
अथापि ते देव पदाम्बुजद्वय-प्रसाद-लेशानुगृहीत एव हि।
जानाति तत्त्वं भगवन्महिम्नो न चान्य एकोऽपि चिरं विचिन्वन् ॥
(श्रीमद्भागवत १०/१४/२९)
हे देव! जो व्यक्ति आपके युगल चरणकमलोंका तनिक सा भी कृपाप्रसाद प्राप्त कर लेता है, उससे अनुगृहीत हो जाता है, वही आपकी सच्चिदानन्दमयी महिमाका तत्त्व जान सकता है। दूसरा कोई भी ज्ञान-वैराग्य आदि अपने साधनोंके द्वारा बहुत समय तक भी अनुसन्धान क्यों न करता रहे, वह आपकी महिमाका यथार्थ तत्त्व नहीं जान सकता।
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कृष्ण प्रीतिवाञ्छायुक्त भक्तोंके अतिरिक्त अन्य व्यक्तियोंका हृदय अपराधों के कारण मलिन तथा पाषाण सदृश कठोर होता है। ऐसे व्यक्तियोंमें भावोंका प्रदर्शन कृत्रिम होता है। श्रीमद्भागवतके अनुसार (२.३.२४)-
तदश्मसारं हृदयं व्तेदं यद्गृह्यमाणैर्हरिनामधेयैः ।
न विक्रियेताथ यदा विकारो नेत्रे जलं गात्ररुहेषु हर्षः ।।
हरिनाम संकीर्त्तनसे साधकका देह रोमांचित, हर्षित होकर उसके नेत्रोंसे अश्रुधारा प्रवाहित होने लगती है। परन्तु जिसके हृदयमें विकार या सात्विक भाव उदित नहीं होते, उसका हृदय, हृदय नहीं; कठोर वज्र है।
हरिनाम संकीर्त्तने रोम-हर्ष हय।
दैहिक विकार नेत्रे जल धारा बय।।
से समये नहे यार हृदय विकार।
धिक् तार हृदय कठिन वज्रसार।।
भजनरहस्यवृत्ति- अनेक समय श्रीहरिनाम ग्रहण करनेपर भी यदि हृदय द्रवीभूत न हो तब निश्चय ही वह व्यक्ति नामापराधी है। नाम सर्वशक्तिमान है। किन्तु पाषणसदृश कठिन स्थानमें शीघ्र प्रतिफलित नहीं होता। साधुनिन्दादि अपराधसमूह हृदय-विकारमें बाधक हैं। यदि प्रतिबन्धक सामान्य हों तो उच्चरित नाम नामाभास रूपमें प्रकाशित होता है, किन्तु गहन प्रतिबन्धक अर्थात् महत् पुरुषोंके चरणोंमें अपराध होनेसे चित्त लोहेके समान कठिन हो जाता है तथा श्रवण कीर्त्तन आदिसे भी द्रवीभूत नहीं होता।
यद्यपि हरिनामके द्वारा चित्तद्रवताका बाह्य लक्षण अश्रु-पुलकादि हैं परन्तु सब समय अश्रु तथा पुलक ही चित्त क्षोभका लक्षण है, यह भी नहीं कहा जा सकता। श्रील रूपगोस्वामीपाद कहते हैं कि जिन लोगोंका चित्त स्वभावतः ही पिच्छल है अर्थात् ऊपरसे कोमल तथा अन्दरसे कठोर है तथा जो व्यक्ति सात्त्विक भाव उदय करानेके लिए धारणाके द्वारा अभ्यास करते हैं, ऐसे व्यक्तियोंमें सत्त्वाभासके बिना भी कभी-कभी अश्रु-पुलकादि देखे जाते हैं। सब समय ये भाव भक्तिसे सम्बन्धित नहीं होते।
जिस भाग्यवान व्यक्तिकी सेवोन्मुख जिह्वापर शुद्ध हरिनाम उदित होनेके कारण हृदयमें विकार आ गया है, उसमें क्षान्तिरव्यर्थ कालत्वं इत्यादि नौ लक्षण निश्चय ही देखे जायेंगे। अतः असाधारण क्षान्ति, नामग्रहणमें असाधारण आसक्तिको ही हृदय विकारका लक्षण समझना चाहिये। मत्सरतायुक्त वैष्णव-प्राय साधारण व्यक्तिके चित्तमें अपराध रहनेके कारण अनेक समय ‘नाम’ (अर्थात् नामापराध) ग्रहण करनेपर भी नाम माधुर्य अनुभवके अभावमें उनका चित्त द्रवित नहीं होता। अतः चित्तकी क्षुब्धताको प्रकाशित करने वाले ‘क्षान्ति’ प्रभृति नौ प्रकारके लक्षण दिखनेपर भी उनका हृदय अपराधके कारण पाषाण सदृश कठोर होता है। वे निन्दाके योग्य हैं। परन्तु साधुसंगके द्वारा अनर्थ निवृत्तिके पश्चात् इनका चित्त क्रमशः निष्ठा, रुचि आदि पद्धतिपर अग्रसर होकर उचित समयपर द्रवित हो सकता है तथा तभी उनके हृदयका काठिन्य रूपी अपराध दूर हो जाता है। निष्किंचन शुद्ध महाभागवत गुरु वैष्णवोंकी कृपा प्राप्त करके उन्हींके आनुगत्यमें अपराध एवं अनथोंसे मुक्त होकर अंतमें रसमय ब्रजभावमें आरूढ़ होकर परम प्रयोजन प्रेम प्राप्त कर सकेंगे।
सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा
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कर्त्तापन का त्याग करना ही शरणागति का लक्षण है। कर्त्तापन का परित्याग करके कृष्ण को ही अपने पालक के रूप में ग्रहण करना शरणागति का स्वरूप लक्षण है (अर्थात् मैं अपना पालन-पोषण एवं रक्षा स्वयं ही करता हूँ, ऐसा अभिमान त्यागकर कृष्ण ही मेरे एकमात्र पालक एवं रक्षक हैं ऐसा विश्वास ही शरणागत का लक्षण है।) किसी पर आश्रित व्यक्ति को अपने कर्तृत्व (अर्थात् अपने पालन-पोषण इत्यादि की चेष्टा) की आवश्यकता नहीं रहती । यदि हमारे हृदय में ऐसा विचार आ जाए कि मैं वृषभानुनन्दिनी श्रीमती राधिकाजी का पाल्य हो जाऊँ, तो किसी प्रकार का तुच्छ जागतिक अभिमान हमारे हृदय पर अपना अधिकार नहीं जमा सकता। मैं केवल कृष्ण पर ही आश्रित हूँ, यदि ऐसा अभिमान हमारे हृदय में नहीं आया तो समझना चाहिए कि अभी शरणागति नहीं हुई है। जिसके फलस्वरूप कर्त्ता अभिमान, पिता (पालक) अभिमान रहना स्वाभाविक है ।
श्रीलप्रभुपाद
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बैकुण्ठ-पुरुषों का परिचय माया से परे
सिद्ध बैकुण्ठ-पुरुषों के स्वरूप का परिचय है। उनका ‘मंजरी’ आदि परिचय जागतिक स्त्री-पुरुषों की धारणा से परे है। भजन की अपरिपक्व (कच्ची) अवस्था में उस ‘मंजरी’ भाव का अभिनय करने पर पतन निश्चित है। भौतिक-वस्तु और बैकुण्ठ-वस्तु अन्धकार और रोशनी के समान पूर्णरूप से विपरीत है। यदि वे एक होते तो स्वयं महाप्रभु राधाभाव लेकर नहीं आ पाते। बैकुण्ठ-पुरुषों का एक ही शरीर में पुरुष और स्त्रीभाव एक साथ सत्य है। एक ही श्रील रूप गोस्वामी, कृष्ण-लीला में स्त्री और गौर-लीला में पुरुष के रूप में अवस्थान करते हैं। श्रील ठाकुर का बाहरी पुरुष-वेश दिखने पर भी स्वरूपतः उनका स्त्री-वेश है। इसलिए बैकुण्ठ तत्त्व, – जागतिक तत्त्व से बिल्कुल अलग है।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
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भगवान् का एक नाम कृष्ण है। कारण, वे सब को आकर्षित करके आनन्द प्रदान करते हैं एवं स्वयं आनन्दित होते हैं। कृष्ण हर विषय में सर्वोत्तम हैं, अखिलरसामृत मूर्ति हैं, वे सच्चिदानन्द विग्रह हैं, अनादि हैं व सबके आदि हैं। वे समस्त कारणों के भी कारण हैं। अतः वे एक मात्र विशुद्ध प्रेम द्वारा ही आराधनीय हैं। उनके साथ ही जीवों का नित्य सम्बन्ध है। श्रीकृष्ण को भूलना ही जीवों के दुःखों का मूल कारण है। श्रीकृष्ण को याद करने का सबसे सहज और निश्चित उपाय उनका नाम-संकीर्त्तन है। जाति, धर्म, पुरुष या स्त्री के भेदभाव के बिना व वृद्ध-युवक व बालक आदि अवस्थाओं के भेदभाव के बिना सभी भगवान् का नाम संकीर्त्तन करने के अधिकारी हैं। इस हरिनाम संकीर्त्तन रूपी झण्डे के नीचे सभी स्तरों के लोग एकत्रित हो सकते हैं। हमारी वैदिक-संस्कृति में ऋषियों ने धर्म और अधर्म के तारतम्यानुसार असीम समय को चार भागों में विभक्त किया है सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि। सत्ययुग के मनुष्यों में ज्ञान की प्रधानता होने की वजह से उन्हें जागतिक वस्तुओं की नश्वरता का बोध था। ये सभी विषय परिणाम में दुःख देने वाले हैं – इस बात का ज्ञान रहने के कारण उनकी संसार में स्वाभाविक अनासक्ति थी व उनका चित्त भी स्थिर था। अतः तब सर्वसाधारण भी ‘ध्यान’ के द्वारा भगवान् की आराधना कर सकते थे। बाद में त्रेतायुग में एक पाद अधर्म प्रवेश करने पर व रजोगुण की प्रधानता होने से सत्य युग की अपेक्षा कर्म और विषयों की तरफ लोगों का अधिक झुकाव होने के कारण उन विषयों को भगवान् के चरणों में समर्पण कर ‘यज्ञ’ के द्वारा भगवान् की आराधना की व्यवस्था दी गयी।
द्वापर युग में इन्द्रियों की चञ्चलता में वृद्धि होने पर व यज्ञ की योग्यता न रहने के कारण, इन्द्रियों को भगवान् की सेवा में नियोजित करने के लिये ‘श्रीमूर्ति के अर्चन’ (पूजा) को ही साधन के रूप से निर्धारित किया गया। परन्तु आज के समय में अर्थात् पापानुकूल कलियुग में तीन पाद अधर्म और एक पाद धर्म है। मनुष्य विषयाविष्ट, थोड़ी आयु वाले, कामातुर और व्याधिग्रस्त हैं। इसलिये ध्यान, यज्ञ और श्रीमूर्ति की पूजा करने में असमर्थ कलिहत जीवों के उद्धार का एकमात्र उपाय साक्षात् श्रीभगवान् के नाम का संकीर्त्तन करना ही है।
आराधना का उद्देश्य है चित्त का भगवान् में आवेश और तन्मयता को प्राप्त करना। अतः हमारे सुयोग्य ऋषियों ने जीवों के अधिकार के अनुसार एवं युग के अनुरूप साधन की व्यवस्था दी है।
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
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बद्धजीव श्रीगुरु और भगवान् की कृपा से समस्त अनर्थों को जीत सकते हैं। इसके अलावा अन्य अभिलाषाओं आदि को जय करने का और कोई उपयुक्त माध्यम नहीं है।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
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Sadhus can help us in our practice, but we should also make sincere effort to get the objective. If we try sincerely, God, His personal associates and the sadhus will come at our back. Always we should remember Yashoda Devi’s pastimes to fasten Krishna, Gopal, but every time there were two fingers less of rope. One finger—His Grace, other finger—sincere desire to serve.
Srila Bhakti Ballabh Tirtha Goswami Maharaj
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