श्रीमद् भागवतम् श्लोक रत्नावली , कंठस्थ करने के लिए श्लोक

मुनियों की जिज्ञासा

निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम्
पिबत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः ॥

निगम वैदिक साहित्य; कल्प-तरोः कल्पतरु का; गलितम् पूर्णतः परिपक्व; फलम् फल; शुक श्रीम‌द्भागवत के मूल वक्ता श्रील शुकदेव गोस्वामी के; मुखात् होठों से; अमृत अमृत; द्रव तरल अतएव सरलता से निगलने योग्य; संयुतम् सभी प्रकार से पूर्ण; पिबत पान करो; भागवतम् भगवान् के साथ चिर सम्बन्ध के विज्ञान से युक्त ग्रन्थ को; रसम्-रस (आस्वाद्य); आलयम् = मुक्ति प्राप्त होने तक या मुक्त अवस्था में भी; मुहुः सदैव; अहो हे; रसिकाः रसिक जनो, रसज्ञ; भुवि पृथ्वी पर; भावुकाः पटु तथा विचारवान ।

अनुवाद – हे भावुक जनो ! वैदिक साहित्य रूपी कल्पवृक्ष के इस पक्व फल श्रीमद्भागवत को जरा चखो तो। यह श्रीशुकदेव गोस्वामी के होठों से निस्सृत हुआ है, अतएव यह और भी अधिक सुस्वादु हो गया है, यद्यपि इसका अमृत-रस मुक्त जीवों समेत समस्त लोगों के लिए पहले से आस्वाद्य था।

तात्पर्य – पिछले दो श्लोकों से यह निश्चित रूप से सिद्ध हो गया कि श्रीमद्भागवत दिव्य साहित्य है जो अपने दिव्य गुणों के कारण अन्य समस्त वैदिक शास्त्रों का अतिक्रमण करता है। यह समस्त लौकिक कार्यकलापों तथा लौकिक ज्ञान से परे है। इस श्लोक में बताया गया है कि श्रीमद्भागवत न केवल उत्कृष्ट साहित्य है, अपितु यह समस्त वैदिक साहित्य का परिपक्व फल है। दूसरे शब्दों में, यह सभी वैदिक ज्ञान का नवनीत (सार) है। अतः मनुष्य को चाहिए कि वह श्रीमद्भागवत द्वारा प्रदत्त सन्देशों तथा उपदेशों को अत्यन्त आदर तथा ध्यानपूर्वक ग्रहण करे।

वेदों की तुलना कल्पवृक्ष से की गयी है, क्योंकि उनमें मनुष्य के लिए सारी ज्ञेय बातें पाई जाती हैं। उनमें सांसारिक आवश्यकताओं के साथ-साथ आध्यात्मिक साक्षात्कार का भी वर्णन हुआ है। वेदों में सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक, सैन्य, चिकित्सीय, रासायनिक, भौतिक, पराभौतिक विषयों से सम्बद्ध ज्ञान के नियामक तत्व तथा जीवन के लिए जो भी आवश्यक है सभी का समावेश है और इनसे भी बढ़कर, इसमें आध्यात्मिक साक्षात्कार के लिए विशेष निर्देश हैं। नियमित ज्ञान में जीव को क्रमशः आध्यात्मिक स्तर तक ऊपर उठाया जाता है और सर्वोच्च आध्यात्मिक अनुभूति तो यह जान लेना है कि भगवान् समस्त रसों के आगार हैं। आगे ……

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गोस्वामी सिद्धान्त-

यस्य ब्रह्मेति संज्ञां क्वचिदपि निगमे याति चिन्मात्रसत्ता-
प्यंशो यस्यांशकैः स्वैर्विभवति वशयन्नेष मायां पुमांश्च ।
एकं यस्यैव रूपं विलसति परमव्योम्नि नारायणाख्यं
स श्रीकृष्णो विधत्तां स्वयमिह भगवान् प्रेमतत्पादभाजाम् ॥

(तत्त्वसन्दर्भ ८ वाँ श्लोक)

जिनकी निर्विशेष चिन्मात्र सत्ताको श्रुतियोंमें कहीं कहीं ‘ब्रह्म’ कहा गया है, जिनके अंश माया नियन्ता कारणार्णवशायी पुरुषने मायाको अपने वशमें लेकर मायाके प्रति दृष्टि शक्ति सञ्चारकर उसके द्वारा ब्रह्माण्डकी सृष्टि की है एवं प्रद्युम्नरूपमें मत्स्य, कूर्म आदि अपने अंश अवतारोंके साथ शक्तिशाली, सर्वव्यापक लीला वातारोंको प्रकट करते हैं एवं जिनका नारायण नामक एक मुख्यरूप परव्योममें विलास करते हैं, वे ही स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण इस जगतमें अपने चरणकमल सेवी भक्तोंको अपना प्रेम प्रदान करें ।

गौड़ीय कण्ठहार

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श्रीचैतन्य महाप्रभु

महाचोर को दो चोर ले गये

ब्रज लीला में जिनकी शराफत के बारे में किसी कवि ने कहा है कि –

अनन्त करोड़ ब्रह्माण्डों के मालिक हैं ये ।
चोर-महाचोर चोरी में माहिर हैं ये ।।

वे ब्रज चोर इस नवद्वीप लीला में प्रत्यक्ष किसी के सामने नहीं आते। रोने के बहाने चोरी से हरिनाम संकीर्तन करते हैं व भक्तों को भी चोरी-चोरी दर्शन दे रहे हैं। वे नवद्वीप चोर एक दिन बचपन में नाना प्रकार के आभूषण पहने घर के बाहर घूम रहे थे कि दो चोरों को इनके आभूषणों पर लालच आ गया और इन्हें सन्देश (मिठाई) खिलाने के बहाने कंधे पर बैठा कर ले गये। लेकिन इन्होंने उन पर अपनी ऐसी माया फैलाई कि वे अपने घर का रास्ता भूल गये और काफी समय घूम कर अपना घर समझ कर जगन्नाथ मिश्र के घर आ कर बालक को कन्धे से उतार दिया । परन्तु जब होश आया तो लज्जित होकर पकड़े जाने के भय से भाग खड़े हुए तथा निमाई को पड़ोस की सभी स्त्रियाँ जो कि बहुत देर से इन्हें ढूँढ रही थीं, उठाकर ले गईं।

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यत् कृतं यत्त करिष्यामि, तत् सर्वं न मया कृतम्।
त्वया कृतं तु फलभुक्, त्वमेव मधुसूदन ! ।।20।।

हे मधुसूदन भगवान् ! मैंने जो कुछ भी किया है व जो कुछ भी मैं करूँगा, वह सब मेरे द्वारा नहीं किया गया है क्योंकि मैं तो आपका दास हूँ व दास वही करता है जो स्वामी कहता है, अतः मैंने जो कुछ भी किया व जो भी करूँगा, वह तो सब आपके द्वारा ही किया गया है, अतः अपने किये का फल आप स्वयं भोग लेना।

श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्

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निर्भीक होकर जो निरपेक्ष सत्यकथा बोलता है, शत-शत जन्मों के बाद तथा शत-शत युगों के बाद भी कोई न कोई इसका निगूढ़ सत्य तत्त्व समझ सकता है । शत-शत गैलन रक्त खर्च न होने पर्यन्त एक व्यक्ति को भी सत्यकथा समझाई नहीं जा सकती ।

श्रीलप्रभुपाद

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परत्तत्त्व की एकता के सम्बन्ध में श्रील प्रभुपाद की शिक्षा

परतत्त्व की चर्चा के सम्बन्ध में भी विचारधारा की विविधता है एवं उसके अनुसार परतत्त्व में विविधता देखी जाती है। किन्तु यहाँ सावधान होने की जरूरत है की ‘विचारधारा की विविधता के अनुसार परतत्त्व में विविधता’ इस कथन में परतत्त्व का बहुत्व (अर्थात् परतत्त्व बहुत सारे हैं) नहीं समझा जाता है। श्रील प्रभुपाद ने हमें बताया है कि, – वस्तु एक ही है; किन्तु एक वस्तु के सम्बन्ध में ही अनुभूति अलग-अलग होने पर मात्र उसकी विभिन्नता प्रकाशित होती है। जैसे कोई यदि हाथी को पीछे से देखता है तो उसने उसकी पूँछ और दो पैरों को देखकर ही अपने उस दर्शन के सम्बन्ध में बताया, और एक व्यक्ति ने हाथी को सामने से देखकर केवल उसकी सूँड और दोनों कानों को देखकर अपने उस दर्शन का अनुभव व्यक्त किया, तृतीय व्यक्ति ने हाथी के एक ओर से उसके विशाल शरीर मात्र का दर्शन कर हाथी का वर्णन कर डाला। अब यहाँ तीन लोगों के तीन प्रकार के वर्णनों से हाथी तीन प्रकार के नहीं हो गये। भले ही यह उदाहरण सर्वांगसुन्दर नहीं है, फिर भी केवल इसका यही तात्पर्य है कि परतत्त्व की विभिन्न अनुभूतियों के वर्णन से उसका अनेकत्व नहीं समझा जायेगा, वह परतत्त्व एक ही है, ऐसा समझना होगा। श्रीव्यासदेव ने वेदान्त के भाष्यरूप में जो श्रीम‌द्भागवत को प्रकाशित किया है, उसमें परतत्त्व के सम्बन्ध में विभिन्न अनुभूतियाँ होने पर भी वे तत्त्वतः एक ही वस्तु हैं, यही प्रदर्शित किया है-

“वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्।
ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्धते ।।”

इस श्लोक में ‘यज्ज्ञानमद्वयम्’ नाम का एक शब्द है। अर्थात् वह ‘परतत्त्व’ वस्तु – ‘अद्वयज्ञान’ -स्वरूप है। ‘अद्वय’ कहने तर ‘भौतिक-भेद से रहित’ समझना होगा। इस भौतिक जगत में देह-देही का भेद, नाम-नामी का भेद, पुरुष-प्रकृति का भेद, अंश-अंशी का भेद आदि समस्त प्रकार के जो भेद देखे जाते हैं, उसके मूल में है अविद्या। ‘अद्वय’ वस्तु में इस प्रकार की अविद्या से जनित भेद का स्थान नहीं है। ‘अद्वय’ शब्द में द्वय या द्वितीय नहीं है ऐसा समझा जाता है। किन्तु इसका मतलब वे वास्तव में पूर्ण रूप से द्वितीय-रहित हैं, ऐसा नहीं है वे भौतिक स्थूल द्वितीय-रहित हैं, ऐसा ही समझना होगा। अर्थात् उस परतत्त्व का नाम-नामी अभेद है, देह-देही अभेद है, शक्ति-शक्तिमान अभेद है, अंश-अंशी अभेद है – इसीलिए उन्हें ‘अद्वय’ कहा जाता है। नहीं तो परम दार्शनिक मनीषियों की विचारधारा में जो तारतम्य रहता है, उसकी उपयोगिता नहीं रहती। तत्त्ववस्तु पूर्ण है इसीलिए पूर्ण में अंश के अवस्थान को स्वीकार किया जाता है। यहाँ चूंकि अंश मायातीत है, अतः वह पूर्ण के समान है या कहा जा सकता है कि, वह पूर्ण की अभिव्यक्ति है। अतः ‘अंश’ तत्त्व को भी ‘पूर्ण’ के रूप में स्वीकार किया जाता है। इसीलिए शास्त्रीय युक्ति-रूप में देखा जाता है-“पूर्णस्य पूर्णामादाय पूर्णमेवावशिष्यते।” इस वैदिक युक्ति को स्वीकार नहीं करने पर नास्तिक होना पड़ेगा। ‘पूर्ण’- एक वस्तु है, उसे ‘तत्त्व’ भी कहा जा सकता है। इस ‘पूर्ण’ से पूर्ण को ग्रहण करने पर अवशिष्ट कुछ भी नहीं रहेगा ऐसा नहीं है। यहाँ अवशिष्ट भी पूर्ण ही रहता है। यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि, ‘पूर्ण’ से पूर्ण को ग्रहण कौन करेगा? पूर्ण से पूर्ण का जो ग्राहक है, वह भी पूर्ण है। जो पूर्ण से पूर्ण को ग्रहण करते हैं, वे ‘पूर्ण’ को ही अवशिष्ट रखते हैं।

जगत में गणित शास्त्र में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है। गणित में ‘असीम’ (Infinity) के रूप में एक संख्या को माना जाता है। उस ‘असीम’ से ‘असीम’ को घटाने पर ‘असीम’ ही शेष रहता है। अतः प्राकृत वैज्ञानिक युक्ति में भी इस प्रकार की घटना को स्वीकार किया गया है। इसके अलावा लौकिक युक्ति में भी देखा जाता है कि, एक. प्रदीप से बहुत से प्रदीप प्रज्वलित करने पर भी मूल प्रदीप को कोई हानि नहीं होती है और जिन समस्त प्रदीपों को प्रज्वलित किया जाता है वे सब मूल प्रदीप से किसी भी प्रकार कम नहीं होते हैं। अतः वे सब प्रदीप का अंश होने के बावजूद पूर्ण और एक हैं। अतएव परतत्त्व एक ही है और अद्वय है। वे मात्र एकत्व को संरक्षित रखकर ही विविधता प्रकाशित करते हैं।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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ज्वालामुखीय ऊर्जा

*क समय जब गुरु महाराज अपने ज्येष्ठ गुरुभ्राता श्रीभक्तिरक्षक श्रीधर ए गोस्वामी महाराज के साथ प्रचार करने के उपरान्त श्रीजन्माष्टमी को उपलक्ष्य करके श्रीधाम मायापुर आए, तब श्रील प्रभुपाद ने उन्हें देखने के साथ-ही-साथ कहा, “बहुत अच्छा हुआ जो आप आ गए। आप तुरन्त ही मथुरा चले जाओ। व्रजमण्डल परिक्रमा निकट ही है, अतएव वहाँ जाकर पण्डे के साथ कैम्प लगाने के स्थानों का निर्णय, यात्रियों के रहने की व्यवस्था तथा जल आदि की व्यवस्था को देखकर सब ठीक कर लो।”

श्रील प्रभुपाद की इच्छा तथा आज्ञानुसार जब गुरु महाराज तत्काल मथुरा प्रस्थान करने हेतु प्रस्तुत हुए तब श्रील प्रभुपाद ने एक भक्त को गुरु महाराज के लिए

पूड़ी और सब्जी बनाने के लिए कहा, किन्तु जब गुरु महाराज ने कहा, “इसकी आवश्यकता नहीं है, मैं इसके बिना भी रह सकता हूँ।”, तब श्रील प्रभुपाद ने अपने ऊपर से बन्द होने वाले लोटे में पानी भरवाकर, उसमें मिश्री घुलवाकर उन्हें दिया तथा साथ में नींबू देते हुए कहा, “मार्ग में नींबू पानी बनाकर पी लेना।”

जब गुरु महाराज वहाँ से मथुरा के लिए रवाना हो गए तब श्रील प्रभुपाद ने एक ब्रह्मचारी से कहा, “हयग्रीव ब्रह्मचारी ज्वालामुखीय ऊर्जा (volcanic energy) से सम्पन्न हैं, वे सर्वदा किसी भी सेवा को उत्साहपूर्वक करने के लिए प्रस्तुत रहते हैं तथा प्रत्येक अवस्था में सफल होकर ही लौटते हैं।”

गुरु महाराज ने एक बार मुझे बताया, श्रील प्रभुपाद के प्रकट काल में, उन्होंने मुझ पर कृपा करके मुझे सदैव सेवाओं में व्यस्त रखा। जब मैं अथक परिश्रम कर किसी सेवा कार्य को सम्पूर्ण करके श्रील प्रभुपाद के निकट लौटकर आता तो वे साथ-ही-साथ मुझे कोई अन्य सेवा-कार्य दे देते। उन्हें मुझसे पहले वाले कार्य के विषय में पूछना नहीं पड़ता था, कारण, वे भलीभाँति जानते थे कि मैं कार्य के सम्पूर्ण होने से पूर्व उनके पास नहीं आऊँगा। शारीरिक रूप से क्लान्त होने पर भी उनके आदेश का पालन करने से मुझे अपूर्व आनन्द की प्राप्ति होती। कभी-कभी मैं सोचता था कि मेरे जीवन में एक ऐसा समय आएगा जब मैं निर्धारित दैनिक समय सारिणी के अनुसार जीवन-यापन करूँगा, जिससे कि मैं शान्ति से संख्यापूर्वक हरिनाम, उपयुक्त समय पर गायत्री मन्त्र जप और ध्यानपूर्वक वैष्णव ग्रन्थों का अध्ययन कर पाऊँगा जैसे कि मेरे कुछ गुरुभ्राता करते हैं। श्रील प्रभुपाद के अप्रकट होने के पश्चात् मुझे अपनी उपरोक्त इच्छानुरूप जीवन-यापन करने

के लिए प्रचुर समय मिला, किन्तु अब मुझे बहुत अधिक शोक का अनुभव होता है कि जिस प्रकार से मैं उनके साथ रहते हुए सेवा में व्यस्त था, अब मैं उस प्रकार से व्यस्त नहीं है। बाह्य रूप से उनके जगत् से अप्रकट होने के पश्चात् ही मुझे यह बात समझ में आई कि कठिन परिश्रम युक्त सेवा ही मेरा जीवन है। इस बात को अनुभव करने के पश्चात् में स्वयं को उसी प्रकार से व्यस्त रखने का प्रयास करने लगा जिस प्रकार से श्रील प्रभुपाद मुझे रखते थे।” यह सब श्रवण करने के पश्चात् मुझे समझ में आया कि श्रील प्रभुपाद के द्वारा गुरु महाराज को ‘ज्वालामुखीय ऊर्जा’ कहकर सम्बोधित करना कितना उचित था।

“श्रील प्रभुपाद के अप्रकट होने के पश्चात् अब मुझे बहुत अधिक शोक का अनुभव होता है कि जिस प्रकार से मैं उनके साथ रहते हुए सेवा में व्यस्त था, अब मैं उस प्रकार से व्यस्त नहीं हूँ।”

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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निरपराध होकर नाम-ग्रहण करने से ही मन की चंचलता दूर होती है

तुम लोगों के द्वारा गुरु-वैष्णवों का आदेश-निर्देश पालन करते हुए हरिभजन करने से मायिक संसार की आसक्ति तुम लोगों को कष्ट नहीं देगी। अपराध-शून्य होकर श्रीनाम ग्रहण कर पाने पर तुम्हारा चंचल चित्त स्थिर हो जायेगा। तब यथायथ भाव से साधन-भजन का सुअवसर प्राप्त करोगी। ऐसी दशा में किसी प्रकार की सांसारिक कामना-वासना तुम्हारे हृदय में स्थान नहीं बना पायेगी। गुरु-वैष्णवों की कृपा के बल से हमें सभी प्रकार की विषय-वासना, भोग-वासना, संसार-वासनाओं से छुटकारा मिल जाता है। गोपीजन-बल्लभ श्रीकृष्णचन्द्र का दासानुदास होना ही हमारी आत्मा की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। श्रीराधा-गोविन्द की अप्राकृत ‘चिल्लीलामिथुन (युगल चित् लीला) की सर्वकालिक सेवा प्राप्ति ही हमारे भजन क्षेत्र में चरम आकांक्षा का विषय है। जो लोग इस प्रकार के विचार में प्रतिष्ठित हैं, वे विशेष भाग्यवान्-भाग्यवती हैं।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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“मैं तो राम का रूप हूँ, सजदा करूँ किसका?”

एक बार गेंदाराम नामक एक व्यक्ति ने गुरुजी से श्रीचैतन्य महाप्रभु की शिक्षा के विषय में उपदेश श्रवण करने के लिए उन्हें अम्बाला कैंट में आमंत्रित किया। उनका निमंत्रण स्वीकार कर गुरुजी चंडीगढ़ से अम्बाला गए। मैं उस समय गुरुजी के साथ था। अम्बाला के लक्ष्मी-नारायण मंदिर में सभा का आयोजन किया गया। सम्मेलन के दो दिन बाद, मनीषानंद नामक एक स्वामी वहाँ आए। वे आयु में मुझसे भी छोटे थे। वे गेंदारामजी के पास आए और सभा में प्रवचन करने की अपनी इच्छा व्यक्त करने लगे।

गेंदारामजी हमारे गुरुजी को ‘गुरुजी’ कहकर ही संबोधित करते थे। उन्होंने मनीषानंद स्वामी से कहा, “मैंने बहुत विनती करके गुरुजी (श्रील माधव महाराज) को इतनी दूर से, उनके मुखारविंद से श्रीचैतन्य महाप्रभु की शिक्षा श्रवण करने के लिए यहाँ आमंत्रित किया है। उनका समय मूल्यवान है इसलिए हम इस सम्मेलन में आपको समय नहीं दे सकते।”

इस प्रकार मना करने पर भी मनीषानंद स्वामी बार-बार अपने प्रस्ताव को लेकर गेंदारामजी के पास आने लगे। उनके बार-बार आग्रह करने पर गेंदारामजी गुरुजी के पास आए और उनसे कहा, “गुरुजी, मैं आपके पास एक समस्या के समाधान के लिए आया हूँ। मनीषानंद नामक एक स्वामी यहाँ आए हैं जो मुझसे आग्रह कर रहे हैं कि उन्हें इस सम्मेलन में बोलने का अवसर दिया जाए। मैंने उन्हें कहा कि इस सम्मेलन में हम उन्हें समय नहीं दे सकते हैं, फिर भी वे बार-बार मेरे पास आकर विनती कर रहे हैं। अब मुझे क्या करना चाहिए?”

गुरुजी ने उत्तर दिया, “हाँ, उन्हें बोलने दीजिए। कोई समस्या नहीं है। पहले आधा घंटा वे बोलेंगे, मैं उनके बाद बोलूँगा।”

गेंदारामजी ने मनीषानंद स्वामी को बुलाकर कहा, “मैंने गुरुजी से पूछा। उन्होंने कहा कि आप आज की सभा में आधा घंटा बोल सकते हैं।”

इस प्रकार उस दिन की सभा में कीर्तन के बाद मनीषानंद स्वामी को आधे घंटे बोलने का अवसर दिया गया। मनीषानंद स्वामी ने अपना वक्तव्य पंजाबी में दिया। उसमें उन्होंने अनेक उर्दू शब्दों का भी प्रयोग किया। गुरुजी ने उनके वक्तव्य को ध्यान से सुना। उनकी बोली गई बातों में से एक बात पर गुरुजी को संदेह हुआ। उन्होंने बोला था, “मैं तो राम का रूप हूँ, सजदा करूँ किसका।” गुरुजी ने सभा के बाद हमारे पुरी महाराज से, जोकि पंजाब प्रांत से हैं, मनीषानंद स्वामी की उस बात का अर्थ पूछा।

पुरी महाराज ने गुरुजी को मनीषानंद स्वामी की बात का शाब्दिक अर्थ बताया, “मैं तो स्वयं राम हूँ, मैं और किसकी पूजा करूँ?”

यह सुनकर गुरुजी बोले, “यह बात तो ठीक नहीं है। जीव कभी राम (भगवान्) नहीं हो सकता।”

दूसरे दिन जब गुरुजी सभा में आए तब मनीषानंद स्वामी ने उन्हें प्रणाम किया। गुरुजी ने उनकी प्रशंसा करते हुए कहा, “आपके कल के भाषण से सब लोग बहुत खुश हुए। आइए साथ बैठकर कुछ बात करते हैं।”

गुरुजी ने उन्हें अपने कमरे में बैठाया और उनसे बात करने लगे। मनीषानंद स्वामी ने बताया कि उनके तीन अलग-अलग जगहों पर मठ हैं एवं सरकार से सहायता मिलने पर वे एक विद्यालय की स्थापना करना चाहते हैं। जब इस प्रकार की बातें हो रही थी तब गुरुजी ने उनसे कहा, “आपके भाषण में बोली गई एक बात मुझे समझ में नहीं आयी। क्या आप मुझे समझा सकते हैं?”

मनीषानंद स्वामीः “हाँ बताइए, कौन सी बात समझ में नहीं आयी।”

गुरुजीः आपने बोला था, ‘मैं तो राम का रूप हूँ, सजदा करूँ किसका’, इसका अर्थ क्या है?

मनीषानंद स्वामी सरल थे। उन्होंने अपने उस वाक्य का अर्थ इस प्रकार बताया, “मैं तो स्वयं राम हूँ, मैं भला और किसकी पूजा करूँ?”

मनीषानंद स्वामी सोच रहे थे कि उनकी इस बात से गुरुजी प्रसन्न होंगे। किन्तु गुरुजी ने थोड़ी ऊँची आवाज़ में उनसे पूछा, “क्या आप राम हैं? क्या आप सच में राम हैं?”

मनीषानंद स्वामी गुरुजी का प्रश्न सुनकर डर गए। उन्हें यह समझ में आ गया कि उन्होंने जो कहा वह गलत है। गुरुजी ने उनसे पूछा, “आपने इस प्रकार की बात क्यों बोली?”

मनीषानंद स्वामी ने उत्तर दिया, “इस विषय में मेरा तो कोई विशेष ज्ञान नहीं हैं, मैंने किसी से इस प्रकार सुना था इसलिए बोल दिया।”

गुरुजी के प्रश्न का ठीक से उत्तर न दे पाने के कारण वह हताश होकर कहने लगे, “मैं संन्यास आश्रम छोड़ दूँगा और घर वापिस चला जाऊँगा।”

उन्हें इस प्रकार हताश हुआ देख गुरुजी ने कहा, “देखिए, आपने जो बात कही उसका वास्तविक अर्थ मैं आपको बताता हूँ। आपने कहा, ‘मैं तो राम का रूप हूँ’, जिसका अर्थ है, मैं राम का हूँ, राम के द्वारा हूँ। रूप और स्वरूप में भेद है। किसी व्यक्ति की शक्ति को उसका रूप कहा जा सकता है। जीव, क्योंकि भगवान् की शक्ति का अंश है, उसे भगवान् का रूप कहा जा सकता है किन्तु भगवान् का स्वरूप अर्थात् स्वयं भगवान् नहीं कहा जा सकता। इसलिए, ‘मैं तो राम का रूप हूँ’ का अर्थ है-मैं राम की शक्ति का अंश हूँ, मैं राम का हूँ, राम के द्वारा हूँ। यदि मैं राम का हूँ, तो राम की सेवा करना ही मेरा धर्म है, इसलिए ‘सजदा करूँ किसका?’, राम को छोड़कर मैं और किसका भजन करूँ? जो राम का है वह राम का ही भजन करेगा। आपकी बात का अर्थ यह नहीं है कि मैं ही राम हूँ। जीव भगवान् की शक्ति का अंश है। जीव और भगवान् में नित्य भेद है। सूर्य की रोशनी सूर्य से आती है, वह सूर्य की शक्ति है किन्तु स्वयं सूर्य नहीं है, इसी प्रकार जीव भगवान् से आता है, भगवान् की शक्ति का अंश है किन्तु स्वयं भगवान् नहीं है।”

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज

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