यत्रानुरक्ताः सहसैव धीरा व्यपोह्य देहादिषु संगमूढम् ।
व्रजन्ति तत्पारमहंस्यमन्त्यं यस्मिन्नहिंसोपशमः स्वधर्मः ॥

यत्र जिनके प्रति; अनुरक्ताः दृढता से आसक्त; सहसा एकाएक; एव निश्चय ही; धीराः = आत्मसंयमी; व्यपोह्य एक ओर छोड़कर; देह स्थूल शरीर तथा सूक्ष्म मन; आदिषु सम्बन्धित; सङ्गम आसक्ति; ऊढम् लगे हुए; व्रजन्ति-जाते हैं; तत्-वह; पारम-हंस्यम्-सिद्धि की सर्वोच्च अवस्था; अन्त्यम् तथा उसके परे; यस्मिन् जिसमें; अहिंसा अहिंसा; उपशमः तथा वैराग्य; स्व-धर्मः = परिणामी वृत्ति।

अनुवाद – भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति आसक्त आत्म-संयमी पुरुष, सहसा स्थूल शरीर तथा सूक्ष्म मन सहित, संसार की आसक्ति को त्याग सकते हैं और संन्यास आश्रम की सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त करने के लिए बाहर चले जाते हैं, जिससे अहिंसा तथा वैराग्य उत्पन्न होते हैं।

तात्पर्य – केवल आत्म-संयमी व्यक्ति ही धीरे-धीरे भगवान् के प्रति अनुरक्त हो सकता है। आत्म-संयमी का अर्थ है जो, आवश्यकता से अधिक इन्द्रियभोग में लिप्त न हो। जो लोग आत्म-संयमी नहीं हैं, वे इन्द्रियभोग में लिप्त रहते हैं। शुष्क दार्शनिक चिन्तन मन का सूक्ष्म इन्द्रियभोग है। इन्द्रियभोग से अंधकार का मार्ग खुलता है। जो लोग धीर हैं, वे संसार के बद्धजीवन से मुक्ति मार्ग की ओर अग्रसर हो सकते हैं। इसीलिए वेदों का आदेश है कि अंधकार के मार्ग पर मत जाओ, अपितु प्रकाश मार्ग या मुक्ति की ओर अग्रसर होओ। आत्म-संयम (धीरता) इन्द्रियों को कृत्रिम ढंग से भौतिक भोग से रोकने से नहीं होता, अपितु इन्द्रियों को भगवान् की दिव्य सेवा में लगाने से होता है। इन्द्रियों को बलपूर्वक दमित नहीं किया जा सकता, अपितु उन्हें उचित कार्य में लगाना होता है। अतएव शुद्ध इन्द्रियाँ सदैव भगवान् की सेवा में लगी रहती हैं। इन्द्रियों के संलग्न रहने की यह सिद्धावस्था भक्तियोग कहलाती है। अतएव जो लोग भक्तियोग के साधनों में अनुरक्त हैं वे वास्तव में धीर हैं और वे सहसा भगवान् की सेवा करने के लिए अपना घरेलू या शारीरिक मोह छोड़ सकते हैं। यह परमहंस अवस्था कहलाती है। हंस दूध तथा पानी के मिश्रण में से केवल दूध ग्रहण करता है। इसी प्रकार जो माया की सेवा न करके, भगवान् की सेवा करना स्वीकार करते हैं, वे परमहंस कहलाते हैं। उनमें स्वभावतः सारे सद्गुण यथा निरभिमानता, अहंकार से मुक्ति, अहिंसा, धैर्य, सरलता, विनयशीलता, पूजा, भक्ति तथा निष्ठा पाये जाते हैं। ये सारे दैवी गुण भगवद्भक्त में सहज में पाये जाते हैं। ऐसे परमहंस, जो भगवान् की सेवा में ही लगे रहते हैं, दुर्लभ हैं। यहाँ तक कि मुक्तात्माओं में भी ये दुर्लभ हैं। वास्तविक अहिंसा का अर्थ है, द्वेष से मुक्त होना। इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति अपने साथी से द्वेष रखता है। किन्तु परमहंस भगवान् की सेवा में संलग्न रहने के कारण पूर्णतया द्वेषरहित होता है। वह प्रत्येक प्राणी को परमेश्वर के रूप में प्यार करता है। वास्तविक वैराग्य का अर्थ है ईश्वर पर पूर्णतया आश्रित होना। प्रत्येक जीव किसी अन्य पर आश्रित है, क्योंकि उसे ऐसा बनाया गया है। वास्तव में हर कोई भगवान् की कृपा पर आश्रित है, किन्तु जब वह भगवान् के साथ अपने सम्बन्ध को भूल जाता है तो वह प्रकृति पर निर्भर रहने लगता है। वैराग्य का अर्थ है प्रकृति पर निर्भरता का परित्याग और भगवान् की कृपा पर पूर्णतया आश्रित होना। वास्तविक स्वतन्त्रता का अर्थ है, पदार्थ पर निर्भर न रहकर, भगवान् की कृपा पर पूर्ण श्रद्धा। यह परमहंस अवस्था भक्ति योग की सर्वोच्च सिद्ध अवस्था है, जो परमेश्वर के लिए की जाने वाली भक्ति की विधि है।

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नाम तथा नामाभासका फलभेद

नामैकं यस्य वाचि स्मरणपथगतं श्रोत्रमूलंगतं वा शुद्धं वाशुद्धवर्ण व्यवहितरहितं तारयत्येव सत्यम्।
तच्चेद्देहद्रविणजनतालोभपाषण्डमध्ये निक्षिप्तं स्यान्न फलजनकं शीघ्रमेवात्र विप्र ॥

(पद्मपुराण-स्वर्गखण्ड ४८ अध्याय)

हे विप्रवर! एक हरिनाम भी जिसकी जिह्वापर उदित हो जाते हैं अथवा कर्णेन्द्रियमें प्रवेश करते हैं या स्मरण-पथपर जागरूक हो जाते हैं, उसका वे नाम (प्रभु) अवश्य ही उद्धार करेंगे। यहाँ नामोच्चारणमें वर्णोंकी शुद्धता अथवा अशुद्धता या विधिके अनुसार शुद्ध नामोच्चारण या अशुद्ध उच्चारण आदिका महत्त्व नहीं, अर्थात् श्रीनाम इनका कुछ भी विचार नहीं करते, परन्तु विचारणीय यह है कि यदि वे सर्वशक्तिसम्पन्न नाम शरीर, गृह, अर्थ-सम्पत्ति, पुत्र-परिवार और लोभ (काञ्चन कामिनी और प्रतिष्ठादि) आदि पाषाणके ऊपर पतित हों अर्थात् उनके उद्देश्यसे लिये जायें, तो फल शीघ्र ही उत्पन्न नहीं होता ।

गौड़ीय कण्ठहार

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नास्था धर्म न वसुनिचये नैव कामोपभोगे,
यद्भाव्यं तद्भवतु भगवन्! पूर्वकर्मानुरूपम्
एतत् प्रार्थयं मम बहुमतं जन्म जन्मान्तरेऽपि,
त्वत्पादाम्भोरुह युगगता निश्चला भक्तिरन्तु ।।7।।

हे भगवन्! धर्म में मेरी श्रद्धा नहीं है। धन- सम्पत्ति मेरी बढ़े, ऐसी भी मेरी इच्छा नहीं है। अपनी दुनियावी कामनाओं को पूरा करने की भी मेरी प्रवृत्ति नहीं है। मेरे किये कर्मानुसार जो मेरे साथ होना हो वह होता रहे, इसमें भी मैं कुछ नहीं कहना चाहता मेरी तो आन्तरिक अभिलाषा व प्रार्थना यह है कि जन्म-जन्मान्तर में मेरी आपके पादपद्मों में अचला – भक्ति हो।

श्रीमुकुन्द माला स्तोत्रम्

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श्रीकृष्णका रूप विधाताने अपूर्व बनाया है इसीका वर्णन श्रीमद्भागवत (३.२.१३) में इस प्रकार है

यद्धर्मसूनोर्वत राजसूये निरीक्ष्य दृक्स्वस्त्ययनं त्रिलोकः ।
कात्स्न्र्वेन चाद्येह गतं विधातुरर्वाक्सृतौ कौशलमित्यमन्यत ।।

धर्मराज युधिष्ठिरके राजसूय यज्ञमें जब भगवान कृष्णके उस नयनाभिराम रूपपर लोगोंकी दृष्टि पड़ी, तब त्रिलोकीने यही माना था कि मानव सृष्टिकी रचनामें विधाताकी जितनी चतुराई है, सब इसी रूपमें पूरी हो गई है।

यूधिष्ठिर राजसूये नयनमङ्गल।
कृष्णरूप लोकत्रय-निवासी सकल ।।
जगतेर सृष्टि मध्ये अति चमत्कार।
विधातार कौशल ए करिल निर्धार ।।

भजनगस्यवृत्ति-उद्धवजी श्रीकृष्ण प्रेममें विह्वल होकर विदुरजीके सम्मुख श्रीकृष्णके रूप सौन्दर्यका वर्णन कर रहे हैं। कहते हैं- जिन लोगोंने युधिष्ठिर महाराजके राजसूय यज्ञमें श्रीकृष्णका साक्षात् दर्शन किया, वे विधाताकी सृष्टि रचना-कौशलकी सराहना करने लगे। नीलोत्पल अथवा इन्द्र नीलमणिकी आभाको भी पराजित करने वाली कमनीय अंग कातिके दर्शनकर सृष्टिकर्ता ब्रह्मा भी आश्चर्य चकित हो जाते हैं। इस श्लोकमें विधाताके रचना-कौशलकी प्रशंसा की गई है, किन्तु श्रीकृष्ण विग्रह नित्य अनादि हैं तथापि लौकिक दृष्टिसे सृष्टि आदि शब्दोंका प्रयोग किया गया है। श्रीकृष्णका स्वरूप अनादि-सिद्ध नित्य नरवपु है, अर्थात् मनुष्यकी भाँति है। उनका यही स्वरूप वृन्दावनमें प्रकाशित होता है तथा नरलीलाके उपयुक्त है। श्रीकृष्णकी वैकुण्ठादि धामोंमें भिन्न-भिन्न स्वरूपोंसे जितनी भी लीलायें हैं, उन सबमें उनकी नरवत्-लीला जो उन्होंने ब्रजमें एक साधारण मनुष्यकी भाँति की है, सर्वश्रेष्ठ है। गुणोंके प्रकाशके तारतम्यानुसार श्रेष्ठ मध्यमादिके भेदसे श्रीकृष्णका पूर्णतम, पूर्णतर एवं पूर्ण इन तीन प्रकारसे कीर्त्तन हुआ है। उनके सर्वगुण प्रकाशक स्वरूपको अर्थात् जिसमें उनके समस्त गुण पूर्णतम रूपसे अभिव्यक्त हुए हैं उसे पूर्णतम कहते हैं। श्रीकृष्णकी पूर्णतमता वृन्दावनमें है। केवल वृन्दावनमें ही श्रीकृष्ण पूर्णतम भगवान स्वरूपसे प्रकाशित होते हैं, क्योंकि व्रजके परिकरोंमें प्रेमकी पूर्णतम अभिव्यक्ति है-अतः श्रीकृष्णका सौन्दर्य-माधुर्य ऐश्वर्य पूर्णतम रूपमें प्रकाशित होता है। अन्यान्य सब स्थानोंपर वहाँके परिकरोंके प्रेम विकासके तारतम्यानुसार श्रीकृष्ण पूर्णतर एवं पूर्ण स्वरूपोंसे प्रकाशित होते हैं।

ब्रजमें पूर्णतम प्रकाशित श्रीकृष्णका ब्रजवासियोंके साथ दास्य, सख्य तथा वात्सल्य इन तीन भावोंमें कोई एक सम्बन्ध रहता है। इन तीनों भावोंमें हर एकमें एक सम्बन्धकी अपेक्षा है तथा सेवामें सम्बन्धकी मर्यादा है। किन्तु कान्ता भाववती ब्रज गोपियोंका श्रीकृष्णके साथ कांद-कान्ताका सम्बन्ध है तथा इनका सम्बन्ध सेवा, वासनाके अनुगत है। कृष्णके सुख तथा सेवाके लिए आर्यपथ तथा मर्यादाका उल्लंघन करनेमें भी इन्हें कोई हिचकिचाहट नहीं होती। अतः कान्ता-प्रेमका उत्कर्ष सर्वातिशायी है। इन समस्त कान्ताओंमें भी श्रीराधाजी सर्वशिरोमणि हैं। श्रीराधाके प्रेमने श्रीकृष्णको सम्यरूपसे वशीभूत कर रखा है। श्रीराधा प्रेमके प्रभावसे श्रीकृष्णचन्द्रका पूर्णतम सौन्दर्य एवं माधुर्य उत्तरोत्तर वृद्धिको प्राप्त करता है।

सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा

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हमारा प्रधान कर्तव्य

हम प्रत्येक जन्म में ही विषयों को प्राप्त करेंगे, भोक्ता होकर कर्मफल का भोग भी भोगेंगे। उन समस्त भोगों को भोगने के लिए तो बहुत से जन्म हैं, परन्तु जो काम सबसे बड़ा है-भगवान की सेवा, जो मनुष्य जन्म के अतिरिक्त किसी भी जन्म में सम्भव नहीं है, हमें उठकर तत्परता से उसमें लग जाना चाहिए । यदि हम देवता होते, तो हमें हरिकथा सुनने का अवसर या समय प्राप्त नहीं हो पाता । अतः जीवन रहते रहते ही जिससे हमें भगवान की प्राप्ति हो जाय, इसके लिए हमें जी-जान से चेष्टा करनी चाहिए। क्योंकि भगवान की सेवा के अतिरिक्त जीव के लिए बड़ा कर्तव्य और कोई नहीं है ।

श्रीलप्रभुपाद

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‘दया’ गुण को लेकर श्रीचैतन्यदेव का अवतरण

‘दया’ एक गुण है। गुण के अलग अवस्थान की धारणा हम कभी नहीं कर सकते हैं। गुण किसी को आश्रय बनाकर रहता है। इसीलिए ‘दया’ रूप गुण को किसी के आश्रय में ही रहना होगा। पाश्चात्य-भाषा में बोलने पर आप सब को और भी सहज लगेगा। गुण अर्थात् – Attribute; इसलिए Attribute की Exclusively separate existance (विशिष्ट अलग अधिष्ठान) की बात हम कभी सोच ही नहीं सकते हैं। वह Substance (पदार्थ) के साथ ओत-प्रोत भाव से स्वतः ही विद्यमान है। इसलिए Attribute के सम्बन्ध में चर्चा करने से, Substance चैतन्यदेव से उसका अलग अधिष्ठान हो ही नहीं सकता। इसलिए चैतन्यदेव कहने से दया को उनके साथी के रूप में समझना होगा। चैतन्यदेव का परिचय देते समय श्रीचैतन्य चरितामृत में हमें “अनर्पितचरी चिरात् करुणयावतीर्णः कलौ” इत्यादि एक श्लोक देखने को मिलता है। इस श्लोक के अंदर ‘करुणया अवतीर्णः यह बात दीखती है। ‘करुणया’ इस करुणकारक ‘तृतीय विभक्ति’ के कारण हमें दो वस्तुएँ मिलती हैं। सबसे पहला कि, दया के वशीभूत होकर अवतीर्ण हुए थे और दूसरा, साहचर्य, अर्थात् करुणा-सहित अवतीर्ण हुए थे, ऐसा ही उसका अर्थ है।

चैतन्यदेव दया करके यहाँ हमारे दुख-दर्द निवारण करने के लिए आये थे- इस अर्थ की अपेक्षा वे करुणा अर्थात् दया-गुण को साथ लेकर अवतीर्ण हुए थे – मैं, इसी अर्थ को ग्रहण करता हूँ। ‘करुणा’ – यही गुण श्रीचैतन्यदेव में अवस्थित है। चैतन्यदेव के आविर्भाव के साथ-साथ ही उनकी समस्त गुणावलियों का आविर्भाव हुआ था। इनमें से दया-गुण ही हमारी चर्चा का विषय है।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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भगवान् ही सबके पालनकर्त्ता

गुरु महाराज के श्रीहरिदास नामक एक बन्धु थे जो कभी-कभी गुरु महाराज के मठ में योगदान से पूर्व के किराए वाले घर में उनके साथ बैठकर कीर्त्तन किया करते थे। गुरु महाराज ने कोलकाता में कुछ समय रहने के पश्चात् सम्पूर्ण रूप से गौड़ीय मठ में योगदान दिया।

वहाँ से श्रील प्रभुपाद के निर्देशानुसार वे प्रचार पार्टी के साथ मद्रास चले गए तथा वहाँ का प्रचार कार्य सम्पन्न होने पर कोलकाता वापस आए।

एक बार श्रील प्रभुपाद की कथा हेतु कोलकाता विश्वविद्यालय के दरभङ्गा हॉल में कार्यक्रम का आयोजन किया गया। उसी उपलक्ष्य में गुरु महाराज ने अपने बन्धु श्रीहरिदास को भी श्रील प्रभुपाद की कथा श्रवण करने के लिए साथ में जाने के लिए कहा। किन्तु श्रीहरिदास ने उत्तर दिया, “आपके पीछे तो कोई क्रन्दन करने वाला नहीं है। कारण, आपने विवाह नहीं किया, आपकी कोई सन्तान आदि नहीं है। किन्तु मैंने तो विवाह किया है। मेरी पत्नी है, सन्तान है, मुझे तो उनका पालन करना है। मैं यदि उनके पालन की चिन्ता नहीं करूँगा तो अन्य कौन करेगा, वे कैसे अच्छे से पालित होंगे? आपके साथ कथा सुनने हेतु आने-जाने में समय व्यय होगा। इसकी अपेक्षा यही समय यदि मैं अपने परिवार के लिए काम करके धन अर्जन करने में लगाऊँ तो अच्छी तरह से उनका पालन कर पाऊँगा।” गुरु महाराज ने उस समय उन्हें कुछ भी नहीं कहा तथा स्वयं ही श्रील प्रभुपाद की कथा सुनने हेतु चले गए।

कुछ समय के पश्चात् उन्हें अपने बन्धु तथा गुरुभ्राता श्रीनारायण मुखर्जी के माध्यम से यह ज्ञात हुआ कि कार दुर्घटना में श्रीहरिदास की मृत्यु हो गई है।

समय के फेर से जब गुरु महाराज ने कोलकाता में श्रीचैतन्य गौड़ीय मठ की स्थापना की, तब उन्हीं श्रीहरिदास का पुत्र गुरु महाराज के दर्शन के लिए आया।

उनकी अत्यन्त श्रद्धासहित की जा रही प्रणाम आदि क्रियाओं को देखकर गुरु महाराज ने उनसे उनका परिचय पूछते हुए कहा, “आप कौन हैं और कहाँ से आए हैं?” उन्होंने उत्तर दिया, “मैं आपके बन्धु श्रीहरिदास का पुत्र हूँ।” परिचय सुनकर गुरु महाराज ने उनसे उनके घर, परिवार, कार्य आदि के विषय में भी सब जानकारी ली तथा अन्त में उन्हें प्रसाद आदि देकर तृप्त किया।

उनके जाने के बाद गुरु महाराज ने हम लोगों को उपलक्ष्य करके शिक्षा देते हुए कहा, “हरिदास कहता था कि वह इनका पालन नहीं करेगा तो अन्य कौन करेगा। देखो। उसके नहीं रहने पर भी इन का पालन तो हो ही गया न। किसी के रहने नहीं रहने पर भी पढ़ना-लिखना, पालन होना इत्यादि भगवान् के द्वारा ही होता है, अन्य किसी के द्वारा नहीं।

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहंकारविमूढात्मा कर्त्ताहमिति मन्यते ॥
श्रीमद्भगवद्गीता (३.२७)

[सभी प्रकार के कर्म प्रकृति के गुणों के द्वारा किए जाते हैं, परन्तु अहङ्कार से मोहित चित्त वाला व्यक्ति ऐसा मान लेता है कि मैं कर्त्ता हूँ।]

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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श्रीगुरु-वैष्णवों की कृपा अंतःस्थल से अनुभव करने की वस्तु है। जिनका जड़ अहंकार है, वे इसे कभी भी अनुभव नहीं कर सकते हैं।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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पुनर्जन्म

असम के ग्वालपाड़ा नामक स्थान की यह एक सत्य घटना है। उस समय ग्वालपाड़ा जंगलों, पहाड़ियों और नदियों से घिरा एक सुन्दर स्थान था। उन जंगलों में बाघ, बन्दर, लोमड़ी आदि अनेक पशु देखे जाते थे। ग्वालपाड़ा में हिन्दू और मुसलमान, दोनों समुदाय के लोग थे, जिसमें मुसलमान समुदाय के लोग अधिक धनी थे। दोनों समुदायों के बीच कभी कोई झगड़ा नहीं होता था; वे एक-दूसरे के साथ प्रीतिपूर्वक रहते थे।

एक बार वहाँ के एक हिन्दू व्यक्ति को अपनी बेटी के विवाह के लिए कुछ पैसों की आवश्यकता पड़ी। हिन्दू समुदाय के अधिकतर लोगों के गरीब होने के कारण, वह सहायता के लिए एक मुसलमान व्यक्ति के पास गया। उस छोटे से शहर में सब एक-दूसरे को जानते थे।

मुस्लिम व्यक्ति ने पूछा, “क्या बात है? सब ठीक तो है? क्या किसी वस्तु की आवश्यकता है?”

अपनी समस्या बताते हुए उस व्यक्ति ने कहा, “मुझे अपनी बेटी के विवाह के लिए कुछ पैसों की आवश्यकता है। मेरे पास इतने पैसे नहीं है, इसलिए मैं आपसे कुछ पैसे उधार लेने आया हूँ। जैसे ही व्यवस्था होगी, मैं पैसे लौटा दूँगा।”

मुसलमान ने पूछा, “कितने पैसों की आवश्यकता है?”

उस व्यक्ति ने अपनी आवश्यकता बताई। मुसलमान जानता था कि वह व्यक्ति कभी उन पैसों को लौटा नहीं पाएगा। पुनर्भुगतान (वापिस मिलने) की कोई आशा न रखते हुए उसने कहा, “तुम मेरे पड़ोसी हो। मैं अवश्य तुम्हारी सहायता करूँगा। तुम ये पैसे ले जाओ और निश्चिंत होकर अपनी बेटी का विवाह करो।”

हिन्दू व्यक्ति की बेटी का विवाह धूमधाम से हो गया। किसी को पता नहीं चला कि उसे इतने पैसे कहाँ से मिले। पंद्रह साल बीत जाने पर भी वह पैसे लौटा नहीं पाया और उसकी मृत्यु हो गई।

उस व्यक्ति का एक बेटा था, जो बाद में एक धनी व्यक्ति बना। एक रात उसने एक स्वप्न देखा। स्वप्न में उसके पिता उसके पास आए और कहने लगे, “तुम नहीं जानते कि मैंने तुम्हारी बहन का विवाह कैसे किया था। उसके विवाह के लिए मैंने एक व्यक्ति से कुछ पैसे उधार लिए थे। मैंने उसे पैसे लौटाने का वचन भी दिया था किन्तु मैं पैसे लौटा नहीं पाया, जिसके कारण अब मेरा जन्म उसी व्यक्ति के घर में एक कुत्ते के रूप में हुआ है।”

मुसलमान व्यक्ति का नाम और उससे कितने पैसे उधार लिए थे, यह बताते हुए पिता ने कहा, “यदि तुम उसके पैसे लौटा दोगे तो मुझे कुत्ते की योनि से मुक्ति मिल जाएगी।”

स्वप्न में पिता की बात को सुनकर बेटा चकित रह गया। उसने सोचा, “पिताजी ने ऐसा क्यों कहा?” उसके पिता ने जिस मुसलमान व्यक्ति का नाम लिया था वह पूरे गाँव में प्रसिद्ध था। वह तुरंत उसके घर गया और उससे पूछने लगा, “क्या मेरे पिताजी ने किसी समय आपसे कुछ पैसे उधार लिए थे?”

उसकी बात पर ध्यान न देते हुए उस मुसलमान व्यक्ति ने कहा, “जाओ, जाओ! वह बहुत पुरानी बात है, तुम्हें उस विषय में सोचने की आवश्यकता नहीं है!”

“कितनी राशि थी?” बेटे ने पूछा।

बार-बार पूछने पर मुसलमान व्यक्ति ने उसके पिता को दिए हुए पैसों के विषय में बताते हुए कहा, “यह तो बहुत पुरानी बात है, अभी तुम इसके लिए चिंतित क्यों हो?”

बेटे ने तब पूछा, “क्या आपके घर में कोई कुत्ता है?”

“हाँ”, मुसलमान ने उत्तर देते हुए पूछा, “तुम यह कैसे जानते हो?”

“क्या मैं उसे देख सकता हूँ?” बेटे ने पूछा।

मुसलमान ने कुत्ते को आवाज़ लगाकर बुलाया। कुत्ता जब वहाँ आया, तब वह रो रहा था। बेटे ने उस व्यक्ति को अपने स्वप्न की बात बताई और कहा, “आपको यह पैसे लेने ही होंगे।”

जैसे ही उसने मुसलमान को पैसे दिए, अपनी अंतिम सांस लेते हुए कुत्ते ने उसी समय अपना शरीर छोड़ दिया।

यह एक वास्तविक घटना है; कोई काल्पनिक कहानी नहीं है।

यह घटना स्पष्ट रूप से इस बात की पुष्टि करती है कि मनुष्य शरीर छूटने के बाद हमें पशु-पक्षी जैसी किसी निम्न योनि में भी जाना पड़ सकता है। श्रीमद् भागवतम् के पाँचवें स्कंध में वर्णित श्रीऋषभदेव के पुत्र, महाराज भरत का प्रसंग भी इसी बात की पुष्टि करता है जिसमें अपने अगले जन्म में उन्हें एक हिरण का शरीर प्राप्त हुआ था।

मनुष्य शरीर मिलना और उसमें भी साधुसंग का अवसर मिलना सहज नहीं है। ८४,००,००० योनियों में भ्रमण करने के बाद यह दुर्लभ मनुष्य जन्म मिलता है। मनुष्य जन्म पाकर यदि हम, पुत्र-परिवार, घर, धन-सम्पति इत्यादि नाशवान वस्तुओं के विषय में ही सोचते रहे तो यह ठीक नहीं है। नाशवान भोग हमें अन्य योनियों में भी मिलते हैं किन्तु भगवान् का भजन करने का अवसर अन्य किसी योनि में नहीं मिलता। इसलिए मनुष्य जीवन के अमूल्य समय को व्यर्थ गँवाए बिना हमें तुरंत ही अपने चरम कल्याण के लिए प्रयास आरम्भ कर देना

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज

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