‘चतुर और कर्मठ’ व्यक्ति को प्रधान बनाया जाए तो वह किसी भी समय युद्ध आरम्भ करवा सकता है, क्योंकि ऐसा व्यक्ति हर समय व्यस्त रहना चाहता है। यह देश की शांति के लिए ठीक नहीं है। ‘चतुर और सुस्त’ व्यक्ति तभी युद्ध करेगा जब कोई अन्य उपाय नहीं होगा।

“जो ‘मूर्ख और सुस्त’ हैं उन्हें मैं भर्ती कर लेता हूँ क्योंकि रोज़गार की समस्या है, किन्तु ‘मूर्ख और कर्मठ’ व्यक्तियों से मैं हज़ारों मील दूर रहता हूँ।”

यदि पूछा जाता कि ऐसा क्यों? तो उत्तर में वे कहते, “मैं, ‘मूर्ख और सुस्त’ व्यक्ति को इसलिए नियुक्त कर लेता हूँ क्योंकि सुस्त होने के कारण वह अधिक गड़बड़ नहीं करेगा और जो थोड़ी गड़बड़ करेगा उसे हम सुधार लेंगे। किन्तु ‘मूर्ख और कर्मठ’ व्यक्ति बहुत गड़बड़ करता रहेगा जिसे ठीक करने के लिए हमें बहुत समय देना पड़ेगा। इसलिए ऐसे व्यक्ति से मैं हमेशा दूर रहता हूँ।”

हमें यह विचार करना चाहिए कि हम किस श्रेणी में आते हैं। हम कहते हैं, “हम संसार में इतने व्यस्त हैं कि भगवान् का भजन करने के लिए हमारे पास समय नहीं है।” हम लोग भी ‘मूर्ख और कर्मठ’ की श्रेणी में आते हैं। हर समय हम संसार की अनित्य वस्तुओं के लिए व्यस्त रहते हैं यह सोचते हुए कि वे हमें सुख देंगी, किन्तु वास्तव में वे हमारे दुःखों का ही कारण हैं। हम अपने आपको शरीर समझते हैं तथा शरीर की आवश्यकताओं को ही अपनी आवश्यकता समझकर उन्हीं को प्रधानता देते हैं। एक व्यक्ति अपने कार्यों में कितना भी व्यस्त क्यों न हो वह अपना सुबह का, दोपहर का और रात का भोजन नहीं भूलता क्योंकि वह जानता है कि खाना उसके शरीर की ज़रूरत है। इस अनित्य शरीर की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए हम दिन-रात परिश्रम करते रहते हैं। किन्तु भगवान् का भजन जोकि नित्य और वास्तव है उसके लिए हमारे पास समय नहीं है। जो व्यक्ति भगवान् के भजन की आवश्यकता को समझ गया है वही अपने समय को भजन में नियोजित करेगा। वही व्यक्ति चतुर है। अन्यथा वह मूर्ख और कर्मठ है।

अम्बरीष महाराज पूरे सप्तद्वीप के सम्राट थे। इतना ऐश्वर्य होते हुए भी उन्हें उसमें थोड़ी सी भी आसक्ति नहीं थी। वे जानते थे कि धन-संपत्ति वास्तविक सुख नहीं दे सकती। उन्होंने अपने समस्त ऐश्वर्य को स्वप्न के समान अनित्य ही देखा और अपनी सभी इन्द्रियों को सब समय भगवान् की सेवा में नियोजित किया। इतना बड़ा दायित्व होने पर भी, अम्बरीष महाराज, भगवान् की सारी सेवा स्वयं ही करते थे। इसलिए भजन करने के लिए समय नहीं मिल पाना एक बहाना मात्र है।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज

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