वेदों में कर्म की निंदा

अविद्यायामन्तरे वर्त्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितन्मन्यमानाः ।
जङ्गमानाः परियन्ति मूढ़ा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धा ॥

जो अविद्याके बीचमें रहकर स्वयंको विवेकी और पण्डित कहते हैं, वे सब विपथगामी अज्ञानी अन्धे व्यक्तिके द्वारा परिचालित होकर बादमें अन्धेकी भाँति ही दुःख पाते हैं।

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इस स्थिति में पहुँचने पर पराशान्ति प्राप्त होती है; यथा श्रीमद्भागवत (११.२.४३)

इत्यच्युताङ्घ्रिं भजतोऽनुवृत्या भक्तिर्विरक्तिभगवत्प्रबोधः ।
भवन्ति वै भागवतस्य राजन् ततः परां शान्तिमुपैति साक्षात् ।।

हे राजन! इस प्रकार भक्तिके अभ्यासके द्वारा जो भगवानके चरणकमलोंका भजन करता है, उसे भगवानके प्रति प्रेममयी भक्ति, संसारके प्रति वैराग्य तथा उसके हृदयमें भगवत् तत्त्वज्ञान स्फुरित हो जाता है, जिसके फलस्वरूप वह परमशान्तिका अनुभव करने लगता है।

हेन अनुवृत्ति-सह येई कृष्ण भजे।
सुभक्ति, विराग, ज्ञान, ताहार उपजे ।।
से तीन सुन्दररूपे एकत्रे बाढ़िया।
पराशान्ति-प्रेमधन देय त आनिया।।

भजनरहस्यवृत्ति- नवयोगेन्द्रमेंसे अन्यतम ‘कवि’ ऋषि निमि महाराज के प्रश्न के उत्तरमें कहते हैं- भगवद्भक्ति के अतिरिक्त आत्यन्तिक मंगलका कोई उपाय नहीं है। काल्पनिक शान्ति अथवा जड़भोग राहित्य के लिए निर्बोध की भाँति क्षणिक प्रयास करके जीव मंगल लाभ नहीं कर सकता। श्रीभगवानके भक्तोंका आश्रय करके अभ्यास द्वारा त्रिगुणातीत भक्तिको प्राप्त करना ही श्रेय है। शुद्ध भक्तिमान व्यक्ति स्वयंरूप भागवतधर्ममें प्रतिष्ठित हो युक्त वैराग्यसे सेवा करते हैं तथा अज्ञानता उन्हें स्पर्श नहीं करती है। भक्तिराज्यमें प्रतिष्ठित हो उत्तरोत्तर उन्नत भक्ति लाभ करता हुआ पराशांति प्राप्त करता है। श्रीभगवानके भक्तोंका आश्रय लेना ही अभ्यास या अनुवृत्ति है। कृष्णसे अधिक उनके परिकरोंका स्मरण तथा अनुशीलन अधिक लाभकारी है। भक्ति साधकोंके लिए महाप्रभुकी अपेक्षा श्रील रूप गोस्वामी, रघुनाथदास गोस्वामीकी गोपियोंकी आनुगत्यमयी भक्ति-प्रणाली अधिक उपादेय है। भक्तोंके भावोंका चिंतन, प्रार्थना और रुदन यही लोभ उत्पत्तिकी विधि है। स्वरूप-सिद्धिको लक्ष्य करके इन्द्रियों द्वारा भक्तिका अनुशीलन साधन कहलाता है। भावोदय होनेपर यह साधन न रहकर भावभक्ति हो जायेगी तथा वस्तु सिद्धि होनेपर प्रेमसेवा लाभ होगी।

सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा

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निष्कपट गुरुसेवक की चित्तवृति कैसी होनी चाहिए ?

निष्कपट शिष्य गुरु देवात्मा होंगे। वे गुरु को देवता अर्थात् ईश्वर और आत्मा अर्थात् अपनी आत्मा के समान प्रिय जानेंगे। सर्वदा ही शिष्य के अन्दर यह अभिमान होगा कि श्रीगुरुदेव मेरे नित्य प्रभु हैं एवं में उनका नित्य सेवक हूँ। गुरु की सेवा ही उसका जीवन, भूषण एवं सत्ता होगी। वे गुरु के अतिरिक्त और किसी को नहीं जानते। सोते समय, स्वप्न में, भोजन के समय, भजन के समय सदैव गुरु की ही चिन्ता करते रहते हैं, यही गुरु का आनुगत्य है। इसीलिए वे जानते हैं कि कृष्ण के परम प्रिय श्रीगुरुदेव ईश्वर वस्तु हैं-स्वतन्त्र वस्तु हैं । श्रीगुरुदेव मेरे जैसे अयोग्य व्यक्ति की सेवा ग्रहण करें या न करें परन्तु मैं निष्कपट रूप से तन, मन, वचन से उनकी ऐकान्तिकी सेवा करने के लिए तैयार रहूँगा । यदि वे मुझको ठोकर मारेंगे, तभी मैं अपनी अयोग्यता समझ पाऊँगा । किन्तु श्रीगुरुदेव सत्य हैं मुझे सावधान रहना चाहिए कि कहीं क्षणभंगुर विषयभोग मुझे एक क्षण के लिए भी श्रीगुरुदेव की सेवा से वास्तव सत्य श्रीगुरुदेव से विमुख न कर पायें। मेरी एकमात्र यही प्रार्थना है कि श्रीगुरुदेव कृपापूर्वक मेरी सेवा ग्रहण करें। वे ऐसी कृपा करें कि मेरा किसी प्रकार का भी दुःसंग न हो और मैं उनकी सेवा से च्युत न होऊँ। यद्यपि मैं सर्वदा अयोग्य हूँ, परन्तु मुझे पूर्ण विश्वास है कि वे अयोग्य व्यक्तियों पर अधिक दया करते हैं । यही मेरा भरोसा है। मैं श्रीगुरुदेव की अहैतुकी दया प्राप्ति की आशा से उनकी सेवा अधिक से अधिक लोभयुक्त होऊँ।

श्रीलप्रभुपाद

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नित्यसिद्ध ब्रजवासियों की कृपा से ही ब्रजदर्शन सम्भव

महाजनगण कहते हैं, “अप्राकृत कभु नहे प्राकृत-गोचर”। अतः जड़ नेत्रों से हम उस चिन्मय वस्तु को कैसे पहचान सकते हैं? इसीलिए ब्रजवासियों की कृपा प्रार्थना करनी होगी। उनकी कृपा से मायाजाल दूर होने पर हम श्रीधाम का स्वरूप अनुभव कर सकेंगे। हमारे गुरुवर्ग ने बताया है-श्रीरूपमंजरी और श्रीरतिमंजरी को छोड़कर ब्रज और ब्रजराज-नन्दन के दर्शन या सेवा लाभ असंभव है। इसीलिए श्रीनयनमणि-मंजरी और श्रीकमल-मंजरी की अनुकंपा से हम उनकी कृपा प्रार्थना कर रहे हैं।

श्रील भक्ति प्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराज

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धर्मराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में उपस्थित व्यक्तियों में से सबसे पहले किसकी पूजा होनी चाहिए, इस विषय पर विचार करने के उपरान्त सहदेव ने श्रीकृष्ण को ही सर्वप्रथम पूजा के योग्य जान के घोषणा कर दी। उस समय जन्म से ही कृष्ण से द्वेष रखने वाला द्मघोष का. पुत्र शिशुपाल कृष्ण के उत्कर्ष को सहन नहीं करके नाना प्रकार की कठोर वाणी द्वारा उसकी निन्दा में प्रवृत्त हुआ। उस परिस्थिति में सभा में उपस्थित सज्जन लोग कृष्ण की निन्दा सुनते ही अत्यन्त दुख के साथ अपने कानों को ढककर के सभा से चले गये। इसलिए श्रीमद्भागत् में लिखा गया है-

जो भगवान् और उनके भक्तों की निन्दा सुन के भी उस स्थान को छोड़ कर नहीं जाता है, वह भी निन्दक व्यक्ति की भाँति पुण्य से भ्रष्ट एवं नरकगामी हो जाता है।

श्री भक्ति प्रमोद पूरी गोस्वामी महाराज

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उपवास करने से अर्थात् व्रत में भूखा रहने से ही क्या खाने की प्रवृत्ति समाप्त हो जायेगी? विषयों को ग्रहण न करने पर भी उन्हें ग्रहण करने की प्रवृत्ति दूर नहीं होगी। श्रेष्ठ-रस का आस्वादन होने से निकृष्ट रस का मोह अपने आप हट जाता है। भगवत् प्रेम रस का आस्वादन होने से कृष्णेतर रस के प्रति मोह नहीं रहता। इसे ही युक्त वैराग्य कहते हैं। इसीलिये युधिष्ठिर महाराज जी को नारदजी ने उपदेश करते हुये कहा था :-

“- येनकेनाप्युपायेन मनः कृष्णे निवेशयेत् ।

(भा.7/1/31)

अर्थात् हे महाराज युधिष्ठिर ! किसी भी तरह मन को कृष्ण में लगा दो। मैं वैराग्य कर रहा हूँ, संकल्प-विकल्पात्मक मन का संग कर रहा हूँ, किन्तु श्रीकृष्ण का संग नहीं कर रहा हूँ, उससे मेरा क्या फायदा होगा? मेरी जो पूजा कर सकता है, स्तव, स्तुति कर सकता है, उसका संग मेरे लिये हितकर नहीं है। जो शासन करता है, नियन्त्रण करता है मेरी गलतियाँ दिखाता है, उसका सँग ही मेरे लिये हितकर है।

श्रील भक्ति दयित माधव गोस्वामी महाराज

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साधन-भजन के द्वारा ही श्रीगुरु-भगवान् की महिमा की अनुभूति

सेवा-विहीन जीवन व्यर्थ है, इसीलिए समर्पितात्म (शरणागत) भक्त अपने जीवन का सम्पूर्ण दायित्व श्रीगुरु-भगवान् के श्रीचरणों में समर्पित करते हैं। वे जानते हैं कि, श्रीभगवान् मेरे हैं और मैं श्रीभगवान् का हूँ। सद्‌गुरु के माध्यम से ही प्रेममय श्रीभगवान् का प्रकाश होता है; श्रीभगवान् जीव की मनोवांछित सभी इच्छाओं को पूरा कर सकते हैं-वे कंगालों के बन्धु हैं। जिनका श्रीभगवान् के प्रति प्रचुर भक्तिविश्वास नहीं है किन्तु सरलता है, उनके साधन भजन में कातस्भाव आ जाता है; वे श्रीगुरु और भगवान् की अहैतुकी कृपा प्राप्त करने में सक्षम होते हैं। जो लोग गुरु-वैष्णव-भगवान् की श्रद्धापूर्वक सेवा-पूजा के द्वारा साधन-भजन करते हैं, वे प्रत्यक्ष रूप से ही इनके महिमा महात्म्य को अनुभव कर सकते हैं।

श्रीभक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराज

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जब सबके स्वार्थ के केन्द्र अलग अलग होंगे तब व्यक्तियों, गुटों तथा देशों के बीच विवादों को रोका नहीं जा सकता। उदाहरण के लिए अलग अलग केन्द्र लेकर जब हम गोल आकार (Circle) बनाएँगे तो उनकी परिधि (Circumference) अवश्य ही एक-दूसरे को काटेगी। परन्तु जब सभी गोल – आकारों (Circles) का केन्द्र एक होगा, तब हम बड़े-छोटे जितने भी गोल आकार बना लें, उनकी परिधि एक-दूसरे को काटेगी नहीं। इसी प्रकार श्रीचैतन्य महाप्रभु के अनुसार हमें अपने वास्तविक स्वरूप तथा सच्चे-स्वार्थ का ज्ञान होना चाहिए। हमारे जीवन का एक ही केन्द्र होना चाहिए, वह हैं-भगवान श्रीहरि। केवल भगवान ही सभी जीवों के स्वार्थ के केन्द्र हो सकते हैं, क्योंकि सभी जीवों के कारण भगवान ही हैं। अतः इस प्रकार भगवत्- प्रेम का अर्थ जीव मात्र से प्रेम निकलता है, चाहे वह जीव बड़ा हो या छोटा हो। अगर हम भगवान से सच्चा प्रेम करते हैं तो हम किसी जीव का अहित कर ही नहीं सकते क्योकि सभी जीव भगवान की सृष्टि हैं तथा उनके अंश हैं। भगवान से संबंध होने के कारण सभी जीव एक दूसरे से संबंधित हैं।

श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
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