जीव स्वरूपतः कृष्णदास है, कृष्ण के साथ उसका नित्य अचिन्त्य-भेदाभेद सम्बन्ध है। श्रीकृष्ण के नाम-रूप-गुण-परिकर-वैशिष्ट्य की लीलाओं के श्रवण-कीर्तन-स्मरण आदि के माध्यम से कृष्ण-अनुशीलन ही उसका नित्य स्वभाव या ‘अभिधेय’ है और प्रेम ही उसका एकमात्र नित्य ‘प्रयोजन’ है। फिर भी, अणुत्व के कारण श्रीभगवान की बहिरंगा माया-शक्ति द्वारा मोहित होकर वर्तमान में वह इसे भूल गया है। उस पर कृपा करने—उसके नित्य स्वरूप को जगाने के लिए ही भगवान उसके हृदय के भीतर भजन-अनुकूल विवेकदाता अन्तर्यामी या ‘चैत्यगुरु’ के रूप में और अपने आदर्श आचरण द्वारा शुद्ध भजन की शिक्षा देने हेतु बाहर ‘महंत गुरु’ के रूप में प्रकट होते हैं।

इसीलिए श्रीभगवान ने अपने परम प्रिय भक्तराज उद्धव को संबोधित करते हुए कहा है— “हे उद्धव! गुरुदेव को मेरा ही स्वरूप जानना, उन्हें सामान्य मरणशील मनुष्य की बुद्धि से ईर्ष्या या अनादर मत करना। गुरुदेव सर्वदेवमय हैं।” स्वयं ‘विषय-विग्रह’ भगवान ही ‘आश्रय-विग्रह’ या सेव्य के सेवक ‘प्रकाश-विग्रह’ गुरु के रूप में उदित होते हैं, फिर भी उन्हें ‘सेव्य-विषय-विग्रह’ का नित्य आश्रय या ‘सेवक-विग्रह’ के रूप में ही जानना चाहिए। उनकी अहैतुकी और निर्मल कृपा या प्रसन्नता के बिना कभी भी सेव्य श्रीभगवान की इंद्रिय-तर्पण रहित साक्षात् सेवा का अधिकार प्राप्त नहीं हो सकता। भगवान के प्रति जैसी भक्ति होनी चाहिए, तद्रूप प्रकाश-विग्रह श्रीगुरुदेव के प्रति भी ठीक वैसी ही भक्ति होनी चाहिए, तभी श्रीगुरुदेव की प्रसन्नता के क्रम से भगवत्-प्रसाद सुलभ होगा।

गुरुदेव को ‘देवता’ अर्थात् भगवान का अभिन्न प्रकाश-विग्रह और ‘आत्मा’ अर्थात् परम प्रेमास्पद जानकर उनके आश्रय में एकांतिक, अटूट (अव्यभिचारिणी) और अन्य अभिलाषाओं (कर्म-ज्ञान आदि) से रहित भक्ति के साथ भगवद्-भजन में प्रवृत्त होने पर, उसके आनुषंगिक फलस्वरुप भगवान से विमुखता के कारण उत्पन्न ‘अस्मृति’ (विस्मृति) या ‘स्वरूप-अस्फूर्ति’ और ‘विपर्reset’ (देह-आत्म-बोध) दूर हो जाएगा। माया जनित देह आदि में जड़ाभिनिवेश से उत्पन्न भय भी समाप्त हो जाएगा। श्रीभगवान के अशोक, अभय और अमृत की धारा स्वरूप श्रीपादपद्मों में प्रेम-भक्ति प्राप्त करना ही इस अटूट भक्ति का साक्षात् फल है।

अतः श्रीगुरुपादपद्मों का उल्लंघन करके या उनकी सेवा के विषय में उदासीन रहकर कृष्ण-कृपा प्राप्ति की आशा करना व्यर्थ है। उनके ‘प्रथित कृपा’ (विख्यात कृपा) के फलस्वरुप ही जीव के भाग्य में श्रेष्ठ युगल श्रीराधा-कृष्ण का नाम, अष्टादशाक्षर मंत्रराज, अप्राकृत कामबीज और कामगायत्री, श्रीशचीनंदन गौरहरि और उनके अंतरंग पार्षद श्रीस्वरूप-रूप-सनातन, श्रेष्ठ पुरी मथुरा, गोष्ठवाटी श्रीवृंदावन, श्रीगोवर्धन गिरिराज, श्रीराधाकुण्ड और श्रीराधिका-माधव की नित्य सेवा का सौभाग्य प्राप्त करने की आशा पूर्ण होती है। यदि श्रीगुरुदेव अप्रसन्न हो जाएं, तो जीव की सभी शुभ आशाएं और भरोसा पूरी तरह से तिरोहित हो जाता है। श्रील चक्रवर्ती ठाकुर ने कहा है— *”यस्य प्रसादाद् भगवत्प्रसादो यस्याप्रसादान्न गतिः कुतोऽपि”* अर्थात् श्रीगुरुदेव के प्रसन्न होने पर भगवत्-प्रसाद अनिवार्य है, और उनके अप्रसन्न होने पर जीव की कहीं भी गति नहीं है।

गुरुदेव की इच्छा या निर्देशानुसार चलने का आंतरिक प्रयास देखने पर ही गुरुदेव उस शिष्य के प्रति प्रसन्न होते हैं और उसे आगे बढ़ने के लिए और अधिक बल प्रदान करते हैं। किंतु गुरु-वाक्यों के पालन में कंजूसी, उदासीनता या आंतरिकता रहित कपटपूर्ण प्रयास देखने पर, अथवा गुरु-वाक्यों के पालन के नाम पर स्वयं की लाभ-पूजा-प्रतिष्ठा की आशा बढ़ाने की चेष्टा करने वाले धर्मध्वजी के प्रति गुरुदेव अपनी प्रकट और अप्रकट दोनों लीलाओं में असंतुष्ट रहते हैं।

गुरुदेव की अप्रसन्नता के कारण शीघ्र ही उस व्यक्ति की भाग्यलक्ष्मी रूठ जाती है, उसका सर्वनाश यानी भक्तिहीनता सिद्ध हो जाती है। वह काम आदि शत्रुओं के चंगुल में फंसकर अत्यंत निर्गुण (पतित) हो जाता है। श्रीगुरुदेव में उसकी ‘मर्त्य-बुद्धि’ आ जाती है और वह पग-पग पर नाना प्रकार के गुरु-अवज्ञा जैसे महा-अपराधों में लिप्त हो जाता है। “हरि-स्थान में अपराध होने पर हरि-नाम बचा लेता है, किंतु गुरु-स्थान में अपराध होने पर फिर कोई बचाव नहीं है।” श्रीगुरुपादपद्मों में पूर्णतः शरणागत हुए बिना इस गुरु-अवज्ञा रूपी महा-अपराध के क्षालन का कोई दूसरा उपाय नहीं है। गुरुदेव द्वारा अपराध स्वीकार न किए जाने पर भी अपराध पीछा नहीं छोड़ता। स्वयं के कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है। शारीरिक या मानसिक दुःख-कष्ट ही गुरु-अवज्ञा का एकमात्र फल नहीं है; भक्तिहीन होकर भगवत्-कृपा से सदा के लिए वंचित हो जाना ही जीव का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है।

साधु सावधान! गुरु-अवज्ञा रहते हुए किया गया साधन-भजन राख में घी की आहुति के समान निरर्थक है। यह एक प्रधान नामापराध है। श्रील नरोत्तम ठाकुर महाशय ने गाया है— “किस प्रकार सेवा पाऊंगा मैं दुराचारी, श्रीगुरु-वैष्णव में रति न हुई मेरी। मन माया में मग्न रहा, वैष्णवों के प्रति लेशमात्र प्रेम नहीं जगा…”

साधु-गुरु के पास जाकर केवल “कृपा करो” चिल्लाने से कृपा प्राप्त नहीं होगी; उनकी कृपा प्राप्त करने की योग्यता अर्जित करनी होगी। तभी कृपा स्वयं अवतरित होगी। यदि कोई आकस्मिक रूप से श्रीहरि-गुरु-वैष्णव की कृपा प्राप्त करता है, तो उसे पूर्व जन्मों के सुकृत्यों का फल समझना चाहिए। अतः हमें निश्चेष्ट नहीं बैठना चाहिए, बल्कि क्रमोन्नति की प्रक्रिया का पालन करते हुए श्रीगुरुपादपद्मों का आश्रय लेना चाहिए। गुरु द्वारा निर्देशित भजन-क्रम का अवलंबन करना चाहिए। मेरा निष्कपट भजन-प्रयास देखने पर ही श्रीगुरुदेव मुझ पर प्रसन्न होकर अपनी कृपा-शक्ति का संचार करेंगे। उससे मेरा भजन-बल क्रमशः बढ़ता जाएगा। तब अपने आप ही अनायास गुरु-कृपा का अनुभव किया जा सकेगा। गुरु-कृपा के जल से विषयाग्नि शांत होकर जीव को प्रेम-भक्ति प्राप्त होती है। उसी प्रेम-भक्ति की परिपक्व अवस्था में भगवत्-साक्षात्कार और साक्षात् सेवाधिकार प्राप्त होना संभव है।

“माया को हराकर विजय प्राप्त नहीं की जा सकती। साधु-गुरु की कृपा के बिना कोई उपाय नहीं है।” यह महाजन की उक्ति है। अनासक्ति रूपी तलवार द्वारा आसक्ति रूपी संसार-बंधन को काटने की बात स्वयं भगवान ने गीता में कही है। श्रील प्रभुपाद ने भी कहा— “जिसने कनक-कामिनी-प्रतिष्ठा की लालसा छोड़ दी, वही सच्चा वैष्णव है।”

विषयों को कृष्ण-संबंध में देखे बिना या तो भोग होगा या त्याग का अहंकार आएगा। इसीलिए श्रील प्रभुपाद ने पुनः कहा— “आसक्ति-रहित होकर विषयों को कृष्ण से जोड़ना ही युक्त-वैराग्य है।” श्रीमन महाप्रभु के शिक्षाष्टक के अनुसार शुद्ध भक्ति ही परम लक्ष्य है। श्रीगुरुपादपद्मों के निर्देशों का अनुसरण ही शिष्य के शिष्यत्व को सुरक्षित रखता है। इससे थोड़ा भी विचलित होने पर जीव संसार-सागर में डूब जाता है। उस स्थिति में भी श्रीगुरुपादपद्म ही एकमात्र सहारा हैं। उनकी अहैतुकी कृपा ही हमारा एकमात्र बल और भरोसा है। श्रीगुरुदेव ही असहायों की एकमात्र गति हैं। उनके चरणों का आश्रय लिए बिना कोई दूसरा रास्ता नहीं है। वे ही हमारे “जन्म-जन्म के प्रभु” हैं।