वेदोंमें अवरोह-मार्ग का उपदेश-
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम् ॥
(मुण्डक ३/२/३, कठ २/२३)
(गुरु परम्परा क्रमसे जिस प्रणाली द्वारा तत्त्ववस्तु सत् सम्प्रदायको प्राप्त होती है, उसी प्रणालीका नाम अवरोह-मार्ग अथवा श्रौतपन्था है। इस मन्त्रमें श्रुति यही उपदेश करती हैं,)- यह परबह्म परमात्मा न तो प्रवचनसे, न बुद्धिसे और न बहुत सुननेसे ही प्राप्त होता है, बल्कि जिसको यह कृपाकर स्वीकार कर लेता है, उसके द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है, क्योंकि यह परमात्मा उसके निकट ही अपने यथार्थ रूपको प्रकट करता है ।
* * * * * * * * * * * * * * * *
श्रीराधा दास्याभिमानः यथा गोस्वामीवाक्य-
अभिमानं परित्यज्य प्राकृतवपुरादिषु
श्रीकृष्ण कृपया गोपीदेहे व्रजे वसाम्यहम्।
राधिकानुचरी भूत्वा पारकीयरसे सदा
राधाकृष्ण विलासेषु परिचर्या करोम्यहम् ।।
“मैं प्राकृत देहका अभिमान परित्याग करके श्रीकृष्ण कृपासे गोपीदेह प्राप्त करूँ तथा व्रजमें निवास करूँ। श्रीराधाजीकी अनुचरी होकर सर्वदा पारकीय रसविलासी राधाकृष्णकी परिचर्या करूँ।।”
स्थूल देहादिते आत्म बुद्धि परिहरि ।
कृष्ण कृपाश्रये नित्य गोपी देह धरि।।
कबे आमि पारकीय रसे निरन्तर।
राधाकृष्ण-सेवा-सुख लभिब विस्तर ।।
भजनरहस्यवृत्ति- साधक में जबतक देहात्मबुद्धि है, तबतक वह भजन राज्यमें प्रवेश नहीं कर सकता। समस्त प्रकारके शरीरगत अभिमान अर्थात् मैं ब्राह्मण हैं, क्षत्रिय हूँ आदि एवं मनगत अभिमान अर्थात् मैं गुणी हैं, धनी हैं, पण्डित हैं आदिका परित्यागकर तृणादपि सुनीच होकर अत्यन्त आर्तिपूर्वक प्रार्थना करें तभी कृष्ण कृपाकी प्राप्ति सम्भव है। समस्त प्रकारके अनर्थ अपराध अभिमान केवल सत्संग द्वारा ही दूर हो सकते हैं। रो-रो कर आर्त, दीन स्वरमें प्रार्थना करो कि “हे श्रीकृष्ण! हे श्रीराधे ! आपकी ऐसी कृपा कब होगी कि मैं व्रजमें निवासकर राधाजीकी दासीकी दासीकी दासी बनूँ, व्रजमें निवास पाऊँ तथा नित्यकाल पारकीय रससे राधाकृष्णके विलासमें दिनरात परिचर्या करूँ।” ‘गोपी देहे व्रजे वसाम्यहम्।’
ऐसी आर्तियुक्त प्रार्थनासे श्रीराधाजीकी सखी नित्य सिद्धा व्रजगोपियोंकी कृपासे हृदयमें गोपीभाव उदित होता है। गोपीभावके बिना राधाकृष्णकी निभृत निकुञ्ज रहकेलि विलास भूमि वृन्दावनधाम प्राप्त नहीं होता। इस भावकी प्राप्ति श्रीराधाजीकी अंतरंगा (खास कमरेकी सहचरी) सखियोंके आनुगत्यसे ही होती है। सखीवृन्दके अतिरिक्त इस लीलामें किसीका प्रवेश नहीं है। वे ही लीलाका विस्तार करती हैं तथा आस्वादन करती हैं। इन्हींकी कृपासे एकादश भाव तथा पंचदशा उत्पन्न होती है।
युगल चरण सेविबो निरन्तर येइ भावो
अनुरागी थाकिबो सदाय ।।
साधने भाविवे जहाँ सिद्ध देहे पाइबे तहाँ
राग पथे ये जे उपाय।।
‘पारकीया रसे सदा’ शास्त्रमें व्रज के पारकीयरसकी सर्वोत्तमता निर्धारित की गयी है। स्वकीय भावसे श्रीराधाकृष्णकी सेवासे गोलोक वृन्दावन प्राप्त होता है तथा पारकीय भावसे श्रीराधाकृष्णकी निकुञ्ज लीला स्थली व्रज वृन्दावनकी प्राप्ति होती है। इनमें उल्लास रतियुक्ता मञ्जरी सखियाँ ही सर्वोत्तम हैं वे निकुञ्ज रसकेलि लीलाविलासमें निसंकोच रूपसे सेवा करती हैं-
ताम्बूलार्पण-पादमर्दन-पयोदानाभिसारादिभि-
वृन्दारण्य महेश्वरीं प्रियतया यास्तोषयन्ति प्रियाः।
प्राणप्रेष्ठ सखीकुलादपि किलासङ्कोचिता भूमिकाः
केलिभूमिषु रूपमञ्जरि मुखास्ता दासिका संश्रये ।।
(श्रीरघुनाथ दास गोस्वामी, व्रजविलास स्तव-३८)
सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा
* * * * * * * * * * * * * * * *
श्रेयः पर (आत्मकल्याण सम्बन्धी विचार) एवं प्रेयः पर (जागतिक विषय सम्बन्धी विचार)। मनुष्य को श्रेयः के लिए ही चेष्टा करनी चाहिए। प्रेयः (जागतिक वस्तुएँ) तो अति सहजता से ही प्राप्त हो जाती हैं। परन्तु श्रेयः अर्थात् भक्ति अत्यन्त दुर्लभ है। श्रीमद्भागवत में कहा गया है- अनेक जन्मोंके पश्चात् मनुष्य जन्म प्राप्त होता है । अतः यह अत्यन्त दुर्लभ है। यद्यपि यह मनुष्यजन्म अनित्य है, परन्तु इसके द्वारा भक्ति प्राप्त की जा सकती है। अपनी स्वतन्त्रता का परित्याग करके भगवान का आश्रय ग्रहणकर निष्कपट रूप से भजन करने पर एक जन्म में ही भगवान को प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए मृत्यु आने से पूर्व ही एक क्षण भी विलम्ब किये बिना निरन्तर आत्मकल्याण के लिए चेष्टा परायण होना चाहिए। विषय भोग तो सभी जन्मों में प्राप्त होंगे ही किन्तु भक्ति अन्य किसी जन्म में सम्भव नहीं है ।
हमारा कोई भी जन्म क्यों न हो, विषय भोग तो प्रत्येक जन्म में मिलेंगे ही। मनुष्य – जन्म न होने पर भी अन्यान्य जन्मों में भी विषय भोग अवश्य ही मिलेंगे ।
मनुष्य – जन्म में केवल श्रेयः अर्थात् आत्मकल्याण हेतु ही चेष्टा करनी चाहिए । प्रेयः अर्थात् जागतिक विषय भोगों के लिए पशु भी चेष्टा करते ही हैं। मनुष्य की यही विशेषता है कि वह भगवान की कथाओं को सुन सकता है, उसका आचरण एवं आलोचना भी कर सकता है। किन्तु पशु परस्पर आलोचना नहीं कर सकते । अतः श्रेयः केवल मनुष्य जन्म में ही प्राप्त किया जा सकता है। मनुष्य जन्म प्राप्त कर भी यदि आत्मकल्याण के सम्बन्ध में विचार न किया जाय. तो निम्न श्रेणी के पशु-पक्षियों के साथ मनुष्यजन्म की समानता हो जाती है। किन्तु हमारे पास विवेक है। देवजन्म प्राप्त होने पर भी हम भोगों में ही उन्मत्त हो जायेंगे हमारा अच्छे-बुरे का विचार ढक जायेगा। इस जगत में सुख और दुःख दोनों ही प्राप्त होते हैं। देवजन्म में प्राकृत सुख ही अधिक प्राप्त होते हैं, किन्तु प्राकृत होने के कारण वे सुख भी नित्य स्थायी नहीं होते – “क्षीणे पुण्ये मत्र्यलोकं विशन्ति” अर्थात् पुण्य समाप्त होने पर जीव को स्वर्गलोक से इस मृत्युलोक में आना पड़ता है। यद्यपि हमें यह मनुष्य जीवन बहुत ही कष्ट से प्राप्त होता है। परन्तु ऐसा दुर्लभ जन्म प्राप्त करके भी हमें इस जगत में ही अनेक प्रकार के कार्य दिखाई देते हैं और उन कर्तव्यों को पूरा करते-करते सारा जीवन ही नष्ट हो जाता है। इस जगत में आकर हम मालिक बन जाते हैं और भगवान की सेवा न कर दूसरों से सेवा ग्रहण करते हैं।
श्रीलप्रभुपाद
* * * * * * * * * * * * * * * *
अच्छे-अच्छे भोजन व विश्राम की चिन्ता करने वाले धाम परिक्रमा के लिए अयोग्य
शरीर की सुख-सुविधाओं पर ज़्यादा ध्यान देने से हमारा धाम परिक्रमा का उद्देश्ये व्यर्थ हो जायेगा। बढ़िया भोजन-विश्राम के लिए व्यस्त रहने पर हमारा मूल्यवान समय नष्ट हो जायेगा। फिर भी इस विषय में जहाँ तक संभव हो अच्छे बन्दोबस्त का प्रयास कर रहा हूँ। दो वक्त भगवत् प्रसाद की व्यवस्था है। आप रुपये पैसे के बदले में इसे ग्रहण कर रहे हैं, यदि ऐसा सोचते हैं तो बड़ी गलती कर रहे हैं। रुपये पैसे के बदले भगवत् प्रसाद नहीं मिलता है। हमेशा याद रखें- प्रसाद का अर्थ है भगवत् अनुग्रह (भगवान की कृपा)। इस परदेस में चावल, दाल आदि आवश्यक सामग्रियाँ कठिनाई से प्राप्त होने के बावजूद हम उनके संग्रह के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं। फिर भी भगवान जब भी जिस प्रकार के प्रसाद की व्यवस्था करेंगे, उसे ही हमें प्रीतिपूर्वक ग्रहण करना चाहिए। मुझे लगता है कि कई यात्री इस ब्रज में बहुत बार आ चुके हैं। यदि इस संबंध में वे भी समिति के सेवकों के साथ मिलकर सहायता करेंगे तो यह विशेष आनन्द का विषय होगा।
श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * * * *
श्रीमन् महाप्रभु जब अपनी गोष्ठी के साथ मथुरा की ओर जा रहे थे तो कुछ समय के लिये वो रामकेलि नामक ग्राम में रुके थे। उसके बाद पुनः मथुरा की ओर अग्रसर न हो वह रामकेलि ग्राम से दक्षिण दिशा की ओर जाने वाले मार्ग से नीलाचल को चल दिये। मार्ग में गंगा के किनारे ठहरते-ठहरते कुछ दिन में श्री अद्वैताचार्य के घर पर पहुँच गये। वहाँ रहते समय एक कुष्ठ रोगी प्रभु के पास आया और आर्तनाद करते हुए दण्डवत् करने के लिए दण्ड के समान गिर पड़ा। दोनों भुजाएँ उठाकर अत्यन्त कातरता से रोते-रोते कहने लगा हे प्रभो! आप करुणामय हो। आप संसार के जीवों का उद्धार करने के लिये ही अवतरित हुए हो। दूसरों के दुख को देखकर आपका हृदय स्वाभाविक रूप से कातर हो जाता है, इसलिए मैं आपके समीप आया हूँ। कुष्ठ रोग से पीड़ित हूँ, और इसकी यन्त्रणा से जल रहा हूँ। कृपा करके इससे उद्धार का उपाय बतायें।
कुष्ठ रोगी के दुःखपूर्ण वचन सुनकर महाप्रभु क्रोधित होकर गर्जन करते हुए बोले अरे पापी ! मेरे सामने से दूर हट जा। तेरे दर्शन मात्र से ही लोगों में पाप उदय होता है। परम धार्मिक व्यक्ति भी यदि तेरा मुख देखेगा तो उस दिन उसे भी अवश्य ही दुख मिलेगा। तू वैष्णव निन्दक, महापापी और दुराचारी है। तुझे जितने कष्ट भोगने हैं, उनकी तो सीमा ही नहीं है। अरे पापी ! इसी ज्वाला को नहीं सह पाता तो कुम्भीपाक नरक में कैसे वास करेगा? जिन वैष्णवों के नाम से संसार पवित्र होता है, जिन वैष्णवों के चरित्र को ब्रह्मा इत्यादि देवता भी गान करते हैं, जिन वैष्णवों की सेवा करने से अचिन्त्य श्रीकृष्ण के चरणविन्द की प्राप्ति होती है। जिन वैष्णवों की पूजा से बढ़कर कुछ भी नही है। श्रीमद्भागवत में तो यहाँ तक कहा गया है कि कृष्ण को वैष्णवगण शेष, लक्ष्मी, ब्रह्मा, शिव जी तथा अपनी देह से भी अधिक प्रिय है। श्री भगवान् ने उद्धव से कहा
न तथा में प्रियतम आत्मयोनिर्न शंकरः।
न च संकर्षणो न श्रीर्नैवात्मा च यथा भवान् ।।
(श्रीमद्भागवतम 11.14.15)
हे उद्धव। मुझे तुम्हारे जैसे प्रेमी भक्त जितने प्रियतम हैं, उतने प्रिय मेरे पुत्र ब्रह्मा, शंकर, मेरे भाई बलराम, स्वयं अर्धांगिनी लक्ष्मी जी और मेरी अपनी आत्मा भी नहीं है।
श्री भक्ति प्रमोद पूरी गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * * * *
जन्म, कर्म और संग के प्रभाव से प्रत्येक मनुष्य का स्वभाव गठित होता है। एक ही माता-पिता की सन्तान होने पर भी उनके जन्म, वर्तमान कर्म और सँग में थोड़ा सा अन्तर होने के कारण एवं पूर्व अर्जित कर्म में अलग-अलग होने के कारण उनके स्वभाव एवं रुचि में ही जब भिन्नता देखी जाती है तो ऐसी अवस्था में विभिन्न परिवारों, स्थानों व जातियों के लोगों के स्वभावों और रुचियों में अन्तर होना कोई बड़ी बात नहीं है। इस प्रकार भिन्न-भिन्न स्वभाव और रुचि वाले लोगों के साथ रहते हुये, सब में एकता के लिये किसी उपाय को खोज निकालने की आवश्यकता है। केवल मुख से एकता के बारे में बोल कर धोखा देने से उसके परिणाम भयावह होंगे।
श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * * * *
छिपी हुई प्रतिष्ठाशा से भी सर्वनाश
कनक-कामिनी-प्रतिष्ठाशा में आसक्त होने से साधक-साधिकाओं का कभी आत्म-मंगल नहीं हो सकता है। कनक-कामिनी त्याग करने पर भी, यदि साधक-हृदय के किसी कोने में प्रतिष्ठाशा छिपी रहती है, तो उसी से ही सब कुछ व्यर्थ हो जाता है। श्रीहरि-गुरु-वैष्णवों की सेवा में अर्थ का कभी भी अपव्यवहार होना उचित नहीं है। उससे ‘ब्रह्मस्व अपहरण’ का दोष लगता है। श्रीहस्गुिरु-वैष्णवों की सेवा के लिए हम सबको समर्पण करना होगा। अंतिम श्वास तक हमें सेवामय जीवन यापन करना चाहिए।
श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * * * *
भगवान तो निर्गुण और अप्राकृत हैं। भगवान के भक्त भी अप्राकृत हैं, प्रकृति के अतीत हैं। उनका महात्म्य बद्ध जीव कैसे वर्णन करेंगे? उनका महात्म्य वर्णन करना ही मुश्किल है।
वैष्णवेर गुण गान करिले जीवेरे त्राण, यह तो बोल दिया, किन्तु वैष्णव तो अप्राकृत हैं। उनका गुणगान अपनी जड़ जिह्वा, जड़ मन अथवा जड़ बुद्धि के द्वारा कैसे करेंगे? वैष्णवों का गुणगान कीर्तन करने के लिए भी वैष्णवों की कृपा चाहिए।
वैष्णव की कृपा प्रार्थना करने के लिए वैष्णव की कृपा चाहिए। वैष्णव को स्मरण करने के लिए भी वैष्णवों की कृपा चाहिए। अन्य कोई उपाय नहीं है। तब भी, चेष्टा करने से वैष्णव की कृपा होती है (इसी विचार से हम उन्हें स्मरण करेंगे)।
श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
* * * * * * * * * * * * * * * *