गंगा का जल देवों समेत तीनों लोकों को पवित्र करता है, क्योंकि यह भगवान् विष्णु के चरण कमलों से निकलता है। भगवान् कृष्ण विष्णु तत्त्व के उत्स हैं, अतएव उनके चरण कमलों की शरण हमें समस्त पापों से उबार सकती है, जिसमें ब्राह्मण के प्रति राजा द्वारा किया गया अपराध भी सम्मिलित है। अतएव महाराज परीक्षित ने मुकुन्द या मुक्तिदाता भगवान् श्रीकृष्ण के चरण-कमलों का ध्यान करने का निश्चय किया। गंगा या यमुना नदी के तट हमें भगवान् का निरन्तर स्मरण करने का अवसर प्रदान करते हैं। महाराज परीक्षित ने अपने आपको सभी प्रकार की भौतिक संगति से विलग कर लिया और भगवान् कृष्ण के चरण कमलों का ध्यान किया और यही मुक्ति का मार्ग है। समस्त प्रकार की भौतिक संगति से मुक्त होने का अर्थ है आगे पाप न करना। भगवान् के चरण कमलों का ध्यान करने का अर्थ है समस्त पूर्व पापों के प्रभावों से मुक्त होना। भौतिक जगत में ऐसी परस्थितियाँ लाई जाती हैं कि मनुष्यों को, जाने या अनजाने, पाप करना होता है और इसके सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं स्वयं महाराज परीक्षित, जो मान्य निष्याप पवित्र राजा थे। किन्तु वे कोई त्रुटि करना न चाहते हुए भी, अपराध के शिकार हो गये। उन्हें भी शाप दिया गया, किन्तु चूँकि वे भगवान् के बहुत बड़े भक्त थे, अतएव जीवन की ऐसी प्रतिकूलताएँ भी अनुकूल हो गई। सिद्धान्त यह है कि मनुष्य को जानबूझ कर अपने जीवन में कोई पाप नहीं करना चाहिए और अविचल भाव से भगवान् के चरण-कमलों को स्मरण रखना चाहिए। ऐसी ही दशाओं में भक्त को मुक्ति-मार्ग में नियमित प्रगति करने में भगवान् सहायक होगा और इस तरह भक्त को भगवान् के चरण कमल प्राप्त हो सकेंगे। यदि भक्त से कोई आकस्मिक पाप हो भी जाता है तो भगवान् इस शरणागत को सभी पापों से बचा लेते हैं, जिसकी पुष्टि सभी शास्त्रों में हुई है-

स्वपादमूलं भजतः प्रियस्य त्यक्तान्यभावस्य हरिः परेशः ।
विकर्म यच्चोत्पतितं कथञ्चिद् धुनोति सर्वं हृदि सन्निविष्टः ।।

(भागवत ११.५.४२)

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वैष्णवनिन्दा-श्रवण से भी महान् दोष-

“वैष्णवनिन्दाश्रवणेऽपि दोष उक्तः –
‘निन्दां भगवतः शृण्वन् तत्परस्य जनस्य वा।
ततो नापैति यः सोऽपि यात्यधः सुकृताच्युतः ॥
इति ततोऽपगमश्चासमर्थस्य एव।
समर्थेन तु निन्दकजिह्वा छेत्तव्या, तत्राप्यसमर्थेन स्वप्राणपरित्यागोऽपि कर्त्तव्यः ॥

(भक्तिसन्दर्भ २६५ संख्या)

केवल वैष्णव निन्दाकारी व्यक्ति ही दोषी (अपराधी) हैं, ऐसी बात नहीं है, जो वैष्णव निन्दा श्रवण करते हैं, उनको भी अपराध होता है। शास्त्रोंमें वर्णन है कि भगवान् या भक्तोंकी निन्दा श्रवणकर जो उस स्थानका त्याग नहीं करते हैं, वे लोग भी सुकृतिसे च्युत होकर अधः पतित हो जाते हैं। ऐसे स्थानसे चले जानेकी विधि असमर्थ लोगोंके लिए है। समर्थवानोंके लिए प्राण परित्याग ही एकमात्र कर्त्तव्य है ।

गौड़ीय कण्ठहार

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दिवि वा भुवि वा ममास्तु वासः,
नरके वा नरकान्तक प्रकामम्।
अवधीरित – शारदारविन्दौ,
चरणौ ते मरणेऽपि चिन्तयामि ।।8।।

नरकासुर को विनाश करने वाले हे हरि ! मैं स्वर्ग में, मृत्युलोक में अथवा नरक में ही क्यों न रहूँ, बस इतनी सी प्रार्थना है कि आप मुझ पर ऐसी कृपा करें कि… शरतकालीन कमल की शोभा भी जिनके आगे फीकी पड़ जाती है, उन चरणों की मैं सर्वत्र व मरते दम तक चिन्ता कर पाऊँ ।

श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्

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श्रीकृष्ण की समस्त लीलाओं की मुकुटमणि रासलीला है। श्रीसनातन गोस्वामीपाद कहते हैं- ‘रासः परम रस कदम्बमय रति यौगिकार्थ’ रास परम रस है, परम रस वह है, जिसका सम्बन्ध परम वस्तुके साथ है। रासक्रीड़ा न तो इस जगतमें है, न स्वर्गमें। द्वारकामें सोलह हजार एक सौ आठ महिषियाँ हैं वहाँ इसकी संभावना हो सकती है किन्तु वहाँ भी नहीं है। अन्यान्य भगवत् धामोंमें यहाँ तक कि वैकुण्ठमें भी नहीं है। केवलमात्र वृन्दावनमें ही रासकी अभिव्यक्ति है तथा इसमें सहयोगिनी हैं ब्रजरमणियाँ। इस परमरस कदम्बमय लीलाकी मूल उत्स हैं- श्रीवृषभानुनन्दिनी। रासलीला महोत्सवमें श्रीश्यामसुन्दर अत्यन्त आनन्दपूर्वक प्रेमार्णवकी तरंगोंमें डूब और उबर रहे हैं। उस प्रेमरूपी उत्ताल समुद्रमें गोपियोंके हाव-भाव कटाक्षरूपी सुउच्च लहरियोंसे अपनेको संरक्षित करनेके लिए ब्रजदेवियोंके कण्ठको धारणकर उनके तटप्रान्तमें स्थित हो रहे हैं।

उद्धवजीने ज्ञान-दृष्टिसे कृष्ण रुक्मिणीके भावी विवाहका दर्शन किया है तथापि ब्रजगोपियोंके सौभाग्यकी गंध भी वह रुक्मिणी प्राप्त नहीं कर सकीं, जो जगत् विख्यात हरिप्रिया हैं; फिर अन्यान्य महिषियों तथा स्वर्गदेवियों की क्या गिनती है? ब्रजदेवियाँ श्रीकृष्णको वशीभूत करनेमें सम्पूर्ण रूपसे समर्था हैं। समर्था रतियुक्त महाभावका चूड़ान्त मादनाख्य भाव एकमात्र श्रीराधाका ही भाव है। वे मधुररसकी मूल विलास हैं; अन्य समस्त गोपियाँ रस उपकरणके रूपमें रहती हैं। श्लोकमें ‘ब्रजसुंदरीणाम्’ पदसे श्रीराधाके प्रेम, सौन्दर्य, सुशीलता, नृत्य, गान-चातुरी, गुणावली, रूप-सम्पत्ति तथा पांडित्यसे अभिप्राय है।

सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा

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सब समय इसे स्मरण रखना चाहिए कि कृष्ण ही सबके एकमात्र प्रभु या सेव्य हैं तथा मैं कृष्ण का दास या सेवक हूँ। दूसरे लोग मेरी सेवा करेंगे, ऐसी दुर्बुद्धि से यदि हम नहीं बच सके, तो हमारा कल्याण नहीं हो सकता ।

प्रत्येक व्यक्ति ही अपने को सबसे अधिक दीन-हीन जानकर दूसरे मठवासी वैष्णवों की सेवा करेंगे। कहीं हम यह न भूल जाएँ कि सब समय कृष्ण की सेवा ही हमारा कर्तव्य है। परन्तु कृष्णसेवा की अपेक्षा गुरु- वैष्णवों की सेवा अधिक प्रयोजनीय है ।

श्रीलप्रभुपाद

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श्रीचैतन्यदेव की दया, जगत में किसी और दया के साथ तुलनीय नहीं

पहले मैंने प्रियता और कमनीयता की जो बात कही है, उसका उद्देश्य है कि, उनकी दया के भीतर किसी प्रकार की कठिनाई, उग्रता, शारीरिक मुशकिलें या अनुपादेयता (निकृष्टता) जैसा कोई पदार्थ दिखता ही नहीं है। इसीलिए चैतन्यदेव महावदान्य हैं। उन्होंने जिस वस्तु को दयापरवश, हमें दान किया है, वह हमारे जैसे कलिहत जीवों के लिए अति सहज, सरल, स्निग्ध, प्रिय और कमनीय है। उन्होंने जिस वस्तु को दयापरवश, दान किया, उसे उनके आविर्भाव के पहले तक किसी आचार्य ने भी हमारे मंगल के लिए दान नहीं किया था। आचार्य श्रीपाद रामानुज, आचार्य श्रीपाद मध्व, आचार्य श्रीपाद विष्णुस्वामी, आचार्य श्रीपाद निम्बादित्य एवं श्रीपाद-शंकर इत्यादि किसी ने भी, जिस प्रकार श्रीचैतन्यदेव ने हमारे लिए किया है, वैसा नहीं किया। चैतन्यदेव ने जिस प्रकार जीव के कृष्णदासत्व के बारे में सूचित किया है, दूसरे आचार्यों ने उस तरह से नहीं किया। आचार्य शंकर ने दासत्व का अंगीकार बिल्कुल ही नहीं किया। चैतन्यदेव ने बताया है कि, द्वादश प्रकार के दासत्व में से पाँच प्रकार के दासत्व, प्रधान रूप से जीव के स्वरूप में अवस्थान करते हैं। चैतन्यदेव के इस दासत्व-पंचक या रस-पंचक के विषय में आपको कुछ बताने की विशेष इच्छा थी। जो भी हो, किसी और समय, इस विषय पर विस्तार से चर्चा करने की इच्छा है। चैतन्यदेव की दया के वैशिष्ट्य का यह एक रूप है। उन्होंने, उक्त पाँच प्रकार की सेवाएँ प्राप्त करने के उपाय स्वरूप, श्रीनाम ग्रहण करने की बात हम से कही है।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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“सनातन धर्म all-accommodating एवं all embracing है। कारण, यह धर्म किसी भी व्यक्ति-विशेष या किसी भी जाति-विशेष अथवा सम्प्रदाय-विशेष का धर्म नहीं है। भौगोलिक सीमा द्वारा विभक्त किसी भी देश का धर्म सनातन धर्म नहीं है। हिन्दु धर्म को ‘सनातन धर्म’ नहीं कहा जाता है। सनातन-वस्तु का जो धर्म है, वह ही सनातन धर्म है। देह और मन असनातन हैं, इसलिये उनका धर्म भी असनातन है अर्थात् अनित्य है; देह और मन से अतीत आत्मा सनातन होने के कारण उसका धर्म ही सनातन धर्म है। सभी जीवों का स्वरूप-धर्म ही सनातन-धर्म है। त्रिगुणात्मक प्रकृति के संग से जीवों में जो बहुत से नैमित्तिक धर्मों का प्रकाश देखा जाता है, वह वर्णभेद से, आश्रमभेद से, जातिभेद से, देशभेद से अलग-अलग है। बद्ध जीव के लिये स्वरूप के धर्म में प्रतिष्ठित होना कोई सहज बात नहीं है। इसीलिए क्रममार्ग से स्वरूपधर्म तक पहुँचने के लिए वर्णाश्रम-धर्म की व्यवस्था दी गयी है। प्रचलित समाज की व्यवस्था में वर्णाश्रमधर्म को सनातन धर्म कहने का उद्देश्य यह है कि उसका चरम लक्ष्य है-सनातनधर्म। बद्धजीव के कल्याण के लिये समाज की ऐसी सुवैज्ञानिक व्यवस्था कहीं भी नहीं देखी जाती। सनातन धर्म के मुख्य तात्पर्य ‘श्रीभागवत धर्म’ को श्रीचैतन्य महाप्रभु जी ने स्वयं आचरण करके प्रचार किया है तथा उन्होंने कहा है कि इस भागवत-धर्म के आश्रय में सभी विश्ववासी एक ही प्रीति-सूत्र में बंध सकते हैं।

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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जागतिक लाभ-पूजा-प्रतिष्ठा की आशा बढ़ जाने पर ही मनुष्य अशिष्ट आचरण में प्रवृत्त होता है, तब वह अमानुष बन जाता है।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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चिंता चिता समान

एक धनी व्यक्ति था जो हर समय अपने व्यवसाय को लेकर व्यस्त रहता था। पूरे दिन में वह अपने भोजन के लिए भी समय नहीं निकाल पाता था। शाम को घर लौटने के बाद भी वह काम के बारे में ही सोचता रहता था। उसकी पत्नी उससे कहती रहती थी, “आप इतना परिश्रम क्यों करते हैं? आपको अपने स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना चाहिए। दिन में काम पूरा करके रात्रि में विश्राम करने से आपका शरीर ठीक रहेगा।”

एक रात्रि वह पत्नी की बात मानकर थोड़ा जल्दी सो गया। थोड़े समय सोने के बाद वह उठा और कुछ लिखने लगा। उसकी पत्नी ने पूछा, “क्या हुआ? क्यों उठ गए?”

वह व्यक्ति बोला, “कल मुझे एक व्यक्ति से ५० हज़ार रुपये लेने हैं। मैं उसे लिख लेता हूँ। मेरे ऊपर कितनी ज़िम्मेदारी है। तुम्हारा क्या है? तुम पर तो कोई ज़िम्मेदारी नहीं है।”

पत्नी ने कहा, “किन्तु यदि आप सोऐगें नहीं तो आपकी तबियत ख़राब होगी।” वह व्यक्ति दोबारा सोने का प्रयास करने लगा, पर थोड़े ही समय में फिर उठकर कहने लगा, “कल मुझे एक और व्यक्ति से कुछ रुपये लेने हैं। मैं उसे भी लिख लेता हूँ, नहीं तो भूल जाऊँगा।”

इस प्रकार वह बार-बार सोने का प्रयास करता रहा किन्तु सो नहीं पाया। संसार की अनित्य वस्तुओं में उसकी तीव्र आसक्ति होने के कारण रात्रि में बार-बार उसकी नींद टूटती रही। बहुत प्रयासों के बाद भी जब वह सो नहीं पाया तब उसे नींद की गोली खानी पड़ी।

धीरे-धीरे ऐसा हो गया कि उसे नींद की गोली खाने की आदत पड़ गई। फिर एक गोली से भी नींद नहीं आती थी तो वह गोलियों की मात्रा बढ़ाता गया। ऐसा करते-करते एक दिन उसने नींद की इतनी गोलियाँ खा लीं कि अगले दिन सुबह वह उठ नहीं पाया। उसे वैकुण्ठ प्राप्ति हो गई (यहाँ पर वास्तव वैकुण्ठ प्राप्ति की बात नहीं की गई है। एक व्यंग्य के द्वारा बतलाया गया है कि उस व्यक्ति की मृत्यु हो गई)।

एक दिन उसकी माताजी हमारे कोलकाता मठ में मेरे पास आकर बहुत रोने लगी। जब मैंने उनसे रोने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया, “मैं अपने बेटे को इतना समझाती थी कि नींद की गोलियाँ मत खाओ किन्तु उसे अपने व्यवसाय की इतनी चिंता थी कि गोली खाए बिना उसे नींद ही नहीं आती थी और नींद न आने से तो शरीर ख़राब होता। एक दिन उसने इतनी गोलियाँ खा लीं कि वह अगले दिन सुबह उठा ही नहीं।”

संसार की चिंता और उसके प्रति आसक्ति मृत्यु की ओर ही ले जाएगी। संसार की वस्तुओं के प्रति तीव्र आसक्ति होने से मन में हर समय कोई न कोई चिंता बनी रहती है, जिससे व्यक्ति ठीक से सो भी नहीं पाता। हमें यह स्मरण रखना होगा कि संसार की संपत्ति का मिलना और चले जाना, ये दोनों तो अपने पूर्व कर्मों के अनुसार ही होता है।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज

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