
मुनियों की जिज्ञासा
आगे . . . . परमेश्वर परम पूर्ण हैं। इसकी पुष्टि समस्त श्रुति मन्त्रों द्वारा होती है। श्रुति मन्त्रों में ही कहा गया है कि परम पूर्ण भगवान् ने पदार्थ के ऊपर दृष्टि फेरी तो सारे जीव उत्पन्न हो गये। ये जीव भगवान् के अंश-रूप हैं। वे ही इस विशाल भौतिक सृष्टि को आध्यात्मिक स्फुलिंग रूपी बीज से आविष्ट करते हैं और इस प्रकार सर्जनात्मक शक्तियाँ चालू हो जाती हैं जिससे अनेक आश्चर्यजनक सृष्टियाँ उत्पन्न होती हैं। नास्तिक यह तर्क कर सकता है कि ईश्वर घड़ीसाज से अधिक पटु नहीं है, किन्तु ईश्वर इससे अधिक पटु होता है, क्योंकि वह मशीनों के नर तथा मादा दोनों रूपों को उत्पन्न कर सकता है। फिर ये विविध नर-मादा मशीनें, ईश्वर के आदेश की प्रतीक्षा किये बिना, अपनी जैसी असंख्य मशीनें उत्पन्न करती जाती हैं। यदि मनुष्य ऐसी मशीन बना सके जो उसके अनदेखे ही अन्य मशीनें उत्पन्न कर सके, तब जाकर वह ईश्वर की बुद्धि को पा सकता है। किन्तु ऐसा सम्भव नहीं, क्योंकि प्रत्येक मशीन को अलग-अलग बनाना होता है। अतः ईश्वर की तरह कोई भी व्यक्ति सृजन नहीं कर सकता। ईश्वर का अन्य नाम असमौर्ध्व है जिसका अर्थ है कि कोई न तो उनके तुल्य है, न उनसे बढ़ कर है। परं सत्यम् वह है जिसके न तो कोई समतुल्य है न उससे श्रेष्ठ। इसकी पुष्टि श्रुति मन्त्रों में हुई हैं। कहा गया है कि इस भौतिक ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के पूर्व सबके स्वामी भगवान् ही विद्यमान थे। उन्होंने ब्रह्मा को वैदिक ज्ञान का उपदेश किया। इन्हीं भगवान् की सब प्रकार से आज्ञा पालनीय है। यदि कोई भव-बन्धन से छूटना चाहता है तो उसे उनकी शरण में जाना होगा। इसकी पुष्टि भगवद्गीता में भी हुई है।
जब तक मनुष्य भगवान् के चरणकमलों की शरण ग्रहण नहीं करता तब तक उसका मोहग्रस्त होना निश्चित है। जब कोई बुद्धिमान पुरुष कृष्ण के चरणारविन्द की शरण ग्रहण करके कृष्ण को समस्त कारणों का कारण मान लेता है, जैसा कि भगवद्गीता में भी कहा गया है, तभी वह व्यक्ति महात्मा बन सकता है। किन्तु ऐसे महात्मा दुर्लभ होते हैं। केवल ऐसे महात्मा ही समझ सकते हैं कि भगवान् ही समस्त सृष्टियों के आदि कारण हैं। वे परम या परमसत्य हैं, क्योंकि अन्य सारे सत्य उनके सापेक्ष हैं। वे सर्वज्ञ हैं। उनके लिए कोई मोह नहीं होता। आगे . . . .
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अचिन्त्य भेदाभेदके विषयमें श्रुति-प्रमाण-
एकोवशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति ।
तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥
(कठ २/२/१२)
जो एक होकर भी सबके नियन्ता हैं, जो सब प्राणियोंकी अन्तरात्मा हैं, एक होकर भी जो बहुतसे रूपोंमें प्रकाशित हैं, जो धीरपुरुष उनको आत्मस्थरूपमें दर्शन करते हैं, वे ही नित्य सुख प्राप्त करते हैं, अन्य नहीं ।
गौड़ीय कण्ठहार
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श्रीचैतन्य महाप्रभु
हरिनाम प्रचार का अद्भुत तरीका
श्रीशचीमाता तथा जगन्नाथ मिश्र को अपने वात्सल्य रस का आनन्द प्रदान करते हुए भक्त-वत्सल श्रीगौरहरि बालक रूप में शशि कला के समान बढ़ने लगे । मुहल्ले की स्त्रियाँ बालक के अद्भुत रूप पर मोहित होकर हमेशा बालक को घेरे रहतीं ।
युग धर्म प्रवर्तक, संकीर्तन पिता, श्रीमन् महाप्रभु ने शिशु अवस्था से ही क्रन्दन छल से ‘हरिनाम’ करने की शिक्षा प्रदान की। निमाई जब भी रोते तो कोई भी उनको चुप नहीं करा सकता था, जब तक कि सब लोग मिलकर हरिनाम संकीर्तन शुरू न कर दें। इसलिए सब लोग समझ गये कि निमाई के रोने पर हरिनाम करने से निमाई चुप ही नहीं होता बल्कि बहुत प्रसन्न होता है। इस लीला द्वारा निमाई प्रभु शिक्षा देते हैं कि यदि कोई प्रभु को प्रसन्न करना चाहता है तो वह हरिनाम संकीर्तन करे ।
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माभी – र्मन्दमतो विचिन्त्य बहुधा यामीश्चिरं यातनाः,
नैवामी प्रभवन्ति पापरिपतः स्वामी ननु श्रीधरः ।
आलस्यं व्यपनीय भक्तिसुलभं ध्यायस्व नारायणं,
लोकस्य व्यसनापनोदन करो दासस्य किं न क्षमः ? ।।14।।
हे मेरे मूढ़ मन ! यमलोक में मिलने वाली यातनाओं की चिन्ता करते हुए भयभीत मत होओ। ये सब जो पाप हैं, ये हमारे ऊपर प्रभाव डालने में समर्थ नहीं हैं, क्योंकि हमारे स्वामी, हमारे रक्षक तो भगवान श्रीधर जी हैं। अतएव आलस्य को त्यागकर, भक्ति के द्वारा भगवान श्रीनारायण का ध्यान करते रहो, जो कि बड़ा आसान है।
सारे जगत के दुःखों को हरने वाले प्रभु क्या अपने सेवक के दुःखों को हरने में समर्थ नहीं हैं?
श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्
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हेन दुष्ट कर्म नाइ, याहा आमि करि नाइ, सहस्र-सहस्र बार हरि।
सेइ सव कर्मफल, पेये अवसर बल, आमाय पिशिछे यन्त्रोपरि।।
गति नाहि देखि आर, कान्दि हरि अनिवार, तोमार अग्रेते एबे आमि।
जा तोमार हय मने, दण्ड देह अकिञ्चने, तुमि मोर दण्डधर स्वामी ।।
भजनरहस्यवृत्ति- हे प्रभो! मैंने जन्मजन्मान्तरमें अनेकों पापकर्म तथा घृणित कार्य किये हैं। उन सबका आपके निकट वर्णन करना सम्भवपर नहीं। किन्तु आप सर्वज्ञ हैं, आप सभी जानते हैं। अतः मैं आपके सम्मुख तृण-गुच्छ दाँतोंमें धारणकर दीनतापूर्वक निवेदन कर रहा हूँ, कि आप चाहें तो दण्ड देकर भी मेरा उद्धार कीजिए। हे प्रभो! समस्त अपराधोंके कारण मैं माया द्वारा गन्नेकी भाँति पेला जा रहा हूँ। इस अकिञ्चनजनको दण्ड देकर शोधन करें-यही मेरी आपके निकट क्रन्दनयुक्त विज्ञप्ति है। आपका एक नाम मुकुन्द है अर्थात् आप जीवोंको मुक्ति प्रदान करनेवाले हैं। इसलिए मुझे भी इन पापोंसे मुक्त कर, अपने चरणकमलोंकी सेवा प्रदान करें।
सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा
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श्रीनाम ग्रहण करते-करते अनर्थ निवृत्ति होने पर श्रीनाम के द्वारा ही रूप, गुण और लीला की अपने आप स्फूर्ति प्राप्त होगी। चेष्टा करके कृत्रिम भाव से रूप, गुण और लीला का स्मरण नहीं करना चाहिए ।
श्रीलप्रभुपाद
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सशिष्य होने से उसकी दृष्टि में हमेशा गुरु जी की महिमा ही दृष्टिगोचर होगी। आपसी सम्बन्ध और योग्यता की भिन्नता के कारण व्यवहार भी अलग-अलग देखा जाता है। गृहस्थियों के घर में भगवद्-भक्तों का आगमन और कृष्ण-कथा शुभ सूचना देते हैं। श्रीमान कृष्णपद दास जी ने वैष्णवों को बुलाकर वैष्णवहोम और वैष्णव-सेवा की है। इससे शुभ ही होगा। जिन्हें भगवान् की आवश्यकता है उन्हें अवश्य ही भक्तों का संग करना होगा।
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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पूर्ण शरणागति या आत्मसमर्पण ही उस परतत्त्व को प्राप्त करने का एकमात्र संपर्क सूत्र है।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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जन्म, आयु व मृत्यु भगवान् द्वारा नियंत्रित होते हैं। भगवान् की इच्छा को स्वीकार करना ही आनन्द प्राप्त करने का एकमात्र उपाय है।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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