विपदः सन्तु ताः शश्वत्तत्र तत्र जगद्गुरो ।
भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम् ।।

विपदः = विपत्तियाँ; सन्तु हों; ताः सारी; शश्वत् पुनः पुनः; तत्र वहाँ; तत्र तथा वहाँ; जगत्-गुरो हे जगत के स्वामी; भवतः आपकी; दर्शनम् भेंट; यत जो; स्यात् हो; अपुनः = फिर नहीं; भव-दर्शनम् जन्म-मृत्यु को बारम्बार देखना।

अनुवाद – मैं चाहती है कि ये सारी विपत्तियाँ फिर-फिर आयें, जिससे हम आपका पुनः पुनः दर्शन कर सकें, क्योंकि आपके दर्शन का यह अर्थ है कि हमें बारम्बार जन्म-मृत्यु को नहीं देखना होगा।

तात्पर्य – सामान्यता आर्त, जरूरतमन्द, बुद्धिमान् तथा जिज्ञासु लोग, जिन्होंने कुछ पुण्य कर्म किये हैं, भगवान् की पूजा करते हैं या पूजा करना प्रारम्भ करते हैं। अन्य लोग, जो दुष्कर्म से ही फलते-फूलते हैं, चाहे वे जिस स्तर के हों, माया द्वारा गुमराह होने के कारण, भगवान् के पास नहीं फटकते। अतएव पुण्यात्मा के लिये संकट आने पर भगवान् के चरण कमलों का निरन्तर स्मरण करना जन्म-मृत्यु से छूटने की तैयारी करना है। अतः भले ही तथाकथित आपत्तियाँ आयें, उनका स्वागत करना होगा, क्योंकि वे भगवान् के स्मरण का अवसर प्रदान करती हैं जिसका अर्थ है मुक्ति ।

जिसने भगवान् के चरण कमलों की शरण ली है, जो अविद्या के सागर को पार करने के लिये सर्वोत्तम नाव के समान हैं, वह उतनी ही सरलता से मुक्ति लाभ करता है, जितनी सरलता से गोखुर के निशान को लांघा जा सकता है। ऐसे लोग भगवद्धाम में रहने के अधिकारी हैं और उन्हें ऐसे स्थान से कोई प्रयोजन नहीं रह जाता, जहाँ पग-पग पर संकट हो।

भगवद्गीता में भगवान् ने इस जगत् को आपत्तियों से परिपूर्ण कष्टप्रद स्थान बताया है। अल्पज्ञानी पुरुष बिना यह समझे कि यह स्थान आपत्तियों से पूर्ण है, इन आपत्तियों के साथ समझौता करने को तैयार हो जाते हैं। उन्हें भगवान् के उस धाम का बिल्कुल ही पता नहीं होता, जो आनन्दमय तथा निरापद है। अतएव चतुर मनुष्य का कर्तव्य है कि भौतिक आपत्तियों से अविचलित रहे, क्योंकि आपत्तियाँ तो सभी परिस्थितियों में आती हैं। सभी प्रकार की अपरिहार्य विपत्तियों का सामना करते हुए मनुष्य को आत्म-साक्षात्कार में प्रगति करते रहना चाहिये, क्योंकि मानव जीवन का यही उद्देश्य है। चूँकि आत्मा समस्त भौतिक आपत्तियों से परे है, अतएव तथाकथित आपत्तियाँ मिथ्या होती हैं। स्वप्न में मनुष्य अपने को शेर द्वारा निगला जाता देख सकता है और वह इस आपत्ति के कारण चिल्ला सकता है, किन्तु वास्तव में न तो शेर रहता है, न आपित्त; यह तो कोरा स्वप्न है। इसी प्रकार जीवन की सारी आपत्तियाँ स्वप्न-तुल्य कही जाती हैं। यदि कोई भक्ति द्वारा भगवान् का सान्निध्य प्राप्त कर सकता है, तो लाभ ही लाभ है। नवधा भक्ति में से किसी एक के द्वारा भगवान् का सान्निध्य भगवद्धाम जाने की दिशा में सदा एक अग्रिम पग है।

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कलियुगमें नामही सर्वसिद्धिदाता है-

कलेर्दोषनिधे राजन्नस्ति होको महान् गुणः।
कीर्त्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसंग: परं व्रजेत् ॥

हे राजन् ! कलियुग दोषराशिका खजाना है, फिर भी इसमें एक बहुत बड़ा गुण है। वह गुण यही है कि कलियुगमें केवल भगवान् श्रीकृष्णका सङ्कीर्त्तन करनेमात्रसे ही सारी आसक्तियाँ छूट जाती हैं और भगवान्‌की प्राप्ति हो जाती है ॥

गौड़ीय कण्ठहार

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ऐकान्तिकी अहैतुकी भक्ति यथा श्रीमद्भागवत (१.२.१४) –

तस्मादेकेन मनसा भगवान् सात्वतां पतिः।
श्रोतव्यः कीर्त्तितव्यश्च ध्येयः पूज्यश्च नित्यदा।।

एकाग्र मनसे भक्तवत्सल भगवानका ही नित्य निरन्तर श्रवण, कीर्त्तन, ध्यान और आराधना करनी चाहिए। साथ ही अनर्थ नाश करनेका यत्न करनेसे भक्तिलता अतिशीघ्र अपना प्रेम रूपी फल प्रदान करेगी।

अनन्य भावे ते कर श्रवण-कीर्त्तन।
नाम-रूप-गुण-ध्यान-कृष्ण आराधन।।
संग-सङ्ग अनर्थनाशेर यत्न कर।
भक्ति लता फल दान करिवे सत्वर ।।

भजनरहस्यवृति – श्रीहरिकी प्रसन्नतासे ही समस्त धर्मोंका पालन हो जाता है। अतएव एकाग्रचित्त होकर तथा कर्म, ज्ञानकी अभिलाषाका परित्याग कर श्रीकृष्णका भजन करना ही जीवमात्रका कर्त्तव्य है। श्रीहरिकी प्रसन्नता के लिए स्थिर चित्त होकर धाममें वास कर श्रीगुरु, वैष्णवोंसे हरिकथा श्रवण करें। श्रवणके पश्चात् उसका कीर्त्तन तथा स्मरण ही शुद्ध भजनानुशीलनकी विधि है। इस विधिके द्वारा अनर्थ नष्ट हो जाते हैं तथा शुद्ध भजन उदित होता है। साधकोंके लिए यही सार उपदेश है।

सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा

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जो भगवान की मंगलमयी कथाओं को श्रद्धापूर्वक प्रतिदिन श्रवण करते हैं अथवा कीर्तन करते हैं, भगवान अति शीघ्र स्वयं उसके हृदय में आविर्भूत हो जाते हैं। यदि सद्गुरु से हरिनाम श्रवण किया जाय, उनसे श्रीनाम ग्रहणकर निरन्तर कीर्तन किया जाय, तो अन्य चिन्ता और कामनाएँ सब दूर हो जायेंगी तथा सब समय कृष्णस्मृति होती रहेगी। कीर्तन के प्रभाव से ही स्वाभाविकरूप में स्मरण होता है। सरल हृदय से निरन्तर या प्रतिदिन श्रवण – कीर्तन किया जाय, तो अवश्य ही मंगल होगा तथा समस्त प्रकार की असुविधाएँ दूर हो जाएंगी।

श्रीलप्रभुपाद

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अप्राकृत शब्द ‘श्रीनाम’ पर चर्चा के लिए ‘शब्द’ (शास्त्रवाक्य) ही एकमात्र सहारा

वेदान्त का ‘संगति’ अध्याय अर्थात् परस्पर विरुद्ध जितने सभी श्रुति वाक्य हैं, उनका समाधान और परस्पर विरोधहीनता को बताने के लिए श्रील व्यासदेव ने ‘संगति’ अध्याय में सूत्रों को लिपिबद्ध किया है; उसमें उक्त विरोध के समाधान के लिए मूल उपाय के रूप में उन्होंने ‘शब्द’ को ही अंगीकार करने का उपदेश दिया है। इसका प्रमाण है- द्वितीय अध्याय के प्रथम चरण के 27 सूत्र अर्थात् “श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वात्”। श्रुति ने भी शब्द को ही मूल प्रमाण के रूप में ग्रहण किया है। वास्तव में किन्हीं विरुद्ध वस्तुओं में सामंजस्य करने के लिए एकमात्र ‘शब्द’ ही समर्थ है। श्रुति, सूत्र और मंत्र इत्यादि से हमें यही शिक्षा मिलती है। श्रीनाम-अप्राकृत शब्द है; इसीलिए यह शब्द-विषयक चर्चा करने के लिए हम शब्द के द्वारा ही शब्द की आलोचना करेंगे।

आलोच्य, आलोचक और आलोचना में अंतर रहने पर, आलोच्य विषय तक नहीं पहुँचा जा सकता है। क्योंकि, एक जैसी प्रकृति वाली वस्तुओं में ही संबंध होता है-विषम-प्रकृति में नहीं होता। इसीलिए शास्त्रकारों ने-“श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वात्”- इस सूत्र का सहारा लेकर विचार मार्ग पर बढ़ने के लिए सरल पथ का निर्देश दिया है। उपनिषद् में कहा है, – “आत्मा वा अरे श्रोतव्यो दृष्टव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः”

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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एकमात्र भगवान् की प्रसन्नता के लिए नृत्य एवं गायन

एक बार गुरु महाराज अमृतसर में प्रचार के उद्देश्य से गए हुए थे तथा हरिकथा का आयोजन नमक मण्डी में स्थित किसी मन्दिर में किया गया था। कथा के पश्चात् गुरु महाराज ने श्रीकृष्णबलराम के अत्यधिक सुन्दर तथा आकर्षक विग्रहों का दर्शन किया तथा उनके दर्शन से हृदय में कृष्ण-प्रेम की उद्दीपना होने के कारण जगत् की सुध-बुध खो बैठे व्यक्ति की भाँति बहुत देर तक भावविभोर हो कर नृत्य तथा गान किया।

उनके महापुरुषोचित दिव्य कलेवर तथा उनकी भाव-भङ्गिमाओं को देख कर उपस्थित भक्त-सज्जन मण्डली मन्त्र मुग्ध हो गई।

दूसरे दिन मन्दिर के कर्तृ-पक्ष ने हरिकथा के उपरान्त, गुरु महाराज द्वारा पुनः नृत्य-कीर्तन की अपेक्षा में, अत्यधिक शीघ्रता एवं उत्साहपूर्वक अनेक बल्ब जलाए। गुरु महाराज के गत दिवस किए गए नृत्य-कीर्त्तन के स्थान को रस्सियों से घेर दिया। उनके नृत्य दर्शन की अपेक्षा में सब ओर से लोग भर गए। जिन लोगों ने गुरु महाराज के नृत्य-कीर्त्तन के दर्शन किए थे वे उसे देखने के लिए अन्य लोगों को भी अपने साथ लाए किन्तु उस दिन गुरु महाराज ने जय-ध्वनि देकर ही कार्यक्रम को विराम दे दिया।

सहारनपुर में भी अमृतसर जैसी उक्त घटना की पुनरावृत्ति हुई। एक दिन गुरु महाराज ने अति आनन्द में भरकर नृत्य-कीर्त्तन किया। अगले दिन सर्वत्र प्रचार हो गया कि नृत्य परम रमणीय एवं दर्शन करने योग्य है। इसी कारण अगले दिन अनेक लोगों का समागम हुआ। जब गुरु महाराज को बताया गया कि आज अधिकांश लोग आपके नृत्य का दर्शन करने के लिए आए हैं। अतः आप कार्यक्रम का आरम्भ नृत्य-कीर्त्तन से कीजिए, तब उन्होंने कहा, “साधु-वैष्णव इत्यादि साधारण लोगों की प्रसन्नता, उनके मनोरञ्जन के लिए नृत्य-कीर्त्तन नहीं बल्कि भगवान् की सेवा के उद्देश्य से करते हैं। लोकरञ्जन करने पर जगत् के प्रति प्रीति अर्थात् आसक्ति हो सकती है किन्तु भगवान् की भक्ति नहीं होगी। उससे विवेकरहित व्यक्तियों की प्रशंसा आदि की प्राप्ति, उनसे प्रतिष्ठा रूपी शूकर की विष्ठा आदि के लोभ से किया गया नृत्य-कीर्त्तन, हरि भक्ति के अनुकूल नहीं बल्कि सम्पूर्ण रूप से प्रतिकूल एवं त्रैयात्रिक (जड़ीय नृत्य-गीत वाद्य यन्त्रों के बजाने) में ही गण्य है।”

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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प्रचार और भजन एक ही तात्पर्यपर

“बाहर लगातार प्रचार में घूमते रहने से भजन की कुछ हानि होती है”, तुमने इस बारे में जो कुछ लिखा है, उसे पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया जा सकता है। प्रचार और भजन- एक ही तात्पर्यपर होने के कारण नुकसान का कोई प्रश्न ही नहीं है। सेवा और श्रीनामग्रहण भी एक ही तात्पर्यपर हैं और दोनों ही साथ साथ किये जा सकते हैं। सेवा को छोड़कर श्रीनाम नहीं, और फिर श्रीनाम को छोड़कर सेवा नहीं है। साधुसंग, नामकीर्तन, भागवत-श्रवण, धामवास, श्रीमूर्ति की सेवा- ये पंचांग-भक्ति के याजन में, आवश्यक कर्त्तव्यों के रूप में निर्णीत हुए हैं। सेवा-परायण होकर श्रीनाम और श्रीनाम-परायण होकर सेवा की व्यवस्था श्रीरूपानुग गौड़ीय वैष्णव आचार्यों के द्वारा दी गयी है। श्रीनामग्रहण और सेवा, अधिकार के भेद अनुसार, ‘विधि’ और ‘रागानुग’ नाम से, अंतर और वैशिष्ट्य को स्थापित करते हैं। निम्न अधिकारी, उत्तम अधिकार की अप्राकृत भाव-सेवा का कभी भी अनुभव नहीं कर सकता है। कृष्ण-मंत्र जपने से जड़ संसार की दशा मिट जाती है और शुद्ध श्रीकृष्णनाम ग्रहण करने से साक्षात् सेवा की प्राप्ति होती है, यह शास्त्र-सिद्धान्त-सम्मत और महाजनों के द्वारा अनुमोदित परम सत्य है।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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आपने तो संसार छोड़ दिया किन्तु क्या संसार आपको छोड़ेगा?

कोलकाता मठ में एक बार पचास वर्ष की आयु के एक व्यक्ति आए। वे मुझसे कहने लगे, “मैंने यह संसार देख लिया है। यह बहुत दुःखदायक है। मैंने संसार को छोड़ने का निश्चय किया है। यहाँ कृष्ण-भजन करने के लिए आप लोगों का मठ है, गौरांग महाप्रभु का मठ है। आप सभी को भजन करने का अवसर देते हैं। मैं भी यहाँ रहकर भजन करना चाहता हूँ।”

हैं।” उनकी बात सुनकर मैंने उनसे कहा, “आपको देखकर लगता है कि आप गृहस्थ

“जी, हाँ।”

“आपकी पत्नी जीवित है?”

“जी, हाँ।”

“आपके बच्चे भी हैं?”

“जी हाँ, हैं।”

“तो आप उन्हें छोड़कर यहाँ कैसे रहेंगे?”

“बस मैंने समझ लिया है कि संसार दुःखमय है। मैंने संसार को छोड़ने का निश्चय किया है और अब वापस नहीं जाऊँगा। मुझे एक अवसर दीजिए।”

“आपने तो संसार छोड़ दिया है किन्तु क्या संसार आपको छोड़ेगा? आपके परिवार के लोग आपको लेने के लिए नहीं आएँगे?”

“उन्हें आने दीजिए। मैं नहीं जाऊँगा।”

“ठीक है। आप यहाँ मठ में रहकर भजन कर सकते हैं। हम तो चाहते ही हैं कि अधिक से अधिक लोग यहाँ रहकर सेवा करें।”

वे मठ में रहने लगे। दूसरी ओर उनकी पत्नी पूरे कोलकाता शहर में उन्हें ढूँढने लगी। ढूँढते-ढूँढते एक दिन वह हमारे मठ में आ गई। उसी समय वह व्यक्ति सीढ़ी से नीचे उतर रहे थे। मैं भी उनके साथ ही था। उनकी पत्नी ने उन्हें देख लिया।

वह दौड़ते हुए उनके पास आयी और कहने लगी, “तुम यहाँ पर हो? मैंने तुम्हें पूरे कोलकाता शहर में ढूँढ लिया।”

उस व्यक्ति ने कहा, “मैं समझ गया हूँ, संसार बहुत दुःखदायक है। यह मनुष्य जन्म भगवान् के भजन के लिए है। इसलिए मैंने निश्चय किया है कि मैं यहाँ रहकर भगवान् का भजन करूँगा।”

पत्नी बोली, “विवाह करने के समय तुमने यह विचार नहीं किया? अब परिवार की सारी ज़िम्मेदारी मुझे देकर तुम दिन-रात यहाँ मज़े से रहोगे? चलो यहाँ से।”

‘हररर….’ उन्हें खींचकर ले गई।

संसार के बन्धनों से छुटकारा प्राप्त करना सहज नहीं है। व्यक्ति सुख प्राप्त करने की आशा से इन बन्धनों को अपनी इच्छा से स्वीकार करता है। पहले वह अकेले सुख प्राप्त करने का प्रयास करता है। किन्तु जब अकेले रहकर सुख की प्राप्ति नहीं होती तो वह विवाह करता है। दो से जब सुख प्राप्त नहीं होता तो वह संतान उत्पन्न करता है। और इसी तरह वह संसार में और फँसता चला जाता है। सुख प्राप्त करने के लिए किए गए यह प्रयास ही उसके बन्धन का कारण बनते हैं। और अन्त में, यदि वह संसार को छोड़ना भी चाहे, तो संसार उसे नहीं छोड़ता।

प्रह्लाद महाराज अपने सहपाठी असुर बालकों को शिक्षा देते हुए कहते हैं, “जैसे रेशम का कीड़ा, बहुत प्रयास करके अपना घर बनाते-बनाते स्वयं उसमें फँस कर मर जाता है, उसी प्रकार संसार के अनित्य सम्बन्धों और भोगों से सुख प्राप्त करने की आशा रखने वाला व्यक्ति स्वयं ही संसार से बाहर निकलने के अपने मार्ग को बन्द कर देता है। और अन्त में वही सम्बन्ध उसके अपार दुःख और कष्ट का कारण बन जाते हैं।”

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज

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