किसी ईसाई विद्वान ने एक अंग्रेजी पत्रिका में लिखा है: “वर्तमान वैज्ञानिक अनुसंधानों के साथ धार्मिक भावों का सामंजस्य जिस प्रकार उन्नति-अभिलाषियों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गया है, ऐसा अन्य कुछ भी नहीं है। सत्-असत् का निर्धारण करने वाली बुद्धि किस प्रकार मानव के जड़मूलक (materialistic) सिद्धांतों के साथ एक साथ रह सकती है, और कैसे ही मनुष्य की उच्च अर्थात् अप्राकृतिक (spiritual) सत्ता जड़विज्ञान द्वारा निर्धारित मानव के जड़-उत्पत्ति संबंधी सिद्धांतों के साथ युगपत् स्वीकार की जा सकती है—ये दो प्रश्न तत्व-जिज्ञासुओं के हृदय को अवश्य उद्विग्न करते रहेंगे। पारमार्थिक-बुद्धि और जड़-वैज्ञानिक-बुद्धि, इन दोनों के मध्य एक विरोधाभास है, इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं है। जीवन के निर्णायक क्षणों में यह विरोधाभासी भाव नित्य वर्तमान रहता है, जो प्रेम की चेष्टा के स्थान पर ज्ञान की चेष्टा को स्थापित करने की वासना से उत्पन्न होता है।”

मानव जीवन की जड़मूलक व्याख्या के साथ सत्-असत् विचार और धार्मिक भावों का कितना गहरा संबंध है, इसे स्थिर करने से कोई लाभ नहीं होगा—ऐसा नहीं है। बल्कि समस्त मानव जाति के लिए यह अनुसंधान अत्यंत आवश्यक है। सभी कालों और सभी देशों में आज तक जितनी भी सामाजिक व्यवस्थाएं बनी हैं, वे सभी एक विश्वास पर टिकी हैं। वह विश्वास यह है कि मानव एक आध्यात्मिक सत्ता है और अपनी स्वतंत्र इच्छानुसार मानसिक व शारीरिक शक्तियों का संचालन करने में सक्षम है। आधुनिक विज्ञान इस विश्वास को मिटाकर उसके स्थान पर एक सर्वथा भिन्न विश्वास स्थापित करना चाहता है।

उनका प्रस्तावित भाव यह है कि मन और शरीर की शक्तियों के मेल से एक जड़-यंत्र के समान मानव की सृष्टि हुई है। इन दोनों भावों में अत्यंत अंतर देखा जा सकता है। इस बाद वाले भाव को स्वीकार करने का अर्थ केवल धर्म और संस्कारों के प्राचीन मंदिरों को नष्ट करना ही नहीं है, बल्कि उनकी प्रतीति को किसी आधारहीन चित्र की भाँति ओझल कर देना है। सत्-असत् का चिंतन, विचार, दया, आशा और क्षमा—जो संप्रति हमारी सत्ता में गहरे सत्य के रूप में विद्यमान हैं, वे सब अचानक आकाश-पुष्प के समान निराधार छाया मात्र रह जाएंगे। उत्तम और अधम के बीच का अंतर पूरी तरह समाप्त हो जाएगा।

एक नरभक्षी राक्षस और परोपकारी ईसा मसीह, दोनों ही जड़ के पूर्व-संस्कारों के परिणाम मात्र प्रतीत होंगे। वे गुरुत्वाकर्षण से गिरते हुए पर्वत के पत्थर के टुकड़ों की तरह जड़-द्रव्य मात्र बनकर रह जाएंगे; उनकी प्रशंसा या निंदा और उनके प्रति राग-द्वेष की कोई आवश्यकता नहीं रह जाएगी। डार्विन, टिंडल, हक्सले आदि आधुनिक वैज्ञानिकों के ग्रंथों का अध्ययन करने पर प्रतीत होगा कि उनका मत ऐसे विकृत निष्कर्षों से भयभीत नहीं होता।

मानव जीवन के आंतरिक रहस्य का निर्णय करते समय यदि उपर्युक्त जड़मूलक मत पर पूर्ण विश्वास कर लिया जाए, तो पूर्वोक्त सिद्धांतों से बचने का कोई उपाय नहीं है। तब मनुष्य को केवल जड़ से उत्पन्न एक यंत्र मात्र मानना ही होगा; इसे स्वीकार किए बिना जड़वादियों के आगे बढ़ने का कोई मार्ग नहीं दिखता। यहाँ सरल जिज्ञासुओं का कर्तव्य यह है कि वे जड़वादियों को उनके स्वयं के सिद्धांतों पर गंभीरता से विचार करने के लिए विवश करें और उनसे स्पष्ट उत्तर मांगें कि क्या हमने सत्य कहा है। कुछ वर्ष पूर्व डेविस ने अपने निबंध में ऐसा ही लिखा था: “मान लिया जाए कि विज्ञान और आत्म-तत्व में विरोध न होने पर भी परस्पर प्रतिद्वंद्विता है।”

अब देखना चाहिए कि इनमें से हमारी श्रद्धा पर किसका विशेष अधिकार है। यदि हम दोनों को समान सम्मान दे पाते तो हमें संतोष होता; किंतु हम ऐसा नहीं कर सकते। जब जड़वादियों ने यह मान लिया है कि विज्ञान को अधिक सम्मान देना चाहिए, तब हमारा ऐसा प्रश्न करना अनधिकार चेष्टा नहीं है। उनका विज्ञान उनकी अप्राकृतिक (अलौकिक) जीवन संबंधी किसी भी भाव का आभास नहीं देता। वह केवल क्रम-उत्पत्ति (evolution), शक्ति की रूपांतरता, प्रकृति की गति और नियम-क्रम जैसे शब्दों को ही व्यक्त करता है। इन सभी भावों के प्रति वे स्वयं बहुत आदर रखते हैं और इन्हें ‘सुंदर तत्व’ कहकर व्याख्यायित करते हैं, जबकि वे स्वयं इन्हें पूरी तरह नहीं समझ पाते। इन सिद्धांतों के अनुशीलन के प्रयास में वे बहुत कार्य करते हैं। हम ईसाई धर्मावलंबी ऐसे विशेष व्यक्ति-सिद्धांतों के वाक्यों का अनादर नहीं करते, किंतु जब जड़वादियों का विज्ञान हमारे सामने आता है, तो हम उसके प्रति कोई विशेष आदर प्रकट नहीं कर सकते। हम स्पष्ट कहते हैं कि विज्ञान-कुशल बुद्धि की अपेक्षा आत्म-तत्व के प्रति हमारी भक्ति अधिक है।

हमारे विचार में असली प्रश्न यह है कि वे वैकुंठ से प्रेषित उस आलोक का आश्रय लेंगे या नहीं? प्रश्न यह है कि तुम विज्ञान के अनुगत होगे या आत्म-ज्ञान के? विज्ञान बीती हुई बातों और निम्नगामी विषयों पर ध्यान देता है, किंतु आत्म-तत्व जीव के भावी स्वरूप और उसकी ऊर्ध्वगति की ओर दृष्टि रखता है। विज्ञान इंद्रिय-ग्राह्य विषयों का अनुसंधान करके देखता है कि वस्तुओं का विकास कैसे हुआ है; किंतु आत्म-ज्ञान पारमार्थिक जीवन के अमृत का पान करके काव्य और शिल्प की रचना करने में सक्षम होता है।

लुएलिन डेविस की बातें सुंदर ढंग से सजी होने पर भी हमें उनमें अनेक विवाद के बिंदु मिलते हैं। उनके लेखन में सर्वत्र यह बात लक्षित होती है— “यद्यपि आत्म-ज्ञान, विज्ञान की अपेक्षा काव्य, शिल्प और सामाजिक भावों के कारण हमारी श्रद्धा पर अधिक अधिकार रख सकता है, तथापि जीवन का वैज्ञानिक पक्ष भी हमसे कुछ न कुछ श्रद्धा की मांग रखता है, क्योंकि यह सत्य है।”

हम यह निश्चित करते हैं कि वैज्ञानिक सिद्धांत हमारी श्रद्धा का पात्र होना तो दूर, सर्वथा तुच्छ है। क्योंकि जिसे वे ‘वैज्ञानिक सिद्धांत’ कहते हैं, उसमें विज्ञान के कोई लक्षण नहीं हैं। उसमें ऐसी कई बातें हैं जो प्रमाणित नहीं हुई हैं और प्रमाणित होने योग्य भी नहीं हैं। देखिए, नूतन वैज्ञानिकों की मुख्य बात क्या है? उनकी मुख्य बात यह है कि मानव की कोई आध्यात्मिक सत्ता नहीं है, अतः उनके चरित्र और इतिहास की उन्नति में उसका कोई योगदान नहीं है। ईसा के कोई भक्त कहते हैं कि “मैं ईसा के प्रेम के कारण ऐसा कार्य करता हूँ”, किंतु उन्नीसवीं सदी के विकासवादी वैज्ञानिक कहते हैं कि ऐसा नहीं है। हे ईसाई! तुम्हारा विश्वास भ्रम है। तुम्हारा ईसा-प्रेम तो सांसारिक कार्यों में किसी तार भेजने वाले (telegraphist) के कार्य की तरह अत्यंत गौण कर्ता मात्र है। सुख-दुःख, आँसू, हास्य, विश्वास, आशा, महत्वाकांक्षा और प्रेम—यही सामाजिक कार्यों के गौण नियंता हैं।

न्याय के अनुसार हम वैज्ञानिकों की इसी बात को सिद्धांत मान सकते हैं। आइए देखें कि मानव जाति के विश्वासों पर ऐसे दावे का आधार क्या है। आजकल जिसे ‘वैज्ञानिक जगत’ कहा जा रहा है, वह डार्विन के क्रमविकासवाद के चरणों में इतना दंडवत है कि यह दिखाना कि डार्विन का सिद्धांत मात्र एक मतवाद है, इसके लिए विशेष साहस की आवश्यकता है। डार्विन के परम भक्तों ने जो बातें स्वीकार की हैं, उसी से स्पष्ट होता है कि उनके पास आज भी प्रमाणों का विशेष अभाव है। केवल यही नहीं—प्रमाणों का अभाव सदैव रहेगा। एक प्रकार की वस्तु से अनेक प्रकार की आकृति और रंग कृत्रिम रूप से उत्पन्न किए जा सकते हैं, यह देखकर उन्होंने यह तय कर लिया कि किसी मूल आकार से ही विविध आकार उत्पन्न होते हैं। प्रकृति कभी भी दो पूरी तरह समान वस्तुएं उत्पन्न नहीं करती। वृक्ष के एक पत्ते के समान दूसरा पत्ता उसी वृक्ष में नहीं मिलता। कोई जंतु पूर्णतः अपने माता या पिता के समान नहीं होता। इन अतार्किक घटनाओं को देखकर माली, पशुपालक और उन जैसे कई लोगों ने विशेष परिश्रम से एक ही जाति की वस्तु से कई प्रकार की आकृतियों वाले पौधे और जंतु उत्पन्न किए हैं। किंतु आज तक दो अलग जातियों को मिलाकर एक नई स्वतंत्र जाति का निर्माण करने में कोई सक्षम नहीं हुआ है। मानव सृष्टि के बाद विकास (evolution) का कोई कार्य नहीं देखा जाता—इस बात को विकासवादी विद्वान भी अस्वीकार नहीं कर सकते। वे कहते हैं कि जब तक लंबा समय न बीत जाए, एक नई जाति की उत्पत्ति नहीं होती; अतः नई जाति को देखने की आशा इतनी जल्दी नहीं करनी चाहिए। अब बात यह है कि—प्रतिदिन की हर घंटे की घटनाओं पर विश्वास त्याग कर एक अदृश्य-फल वाले मतवाद को स्वीकार करो, जिसके स्वभाव का विचार करने पर उसे प्रमाण (सिद्ध) नहीं माना जा सकता।

जड़वाद को स्वीकार करने के मार्ग में इन बाधाओं के अलावा एक और भी गंभीर बाधा है। क्रमविकासवाद को सत्य मानने पर भी, अधिकार निर्णय के समय इसे केवल एक सामान्य प्रक्रिया मात्र मानना पड़ता है। जिस शक्ति से यह प्रक्रिया आरंभ हुई है, उसके मूल और स्वभाव के विषय में यह मत पूरी तरह मौन है। जब तक भूगर्भ के स्तरों में पौधों और जंतुओं की आकृति और निर्माण के संबंध में इस मत की क्रिया होती रहती है, तब तक यह क्रिया के मूल की खोज नहीं करता। इस विषय में यह मत पर्याप्त है। किंतु जब प्रबुद्ध व्यक्ति देखते हैं कि—जिज्ञासु व्यक्ति आत्म-प्रत्यय (self-realization) से परिपूर्ण जीवन के संबंध में खोज करता है, तब उसके सम्मुख अनेक प्रकार की सत्ताएं प्रकट होती हैं, जिनका संबंध आत्म-प्रत्यय की सीमा से बाहर नहीं है।

जब हम आनंद और विषाद, सुख और दुःख, वाणी और कर्म के विषय में चिंतन करते हैं, तब हम उनकी उत्पत्ति के मूल को नहीं जान पाते; केवल तभी जान पाते हैं जब हम सृष्टिशक्ति के तत्व सिद्धांत का विचार करते हैं। विकासवादी साहस के साथ किंतु बिना किसी प्रमाण के कहते हैं कि यह शक्ति जड़-यंत्र से प्रेरित है और आत्म-प्रत्यय के संबंध से रहित कोई शक्ति आध्यात्मिक स्वतंत्रता पूर्ण जीवों को उत्पन्न कर सकती है—इस विषय में विकासवादी कोई सिद्धांत नहीं देना चाहता। दूसरी ओर वह स्वीकार करता है कि यह तत्व अज्ञात और अचिन्त्य है। फिर भी अपने जड़वाद की अक्षमता स्वीकार करने के साथ-साथ वह अत्यंत अन्यायपूर्वक उन लोगों को कहता है जो विकासवाद की सत्यता पर संदेह करते हैं कि वे तत्व-अज्ञानी और मत-दूषित हैं।

हर्बर्ट स्पेंसर, हक्सले आदि द्वारा आविष्कृत विज्ञान की कुशलता में निहित त्रुटियाँ विशेष प्रकार के भ्रम हैं। जिस प्रकार एक अकुशल चिकित्सक गलत दवाओं के प्रयोग से शारीरिक पीड़ा दूर करने की प्रतिज्ञा करता है, उसी प्रकार हमारे आधुनिक जड़वादी विद्वान जैव-जीवन के समस्त गूढ़ रहस्यों को सुलझाने के लिए लघु जड़वादी नियमों का प्रयोग करते हैं। वे भ्रमजनित कष्ट को समझे बिना निराधार स्वप्न जैसी विद्या पर विश्वास करके सभी विषयों की खोज करते हैं। जड़वादी मतवाद अत्यंत सीमित है और भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा (धोखा देने की इच्छा) और कुशलता की कमी से पूर्ण है—यह दिखा देने पर भी उन भ्रान्त लोगों की शिक्षा कोई कार्य नहीं कर पाएगी।

यह लेख किसी ईसाई की लेखनी से निकला है, इसमें संदेह नहीं है। लेखक ने जड़वाद को नकारते हुए जो आध्यात्मिकता स्थापित की है, वह ईसाई धर्म के अनुरूप संकुचित आत्मवाद मात्र है। ईसाई धर्म में जो ‘Soul’ शब्द है, उसे स्थापित करने के लिए जड़वादियों के नियमों का खंडन करना आवश्यक है, क्योंकि वह ‘Soul’ जड़ शक्ति के नियमों से परे है। किंतु ईसाई मत से प्रभावित ‘Soul’ शुद्ध आत्मा नहीं है। वेद शास्त्रों में “आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः मन्तव्यः” इत्यादि मंत्रों में जिस आत्मा का उल्लेख है, वह आत्मा जड़वाद और मिश्र-जड़वाद (जीवात्मा जो प्रकृति से बद्ध है) दोनों से पृथक है। ईसाई की ‘Soul’ मिश्र-जड़वाद के अंतर्गत आती है; मन और मन के सभी धर्म ही ईसाई की आत्मा है। किंतु शुद्ध आत्मा मन से अत्यंत उच्च और शुद्ध है।

सूक्ष्म शरीर (linga-sharira) को ही ईसाई लोग आत्मा मानकर विश्वास करते हैं। उसी विश्वास के अनुरूप उन्होंने एक स्वर्ग और एक नर्क की कल्पना की है और एक ईश्वर व एक शैतान के विश्वास को स्वीकार किया है। जो भी हो, ईसाई लोग भले ही शुद्ध आत्म-तत्व का अनुभव न कर पाएं, फिर भी वे समस्त जड़वादियों के लिए पूजनीय हैं, क्योंकि जड़वादियों में तो आत्म-तत्व की खोज ही नहीं है। ईसाइयों में जड़-बंधन से मुक्ति और आत्म-पथ के प्रति श्रद्धा लक्षित होती है—यही उनके कल्याण का बीज है। यह श्रद्धाभास जन्मांतर के सत्संग रूपी सुकृत के कारण अनन्य भक्ति और वास्तविक श्रद्धा में परिणत होगा। जड़वादी दुर्भाग्यशाली हैं; उनकी मृत्यु के बाद जड़-धर्म की प्राप्ति ही परिणाम है। “भूतानि यान्ति भूतेज्या” (भूतों को पूजने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं)—यह भगवद्वाणी इसका प्रमाण है। “यान्ति देवव्रता देवान्”—इस वाक्य के अनुसार ईसाई लोग देवत्व और स्वर्गलोक प्राप्त करेंगे, इसमें संदेह नहीं है। वेदार्थ के ज्ञाता वैष्णवजन “यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्” इस वाक्य के अनुसार शुद्ध आत्म-वस्तु का यजन (भजन) करते हुए परमात्मा स्वरूप भगवान की सेवा प्राप्त करते हैं।

जड़वादियों को ही ‘भूतेज्या’ कहा जा सकता है, क्योंकि उन्होंने जड़-भूतों और उनकी शक्तियों की चर्चा करके ही विकास और उत्पत्ति के नियम निर्धारित किए हैं और उसी नियम को जगत का मुख्य नियम मान लिया है। वे मृत्यु के बाद आत्म-तत्व से दूर होकर जड़ में विलीन हो जाते हैं, अर्थात् उनकी आत्मशक्ति लुप्तप्राय होकर जड़शक्ति प्रधान हो जाती है। उनकी अवस्था सोचनीय है। वे स्वयं वंचित होकर जगत को भी धोखा देते हैं। इसी अपराध के कारण वे अंततः और अधिक वंचित होते हैं। इस प्रकार का क्रमविकासवाद आर्य पुरुषों के बीच बहुत पहले ही पतित विद्वानों द्वारा स्वीकार किया जा चुका है। इसमें कुछ भी नया नहीं है। पाश्चात्य देशों में बहुत कम समय से मानव सभ्यता और बुद्धि का परिचय मिलता है। अतः उन देशों में टिंडल, हक्सले, डार्विन आदि को पंडित माना जाता
है। वे पुरानी बातों को नई भाषा में बोलकर विद्वता का दावा करते हैं। चार हजार वर्ष पूर्व जो श्रीमद्भगवद्गीता प्रकट हुई थी, उसमें आसुरी प्रवृत्ति के वर्णन में “जगदाहुरनीश्वरम्”, “अपरस्परसम्भूतम्” इत्यादि वाक्यों द्वारा स्वभाववाद और क्रमविकासवाद को आसुरी प्रवृत्ति से उत्पन्न बताया गया है।

इन सभी वाद-विवादों को त्यागकर आत्म-तत्व में प्रवेश करना ही स्वार्थ-साधक जीव का कर्तव्य है। जड़ जगत की समस्त विचित्रता को स्वीकार करते हुए उसमें परमेश्वर की लीला का दर्शन करना और भगवत्-प्रेम की खोज करना ही बुद्धिमान पुरुष का कर्तव्य है। तुच्छ मतवादों में आबद्ध रहना उचित नहीं है। शिल्पियों के लिए वह विज्ञान आदरणीय है; शिल्प-विद्या और विज्ञान को उन्नत करके तत्वज्ञों की सेवा करना ही उनका कर्तव्य है। आत्म-तत्व अत्यंत गूढ़ है, जो इसकी चर्चा में नियुक्त हैं, उनके पास शिल्प और सामान्य विज्ञान में उलझने का समय नहीं है। इसलिए उनकी शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अन्य सभी को प्रयास करना चाहिए।

हे भाइयों! हे विकासवादियों! तुम अपना-अपना कार्य करो, उसमें तुम्हारा और जगत का मंगल होगा। तुम अनधिकार चेष्टा करते हुए आत्म-तत्व के दोष-गुण की व्याख्या करने का प्रयास मत करो। तुम अच्छे मनुष्य बनकर कार्य करोगे, तो हम तुम्हें निरंतर आशीर्वाद देंगे।