अन्याभिलाषिता शून्यं ज्ञान-कर्माद्यनावृतम्।
आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा ॥

(भ. र. सि. पूर्वविभाग १/९)

श्रीकृष्णको सुखी करनेकी स्पृहाके अतिरिक्त समस्त प्रकारकी अभिलाषाओंसे रहित, ज्ञानकर्मादिके द्वारा अनावृत्त, एकमात्र श्रीकृष्णकी प्रीतिके लिए ही कायिक, मानसिक और वाचिक समस्त चेष्टाओं और भावके द्वारा तैल-धारावत् अविच्छिन्न गतिसे जो कृष्णका अनुशीलन अर्थात् श्रीकृष्णकी सेवा की जाती है, उसे (उन समस्त चेष्टाओंको) उत्तमा भक्ति कहते हैं।

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नाम में रति उदित होनेसे कृष्णकिशोररूप सहजमें ही उदित होने लगता है, यथा कृष्णकर्णामृत (१०७)

भक्तिस्त्वयि स्थिरतरा भगवन् यदि स्यादैवेन नः फलति दिव्यकिशोरमूर्तिः ।
मुक्तिः स्वयं मुकुलिताञ्जलि सेवतेऽस्मानधर्मार्थ कामगतयः समय प्रतीक्षा ।।

हे भगवन् ! यदि आपके श्रीचरणकमलोंमें दृढ़ भक्ति हो तो आपके परम मनोहर दिव्यकिशोर मूर्तिका दर्शनरूपी फल सहज ही प्राप्त हो जाता है। तदनन्तर मुक्ति तो हाथ जोड़कर सामने खड़ी रहती है। साथ ही धर्म, अर्थ, तथा काम भी भक्तिपूर्ण हृदयवालेकी सेवाके अवसरकी प्रतीक्षा करते रहते हैं।

भक्ति स्थिरतरा जार ब्रजेन्द्रनन्दन।
तोमार कैशोर मूर्ति तार प्राप्य धन।।
कर जोड़ि मुक्ति सेवे तौहार चरण।
धर्म, अर्थ, काम करे आज्ञार पालन।।

भजनरहस्यवृत्ति- शुद्ध भक्तों के साथ नाम करनेपर चित्तमें शुद्ध-नाम उदित होता है। इस अवस्था में उसके हृदयमें प्रेमलक्षणा भक्ति लीला स्फूर्ति के रूपमें प्रकट होती है। प्रेम लक्षणा भक्ति जब स्थिरताको प्राप्त होती है, तब श्रीकृष्णकी दिव्यकिशोरमूर्ति स्वतः ही हृदयमें आविर्भूत होती है। स्वयं मुक्तिदेवी अवहेलित होनेपर भी अञ्जलिबद्ध हो साधकसे प्रार्थना करती है कि मेरी सेवा स्वीकार करें। धर्म, अर्थ, काम भी भक्तके निकट कुछ सेवा-प्रार्थनाके लिए समयकी प्रतीक्षा करते हैं।

मधुर जातरति भक्त श्रीकृष्णकी दिव्यकिशोरमूर्तिसे प्रलुब्ध होते हैं, श्रीकृष्णका सर्वोच्च श्रृंगार रसविलास इसी आयुमें प्रकाशित होता है।

रात्रिदिने कुञ्ज कीड़ा करे राधा-सङ्गे।
कैशोर वयस सफल कैल क्रीड़ा रङ्गे ।।

(चै. च. म. ८.१८८)

विदग्धादि गुणोंसे युक्त रति-कला किशोरवयसमें ही मधुरतम रूपमें व्यक्त होती है। भक्तिरसामृतसिन्धुके अनुसार, “पूर्वरात्रि कालके रति-कौशल-औद्धत्यके प्रकाशक वचनोंसे सखियोंके सम्मुख श्रीराधाको लज्जावश संकुचित करके, उनके उरोजयुगलमें विचित्र केलि-मकरीका निर्माण करनेके कौशलकी पराकाष्ठा दिखाते हुए कुञ्जोंमें विहार करते-करते श्रीकृष्ण अपनी कैशोर-अवस्थाको सफल करते हैं।”

सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा

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अन्यान्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य को भविष्य की चिन्ता अधिक रहती है। मनुष्यों की अपेक्षा देवता अधिक सुख और स्वतन्त्रतापूर्वक रहते हैं, वे अधिक दिनों तक भोग कर सकते हैं, किन्तु उन देवताओं को अन्त में असुविधा की प्राप्ति होती है। देवता जन्म, ऐश्वर्य, सौन्दर्य एवं विद्या इत्यादि चार प्रकार के मदों से घिरे रहते हैं, तथा उनको ही बढ़ाने के लिए वे चेष्टारत रहते हैं। हम लोग देवताओं को इसलिए बड़ा मानते हैं, क्योंकि उनके पास मनुष्य की तुलना में अधिक भोग सामग्रियाँ हैं। परन्तु उनके पास मनुष्य जन्म में एक विशेष लाभ यह है कि वे देवताओं की भाँति भोगों में न डूबे होने के कारण अपने आत्मकल्याण की चिन्ता कर सकते हैं। मनुष्य भी यदि देवताओं का अनुकरण करते हुए जन्म, ऐश्वर्य, इत्यादि के मद में डूबा रहे, तो वह भी अपने कल्याण की चिन्ता नहीं कर सकता। देवताओं की तुलना में मनुष्यों को भगवान का भजन एवं साधुओं का संग करने का अधिक सुयोग प्राप्त है। इसलिए देव-जन्म से मनुष्य जन्म श्रेष्ठ है ।

मनुष्य जीवन में क्षण-क्षण में प्राप्त होने वाले कष्ट हमें जागतिक वस्तुओं एवं जागतिक क्षण भंगुरता का अनुभव कराते रहते हैं। किन्तु स्वर्ग सुख के कुछ दिव्य होने के कारण देवताओं को जगत की क्षण भंगुरता का अनुभव नहीं हो पाता । अतः ऐसा मनुष्य जन्म प्राप्त करने के कारण हमारे पास समय है कि हम अपना आत्म कल्याण कर लें। इस मनुष्य जन्म में ही हम जान सकते हैं कि किसमें हमारा मंगल है, किसमें अमंगल ।

श्रीलप्रभुपाद

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बैकुण्ठ-पुरुषों का तिरोभाव होने पर भी, ये विग्रह के रूप में नित्य अवस्थित हैं

हम श्रील ठाकुर की तिरोभाव-तिथि को सम्मान देने के लिए यहाँ एकत्रित हुए हैं। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि वे अभी इस संसार में अवस्थित नहीं हैं, इसीलिए उनके अभाव में हम यहाँ एक स्मृति-सभा का आयोजन कर रहे हैं। “वैष्णवेर गुणगान, करिले जीवेर त्राण।” (वैष्णवों का गुणगान करने से जीवों का उद्धार हो जाता है) – यह बात सत्य है; और यह बात भी सत्य है कि, “अद्यापिह सेइ लीला करे गोराराय।” (आज भी श्रीचैतन्य महाप्रभु वही लीला कर रहे हैं)। इसलिए मेरा कहना है कि, श्रील ठाकुर आज भी हमारे बीच विद्यमान हैं। हम यहाँ उनके सुसज्जित आलेख्य ‘अर्चा’-रूप दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त कर रहे हैं। वे हमारी अक्षज-धारणा के अन्तर्गत कोई चित्रपट मात्र नहीं हैं- वे स्वयं श्रील भक्तिविनोद ठाकुर हैं। उन्होंने अपने विभिन्न ग्रंथों में हमें बताया है कि, -श्रीविग्रह ही स्वयं वही तत्त्व-वस्तु हैं। इसलिए उनके वाक्य या ‘शब्द’ को प्रमाण के रूप में मानकर मैं कह रहा हूँ कि यह आलेख्य मूर्ति ही वही अप्राकृत श्रीमूर्ति है। जड़विद्या-बुद्धि को पकड़े रहने पर श्रीविग्रह का चिन्मयत्व, नित्यत्व कभी भी अनुभव में नहीं आ सकता है।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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विष्णु और वैष्णवों के प्रति प्राकृत बुद्धि करना कभी भी भगवान् के द्वारा अनुमोदित नहीं किया जाता, और न ही यह शास्त्र सम्मत है। इनके प्रति प्राकृत बुद्धि करने वाले को राक्षसी अथवा आसुरी प्रवृति वाला कहा जाता है। जैसे कि श्री भगवान् स्वयं गीता में कहते हैं-

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ।।

(गीता 9.11)

अविवेकी लोग मेरे मनुष्य की आकृति वाले श्रीविग्रह को सर्वोत्कृष्ट रुप में स्वीकार नहीं करते हैं और इसी कारण सर्वभूत महामहेश्वर ‘मुझमें, मनुष्य बुद्धि से अवज्ञा करते हैं।

श्री भक्ति प्रमोद पूरी गोस्वामी महाराज

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एक उत्सव की वास्तविक सफलता का निर्धारण

जब भी किसी स्थान पर उत्सव होता था, गुरु महाराज उसे केवल सन्यासी, ब्रह्मचारियों का नहीं, बल्कि मठ के प्रत्येक प्राणी के उत्सव के रूप में आयोजित करते थे। उन्होंने हमें निर्देश प्रदान किया हुआ था कि यद्यपि ठाकुरजी के लिए प्रतिदिन फूल-मालाएँ आती हैं, तथापि उत्सव के दिन विशेष फूलों की मालाएँ आनी चाहिएँ। वस्त्र तो वे नित्यप्रति धारण करते हैं, उत्सव के दिन विशेष वस्त्र, आभूषण आदि धारण करेंगे, मुरली, वंशी आदि भी उत्सव के दिन विशेष होनी चाहिएँ। गैयाओं को प्रतिदिन जो दिया जाता है, उत्सव के दिन भी वही भोजन नहीं बल्कि उनका भोजन भी उत्तम होना चाहिए। मठ में कार्य करने वाले मजदूर, मिस्त्री अथवा अन्य कर्मचारियों यथा दरबान आदि के लिए भी विशेष वस्तुएँ देनी होंगी, तभी उत्सव सम्पूर्ण होगा। ऐसा था गुरु महाराज का दृष्टिकोण प्रत्येक वस्तु के प्रति ।

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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लौकिकता के बदले कभी भी परमार्थ को तिलांजलि नहीं दी जा सकती है।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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एक शुद्ध भक्त में कभी भी भोग अथवा त्याग करने की प्रवृत्ति नहीं रहती। भगवान श्रीकृष्ण ही सभी यज्ञों के एकमात्र भोक्ता व प्रभु हैं। वे ही एक मात्र पुरुष—पुरुषोत्तम हैं। हम भोक्ता व प्रभु नहीं हैं, इसलिए हम न भोग कर सकते हैं न त्याग।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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