जन्म कर्म च विश्वात्मन्नजस्याकर्तुरात्मनः ।
तिर्यङ्नृषिषु यादःसु तदत्यन्तविडम्बनम् ॥
जन्म जन्म; कर्म कर्म; च तथा; विश्व-आत्मन् हे विश्व की आत्मा; अजस्य अजन्मा की; अकर्तुः = निष्क्रिय की; आत्मनः प्राण-शक्ति की; तिर्यक् पशुः नृ-मनुष्यः ऋषिषु ऋषियों में; यादःसु जल में; तत्वह; अत्यन्त वास्तविक, अत्यन्त; विडम्बनम् भ्रामक, चकराने वाली।
अनुवाद – हे विश्वात्मा ! यह सचमुच ही चकरा देनेवाली बात (विडम्बना) है कि आप निष्क्रिय रहते हुए भी कर्म करते हैं और प्राण-शक्ति-रूप तथा अजन्मा होकर भी जन्म लेते हैं। आप स्वयं पशुओं, मनुष्यों, ऋषियों तथा जलचरों के मध्य अवतरित होते हैं। सचमुच ही यह चकरानेवाली बात है।
तात्पर्य – भगवान् की दिव्य लीलाएँ न केवल चकरानेवाली हैं, अपितु विरोधमूलक भी हैं। दूसरे शब्दों में, वे मनुष्य की सीमित चिन्तनशक्ति के लिए अचिन्त्य हैं। भगवान् सारे संसार में सर्वव्यापी परमात्मा हैं, तो भी पशुओं में सूकर बन कर, मनुष्यों में राम, कृष्ण आदि के रूप में, ऋषियों में नारायण-रूप में तथा जलचरों के बीच मत्स्य-रूप में प्रकट होते हैं। इतने पर भी उन्हें अजन्मा कहा जाता है और उन्हें कुछ भी नहीं करना पड़ता। श्रुति-मन्त्र में कहा गया है कि परब्रह्म को कुछ नहीं करना होता। कोई भी न तो उनके समान है, न उनसे बढ़ कर है। उनकी शक्तियाँ विविध हैं और उनका हर काम स्वतः ज्ञान, शक्ति तथा कर्म द्वारा सम्पन्न होता है। ये सारे कथन निस्सन्देह सिद्ध करते हैं कि भगवान् की लीलाएँ, उनके रूप तथा उनके कार्यकलाप हमारी सीमित चिन्तन-शक्ति द्वारा अचिन्त्य हैं। चूँकि वे कल्पना से परे शक्तिमान हैं, अतः उनके लिए हर कार्य सम्भव है; अतः उनके लिए अनुमान लगा पाना कठिन है और इसीलिए भगवान् का प्रत्येक काम सामान्य मनुष्य को चकरानेवाला है। उन्हें वैदिक ज्ञान द्वारा नहीं जाना जा सकता, लेकिन शुद्ध भक्तों द्वारा सरलता से समझा जा सकता है, क्योंकि वे लोग भगवान् के घनिष्ठ सम्पर्क में रहते हैं। अतएव भक्तगण जानते हैं कि, यद्यपि भगवान् पशुओं के बीच प्रकट होते हैं, लेकिन वे न तो पशु हैं, न मनुष्य, न ऋषि, न ही मछली हैं। वे समस्त परिस्थितियों में शाश्वत परमेश्वर हैं।
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कलिकाले नाम रूपे कृष्ण अवतार।
नाम हैते हय सर्व जगत् निस्तार ॥
नाम बिना कलिकाले नाहि आर धर्म।
सर्वमन्त्रसार नाम एइ शास्त्र मर्म ॥
(चै. च. आ. १७/२२, ७/७४)
कलियुगमें श्रीकृष्ण ही नामके रूपमें अवतरित हुए हैं। नामसे ही सारे जगत्का उद्धार होता है। कलियुगमें नामके अतिरिक्त सारे धर्म व्यर्थ हैं। समस्त मन्त्रोंका सार हरिनाम है, सभी शास्त्र ऐसा ही कहते हैं।
गौड़ीय कण्ठहार
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अहेतुकी भक्तिकी उन्नतिका लक्षण, यथा श्रीमद्भागवत (११.२.४२)-
भक्तिः परेशानुभवो विरक्तिरन्यत्र चैष त्रिक एककालः।
प्रपद्यमानस्य यथाश्नतः स्युस्तुष्टिः पुष्टिः क्षुदपायोऽ नुघासम् ।।
भोजनकारी व्यक्ति प्रति ग्रासपर तुष्टि (तृप्ति सुख), पुष्टि (जीवन सुख लाभ) और क्षुधा निवृत्तिका अनुभव करता है। जिस प्रकार ये तीनों क्रियाएँ एक साथ होती हैं, ठीक वैसे ही शरणागत भक्त भी भक्ति करने के साथ-ही-साथ परेशानुभव अर्थात् अपने आराध्यकी अनुभूति करता है, उसका सम्बन्ध अपने आराध्यसे पुष्ट होता है और इस अनित्य संसार एवं अनित्य सम्बन्धोंके प्रति उसे विरक्ति होने लगती है।
भक्तजने सममाने युगपदुदय।
भक्ति ज्ञान विरक्ति तिन जानह निश्चय ।।
चिदचिदीश्वर सम्बन्धज्ञाने-ज्ञान।
कृष्णेतरे अनासक्ति विरक्ति-प्रमाण ।।
येरूप भजने तुष्टि पुष्टि प्रति ग्रासे।
क्षुधार निवृत्ति एइ तिन अनायासे ।।
भजनरहस्यवृत्ति – भगवत् माधुर्यका अनुभव होनेपर साधकमें जो लक्षण लक्षित होते हैं, उन्हींका इस श्लोकमें वर्णन है। इस अवस्थाके भक्तोंमें भगवत् सेवा प्राप्ति, भक्तियुक्त तत्त्वज्ञानका अनुभव तथा कृष्णेतर वस्तुओंके प्रति वैराग्य ये तीनों ही एक साथ परिलक्षित होते हैं। साधकका वैराग्य उन भोग्य पदार्थोंसे होता है, जिनकी श्रीकृष्ण सेवामें अनुपयोगिता है। श्रीकृष्ण सेवाके उपयोगी उपकरणोंसे वैराग्य नहीं होता तथा न ही भोग विचार होता है, इसलिए वह वस्तु त्यागने योग्य भी नहीं होती।
जब श्रील सनातन गोस्वामीपादजीने दैन्यके कारण अपने शरीरको रथके पहियेके नीचे आकर त्यागनेका संकल्प किया, तब सर्वान्तर्यामी श्रीगौरसुन्दरने उन्हें उपदेश दिया कि देह त्यागसे कृष्ण प्राप्ति नहीं होती। एकमात्र भजन अर्थात् श्रील गुरुजीकी मनोऽभीष्ट सेवा द्वारा कृष्णकी प्राप्ति होती है।
साधक जब श्रीगुरुके पादपद्ममें शरणागत होता है, उस समय उसकी देहपर गुरुजीका अधिकार हो जाता है। इसलिए उस देहको गुरुकी सम्पत्ति मानकर उसकी रक्षा करना आवश्यक है। इसी भावनाके अनुसार ही व्रजदेवियाँ श्रीकृष्ण सेवाके लिए वस्त्र, अलंकार तथा सौंदर्य प्रसाधन, श्रृंगारादिसे अपने शरीरको विभूषित करती हैं।
जितने परिमाणमें भगवद् अनुभूति होती है, उतने ही परिमाणमें जड़ विषयोंके प्रति उदासीनता उत्पन्न होती है। यही उदासीनता भगवद् सेवामें अधिकार प्राप्त कराती है। श्रील रघुनाथदास गोस्वामी कहते हैं-
वैराग्ययुग भक्तिरसं प्रयत्नैरपाययन्मामनभीप्सुमन्धम् ।
कृपाम्बुधिर्यः परदुःखदुःखी सनातनं तं प्रभुमाश्रयामि ।।
(विलापकुसुमांजलि-६)
जो दयाके सागर हैं तथा सर्वदा दूसरोंका दुःख देखकर जिनका उदय कातर हो जाता है, मेरी अनिच्छा होनेपर भी जिन्होंने यत्नपूर्वक मुझ अज्ञानान्धको वैराग्ययुक्त भक्तिरसका पान कराया है, उन्हीं सम्बन्ध ज्ञानदाता श्रीसनातन प्रभुके श्रीचरणोंमें शरणागत होता हूँ।
अविचारकगण अपने दृष्टि कोणसे कृत्रिम वैराग्झका आदर करते हैं एवं शुष्क ज्ञान अर्जनकारीकी प्रशंसा करते हैं। इस प्रकारका ज्ञान, वैराग्य जिसमें सेवा-प्रवृत्ति नहीं है केवल मात्र भव प्रजल्प एवं लोक वंचना है। शुद्ध भक्तिका इसमें कोई स्थान नहीं है।
सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा
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जगत की सभी वस्तुएँ भगवान की हैं । अतः उन सभी वस्तुओं के प्रति भोगबुद्धि करने पर विपत्ति में पड़ जाएंगे । जो भगवान की कथा के श्रवण से विमुख होंगे, वे संसार में आसक्त और आबद्ध हो जायेंगे । इसलिए मंगलाकांक्षी सज्जन व्यक्ति शुद्ध साधुओं के मुख से हरिकथा श्रवण करने के लिए चेष्टाशील रहेंगे ।
श्रीलप्रभुपाद
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आत्मा ‘श्रोतव्य’ अर्थात् शब्दस्वरूप है, लेकिन सत्त्व, रजः और तमः गुण के अन्तर्गत नहीं
यहाँ ‘आत्मा’ को ‘श्रोतव्य’ कहा गया है; अर्थात् आत्मा रूपी वस्तु का श्रवण करना होगा। हम एकमात्र शब्द को ही कान से ग्रहण कर सकते हैं। ‘हरिनाम सुनना होगा’- इस बात से समझा जाता है कि, हरिनाम शब्द-स्वरूप है। यहाँ ‘आत्मा को ही श्रवण करना होगा’ कहने से यह प्रमाणित होता है कि, आत्मा शब्दरूप है। हमारे श्रवण पथ में उसी आत्मा का प्रवेश होता है और इसीलिए ऐसा मानना उचित नहीं है कि, आत्मा ‘मुख्य’ अर्थात् अप्राकृत नहीं है क्योंकि शब्द ही आत्मा का स्वरूप है और शब्दस्वरूप आत्मा कभी गौण नहीं है। वेदान्त के प्रथम अध्याय के प्रथम चरण के छठे सूत्र में देख सकते हैं, “गौणश्चैन्नात्मशब्दम्”। इसलिए श्रीव्यासदेव ने कहा है-‘आत्मशब्द’ गौण नहीं है अर्थात् गुणों के अन्तर्गत नहीं है- सत्त्व, रजः तमः के अन्तर्भुक्त नहीं है।
आत्मा एक ही साथ श्रवण और दर्शन योग्य
आप लोगों का प्रश्न हो सकता है कि, उपनिषद्-वाक्य के अनुसार यदि आत्मा शब्दस्वरूप है तो उसी उपनिषद्-वाक्य में ‘आत्मा द्रष्टव्यः‘ अर्थात् दर्शन योग्य है, यह अर्थ भी ग्रहण करना होगा-लेकिन यह तो युक्ति-विरुद्ध है। यहाँ मैं कहना चाहता हूँ कि, प्राकृत जगत में यह युक्ति-विरुद्ध भले ही हो किन्तु अप्राकृत जगत में वह युक्ति-विरुद्ध नहीं है। शब्द को आँख से भी ग्रहण किया जा सकता है, जिसे इस जगत में भी. प्रमाणित करना कठिन नहीं है। साँप के कान नहीं होते, आप सबको मालूम है। आँखों से वह ‘श्रवण’, ‘दर्शन’ दोनों कार्य करता है। इसीलिए साँप का एक नाम ‘चक्षुश्रवः’ भी है। इसलिए ‘आत्मा श्रोतव्य द्रष्टव्य’ – इस बात में किसी प्रकार का कोई असामंजस्य नहीं है।
इसके अतिरिक्त वेदान्तिक युक्ति भी है। वेदान्त के सूत्रकार कहते हैं- “ईक्षतेर्नाशब्दम्” (1/1/5) अर्थात् ‘ईक्षतेः न अशब्दम्’ । यहाँ ‘न अशब्दम्’ का अर्थ, शब्द ही है। ‘ईक्षते’ शब्द में पंचमी विभक्ति लगने पर समझना होगा-ईक्षण-धर्म के लिए अर्थात् दृष्ट होने की योग्यता के कारण ‘न अशब्दम्’ अर्थात् ‘अशब्द नहीं’, मतलब – शब्द ही समझना होगा। अब इस प्राकृत जगत की युक्ति के अनुसार कहीं कोई दृष्ट होने की योग्यता के कारण आत्म-शब्द को गौण अर्थात् गुण के अन्तर्गत समझ लेते हैं, इसीलिए उस शंका को दूर करने के लिए, बाद वाले सूत्र में “गौणश्चैन्न आत्मशब्दम्” (1/1/6) सूत्र को प्रस्तुत किया गया है।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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जब हम ने एक बार भगवान् को ‘सर्वशक्तिमान्’ मान लिया तो भगवान् ये कर सकते हैं, ये नहीं कर सकते; ये बात बोलने का अधिकार क्या हमारा रहता है?-
‘कर्तुमकर्तुमन्यथा कर्तुं यः समर्थः स ईश्वरः ।’
सर्वशक्तिमान् जिस किसी भी स्थान में, जिस किसी मूर्ति से, सर्वशक्तियों के साथ आ सकते हैं। यदि कहें कि नहीं, तब तो हमारे द्वारा उनकी सर्वशक्तिमत्ता और असीमत्व को अस्वीकार करना होगा। मैं किसी वस्तु को भगवान् मानूँ तो वह भगवान् नहीं बन जायेगी, क्योंकि भगवान् हमारे अधीन नहीं हैं।
कई लोग ऐसा सोच सकते हैं कि भगवान् जब पृथ्वी पर आते हैं। तब माया के त्रिगुणों को स्वीकार कर के ही आते हैं, यह सम्पूर्ण अज्ञानजनित धारणा है। भगवान् अपने अप्राकृत स्वरुप से ही जगत में आते हैं; वे माया की पोशाक पहन कर नहीं आते, क्योंकि वे मायाधीश हैं। कर्म फल बन्धन का जो कानून है, वह भगवान् या भगवान् के पार्षदों पर लागू नहीं होता। ये माया का ब्रह्माण्ड बहिर्मुख जीवों का कारागार है। कारागार का मालिक जैसे अपनी पोशाक में ही आता है, कैदी की Dress में नहीं, उसी प्रकार मायाधीश भगवान् अपने ही स्वरूप से जगत में आते हैं। उन निर्गुण स्वरूप भगवान् के प्रकट होने पर भी त्रिगुणों से बँधे जीव अपने त्रिगुणात्मक रंगीन चश्मों से दर्शन करने के कारण निर्गुण स्वरूप भगवान् को भी त्रिगुणमय देखते हैं। दर्शन करने का माध्यम रंग रहित होने पर ही वस्तु की यथायथ प्रतीति हो सकती है। भक्त-लोग निर्गुण, अप्राकृत, प्रेम-नेत्रों से ही भगवान् का वास्तविक स्वरूप दर्शन करते हैं-
‘प्रेमाञ्जनच्छुरित भक्तिविलोचनेन सन्तः सदैवद्वदयेषु विलोकयन्ति ।’
(ब्र.सं. 5/38)
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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स्वयं कष्टदायक परिश्रम स्वीकार करके सेवाकार्य करने की अपेक्षा बुद्धिमानी सहित दूसरों की योग्यता को कार्य में लगाकर सेवा की प्रचेष्टा अधिक वैशिष्ट्यमय और प्रशंसनीय है।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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रावण-भक्ति
रावण के इष्टदेव हैं- महादेव (शिव)। रावण महादेव को लंका में स्थापित करना चाहता था जिससे उसे इंद्र, वरुण आदि अन्य देवताओं से कोई भय न रहे। वह यह जानता था कि महादेव आशुतोष हैं; उन्हें प्रसन्न करना कठिन नहीं है। वह कैलाश पर्वत पर घोर तपस्या एवं बेलपत्र तथा जल अर्पित कर उनकी पूजा करने लगा।
रावण की तपस्या एवं पूजा से प्रसन्न होकर महादेव शीघ्र ही वहाँ प्रकट हो गए और उसे वर माँगने के लिए कहा। रावण ने कहा, “मैं आपसे किसी जागतिक वस्तु की माँग नहीं करता। आपसे मेरी केवल एक प्रार्थना है। आप कृपया मेरी नगरी लंका चलें और वहाँ मुझे आपकी सेवा का अवसर प्रदान करें। मैं प्रतिदिन आपकी सेवा-पूजा करना चाहता हूँ।”
रावण भले ही बाहर से सेवा के लिए प्रार्थना कर रहा था, किन्तु महादेव को लंका ले जाने का उसका मूल उद्देश्य अपनी समस्या का समाधान करना ही था।
उसकी प्रार्थना सुनकर महादेव ने उससे कहा, “तुमने तपस्या के द्वारा मुझे प्रसन्न किया है इसलिए मैं तुम्हारी यह इच्छा पूर्ण करूँगा। तुम मुझे लिंग-रूप में अपने राज्य में ले जा सकते हो। किन्तु तुम्हें मेरी एक बात ध्यान में रखनी होगी-मार्ग में मुझे कहीं भी भूमि पर नहीं रखना। यदि तुमने मुझे कहीं भूमि पर रख दिया, तो मैं उसी स्थान पर रह जाऊँगा; वहाँ से आगे नहीं जाऊँगा।”
लिंग-रूप में महादेव के अति भारी होने पर भी, शक्तिशाली रावण उन्हें अपने हाथ पर धारण कर लंका की ओर यात्रा करने लगा।
रावण द्वारा महादेव को लंका ले जाते हुए देख सभी देवता घबरा गए। वे जानते थे कि यदि रावण महादेव को लंका ले जाने में सफल हो गया तो उसके अत्याचारों का सामना करने में वे और भी असमर्थ हो जाएँगे। इसलिए रावण को रोकने के लिए उन्होंने विचार विमर्श करके एक योजना बनाई।
योजना के अनुसार, वरुणदेव ने रावण के शरीर में प्रवेश किया जिससे रावण को लघुशंका के तीव्र वेग का अनुभव होने लगा। उसे महादेव के वचन याद तो थे, किन्तु वह लघुशंका के वेग को सहन नहीं कर पा रहा था। उसी समय उसने एक ब्राह्मण को देखा। उसने ब्राह्मण से कुछ समय के लिए शिवलिंग को अपने हाथ पर रखने के लिए कहा। ब्राह्मण के, “शिवलिंग बहुत भारी है, मैं नहीं उठा पाऊँगा”, कहने पर भी रावण शिवलिंग को उसके हाथ में रखकर लघुशंका के लिए चला गया।
क्योंकि वरुणदेव रावण के शरीर में विद्यमान थे, इसलिए उसका लघुशंका का वेग शांत नहीं हो रहा था। थोड़ी देर प्रतीक्षा करने के बाद वह ब्राह्मण शिवलिंग का भार सहन न कर पाने के कारण उसे भूमि पर रखकर वहाँ से चला गया। वरुण देव ने अब रावण को छोड़ दिया, जिससे उसका लघुशंका का वेग शांत हुआ। जब वह उस स्थान पर वापिस आया तो उसने देखा कि शिवलिंग भूमि पर विराजित हैं। वह महादेव से विनती करने लगा कि वे पुनः उसके हाथ पर विराजित हो जाएँ और लंका चलें। अनेकों बार विनती करने पर भी जब महादेव ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की तब रावण ने उन्हें अपने बल से उठाने का प्रयास किया। अपनी सारी शक्ति लगा देने पर भी वह शिवलिंग को हिला भी नहीं सका। महादेव की इच्छा के बिना उन्हें कहीं ले जाना संभव नहीं है। जब उसके सभी प्रयास निष्फल रहे, तब अत्यंत क्रोधित होकर उसने पूछा, “क्या आप मेरे साथ नहीं जाओगे?” कोई उत्तर न मिलने पर, क्रोधित होकर उसने शिवलिंग पर बल पूर्वक प्रहार कर दिया, जिससे शिवलिंग भूमि में धंस गया।
यह शिवलिंग अभी भी उसी अवस्था में झारखंड में बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर में स्थित है। यह १२ ज्योतिर्लिंगों में से एक है।
क्या रावण की महादेव के प्रति भक्ति, उनकी सेवा के लिए थी? भगवान् के प्रति हमारी भक्ति भी रावण की भक्ति के जैसी ही है। जब तक भगवान् हमारी इच्छाओं को पूर्ण करते रहते हैं, तब तक हम उनकी सेवा-पूजा करने के लिए तैयार रहते हैं, किन्तु जिस समय हमारी कोई इच्छा पूरी नहीं होती, उसी समय हम उन्हें अपना शत्रु मान लेते हैं। इसे रावण-भक्ति कहा जाता है।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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